पाठ्यक्रम का क्षेत्र

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पाठ्यक्रम का क्षेत्र – यदि हम पाठ्यक्रम के इतिहास पर सरसरी नजर डालें तो स्पष्ट रूप से ज्ञात होता है कि प्रत्येक प्रकार का पाठ्यक्रम अपने समाज द्वारा निर्धारित शैक्षिक उद्देश्यों पर आधारित होता है। इसीलिए देश और काल की भिन्नता के अनुसार, वहां के पाठ्यक्रमों में भी भिन्नता पाई जाती है। उदाहरण स्वरूप वैदिक कालीन शिक्षा व्यवस्था शिक्षा के उद्देश्य बालकों का नैतिक विकास करना, पवित्रता और धार्मिकता का विकास करना, व्यक्तित्व का विकास करना, सामाजिक कुशलता में वृद्धि करना, संस्कृति का संरक्षण व विकास करना तथा चित्त वृत्तियों का निरोध करना आदि था।

इस उद्देश्य के अनुसार ही तत्कालीन पाठ्यक्रम में वैदिक मंत्रों का उच्चारण व स्मरण, भाषा साहित्य व व्याकरण, परविद्या एवं अपरा विद्या को प्रमुख स्थान दिया गया था। बालकों को व्यवसायिक शिक्षा के साथ-साथ सैनिक शिक्षा भी दी जाती थी। साथ ही औषधि शास्त्र का भी ज्ञान दिया जाता था। शिक्षा आश्रम व गुरुकुलों में दी जाती थी।

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इसी प्रकार बौद्ध कालीन शिक्षा के उद्देश्यों में चरित्र निर्माण, व्यक्तित्व का विकास, बौद्ध धर्म का प्रचार तथा जीवन के लिए तैयार करना आदि प्रमुख थे और इन्हीं के अनुसार बालकों को बौद्ध धर्म शास्त्रों का अध्ययन आयुर्वेद कला, शिल्प कला व सैनिक शिक्षा का अध्ययन कराया जाता था। छात्रों को मौन रहकर भिक्षाटन करना होता था। बालकों के शारीरिक विकास हेतु कुश्ती लड़ना, मुक्केबाजी करना, भूमि जोतना, तीर चलाना व रथों की दौड़ का आयोजन करने का प्रावधान था।

बौद्ध काल के पश्चात, भारत पर लगभग 300 वर्षों तक मुस्लिमकालीन शासन व्यवस्था बनी रही। उस समय इस्लाम धर्म व मुस्लिम संस्कृत के प्रसार चरित्र निर्माण तथा सांसारिक एश्वर्य की प्राप्ति को शिक्षा के प्रथम उद्देश्यों में स्थान दिया गया। तदनुसार ही पाठ्यक्रम में कुरान की आयतें, अरबी व फारसी भाषाओं, व्याकरण व पत्र लेखन को प्रमुख स्थान प्राप्त हुआ। साथ ही बालकों को हस्त कलाओं का ज्ञान, व्यवसाय ज्ञान, चिकित्सा शास्त्र का ज्ञान व सैनिक शिक्षा भी दी जाती रही।

पाठ्यक्रम का क्षेत्र

तत्पश्चात ब्रिटिश काल एवं स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात गठित अनेकों आयोगों के दौरान भी शिक्षा के उद्देश्य निर्धारित किए जाते रहे। वह उन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विभिन्न प्रकार का पाठ्यक्रम संगठित किया जाता रहा। इस प्रकार पाठ्यक्रम की व्यापक अवधारणा को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रम के क्षेत्र को सीमाओं में बांधना अत्यंत कठिन कार्य है। फिर भी कुछ शिक्षा शास्त्रियों ने पाठ्यक्रम का क्षेत्र को निम्न बिंदुओं में सीमांकित करने का प्रयास किया है-

पाठ्यक्रम का क्षेत्र
  1. शिक्षा के लक्ष्यों व उद्देश्यों का निर्धारण– जिस प्रकार शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पाठ्यक्रम का निर्माण किया जाता है, उसी प्रकार पाठ्यक्रम बालकों के लिए कुछ निश्चित उद्देश्यों का निर्धारण भी करता है तथा उन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए बालकों को प्रेरित करता है।
  2. नवीन प्रवृत्तियों का साहचर्य– पाठ्यक्रम एक व्यापक अवधारणा का रूप लेता जा रहा है अतः वर्तमान समय में प्रचलन में आने वाली अनेक नवीन प्रवृत्तियों का साहचर्य भी इसके क्षेत्र में आता है।
  3. बालकों के संज्ञानात्मक विकास का पोषण- पाठ्यक्रम का उद्देश्य बालकों का सर्वांगीण विकास एवं ज्ञान वर्धन करना भी होता है और वह बालकों को विभिन्न प्रकार का ज्ञान प्रदान करने उनका संज्ञानात्मक विकास करता है।
  4. बालकों के सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य का संवर्धन– मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तथा समाज में रहते हुए उसे कुछ अधिकारों का उपभोग एवं कर्तव्य का निर्वहन करना होता है। इसके अतिरिक्त एक बालक पूर्ण रूप से स्वस्थ तभी माना जा सकता है। जब वह मानसिक एवं मनोवैज्ञानिक रूप से सुदृढ़ हो पाठ्यक्रम के द्वारा बालकों का सामाजिक विकास एवं मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य का संवर्धन किया जाता है।
  5. अधिगम हेतु व्यवस्था– अधिगम एक जीवन परयंत चलने वाली प्रक्रिया है। जिस प्रकार ठहरे हुए पानी में अनेक गंदगियां एवं बीमारियां पनपने लगती हैं। उसी प्रकार जब व्यक्ति अधिगम कार्य बंद कर देता है तो उसमें भी रूढ़िवादिता आ जाती है। इस प्रकार पाठ्यक्रम समय-समय पर बालकों के नवीन एवं विभिन्न प्रकार के अधिगम हेतु सुविधा प्रदान करता है।
  6. शैक्षणिक स्रोतों का उपयोग– पाठ्यक्रम बालकों के अधिगम के लिए व्यवस्था ही नहीं प्रदान करता, अपितु बालकों को विभिन्न प्रकार का ज्ञान प्रदान करने हेतु आने को शैक्षणिक स्रोतों का भी उपयोग करता है। अनेकों पुरातन शैक्षिक अभिलेखों में से बालकों के लिए उपयोगी विषय वस्तु प्रदान करता है।
  7. छात्रों का व्यक्तिगत बोध एवं उसके अनुरूप शिक्षण व्यवस्था– पाठ्यक्रम द्वारा बालकों का व्यक्तित्व विकास एवं ज्ञानवर्धन किया जाता है। प्रत्येक बालक की अभिरुचि आवाज क्षमताएं भिन्न-भिन्न होती हैं तथा पाठ्यक्रम प्रत्येक बालक के व्यक्तिगत बोध के अनुरूप ही शिक्षण व्यवस्था प्रदान करता है।
  8. समस्त कार्यक्रमों एवं बालकों के कार्यों का मूल्यांकन– जैसा कि पूर्व विदित है पाठ्यक्रम विषय वस्तुओं का समावेश मात्र न होकर विभिन्न क्रियाओं एवं कार्यकलापों का भी समन्वय है। पाठ्यक्रम बालकों को ज्ञान प्रदान करने के साथ ही साथ उनके कार्यों एवं अन्य सभी कार्यक्रमों का मूल्यांकन भी करता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि पाठ्यक्रम का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। विद्यालय में रहते हुए बालक 24 शैक्षिक क्रियाएं करते हैं, जो पाठ्य सहगामी क्रियाएं करते हैं तथा जो अभिरुचि की पूर्ति से संबंधित कार्य करते हैं। उन प्रवृत्तियों के आधार पर ही पाठ्यक्रम का क्षेत्र विस्तृत होता चला जाता है।

पाठ्यक्रम अर्थ परिभाषा आवश्यकता महत्वपाठ्यक्रम का क्षेत्र
पाठ्यक्रम का आधारपाठ्यक्रम के लाभ
पाठ्य सहगामी क्रियाएंशैक्षिक उद्देश्य स्रोत आवश्यकता
मूल्यांकन की विशेषताएंपाठ्यक्रम के उद्देश्य
प्रभावशाली शिक्षणअच्छे शिक्षण की विशेषताएं

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