जैन दर्शन

जैन दर्शन एकमात्र ऐसा भारतीय दर्शन है जो वेदों के प्रमाण को स्वीकार नहीं करता है। जैन शब्द की उत्पत्ति जिन शब्द से हुई है जिसका तात्पर्य है जितना अर्थात जिसने सांसारिक रागद्वेषों मोह माया पर विजय प्राप्त कर ली हो। जैन दर्शन का प्रमुख उद्देश्य मनुष्य को संसार के कष्टों से मुक्ति दिलाकर आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति हेतु मार्गदर्शन करना है। जैन दर्शन में ईश्वर की सत्ता का खंडन किया गया है तथा अहिंसा, त्याग, तपस्या आदि पर प्रमुख बल दिया गया है।

जैन दर्शन को मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त किया गया है –

  1. तत्व चिन्तन – तत्व चिंतन के अंतर्गत जगत प्राणी ईश्वर कर्म आदि विविध दार्शनिक विषयों को लेकर जैन दर्शन में बहुत सूक्ष्म गहन और व्यापक विवेचन किया गया है।
  2. आत्म शोधन की क्रिया – यह एक प्रकार से तत्व चिंतन का क्रियात्मक रूप है। आत्म शोधन की क्रिया उन विविध विधाओं से संबंधित है जिनका जीवन में व्यवहार ही मनुष्य का वास्तविक धर्म है।
जैन दर्शन

तत्व चिंतन मानव आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप से परिचित कराता है वही आत्मकथन विभिन्न विधाओं के रूप में धर्म का मार्ग प्रस्तुत करता है। जैन दर्शन के अनुसार आत्मा अपने स्वाभाविक रूप में शुद्ध और सच्चिदानंद है, परंतु कर्मों के मिश्रण से यह जीवात्मा, अशुद्ध विकारी और दुख का कारण बनी हुई है। कर्मों का यह मिश्रण आत्मा में अनादि काल से है। आतम शोधन की प्रक्रिया कर्मों से लिप्त अशुद्ध अविकारी आत्मा को शुद्ध एवं सच्चिदानंद रूप में लाने के लिए यह आवश्यक है कि सांसारिक मनुष्य पहले अपने वास्तविक स्वरूप से परिचित हो और फिर आदमी शोधन की ओर प्रवृत्त हो जाए अतः जैन दर्शन की मूल आधार भूमि आत्मज्ञान और आत्मशोधन पर आधारित है।

जैन दर्शन के मूल सिद्धांत

जैन दर्शन के मूल सिद्धांत निम्न है-

  1. अनीश्वरवादी दर्शन
  2. अनेकांतवादी दर्शन
  3. द्रव्य अवधारणा
  4. कर्म की अवधारणा
  5. मोक्ष की अवधारणा

1. अनीश्वरवादी दर्शन

जैन दर्शन ना तो वेदों की सत्ता को स्वीकार करता है और ना ही ईश्वर के अस्तित्व को जैन दर्शन ईश्वर में विश्वास नहीं करता, परंतु अपने तीर्थ करो की उपासना तथा आराधना करते हैं क्योंकि तीर्थंकर मुक्त प्राणी है।

2. अनेकांतवादी दर्शन

जैन दर्शन के अनुसार इस संसार में अनेक वस्तुएं हैं और प्रत्येक वस्तु के अनंत धर्म है। संसार अनंत जीवो से परिपूर्ण है जैन दर्शन का मानना है कि जीव का निवास केवल मनुष्य पशुओं तथा पेड़ पौधों में ही नहीं है बल्कि धातु तथा पत्थरों में भी है। जिस प्रकार अनेक जीव होते हैं उसी प्रकार आत्माएं भी अनेक होती हैं।

3. द्रव्य अवधारणा

जैन दर्शन के अनुसार या संसार जीव तथा अजीव दृव्यों से मिलकर बना है। जीव चेतन तत्व है जबकि अजीब जड़ तत्व है। जीव नित्य तथा आकार विहीन है। जीव को ज्ञाता कहा जाता है क्योंकि वह भिन्न-भिन्न विषयों का ज्ञान प्राप्त करता है, परंतु स्वयं ज्ञान का विषय नहीं होता है। जीव की चार विशेषताएं हैं:-

  1. अनंत ज्ञान
  2. अनंत दर्शन
  3. अनंत शक्ति
  4. अनंत सुख

बंधन अवस्था में जीव की यह विशेषताएं विलुप्त हो जाती हैं। जैन दर्शन मुक्त जीव आत्माओं को मानता है जिन्होंने मोक्ष प्राप्त कर लिया है बंधन ग्रस्त आत्माओं को बद्धजीव कहा जाता है। बद्धजीव दो प्रकार का होता है – स्थावर तथा त्रस। गतिहीन जीवो को स्थावर का नाम दिया गया है। त्रस का संबंध पांच इंद्रिय और दो इंद्री वाले जीवो से है।

जैन दर्शन

4. कर्म की अवधारणा

जैन दर्शन में जीव को अनंत ज्ञान अनंत दर्शन अनंत शक्ति का अनंत सुख का स्वामी माना गया है। अपने कर्म के परिणाम स्वरूप अज्ञानता के कारण जीव की यह शक्तियां विलुप्त हो जाती हैं और वह मोह माया के बंधन में बंध जाता है। जीव अजीव मिलकर सांसारिक जीवन चक्र में फस जाते हैं। ज्ञान की प्राप्ति होने पर जीव की यह शक्तियां उसे पुनः प्राप्त हो जाती हैं और वह मुक्त हो जाता है। कर्मों के अनुसार ही जीव को फल की प्राप्ति होती है।

5. मोक्ष की अवधारणा

जैन दर्शन में मोक्ष की प्राप्ति जीवन का मुख्य लक्ष्य माना जाता है। अपने शुद्ध रूप में जीव चैतन्य एवं स्वयं प्रकाशमान होता है और वह अन्य वस्तुओं को भी प्रकाशित करता है। जीवन में कुप्रवृत्तियां प्राय: अज्ञानता के कारण उत्पन्न होती हैं। अज्ञानता एवं कुप्रवृत्तियों के कारण ही पुद्गल कण जीव को और प्रवाहित करने लगते हैं। कर्म पुद्गल जब आत्मा की ओर प्रभावित होने लगते हैं तो उसे आश्रव कहते हैं। कर्म जब जीव से संबंध हो जाता है तो उसे बंधन कहते हैं।

जैन दर्शन के अनुसार जीव को मोक्ष की प्राप्ति के लिए त्रिरत्नों का पालन करना आवश्यक है। इनका पालन करने से कर्मों का जीव की ओर प्रवाह रुक जाता है जिसे संवर कहते हैं। इसके बाद जीव में पहले से उपस्थित कर्म समाप्त होना प्रारंभ हो जाते हैं यह अवस्था निर्जरा कहलाती है। जब आत्मा कर्म खुद गलों से पूर्णतया मुक्त हो जाती है तब उसे कैवल्य की प्राप्ति होती है।

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