कादम्बरी कथावस्तु

कादम्बरी ना केवल बाणभट्ट की अपितु संस्कृत गद्य साहित्य की उत्कृष्टतम कृति है। इसमें महाकवि बाणभट्ट की मौलिक प्रतिभा झलक रही है। इसकी संक्षिप्त कथावस्तु इस प्रकार है।

कादम्बरी कथावस्तु

विदिशा में शूद्रक नाम का प्रख्यात राजा राज्य करता था। एक दिन उसके पास एक चांडाल कन्या अत्यंत मेधावी शुक को लेकर पहुंचती है। सुखराज आसोतरा को वृंदावन में अपने जन्म से लेकर महर्षि जाबालि के आश्रम में पहुंचने तक के वृतांत को सुनाता है। वह वृतांत इस प्रकार है –

अत्यंत समृद्ध उज्जैनी के राजा तारापीड और रानी विलासवती अपनी तपस्या के द्वारा चन्द्रापीड नामक पुत्र रत्न को प्राप्त करते हैं। विद्या अध्ययन के पश्चात राजकुमार चन्द्रापीड अपने पिता के अमात्य सुक नास के पुत्र वैशम्पायन के साथ दिग्विजय के लिए प्रस्थान करते हैं। एक दिन वह अपने घोड़े इंदिरा युद्ध पर सवार होकर एक किन्नर युगल का पीछा करते हुए परम रमणीय अच्छोद सरोवर पर पहुंच जाते हैं।

वहां पर महास्वेता युवक तपस्वी पर अनुरक्त हुई थी। पुंडरीक भी महाश्वेता के प्रति आकृष्ट हो गया था। परंतु वह काम पीड़ा से इतना अधिक पीड़ित हो गया था कि मिलन के पूर्व ही उनकी मृत्यु हो गई। पुण्डरीक के साथ भविष्य में मिलन होगा, इस आशा से महाश्वेता तपस्विनी का व्रत धारण कर अच्छोद सरोवर के पास रहने लगी।

महाश्वेता की प्रिय सखी कादंबरी ने भी कौमार्य व्रत को धारण करने का निश्चय किया। महाश्वेता चन्द्रापीड को कादंबरी के समक्ष ले जाती है। चन्द्रापीड और कादंबरी प्रथम दर्शन में ही परस्पर अनुरक्त हो जाते हैं। परंतु उज्जैन से पिताजी के बुलावे पर चंद्रापीड को वहां से लौट जाना पड़ता है। और वे वैशंपायन को सेना के साथ लौटाने के लिए कहते हैं।

अधिक समय के व्यतीत हो जाने पर भी जब वैशंपायन नहीं आते हैं तो चंद्रापीड उनको खोजने के लिए अच्छोद सरोवर को प्रस्थान करते हैं। वहां पहुंचने पर महास्वेता उन्हें बताती है कि वैशंपायन मुझ पर आसक्त होकर प्रणय प्रस्ताव करने लगे। एवं मैंने उन्हें सुक हो जाने का श्राप दे दिया। अपने प्रिय मित्र को दुखद समाचार को सुनकर चन्द्रापीड ने भी उसी क्षण अपने प्राण छोड़ दिए। इसी समय कादंबरी वहां पहुंचती है और अपने प्रेमी को प्राण रहित पाकर स्वयं प्राण त्यागने के लिए उद्धत हो जाती है।

परंतु आकाशवाणी उसे ऐसा करने से रोक देती है और आश्वासन देती है कि महाश्वेता और कादंबरी का अपने प्रेमी से शीघ्र ही संयोग होगा। यहीं पर जाबालि की कथा समाप्त हो जाती है।



शुक राजा शूद्रक से कहता है कि जाबालि से अपने पूर्व जन्म के वृतांत को सुनकर मेरे हृदय में महाश्वेता के प्रति पूर्व प्रेम जागृत हो गया और मैं उस आश्रय से उड़ पड़ा। परंतु इस चांडाल कन्या ने मुझे पकड़ लिया और मुझे आपकी सभा में ले आई। मैं केवल इतना ही जानता हूं। तब चांडाल कन्या राजा शूद्रक को बतलाती है कि मैं पुंडरीक (वैशंपायन के रूप में हुआ था) की माता हूं मेरा नाम लक्ष्मी है।

आप (शुद्रक) ही पूर्व जन्म में चन्द्रापीड थे। अब आप की कथा पुंडरीक की शापावधि समाप्त होने वाली है। इसे सुनकर शुद्रक को कादंबरी प्रेम का स्मरण हो जाता है और तत्काल ही उसके प्राण निकल जाते हैं।

शूद्रक के प्राण निकलते ही चन्द्रापीड जीवित हो जाता है। इस प्रकार पुंडरीक और महाश्वेता चन्द्रापीड और कादंबरी का पुनर्मिलन होता है।

पुंडरीक और शुद्रक को प्राप्त होने वाले शाप का रहस्य इस प्रकार है-

महाश्वेता के प्रेमी पुंडरीक ने चंद्रमा को पुनः पुनः जन्म लेने का शाप दिया था। चंद्रमा ने भी पुंडरी को इसी प्रकार का शाप दिया। इसके फलस्वरूप चंद्रमा चन्द्रापीड के रूप में और पुजारी पुणे वैशंपायन के रूप में जन्म लिया और चंद्रा पीने शूद्रक के रूप में और वैशंपायन में शुक के रूप में जन्म लिया। शुक की कथा समाप्त के पश्चात सांप की अवधि समाप्त हो जाती है।

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