उपन्यास चित्रलेखा की भाषा शैली का विवेचन कीजिए।

चूंकि भगवती चरण वर्मा कवि भी हैं। अतः उनकी भाषाएं योजना में कलात्मक और हिंदी कथा साहित्य भाषा के प्रयोगों के समस्त गुण विद्यमान हैं। परंतु फिर भी यह कहा जा सकता है कि लेखक लक्षणा व्यंजना आदि के मकड़जाल में नहीं फंसा है।

उसने सीधे साधे और व्यावहारिक ढंग से ही अपनी बात कहने का प्रयास अधिक किया है। उपन्यास में जहां दार्शनिक तत्वों का विवेचन विश्लेषण आया है। वहां की भाषा कुछ परिभाषिक एवं गहण गुण अवश्य हो गई है। फिर भी मस्तिष्क को उसका अर्थ ग्रहण करने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि लेखक अधिकांशत भाषा की अलंकरण के चक्कर में नहीं पड़ता है। परंतु व्यक्ति चित्रण करने वाले स्थानों में सामान्यतः भाषा में अलंकार की प्रवृत्ति अवश्य आ गई है। इसका कारण शायद लेखक का कभी होना भी है। वैसे भी काव्यमता और सामान्य अलंकारिक ताको सौंदर्य वादी दृष्टि से भाषा का गुण ही स्वीकार किया जाता है।

अतः यह कहा जा सकता है कि चित्रलेखा उपन्यास की भाषा सभी दृष्टिओं से सहज एवं संयत है। विषय के अनुरूप ही उसमें माधुर्य तथा रोज का उचित एवं संयुक्त समावेश मिलता है। चित्रलेखा की भाषा में एक सहज बांकपन है। जो पाठकों के हृदय में उतर कर अपना अमित प्रभाव छोड़ देता है।

जहां तक उपन्यास की अभिव्यक्ति शैली का प्रश्न है सामान्यतया उसे ऐतिहासिक वर्णनात्मक शैली ही कहा जा सकता है यद्यपि लेखक ने अभिव्यक्त शैली की दृष्टि से इस उपन्यास में कुछ नितांत नए प्रयोग भी किए हैं।

उपन्यास की शैली में मनोवैज्ञानिक तथा विश्लेषणात्मक तत्वों का समावेश भी विशेष दर्शनीय है। यद्यपि उपन्यासकार ने प्रत्यक्ष का मनोविज्ञान और मनोविश्लेषण के सिद्धांत का प्रतिपादन या चर्चा तो उपन्यास में कहीं कहीं की तो भी उपन्यास के प्रायः सभी प्रमुख पात्र अब तक आए तथा काम के पुण्य जैसे मनोवैज्ञानिक सिद्धांत से ही परिचालित दिखाई देते हैं। फिर भी अभिव्यक्ति की सहजता स्पष्टता सरलता तथा रोचकता आदि सर्वत्र समान रूप से बनी रही है।

व्यंग्य विनोद की भी कमी नहीं है। शायद इन्हीं गुणों के कारण साहित्यिक उपन्यासों के क्षेत्र में जितनी लोकप्रियता चित्रलेखा को प्राप्त हो सकी है। हिंदी के शायद ही किसी अन्य उपन्यास को प्राप्त हो सकी हो।

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