जातीय संघर्ष निवारण

जातीय संघर्ष निवारण के लिए अनेक समाज शास्त्रियों ने अपने अपने सुझाव दिए हैं। स्वस्थ समाज के विकास के लिए आवश्यक है कि विकास के मार्ग की बाधाओं और समस्याओं को दूर किया जाए तथा अनुकूल परिस्थितियों का सृजन किया जाए।

जातीय संघर्ष निवारण

जातीय संघर्षों निवारण हेतु सुझाव निम्नलिखित हैं।

  1. जातिवाद की समाप्ति
  2. आर्थिक समानता
  3. उचित शिक्षा
  4. स्वस्थ जनमत
  5. असामाजिक तत्वों में वृद्धि
  6. सांस्कृतिक विघटन
  7. स्थिरता में बाधा
  8. शांति व व्यवस्था की समस्या
  9. लोकतंत्र व सरल
  10. अंतर्जातीय विवाह
जातीय संघर्ष निवारण
जातीय संघर्ष निवारण

1. जातिवाद की समाप्ति

जातिवाद देश के लिए अभिशाप है। इसके रहते क्षुद्र स्वार्थों, संकीर्णता व विघटन को बढ़ावा मिलता है। जातिवाद की समस्या के समाधान के लिए इरावती कर्वे ने सभी जातियों की आर्थिक व सामाजिक समानता को आवश्यक बताया है। घुरिए ने अंतरजातीय विवाहों की वकालत की है। काका कालेकर ने उचित शिक्षा पर बल दिया है।

2. आर्थिक समानता

कुछ लोग आर्थिक समानता को जातीय संघर्षों का मूल कारण मानते हैं। इसी के रहते शोषण, अन्याय, बेकार, अत्याचार पनपते हैं। आर्थिक समानता से आर्थिक अंतर की खाई पटेगी। शांति व्यवस्था, सुख संतोष का वातावरण होगा।

3. उचित शिक्षा

काका कालेकर उचित शिक्षा पर विशेष बल देते हैं। इससे लोगों से समतामूलक विचार बन पनपेंगे। भेद-भाव, संकीर्णता, शोषण व अन्याय में कमी होगी। इसी के साथ सामाजीकरण भी जातीय संघर्ष का प्रभावी समाधान हो सकता है।

4. स्वस्थ जनमत

जनमत में बड़ी शक्ति होती है। शक्तिशाली लोगों को भी इनके सामने झुकना पड़ता है। यदि समाज में स्वस्थ जनमत का निर्माण हो तो अनेक विकृतियों और बुराइयों पर काबू पाया जा सकता है। जातीय संघर्ष का समाधान सरलता से किया जा सकता है।

5. असामाजिक तत्वों में वृद्धि

जातीय संघर्षो से असामाजिक तत्वो की आती है। उनकी सेवा व सहायता बदला लेने के लिए उच्च और निम्न दोनों प्रकार की जातियां लेती हैं।

6. संस्कृतिक विघटन

जातीय संघर्षों से सामाजिक संस्थाओं, सांस्कृतिक मूल्यों व आदर्शों का क्षरण होता है। समाज में घृणा, भय, आशंका व अविश्वास का बोलबाला होता है।

7. स्थिरता में बाधा

जातीय संघर्ष से समाज की स्थिरता व सामंजस्य को प्रभावित होता है। एकमत्व का अभाव होता है। महत्वपूर्ण विषयों में विरोध मिलता है तथा अस्थायित्व व विघटन बढ़ता है।

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8. शांति व व्यवस्था की समस्या

जब जातीय संघर्ष बढ़ते हैं तो शांति व व्यवस्था की समस्या गंभीर हो सकती है। तनाव, विरोध, हिंसा व हत्या का प्रतिशोध थमने का नाम नहीं लेते। जब और जहां जिसे अवसर मिलता है विरोधियों को समाप्त करने का प्रयास किया जाता है।

9. लोकतंत्र व सरल

जनतंत्र के आधार स्तंभ स्वतंत्रता, समानता व भाईचारा हैं। जातीय संघर्षों के चलते इन सिद्धांतों की हत्या होती है। इनके स्थान पर असमानता, वैमनस्य, स्वतंत्रता का अपहरण प्रमुखता पाते हैं। शोषण अविश्वास, अन्याय, अत्याचार की प्रधानता होती है।

10. अंतर्जातीय विवाह

जाति प्रथा में अपनी जाति या उपजाति में विवाह का कठोर नियम होता है। इससे दूरी संकीर्णता व पृथकता पनपती है। यदि विभिन्न जातियों में विवाह होने लगे तो प्रेम, आत्मीयता व घनिष्ठता पनपेगी। इससे जातीय संघर्ष के स्थान पर सहयोग और प्रेम बढ़ेगा। जातिवाद की बुराई समाप्त होगी।

1 thought on “जातीय संघर्ष निवारण”

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