कामायनी श्रद्धा सर्ग

कामायनी श्रद्धा सर्ग 1

कामायनी का अर्थ है- “काम गोत्रजा”। कामायनी में कुल 15 सर्ग है। कामायनी श्रद्धा सर्ग में मनु व श्रद्धा को चित्रित किया गया है। काम की पुत्री होने के कारण श्रद्धा का दूसरा नाम कामायनी है। कामायनी महाकाव्य में शांत, श्रृंगार और वीर रस का प्रयोग हुआ है। कामायनी आधुनिक युग का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है। जयशंकर प्रसाद को कामायनी रचना पर मंगला प्रसाद पारितोषिक दिया गया।

जयशंकर प्रसाद की जीवनी

कामायनी श्रद्धा सर्ग 2
जयशंकर प्रसाद
कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार

आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में इनके कृतित्व का गौरव अक्षुण्ण है। वे एक युगप्रवर्तक लेखक थे जिन्होंने एक ही साथ कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिंदी को गौरवान्वित होने योग्य कृतियाँ दीं। कवि के रूप में वे निराला, पन्त, महादेवी के साथ छायावाद के प्रमुख स्तम्भ के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं; नाटक लेखन में भारतेन्दु के बाद वे एक अलग धारा बहाने वाले युगप्रवर्तक नाटककार रहे जिनके नाटक आज भी पाठक न केवल चाव से पढ़ते हैं, बल्कि उनकी अर्थगर्भिता तथा रंगमंचीय प्रासंगिकता भी दिनानुदिन बढ़ती ही गयी है। इस दृष्टि से उनकी महत्ता पहचानने एवं स्थापित करने में वीरेन्द्र नारायण, शांता गाँधी, सत्येन्द्र तनेजा एवं अब कई दृष्टियों से सबसे बढ़कर महेश आनन्द का प्रशंसनीय ऐतिहासिक योगदान रहा है। इसके अलावा कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में भी उन्होंने कई यादगार कृतियाँ दीं। विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करुणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन। 48 वर्षो के छोटे से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएँ की।

जन्म
30 जनवरी 1889
जन्म स्थान
वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत
मृत्यू
15 नवंबर 1937
पिता
बाबू देवीप्रसाद
सम्मान
जयशंकर प्रसाद को 'कामायनी' पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ था।

कामायनी श्रद्धा सर्ग

कामायनी श्रद्धा सर्ग

कामायनी श्रद्धा सर्ग में श्रद्धा एवं मनु का संवाद है। एक दिन जब मनु विचारों में लीन थे। तभी अचानक एक सुंदर संपन्न स्त्री ने उनके सम्मुख आकर पूछा कि इन जनहिन प्रदेशों में अपनी रूप बिखेरने वाले तुम कौन हो। नीग्रो वाली चिकने चर्म खंडों से ढका हुआ उस स्त्री का अर्धनग्न शरीर ऐसा प्रतीत होता था जैसे काले बादलों के वन में बिजली के फूल खिल उठे हो। वह गांधार प्रदेश की रहने वाली श्रद्धा थी। जिसकी सुंदरता मनु देखते ही रह गए।

हिमालय के दर्शन के लिए वह घर से निकल पड़ी थी और एक वृक्ष के नीचे खाद्य सामग्री देख कर उसे अनुमान हो गया था कि प्रलय होने के बाद भी कोई व्यक्ति इधर निकट में अभी जीवित है। मनु ने कहा मैं एक अभागा व्यक्ति हूं मैंने अपनी आंखों से असर के स्वपन विनाश का क्रूर ने देखा है।

श्रद्धा बोली प्रसिद्ध परिस्थितियों के चक्र में पीसकर कभी-कभी ऐसे अशोक भावना का उत्पन्न होना स्वाभाविक है। तुम्हारा अतीत दुख में रहा यह सत्य है। पर तुम उसी प्रकार के भविष्य की व्यर्थ कल्पना इस आधार पर करते हो वह सुख में हो सकता है। जीवन में यदि सुखी सुख होता तो भी प्राणी उससे ऊब जाता।

वस्तुओं के स्थायित्व को लेकर तुम क्या करोगे जो वस्तु जीवन हो चुकी है जिसका उपयोग नष्ट हो चुका है। उसे मिट जाने दो परिवर्तन को नित्य नवीनता के रूप में देखो किसी का एकाकी जीवन कभी सफल नहीं रहा था। बिना किसी प्रकार की हिचक के तुम्हारे जीवन में सुख भरने के लिए मैं तैयार रहूंगी।

प्रत्येक कार्य के पीछे कोई ना कोई उद्देश्य अवश्य होता है। कामायनी के श्रद्धा सर्ग में प्रसाद जी ने अपने उद्देश्यों का प्रतिपादन किया है और इन्हीं उद्देश्यों में प्रसाद जी के व्यक्तित्व विचार भी दृष्टिगोचर होते हैं। श्रद्धा का संक्षिप्त परिचय निराशा और पलायन वादी व्यक्ति के लिए आशा और कर्मठता का मधुर संदेश देती है।

कामायनी श्रद्धा सर्ग के अनुसार जीवन को गतिशील बनाए रखने के लिए परिवर्तन आवश्यक है। निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि काव्यात्मक सौंदर्य कामायनी का श्रद्धा सर्ग की सबसे बड़ी विशेषता है।

जयशंकर प्रसाद की रचनाएँ

शिक्षा - दीक्षा

प्रसाद जी की प्रारंभिक शिक्षा काशी में क्वींस कालेज में हुई, किंतु बाद में घर पर इनकी शिक्षा का व्यापक प्रबंध किया गया, जहाँ संस्कृत, हिंदी, उर्दू, तथा फारसी का अध्ययन इन्होंने किया। दीनबंधु ब्रह्मचारी जैसे विद्वान्‌ इनके संस्कृत के अध्यापक थे। इनके गुरुओं में 'रसमय सिद्ध' की भी चर्चा की जाती है।

घर के वातावरण के कारण साहित्य और कला के प्रति उनमें प्रारंभ से ही रुचि थी और कहा जाता है कि नौ वर्ष की उम्र में ही उन्होंने 'कलाधर' के नाम से व्रजभाषा में एक सवैया लिखकर 'रसमय सिद्ध' को दिखाया था। उन्होंने वेद, इतिहास, पुराण तथा साहित्य शास्त्र का अत्यंत गंभीर अध्ययन किया था। वे बाग-बगीचे तथा भोजन बनाने के शौकीन थे और शतरंज के खिलाड़ी भी थे। वे नियमित व्यायाम करनेवाले, सात्विक खान पान एवं गंभीर प्रकृति के व्यक्ति थे। वे नागरीप्रचारिणी सभा के उपाध्यक्ष भी थे। क्षय रोग से नवम्बर 14, 1937 (दिन-सोमवार) को प्रातःकाल (उम्र 47) उनका देहान्त काशी में हुआ।

रचनाएँ
काव्य
  1. कानन कुसुम
  2. झरना
  3. आंसू
  4. लहर
  5. कामायनी
  6. प्रेम पथिक
कहानी

कथा के क्षेत्र में प्रसाद जी आधुनिक ढंग की कहानियों के आरंभयिता माने जाते हैं। सन्‌ 1912 ई. में 'इंदु' में उनकी पहली कहानी 'ग्राम' प्रकाशित हुई। उन्होंने कुल 72 कहानियाँ लिखी हैं।

  1. छाया
  2. प्रतिध्वनि
  3. आकाशदीप
  4. आंधी
  5. इन्द्रजाल
उपन्यास

प्रसाद ने तीन उपन्यास लिखे हैं।

  1. 'कंकाल', में नागरिक सभ्यता का अंतर यथार्थ उद्घाटित किया गया है।
  2. 'तितली' में ग्रामीण जीवन के सुधार के संकेत हैं।
  3. 'इरावती' ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखा गया इनका अधूरा उपन्यास है जो रोमांस के कारण ऐतिहासिक रोमांस के उपन्यासों में विशेष आदर का पात्र है।

इन्होंने अपने उपन्यासों में ग्राम, नगर, प्रकृति और जीवन का मार्मिक चित्रण किया है जो भावुकता और कवित्व से पूर्ण होते हुए भी प्रौढ़ लोगों की शैल्पिक जिज्ञासा का समाधान करता है।

नाटक
  1. स्कंदगुप्त
  2. चंद्रगुप्त
  3. ध्रुवस्वामिनी
  4. जन्मेजय का नाग यज्ञ
  5. राज्यश्री
  6. कामना
  7. एक घूंट

आधुनिक हिन्दी काव्य

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