दलित समस्या समाधान

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दलित समस्या समाधान – जिन वर्गों का प्रयोग हिंदू सामाजिक संरचना सोपान में निरंतर स्थान रखने के लिए समुदायों के लिए किया जाता है वह दलित व अनुसूचित जातियां कहलाती हैं। ‘निम्नतम’ स्थान का आधार इन जातियों के उस व्यवसाय से जुड़ा है, जिसे अपवित्र कहा गया है।

यहां पर दलितों की विवेचना अनुसूचित जाति में की गई हैं क्योंकि भारतीय संविधान में अनुसूचित जाति के रूप में इनके कल्याण हेतु अनेकों संवैधानिक प्रावधान किए गए हैं। इन्हें अछूत, हरिजन और बाह्य जातियां भी कहा जाता है। इन्हें संविधान सूची में सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक दृष्टि से सुविधाएं दिलाने के उद्देश्य में शामिल किया गया है।

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दलित समस्या

दलितों की समस्याओं का अध्ययन निम्न बिंदुओं में कर सकते हैं।

  1. सामाजिक समस्याएं
  2. आर्थिक समस्याएं
  3. धार्मिक समस्याएं
  4. शैक्षणिक समस्याएं
  5. अंतर्जातीय संघर्ष की समस्याएं

1. दलित की सामाजिक समस्याएं

भारत में दलितों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा। दलितों को जन्म से अनेक दुख सहने पड़ते हैं, जो अनुसूचित जातियों के जीवन का अंग बन गए हैं। दलितों को समाज में निम्न स्थान प्राप्त है, उन्हें समाज में अछूत कहा जाता है। दलितों को समाज ने खान पान, छुआछूत आदि मे प्रतिबंध है।

यह सामाजिक बहिष्कार मात्र नहीं है। थोड़े समय के लिए सामाजिक व्यवहार का बंद कर देना है।

डॉ अंबेडकर

शताब्दियों सेअनुसूचित जातियों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा है। भारत में स्वतंत्रता के बाद अनेक समस्याओं के समाधान का प्रयास किया गया हाय लेकिन आज भी अनसूचित जातियां अनेक समस्याओं के ग्रस्त हैं।

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2. आर्थिक समस्याएं

जाति व्यवस्था ने भारत में आर्थिक समस्या उत्पन्न कर दी है जिसके कारण दलित जातियां आर्थिक समस्या से ग्रस्त हैं। निम्न जातियों की दशा आर्थिक क्षेत्र में दयनीय रही है। जाति व्यवस्था के कारण व्यवसाय में प्रतिबंध है जिसके कारण आर्थिक स्थिति निम्न है। उच्च जातियों की दास्तां और निम्न व्यवसाय ने अनुसूचित जातियों की दशा दयनिय बना दी है जिसके कारण दरिद्रता और निर्धांता का जीवन जीना पड़ता है। (दलित समस्या समाधान)

आर्थिक दृष्टि से सामुदायिक अधिकार की योजना ने अनुसूचित जाति के इन असहाय लोगों को सदा ही संपत्तिहीन रखा।

वह हमारे कुएं खोदते हैं, पर अपने प्रयोग के लिए उन्हें छू नहीं सकते। वह हमारे तालाब साफ करते हैं, पर जब यह पानी से भरे हो तो उन्हें उससे दूर ही रहना पड़ता है।

इस कथन से यह स्पष्ट है कि भारत में अनुसूचित जातियां अनेक महत्वपूर्ण कार्य करती हैं फिर भी उन्हें दरिद्रता पूर्ण जीवन यापन करना पड़ता है।

3. धार्मिक समस्याएं

भारतीय समाज में अनुसूचित जातियों को धार्मिक कार्यों से दूर रखा गया, जाति विभाजन में धर्म का ठेकेदार ब्राह्मणों को माना गया। जिसके कारण अनुसूचित जातियों को अनेक धार्मिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। धार्मिक कार्यों से अनुसूचित जातियों को वंचित रखा गया।

यद्यपि अनुसूचित जातियां हिंदू समाज की अभिन्न अंग मानी जाती हैं, उन्हें मंदिरों देवालयो में प्रवेश का अधिकार नहीं था। उनके मन में यह विश्वास करा दिया गया कि उनके स्पर्श से पाप लग जाएगा। इस प्रकार पाप के भाई के कारण अनुसूचित जातियां धार्मिक स्थानों में जाने का साहस नहीं करती थी।

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4. शैक्षणिक समस्याएं

शैक्षणिक क्षेत्र में अनुसूचित जातियों का स्थान अत्यंत निम्न है, साक्षरता दर का अनुमान प्रत्येक दशक में जनगणना से लगाया जाता है। दलितों में शिक्षा का प्रसार एवं प्रचार बहुत कम हुआ है। बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान और अनुसूचित जातियों में शिक्षा के प्रति रुचि नहीं है।

वर्तमान समय दलितों शैक्षणिक व्यवस्था की गई है और उनके पशुवत व्यवहार को दूर करने के लिए आज समान व्यवहार किया जा रहा है। किंतु आज भी शैक्षणिक कार्यक्रम का स्तर बहुत निम्न है। वर्तमान समय में दलित वर्ग ने शिक्षा के प्रति रुचि ली है। जिसके कारण दलितों का शैक्षणिक विकास प्रारंभ हो गया।

5. अंतर्जातीय संघर्ष की समस्याएं

भारत में अनुसूचित जातियों की समस्याओं में एक और समस्या का विकास हुआ है। जिसे अंतर्जातीय संघर्ष की संज्ञा दी गई है मात्र उच्च जातियां ही नहीं अनुसूचित जातियां भी अन्य जातियों से विरोध करने के लिए स्वयं को तैयार करने लगे हैं। (दलित समस्या समाधान)

उच्च जातियां अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए अनुसूचित जातियों का विरोध करती है। अनुसूचित जातियों के लोग शोषण से मुक्त होने तथा अपनी स्थिति को कुछ बनाए रखने के लिए दूसरी जातियों से विरोध करते हैं।

दलित समस्या समाधान

दलितों की अनेक समस्याएं हैं दलित समस्या समाधान के लिए अनेक कार्यक्रम या योजनाएं चलाई गई हैं, जिनका वर्णन निम्न प्रकार किया गया है।

दलित समस्या समाधान की संवैधानिक व्यवस्थाएं

दलित समस्या समाधान की संवैधानिक व्यवस्थाएं उल्लिखित हैं।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 के अंतर्गत धर्म, जाति, लिंग, वंश, जन्म स्थान के आधार पर कोई भेद नहीं किया जाएगा। इनमें से किसी भी आधार पर राज्य द्वारा पोषित संस्थानों के उपयोग के बारे में किसी नियोग्यताओं निवर्तन या शर्त के अधीन नहीं होगा।
  • संविधान के अनुच्छेद 16 के अंतर्गत समस्त नागरिकों को समानता प्रदान की गई अर्थात धर्म, जाति, वंश, लिंग, जन्म स्थान एवं निवास आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।
  • संविधान के अनुच्छेद 17 के अंतर्गत अस्पृश्यता का अंत कर दिया गया है तथा अस्पृश्यता को दंडनीय अपराध घोषित किया गया है।
  • संविधान के अनुच्छेद 29 के अंतर्गत किसी भी नागरिक को किसी भी सरकारी सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्था में धर्म, जाति, वंश एवं भाषा के आधार पर प्रवेश के लिए वंचित नहीं किया जा सकता है।
  • संविधान के अनुच्छेद 46 के अंतर्गत कमजोर और दलित वर्गों की उन्नति के लिए राज्य द्वारा इनको आर्थिक और शिक्षा संबंधी सुविधाएं प्रदान की जाएंगी। इसके अंतर्गत सामाजिक अन्याय और शोषण से संरक्षण की भी व्यवस्था की गई है।
  • संविधान के अनुच्छेद 164 के अंतर्गत दलितों के कल्याण एवं रक्षा के उद्देश्य से राज्यों में सलाहकार परिषदों की स्थापना की गई।
  • संविधान के अनुच्छेद 330, 332 और 334 के द्वारा संसद तथा राज्यों के विधान मंडलों में 20 वर्ष तक उन्हें प्रतिनिधित्व की विशेष सुविधा दी गई है।
  • भारतीय सरकार ने अस्पृश्यता अधिनियम 1955 पारित करके अनुसूचित जातियों पर थोपी गई परंपरागत नियुक्तियों को समाप्त कर दिया है।
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दलित समस्या समाधान के स्वयंसेवी प्रयास

दलितों की दयनीय दशा को देखकर प्रत्येक सहृदय व्यक्ति दुखित होता है। दलितों के उत्थान के लिए महत्वपूर्ण कार्य महात्मा गांधी ने किया है उनके राजनीतिक कार्यक्रमों में अनुसूचित जातियों का उत्थान उनकी समस्याओं के निराकरण का प्रयास कार्यक्रमों का अंग रहा है। अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए स्वयंसेवी संगठन निरंतर प्रयास कर रहे हैं। अखिल भारतीय समाज के इन महत्वपूर्ण स्वयंसेवी और स्वैच्छिक संगठनों में निम्न मुख्य हैं।

  • रामकृष्ण मिशन
  • हरिजन सेवक संघ
  • दिल्ली भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी – नई दिल्ली
  • हिंदू स्वीपर सेवक समाज – नई दिल्ली
  • आदिम सेवक समाज – नई दिल्ली
  • हरिजन आश्रम – इलाहाबाद
  • भारतीय समाज उन्नति मंडल – भील वन्डी
  • भारत सेवक समाज – पुणे
  • थक्करबापा आश्रम – नुमाखंडी उड़ीसा
  • सामाजिक कार्य और शोध केंद्र – तिलोनिया राजस्थान

दलित समस्या समाधान की कल्याणकारी योजनाएं

अनुसूचित जातियों के लिए सरकार और अन्य लोगों के द्वारा निराकरण के अनेक उपाय किए गए हैं। अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए राज्य सरकार और केंद्र सरकार मिलजुल कर अनेक कार्य कर रही हैं। सरकार ने समस्याओं के समाधान के लिए अनेक योजनाएं बनाई हैं। पंचवर्षीय योजना में अनुसूचित जातियों के कल्याण के कार्यक्रम प्रारंभ किए गए हैं, छठवीं पंचवर्षीय योजना में दलितों के कल्याण के लिए 269.19 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं।

600 करोड़ रुपए अनुसूचित जातियों के विकास संगठन के लिए उन्हें केंद्र द्वारा सहायता दी गई है। दलितों की सुरक्षा के लिए केंद्र में एक आयुक्त की व्यवस्था की गई है, आयोग का गठन दलितों के कल्याण को ध्यान में रखकर किया गया है। जिसमें एक अध्यक्ष और 4 सदस्य हैं। अनुसूचित एवं दलित के कल्याण के लिए केंद्रीय स्तर पर एक सलाहकार बोर्ड भी स्थापित किया गया है।

दलित समस्या समाधान के लिए कुछ महत्वपूर्ण योजनाएं निम्नलिखित हैं।

  1. संवैधानिक व्यवस्थाएं
  2. आर्थिक सुविधाएं
  3. शैक्षणिक योजनाएं
  4. स्वास्थ्य और आवास की योजनाएं
  5. अन्य कल्याणकारी योजनाएं

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