गणित शिक्षण के उद्देश्य

विद्यालय में भिन्न-भिन्न विषयों का पाठन होता है, प्रत्येक विषय का अपना अपना अस्तित्व तथा महत्व होता है। इसके साथ ही प्रत्येक विषय को पाठ्यक्रम में रखने का एक ध्येय होता है, विषय का महत्व उसके द्वारा प्राप्त किए जाने वाले उद्देश्यों से जाना जा सकता है। प्रत्येक विषय के अपने उद्देश्य होते हैं। गणित शिक्षण के उद्देश्य अन्य विषयों के उद्देश्यों से बिल्कुल ही अलग है। यदि उनकी पूर्ति हो जाती है तो यह कहा जा सकता है कि अमुक विषय का क्या महत्व है।

प्रत्येक उद्देश्य के अंतर्गत कुछ प्राप्त उद्देश्य आते हैं। विषय पढ़ाने का एक लक्ष्य होता है, जिसकी परीक्षा बालकों के विद्यालय को छोड़ने के पश्चात होती है, जिसको हम लक्ष्य भी कह सकते हैं। गणित शिक्षण के उद्देश्य की प्राप्ति में जिन छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रखना पड़ता है उन्हें प्राप्य उद्देश्य कहते हैं।

प्राप्य उद्देश्य को तैयार करने में बहुत होशियारी रखनी पड़ती है, क्योंकि किसी उद्देश्य की पूर्ति तभी संभव है, जब उसके अंतर्गत तैयार प्राप्य उद्देश्यो उद्देश्यों की तैयारी सही रूप से की गई हो। इनके मुख्य रूप से दो कार्य है –

  1. इनके द्वारा किसी उद्देश्य की पूर्ति होती है।
  2. इनके आधार पर पाठ्यवस्तु से प्रश्न तैयार करके बालकों को क्रिया विधि का ज्ञान होता है।
गणित शिक्षण के उद्देश्य

इसका मतलब यह है कि एक विशेष उद्देश्य की पूर्ति प्राप्य उद्देश्यो पर कार्य करने से पाठ्यवस्तु के आधार पर प्राप्त उद्देश्यों की परीक्षा हेतु प्रश्न तैयार कर विद्यार्थियों के व्यवहार की परीक्षा की जाती है। उदाहरण के लिए यह कह सकते हैं – यदि किसी प्रश्न के हल करने में बालकों की किसी योग्यता की परीक्षा नहीं होती है तो इस प्रकार के प्रश्नों से किसी उद्देश्य की प्राप्ति नहीं हो सकती है।

गणित शिक्षण के उद्देश्य

अन्य विषयों की भांति गणित को स्कूल में रखना अग्रंकिते उद्देश्यों पर आधारित है –

  1. सांस्कृतिक उद्देश्य
  2. अनुशासनिक उद्देश्य
  3. व्यावहारिक उद्देश्य

1. सांस्कृतिक उद्देश्य

गणित का एक मुख्य उद्देश्य सांस्कृतिक है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु गणित पढ़ने वाले विद्यार्थियों में कुछ सामान्य आदतों को बनाना होता है। इसका अभिप्राय क्या है कि उक्त विषय को पढ़ने वाले बालकों में कुछ सामान्य आदतों का विकास हो जाता है। गणित ही एक ऐसा विषय है जिस के अध्ययन से बालकों में तर्क शक्ति का विकास सबसे अधिक होता है। गणित शिक्षण के उद्देश्य में कुछ सांस्कृतिक उद्देश्य भी शामिल है। स्कूल में गणित पढ़ाने का मुख्य उद्देश्य बालकों की तर्क शक्ति का विकास होना चाहिए ना कि केवल तथ्यों को याद कराना। केवल गणित का एक अच्छा जानने वाला वही होता है जो दैनिक जीवन में उसके सिद्धांतों का प्रयोग कर सकें।

गणित शिक्षण के प्रमुख उद्देश्य 2

इसीलिए गणित पढ़ाने में तर्कशक्ति के विकास का ध्यान रखना, सूचना प्राप्त की अपेक्षा महत्वपूर्ण होता है। गणित पढ़ाने में विधि अधिक महत्वपूर्ण होती है। गणित में तर्कशक्ति के विकास हेतु उसकी स्पष्टता, शुद्धता, परिणामों की वास्तविकता मूलतः तर्कशक्ति का परिणाम आवश्यक होते हैं।

इस तरह वही व्यक्ति कुशल तथा उसका सामान्य व्यवहार समाज के अनुकूल होता है, जिसका व्यवहार वस्तु के निरीक्षण और तर्क से संबंधित हो। वह इस तरह स्कूल में शिक्षा समाप्त करने पर जब समाज का नागरिक बनता है तो उसके व्यवहार से स्पष्ट हो जाता है कि वह एक अच्छा नागरिक है या नहीं। स्कूल में इस तरह गणित की शिक्षा का एक मुख्य उद्देश्य सांस्कृतिक होता है।

2. अनुशासनिक उद्देश्य

इस उद्देश्य से हमारा अभिप्राय मानसिक अनुशासन से है, गणित के पढ़ने से बालकों में अनुशासन की भावना उत्पन्न होती है। बहुत से मनोवैज्ञानिक का कहना है कि गणित से जिस तर्क शक्ति का विकास होता है उसका क्षेत्र गणित संबंधी समस्याओं तक ही सीमित है। परंतु यह बात असत्य सिद्ध हो चुकी है क्योंकि किसी भी विषय में सीखी बातें तथा सिद्धांतों का प्रयोग सदैव जीवन में होता रहता है।

इसकी पुष्टि स्थानांतरण से होती है, वह विद्यार्थी जो कि एक साधारण कोटि के थे। गणित अभ्यास से एक बुध तथा चतुर विद्यार्थी बन गए हैं। यह इस बात का प्रमाण देता है कि गणित विषय से बालक में किस प्रकार अनुशासन पैदा हो जाता है। इसके अतिरिक्त इस तरह का ज्ञान उसको अन्य विषयों में सहायता प्रदान करता है। इस तरह विद्यार्थी अपने दिन प्रतिदिन के जीवन में एक आवश्यक व्यवहार करता है तथा उसमें अनुशासन की भावना जागृत हो जाती है।

गणित शिक्षण के उद्देश्य में अनुशासन एक विशेष स्थान रखता है।

3. व्यावहारिक उद्देश्य

गणित का व्यावहारिक उद्देश्य बहुत महत्वपूर्ण है। हमारी आधुनिक सभ्यता के आधार भी गणित ही है। आधुनिक युग विज्ञान का युग है विज्ञान की खोजों के कारण हमारे जीवन पर बड़ा प्रभाव पड़ा है इन खोजों के पीछे गणित के सिद्धांत है बिना गणित के विज्ञान की खोजों में सफलता मिलना असंभव है प्रत्येक व्यावहारिक कार्य में जैसे नापने, तौलने आदि का बोध गणित के ज्ञान द्वारा ही संभव है। इस तरह विज्ञान के अतिरिक्त अन्य विषयों में गणित का प्रमुख हाथ होता है।

हम दैनिक जीवन में मकान बनवाते हैं, कपड़े बनवाते हैं, जूते पहनते हैं, इन सभी कार्यों में गणित का ज्ञान आवश्यक है। एक अनपढ़ किसान भी यह जानता है कि 1 एकड़ भूमि में कितनी खाद पड़ेगी, कितना बीज डाला जाएगा, और कितनी उपज होगी। किसान हो या मजदूर व्यापारी हो या डॉक्टर वकील हो या इंजीनियर शिक्षक हो या पुजारी, सभी प्रतिदिन गणित के अंकों तथा सिद्धांतों का प्रयोग करते हैं।

एक मजदूर भी अपनी मजदूरी गिनना जानता है। एक रसोईया भी दाल सब्जी में नमक मसाले के अनुपात को जानता है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति जीवन में किसी न किसी रूप से गणित का प्रयोग अवश्य करता है। इस हेतु विद्यालयों का यह कर्तव्य होना चाहिए कि वे बालकों में इस तरह की भावनाओं को जागृत करें। जिससे बालक अपने समय का सदुपयोग कर सके इस तरह से बालक अपने अवकाश का अच्छा उपयोग भी कर लेगा तथा गणित सिद्धांतों को भी समझ लेगा।

गणित प्रत्येक व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण विषय है एक व्यापारी को गणित का ज्ञान होना आवश्यक है। वरना वह अपने व्यवसाय में कुशलता प्राप्त नहीं कर सकता। इसी तरह इंजीनियर कारीगर आज सभी लोगों को गणित का ज्ञान होना आवश्यक होता है। गणित शिक्षण के उद्देश्य से विद्यार्थियों के व्यवहार को भी परिवर्तित किया जाता है।

प्रत्येक व्यक्ति को बाजार में वस्तुओं को खरीदना या बेचना पड़ता है यदि उसने का ज्ञान ना होगा। तो वह कुछ कार्य नहीं कर सकता है उपयुक्त उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है। कि विद्यालय तथा उसके बाहर दोनों स्थानों में गणित का ज्ञान होना परम आवश्यक है। इस प्रकार से यह बात का सही ज्ञान होता है कि स्कूल में अन्य विषयों के समान गणित का व्यावहारिक उद्देश्य भी होता है।

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