चित्रलेखा उपन्यास व्याख्या

चित्रलेखा उपन्यास व्याख्या

चित्रलेखा उपन्यास भगवती चरण वर्मा द्वारा रचित हिंदी उपन्यास है। इस उपन्यास के गद्यांशो की व्याख्याएँ परीक्षा में पूछी जाती है। चित्रलेखा उपन्यास व्याख्या इस प्रकार हैं-

चित्रलेखा उपन्यास व्याख्याएँ

चित्रलेखा उपन्यास व्याख्याएँ

1. पर एक बात याद रखना। जो बात अध्ययन से नहीं जानी जा सकती है, उसको अनुभव से जानने के लिए ही मैं तुम दोनों को संसार में भेज रहा हूं। पर इस अनुभव से तुम स्वयं ही ना वह जाओ। इसका ध्यान रखना पड़ेगा। संसार की लहरों की वास्तविक गति में तुम दोनों बहोगे। उसी समय या ध्यान रखना पड़ेगा कि कहीं डूब ना जाओ।।

चित्रलेखा उपन्यास व्याख्या —- 1

मानव जीवन में अनुभव का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है। यद्यपि मनुष्य अपने जीवन में विविध पुस्तकों का निरंतर अध्ययन करता रहता है परंतु मात्र अध्ययन से ही वह ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता जो कि प्रत्यक्ष जीवन में कार्य व्यवहार में रहकर नित्य नए अनुभव द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। परंतु साथ ही साथ मनुष्य को इस बात का भी हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि वह सांसारिक गतिविधियों में ही ना डूब जाए।

उसे ध्यान से देख सुनकर उससे कुछ प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। तुम लोगों को संसार में प्रवेश करके उसकी धारा में लहरों तथा प्रवाह की भांति प्रवाहित होना है। अनुभव एवं ज्ञान प्राप्त करना है। अतः संभल कर रहना। इस प्रकार उनका भाव यही है कि व्यक्ति को संसार में रहकर अपने सर्वोच्च लक्ष्य पर सदैव ध्यान रखना चाहिए। तभी वह बहने से बच सकता है और कुछ सीख कर अनुभव कर सकता है।

2. भेद जानना चाहोगे तो सुनो जिसे सब समुदाय का उल्लास कहते हैं वह समुदाय के व्यक्तियों के रुदन का संग्रह है। निर्बल व्यक्तियों की आए हैं संगठित होकर समुदाय द्वारा जनित क्रांति का रूप धारण कर सकती हैं और साथ ही जहां समुदाय से हानि की कोई संभावना नहीं होती। वह व्यक्ति का महत्व भाव भायोतपादक केंद्र बन जाता है।

चित्रलेखा उपन्यास व्याख्या —- 2

समुदाय का आनंद वस्तुतः अनेक व्यक्तियों के रुदन और उल्लास का परिचायक होता है। समूह के सभी का उल्लास तथा रुदन साझा होता है। बाबू से निर्बल व्यक्ति मिलकर समुदाय का रूप ग्रहण कर लेते हैं और उनके दुख पूर्ण जीवन की आय संगठित होकर जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती हैं। इस प्रकार समूह की संगठित शक्ति अधिक बलवती और महत्वपूर्ण होती है जबकि किसी एक व्यक्ति को समाज तथा समुदाय से कोई हानि नहीं होती और वह समाज का अंग बनकर मतों का भाव जाग उठे तो उससे अनेक भय और हानियां हो सकती हैं।

अर्थात व्यक्ति एक ही व्यक्ति के प्रति आकर्षित होकर समाज की धारा से कट जाता है। व्यक्ति विशेष के मुंह में वह शारीरिक और मानसिक कष्ट भी पा सकता है। इस प्रकार चित्रलेखा का भाव यहां पर यह है कि अभी तक तो उसकी कलरु तथा जो एक समाज की प्रशंसा का केंद्र है परंतु यदि वह बीज गुप्त की ही होकर रह गई तो भविष्य में उसे अनेक यंत्रणा ए उठानी पड़ सकती हैं।

3. वासना पाप है जीवन को कलुषित बनाने का एकमात्र साधन है वासनाओं से प्रेरित होकर मनुष्य ईश्वरी नियमों का उल्लंघन करता है और उसमें डूब कर मनुष्य अपने मन को अपने रचयिता ब्रम्हा को भूल जाता है। इसलिए वासना त्याज्य है यदि मनुष्य अपनी इच्छाओं को छोड़ सके तो वह बहुत ऊपर उठ सकता है। ईश्वर के तीन गुण हैं सत चित और आनंद तीनों ही गुण वासना से रहित विशुद्ध मन को मिल सकते हैं पर वासना के होते हुए मामा तो प्रधान रहता है और ममत्व के क्रांतिकारक आवरण के रहते हुए ममत्व प्रधान रहता है और क्रांतिकारक आवरण के रहते हुए इस में से किसी एक का पाना असंभव है।

चित्रलेखा उपन्यास व्याख्या —- 3

वासना मनुष्य के अच्छे भले जीवन को कलंकित करने वाला एक पाप है क्योंकि वासनाओं से घिरा व्यक्ति ईश्वरी नियमों की परवाह नहीं कर के भ्रष्ट हो जाता है। और वह अपनी वास्तविकता तथा इसकी सकता के अस्तित्व को भी भुला देता है। यह व्यक्ति की आत्मा का चरम पतन है। अतः वासना सर्वथा त्याज्य होनी चाहिए ऐसा करके ही मानव संसार के मोह माया के सामान्य धरातल को त्याग कर स्वर्ग तथा मुक्ति के मार्ग पर चल सकता है।

और वह सांसारिक सुख दुख से विरक्त हो जाता है। इस प्रकार जब मनुष्य भी अपने मन को वासनाओं से मुक्त करके स्वच्छ एवं निर्मल बना लेता है। तो वह भी परमात्मा सदस्य हो जाता है परंतु जब वह वासना का अंत नहीं होता मनुष्य की चेतना में महत्त्व तथा अहम का भाव बना रहता है।

4. और सुख कहते हैं कि तृप्ति को यहां भी तुम भूलती हो। यदि तृप्ति ही संतोष का एकमात्र साधन हो सके तो वह सुख अवश्य हैं। पर कर्म जाल में फंसे रहने पर तृप्ति के साथ संतोष नहीं होता। ब्रह्म, माया के सहयोग से स्वयं को भूल जाता है तथा कर्म जाल में भटकने लगता है पर जिस समय वह माया को छोड़ देते हैं और अपने को जान लेता है। वह प्राप्त हो जाता है। दुखमय संसार छोड़ देने ही को सुख कहते हैं।

चित्रलेखा उपन्यास व्याख्या —-4

वास्तव में, संसार में रहकर इंद्रिय सुख पाना ही सच्ची तृप्ति नहीं है। वस्तुतः ऐसा मानना भूल है हां, यदि संसार के कार्यों से प्राप्त होने वाली तृप्ति व्यक्ति की चेतना में असंतोष का भी भाव जगा दे तो उसे सुख के रूप में अवश्य स्वीकार किया जा सकता है। परंतु जीवन भर कार्यों के जाल में उलझा रहने वाला व्यक्ति ना तो तृप्ति और ना ही वास्तविक सुख प्राप्त कर सकता है। भ्रम भी जब माया के संसर्ग में आता है। तो वह अपनी वास्तविक सत्ता को भूलकर वह संसार में कर्म जीव में भटकते हुए दुखी होने लगता है।

परंतु माया को त्याग कर अपने आप को पहचानने पर ही उसे वास्तु तृप्ति का अनुभव होता है। वह तरफ से संतोष प्रदान करने वाली कथा असंतोष से ही वास्तविक सुख की अनुभूति हो सकती है। इस प्रकार दुखों के कारण इस संसार से हटकर उसकी सच्ची साधना में ही सुख है कर्म तो संसार में भटका कर दुख ही देने वाले हैं। यहां पर कुमार गिरी का भाव यही है। कि जब तक व्यक्ति का मन किसी भी प्रकार के संसारी कार्यों में लीन रहता है। सच्चे सुख की अनुभूति उसे कभी नहीं हो सकती।

5. ईश्वर मनुष्य का जन्मदाता है और मनुष्य समाज का जन्मदाता है। धर्म ईश्वर का सांसारिक रूप है। वह मनुष्य को ईश्वर से मिलाने का साधन है। धर्म की अवहेलना ईश्वर की अवहेलना है। सत्य से दूर हटना है। सत्य एक है, धर्म उसी सत्य का दूसरा नाम है। यदि नीतिशास्त्र धर्म के सिद्धांतों के प्रतिकूल है तो वह नीतिशास्त्र नहीं वरन अनीतिशास्त्र है। उचित और अनुचित, न्याय और अन्याय इन सब की कसौटी धर्म है, धर्म के अंतर्गत सारा विश्व है।

चित्रलेखा उपन्यास व्याख्या —-5

मानव का जन्मदाता ईश्वर है तथा उसी की शक्ति एवं चेतना से प्रेरित होकर मानव ने अपने लिए समाज का निर्माण किया। संसार में जिसे धर्म कहा जाता है वह भी वास्तव में ईश्वर का ही रूप है। धर्म के सद मार्ग पर चलकर ही व्यक्ति ईश्वर तक पहुंचने में समर्थ हो सकता है, जबकि धर्म का अनादर करने वाला ईश्वर के सत्य से हमेशा दूर रहता है। सारे संसार का सत्य ईश्वर के समान एक ही है। इसी कारण धर्म, सत्य और ईश्वर का दूसरा नाम है।

इस प्रकार यदि कोई भी नीतिशास्त्र किसी भी धर्म का विरोध कर उसके विरुद्ध चलता है तो वह ईश्वर के विपरीत माना जाएगा। अतः उसे नीति शास्त्र कहना भ्रम है। असत्य और अनीति को प्रश्रय देना है। धर्म की दृष्टि से ही व्यक्ति उचित अनुचित न्याय अन्याय का वास्तविक निर्णय कर सकता है। समस्त शक्तियों की परख का साधन धर्म ही है और सारा संसार धर्म के अंतर्गत आता है और उसके बिना अस्तित्व मिथ्या है।

6. अंतरात्मा ईश्वर द्वारा निर्मित नहीं है वरन् समाज द्वारा निर्मित है। यदि वास्तव में वह ईश्वर प्रदत्त होती। तो भिन्न-भिन्न समाज के व्यक्तियों की अंतरात्मा भिन्न-भिन्न ना होती। ईश्वर एक है यदि वास्तव में उसने धर्म के नियम बनाए हैं। तो प्रत्येक व्यक्ति पर एक ही नियम लागू होता है पर बात ऐसी नहीं है।

चित्रलेखा उपन्यास व्याख्या —-6

ईश्वर एक कल्पित वस्तु है जिसकी कल्पना समाज ने की है। अतः मनुष्य की अंतरात्मा का निर्माण भी समाज ही करता है। अर्थात देश काल के अनुरूप जहां जैसे समाज होता है। वहां के लोगों की अंतरात्मा भी वैसे ही बन जाती है। इसका साक्षात प्रमाण यह है कि सभी लोगों की अंतरात्मा में एक स्पष्ट अंतर देखा जा सकता है। सभी धर्मों का निर्माण भी एक ही ईश्वर ने नहीं किया क्योंकि यदि ऐसा होता तो सारा संसार एक ही धर्म को मानने वाला होता।

इस प्रकार यह स्पष्ट और निश्चित है कि मनुष्य की अंतरात्मा का संबंध ईश्वर या उससे बनाएं किसी नियम से नहीं है। अपितु समाज तथा उसके द्वारा बनाए गए नियमों से है। समाज के प्रति विश्वास अंधविश्वास या श्रद्धा जी वास्तव में मनुष्य की अंतरात्मा की कल्पना तक संभव नहीं हो सकती है। इस प्रकार चाणक्य का भाव यहां यह है कि मनुष्य के जीवन की सभी प्रवृत्तियों धर्म तथा नियम समाज सापेक्षता में ही मानव की गति है।

7. स्त्री शक्ति है। वह श्रष्टि है, यदि दूसरे संचालित करने वाला व्यक्ति योग्य है। वह विनाश है, यदि से संचालित करने वाला व्यक्ति अयोग्य है। इसीलिए जो मनुष्य स्त्री से भय खाता है, वह या तो अयोग्य है या कायर है। अयोग्य एवं कायर दोनों ही व्यक्ति अपूर्ण है।

चित्रलेखा उपन्यास व्याख्या —-7

नारी के जीवन में शक्ति, सृष्टि की रचना और विकास तथा माया ममता का रूप सभी विद्वान है। वह इनमें से क्या प्रमाणित होती है। या उसे संचालित करने वाली की शक्ति तथा योग्यता पर निर्भर करता है। यदि नारी का पथ प्रदर्शन करने वाला व्यक्ति स्वयं योग्य और शक्तिशाली होगा। तो नारी शक्ति और निर्माण करने वाली सिद्ध होगी। परंतु यदि उसका संचालन या पथ प्रदर्शक स्वयं ही निर्बल तथा अयोग्य होगा।

तो निश्चय ही माया तथा अंधकार बनकर नारी स्वयं भी नष्ट होगी और अपने साथ ही दूसरों को भी ले डूबेगी। ऐसी दशा में वह विनाश का प्रतीक बन जाएगी। अतः स्त्री से डरने वाले व्यक्ति को या तो कायर कहा जाएगा। या फिर अपनी शक्ति तथा योग्यता के प्रति अविश्वास कर रखने वाला सभी प्रकार से अयोग्य कहा जाएगा। जिस मनुष्य में चाहे अयोग्यता है चाहे कायरता उसे किसी भी तरह से पूर्ण नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार योगी कुमार गिरी यदि नारी से किसी प्रकार भी वह रखता है तो निश्चय ही वह एक आयोग एवं अपूर्ण व्यक्ति होगा।

8. प्रेम का संबंध आत्मा से है, प्रकृति से नहीं जिस वस्तु का प्रकृति से संबंध है। वह वासना है क्योंकि वासना का संबंध बाह्य से है। वासना का लक्ष्य वह शरीर है जिस पर प्रकृति में कृपा करके उसको सुंदर बनाया है। प्रेम आत्मा से होता है शरीर से नहीं। परिवर्तन प्रकृति का नियम है आत्मा का नहीं आत्मा का संबंध अमर है।

चित्रलेखा उपन्यास व्याख्या —-8

प्रकृति के अदृश्य प्रेम को परिवर्तनशील मानना उचित नहीं है। क्योंकि प्राकृति बाह्य रूप है, इसीलिए इस बाहरी रूप से संबंध रखने वाली शारीरिक वासना तो हो सकती है। परंतु प्रेम नहीं। प्रेम बाय नहीं हो सकता प्रेम का लक्ष्य आत्मा होता है। जबकि वासना का लक्ष्य प्रकृति द्वारा निर्मित सुंदर शरीर होता है। प्रेम का संबंध शरीर के बाहरी सौंदर्य से नहीं होता बल्कि आत्मा की सुंदरता से हुआ करता है। इस कारण प्रेम को परिवर्तित होने वाला नहीं माना जा सकता क्योंकि परिवर्तन का विषय प्रकृति है आत्मा नहीं।

इस प्रकार बीजगुप्त भाव यहां पर केवल यही है कि प्रेम एक आत्मिक वस्तु है, वह आत्मा के समान ही परिवर्तनशील पवित्र तथा अजर अमर होता है। पवित्र प्रेम में वासना के लिए कोई स्थान नहीं होता है।

9. उन्माद और ज्ञान में जो भेद है, वही वासना और प्रेम में है। उन्माद स्थाई होता है और ज्ञान स्थाई। कुछ क्षणों के लिए ज्ञानलोक हो सकती है पर वह मिटता नहीं। जब पागलपन का प्रहार होता है। ज्ञान लोप होता हुआ विदित होता है, पर उन्माद बीत जाने के बाद ही ज्ञान स्पष्ट हो जाता है। यदि ज्ञान अमर नहीं हो तो प्रेम भी अमर नहीं है, पर मेरे मत में ज्ञान अमर है ईश्वर का एक अंश है और साथ ही प्रेम भी।

चित्रलेखा उपन्यास व्याख्या —-9

प्रत्येक वस्तु ज्ञात तत्वों के बारे में व्यक्ति का अपना-अपना सोचने का ढंग तथा विश्वास होता है। फिर भी मेरे विचार में जिस प्रकार उन्माद की स्थिति को ज्ञान नहीं कहा जा सकता, ठीक उसी प्रकार वासना को भी प्रेम की संज्ञा नहीं दी जा सकती। दोनों की स्थितियों में बड़ा तथा गहरा अंतर है। उन्माद अथवा पागलपन का भाव छानिक होता है, जबकि ज्ञान का भाव स्थाई होता है। यद्यपि ज्ञान की दशा किसी विशेष कारणवश कुछ क्षणों के लिए लुप्त अवश्य हो सकती है पर हमेशा के लिए नहीं।

वह कभी मिटता नहीं। पागलपन की दशा बीती, ज्ञान का दशा फिर स्पष्ट प्रकट हो जाती है। अतः यदि ज्ञान को हम अमर नहीं कह सकते हैं तो प्रेम को भी अमर नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि प्रेम का भाव जागृत ज्ञान दशा में ही उत्पन्न होता है। मैं यह मानता हूं कि ईश्वर का अंश है। अतः वह भी अमर है।

10. मनुष्य को सुखी और संतुष्ट जीवन की आवश्यकता होते हुए भी उस में हलचल का पुत्र होना ही चाहिए। प्रेम मनुष्य का निर्धारित लक्ष्य है। कंपन और कंपन में सुख, प्यास और तृप्ति प्रेम का क्षेत्र यही है। जीवन में प्रेम प्रधान है। जीवन में आवश्यक है, एक दूसरे की आत्मा को अच्छी तरह जान लेना एक दूसरे प्रगाढ़ सहानुभूति और एक दूसरे के अस्तित्व को एक कर देना ही प्रेम है। जीवन का सर्व सुंदर लक्ष्य है।

चित्रलेखा उपन्यास व्याख्या —-10

यद्यपि प्रत्येक मनुष्य सुख और संतोष जीवन चाहता है। पर चाहे कितने भी सुख और संतोष के साधन क्यों न मिल जाएं यदि जीवन में धड़कन और हलचल नहीं है। तो उसे जीवन की जड़ता ही माना जाएगा। हलचल के बिना जीवन मृत शरीर के समान होता है। वस्तुतः जीवन में जीवन से तथा इच्छा अनुरूप प्राणियों से प्रेम भाव जीवन का एक पूर्ण सुनिश्चित उद्देश्य है, क्योंकि वही जीवन में हल चलाता है। प्रेम मानव मन में धड़कनें तथा भावनाएं पैदा करता है।

उससे सुख की उत्पत्ति होती है। प्यास के जागने पर ही उसकी तृप्ति के लिए हलचल होती है। ठीक यही स्थिति प्रेम में भी होती है, इस प्रकार इसी प्रेम को प्रेम का क्षेत्र कहना चाहिए। इसी के कारण जीवन में प्रेम की प्रधानता भी प्राप्त हुई है, जीवन में एक दूसरे को भली प्रकार पहचान कर पूर्ण सहानुभूति के भाव से अपना अस्तित्व दूसरे के अस्तित्व में मिला देना ही वस्तुतः प्रेम है। यही प्रेम जीवन का श्रेष्ठ लक्ष्य है।

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