त्याग की मूर्ति श्रीमती सोनिया गांधी

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी की धर्मपत्नी है । 21 मई 1991 को राजीव गांधी की अचानक मौत के बाद सभी की निगाहें सोनिया गाँधी पर टिक गई थीं । वे राजनीति में नहीं आई । अपने बच्चों का लालन – पालन किया किंतु कुछ सालों के बाद पूरे भारत की जनता सोनिया जी की ओर इस आशा से देख रही थी कि आगे बढ़ें और काँग्रेस का नेतृत्व करें । देश की खातिर सोनिया जी ने साहस बटोरा और गमगीन वातावरण को छोड़कर बाहर आईं ।

कांग्रेस का अध्यक्ष पद स्वीकार किया । वे जन्म से विदेशी थी किंतु भारतीय संस्कारों को उन्होंने इस प्रकार रचा – बसा लिया कि वे भी भारतीय ही लगने लगीं । उनकी शालीनता मंत्रमुग्ध कर देने वाली है । सिर का पल्लू कभी हटा नहीं । प्रयास करके अच्छी हिंदी बोलनी शुरू कर दी । अपने भाषाणों में देश के दर्द को समझा । भारतीय जनता से सीधा संवाद किया । लोकसभा में विरोधी दल की नेता बनकर विपक्ष की सरकार को रचनात्मक और ठोस सुझाव दिए ।

कांग्रेस अध्यक्षा रूप में श्रीमती सोनिया गांधी ने दिन – रात परिश्रम किया , अनेक राज्यों में रोड़ शो किए । उनकी सभाओं में भीड़ जुटने लगी । अनेक राज्यों की विधान सभा के चुनावों में काँग्रेस को आशा के अनुरूप सफलता मिलने लगी सन् 2004 के लोकसभा चुनावों में श्रीमती सोनिया गाँधी ने अपने विवेक , धैर्य और मनोबल के सहारे काँग्रेस का नेतृत्व करते हुए विजय दिलाई । सोनिया गाँधी ने लोकसभा चुनावों को जन आंदोलन का रूप दे दिया । सोनिया जी ने नगर – नगर , डगर – डगर पैदल यात्राएँ की । जहाँ भी सोनिया जी पहुँचती जनता उन्हें सिर आँखों पर बिठा लेती ।

जनता को सोनिया जी में राजीव गाँधी की , परिवर्तन की झलक दिखाई देने लगी थी । सोनिया भी जनता से सीधी – सीधी बातें करने लगीं । ग्रामीण महिलाओं के घरों में जाकर चाय पीती , खाना खा लेतीं । भारतीय जनता सोनिया जी में अपनापन देख रही थी । स्त्री , पुरुष , बालक – बालिकाओं को सोनिया में अपनापन दिखाई दे रहा था । सोनिया जी ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक , पंजाब से बंगाल तक का भ्रमण करके अपने प्यार की ऐसी वर्षा कर दी कि सोनिया जी सभी भारतवासियों के हृदय में बस गई ।

लोकसभा चुनावों में काँग्रेस की भारी जीत के बाद प्रत्येक शहर में श्रीमती सोनिया गाँधी को फूल मालाओं से लादा जा रहा था । एक अजीब सी प्रसन्नता के साथ सभी को कृतज्ञतापूर्ण नेत्रों से देखते – देखते सोनिया जी बीच – बीच में कहीं खो जाती थीं । उन्हें रह – रहकर अपने हृदय सम्राट अपने आराध्य , अपने पूज्य श्री राजीव गाँधी का ध्यान आ रहा था । सोनिया जी अपने प्रभु से अपने देवता से ऐसी शक्ति मांग रही थी जिससे वे राजीव जी के अधूरे सपने को पूरा कर सकें । वे ऐसे भारत के निर्माण में लीन हो रही थी जिसमें प्रत्येक भारतीय नागरिक को रोटी , कपड़ा और मकान मिल सके।

हर नागरिक को विजली – पानी , शिक्षा और अच्छा स्वास्थ्य मिल सके , संसार में भारत को गौरवपूर्ण स्थान मिल सके । तत्कालीन राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने सर्वाधिक सांसदों की प्रतिनिधि श्रीमती सोनिया गाँधी को 18 मई 2004 को सरकार बुलाने के लिए आमंत्रित किया । काँग्रेस समर्थित संसदीय दल की बैठक हुई । सभी को पूर्ण विश्वास था कि श्रीमती सोनिया गांधी भारत की नई प्रधानमंत्री होगी । प्रधानमंत्री पद की शपथ लेगी किंतु अचानक सब कुछ बदल गया , श्रीमती सोनिया गाँधी ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया । सारे सांसदों ने मनाया किंतु सोनिया जी का फैसला टस से मस नहीं हुआ।

सोनिया जी ने कहा कि मैंने बहुत पहले ही निर्णय कर लिया था कि मैं प्रधानमंत्री नहीं बनूंगी । राजनीति में रहूँगी तथा काँग्रेस अध्यक्षा के रूप में कार्य करती रहूँगी । वह सरकार के बाहर बिना सरकारी पद के ही देश की सेवा करेंगी । उन्होंने अपनी ओर से डॉ . मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित कर दिया ।

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