आदर्श शैक्षिक पाठ्यक्रम

आजकल विद्यालयों में बालक के शारीरिक विकास मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए अनेक प्रयास किए गए। साथ में संवेगात्मक और सौंदर्यात्मक तथा सामाजिक विकास पर भी अनेक प्रयत्न किए गए। सामाजिक बुराइयों के प्रभाव को कम करने तथा दूषित राजनीति के प्रभाव से दूर रखने के लिए भी अनेक प्रयत्न किए गए।

आदर्श शैक्षिक पाठ्यक्रम

वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में शैक्षिक पाठ्यक्रम को निम्न प्रकार का होना चाहिए –

  1. शारीरिक श्रम को महत्त्व
  2. व्यावसायिक पाठ्यक्रम
  3. विज्ञान व तकनीकी को अनिवार्य स्थान
  4. कृषि को स्थान
  5. शारीरिक शिक्षा तथा स्वास्थ्य विज्ञान
  6. भारतीय भाषाओं का ज्ञान
  7. प्राचीन संस्कृति एवं इतिहास का अध्ययन
  8. धार्मिक व नैतिक शिक्षा
  9. राष्ट्रीय व समाज सेवा कार्यक्रमों का आयोजन
  10. क्रियात्मक पक्ष पर बल

1. शारीरिक श्रम को महत्व

पाठ्यक्रम में सबसे पहले छात्र छात्राओं के मन के शारीरिक श्रम के प्रति निष्ठावान उच्च उत्पन्न करने का गुण होना चाहिए। शारीरिक श्रम के द्वारा व्यक्ति श्रम के महत्व को समझता है तथा इससे व्यक्ति का भौतिक विकास होता है, जो अंततः राष्ट्र की प्रगति का सूचक बनता है। गांधी जी द्वारा भी शिक्षा में श्रम को महत्व दिया गया था। तथा कोठारी कमीशन ने भी इसे कार्यानुभव विषय के रूप में रखने की सिफारिश की थी। आज के भारतीय समाज के लिए उत्पादन शारीरिक श्रम एक अनिवार्यता बन गई है।

2. व्यावसायिक पाठ्यक्रम

वर्तमान भारतीय सामाजिक व्यवस्था को आज किताबी शिक्षा कि नहीं अपितु व्यावसायिक शिक्षा की अधिक आवश्यकता है। शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी अधिकांश व्यक्ति बेरोजगार घूम रहे हैं क्योंकि उन्हें उत्पादकता व्यवसाय का ना तो ज्ञान है और ना अनुभव। रोजगार उन्हीं परिस्थितियों में पाया जा सकता है जबकि पाठ्यक्रम व्यवसायिक हो।

3. विज्ञान व तकनीकी को अनिवार्य स्थान

आज का युग विज्ञान व तकनीक का युद्ध है तथा इसके ज्ञान के बिना किसी भी पाठ्यक्रम की कल्पना नहीं की जा सकती है कृषि विज्ञान व तकनीकी के बिना जीवन असंभव सिले पाठ्यक्रम में विज्ञान तथा तकनीकी को अनिवार्य रूप से स्थान मिलना चाहिए।

4. कृषि को स्थान

हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है तथा हमारी सामाजिक व्यवस्था भी प्रश्न के ऊपर निर्मित है। हमारे देश में आज भी 75% से अधिक जनता कृषि से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई है। अतः पाठ्यक्रम में कृषि को तथा कृषि पर आधारित उद्योगों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

5. शारीरिक शिक्षा तथा स्वास्थ्य विज्ञान

यह एक पुरानी कहावत है कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क होता है। इस दृष्टिकोण से ध्यान में रखते हुए सारे शिक्षा के द्वारा स्वस्थ शरीर का विकास किया जाना हमारे शिक्षा के पाठ्यक्रम का लक्ष्य होना चाहिए।

6. भारतीय भाषाओं का ज्ञान

हमारे देश में अनेक भाषाएं बोली जाती हैं इन भाषाओं में संबंध में सदर सामंजस्य बिठाने की दृष्टि से शिक्षा में एक मात्र भाषा तथा एक क्षेत्रीय भाषा का ज्ञान होना अनिवार्य है इससे राष्ट्रीय एकता की भावना की बलवती होगी।

7. प्राचीन संस्कृति एवं इतिहास का अध्ययन

अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए तथा राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने के उद्देश्य से पाठ्यक्रम में सांस्कृतिक परंपराओं वह हमारे देश के इतिहास को स्थान मिलना चाहिए। राष्ट्रीय एकता के लिए भी संस्कृति व इतिहास का ज्ञान होना छात्र-छात्राओं के लिए आवश्यक है।

8. धार्मिक व नैतिक शिक्षा

हमारा देश बहुत धर्मीय देश है यहां पर अनेक धर्मों को मानने वाले रहते हैं इसलिए किसी धर्म किसी धर्म विशेष की शिक्षा ना देकर सभी धर्मों की शिक्षा दी जानी चाहिए। इसी शिक्षा में नैतिक शिक्षा को भी शामिल किया जाना चाहिए। नैतिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में सामाजिक नैतिक मूल्यों का प्रशिक्षण प्रदान करना आवश्यक है। इस संपूर्ण विषय को सभी स्तरों पर सैद्धांतिक व क्रियात्मक रूप से लागू किया जाना चाहिए।

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