प्रदूषण की समस्या

प्रदूषण – वातावरण या वायुमंडल का अस्वस्थ होना तथा उसके संतुलन का डगमगा जाना। विकास और व्यवस्थित जीवन क्रम के लिए जीवधारियों को संतुलित वातावरण की आवश्यकता होती है। जब वातावरण में हानिकारक घटकों का प्रवेश हो जाता है तो वातावरण प्रदूषित हो जाता है जिसे ‘ प्रदूषण ‘ कहा जाता है ।  यह स्वयंसिद्ध है कि सभी प्राणी जन्म से लेकर मृत्यु तक सम्पूर्ण जीवनकाल में अपने पर्यावरण के सभी प्राकृतिक साधनों का मुक्त रूप से उपयोग करते हुए अपनी जैविक क्रियाएँ सम्पादित करते है।

“कोई भी ऐसी प्रक्रिया जो प्राकृतिक साधनों के मुक्त उपयोग में बाधा उत्पन्न करती है , उसे प्रदूषक कहते है एवं परिणामस्वरूप उत्पन्न स्थिति को पर्यावरण प्रदूषण कहते है। “

प्राकृतिक साधनों की शुद्धता को प्रभावित करके उनकी जीवन उपयोगिता को नष्ट अथवा कम करने वाले पदार्थ प्रदूषक एवं ऐसी प्रक्रिया प्रदूषण कहलाती है।

प्रदूषण के प्रकार

प्रदूषण तीन प्रकार का होता है – वायु प्रदूषण , जल प्रदूषण तथा भूमि प्रदूषण । वायुमंडल में विभिन्न प्रकार की गैसें एक विशेष अनुपात में विद्यमान रहती हैं । जब यह संतुलन बिगड़ जाता है तो वायु दूषित हो जाती है । इसी प्रकार जल में जब अशुद्धियाँ मिल जाती हैं तो जल प्रदूषण हो जाता है । भूमि पर व्याप्त गंदगी के कारण भूमि प्रदूषित हो जाती है । इसके अलावा आजकल रासायनिक प्रदूषण भी हो रहा है । अधिक पैदावार के लिए जब कीटनाशकों का अधिक प्रयोग किया जाता है तो इनका स्वास्थ्य पर बहुत घातक प्रभाव पड़ता है । ध्वनि प्रदूषण भी एक प्रकार का प्रदूषण है जो बड़े – बड़े नगरों में कल – कारखानों के शोर आदि के कारण होता है । 

समस्या के कारण आज महानगरों में वाहनों , कारखानों तथा बढ़ती औद्योगिक इकाइयों के कारण वातावरण प्रदूषित हो रहा है । कारखानों की चिमनियों तथा वाहनों आदि से जहरीली गैसें निकलती हैं जिनसे वायु प्रदूषित हो जाती है । कल कारखानों से निकलने वाले अवशिष्ट पदार्थ जब नदी में बहा दिए जाते हैं , तो जल प्रदूषित हो जाता है । महानगरों में मशीनों , कल कारखानों , वाहनों के शोर से ध्वनि प्रदूषण होता है ।

परमाणु शक्ति के उत्पादन ने वायु , जल और ध्वनि तीनों प्रकार के प्रदूषण को बढ़ावा दिया है । भूमि पर पड़े कूड़े – कचरे के कारण भूमि प्रदूषण होता है । महानगरों में झुग्गी – झोंपड़ियों की अधिकता के कारण भी भूमि प्रदूषण होता है । आवास की समस्या को सुलझाने के लिए की जा रही वनों की कटाई भी वायु प्रदूषण का मुख्य कारण है ।

साधारणतया हम जिस स्थान में निवास करते है , उसके आस पास के सभी प्राकृतिक साधन जैसे जल , मिट्टी , वायु , वनस्पतियाँ , धूप , वन और वन्य प्राणी आदि हमारा पर्यावरण अथवा प्राकृतिक वातावरण बनाते है। इन्ही साधनों का हमारी रचना , स्वास्थ्य एवं मन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। स्पष्ट है कि पर्यावरण के प्राकृतिक साधन जितने स्वच्छ और सुन्दर होंगे , हमारा शरीर , स्वास्थ्य एवं मन भी उतना ही स्वस्थ तथा अच्छा रहेगा। प्राचीन काल में भारतीय ऋषि मुनियों को भी यह ज्ञान था , जिसका वर्णन वेदों , उपनिषदों , पुराणों और अन्य प्राचीन ग्रंथो में मिलता है। 

प्रदूषण का दुष्प्रभाव

प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक होता है । वायु प्रदूषण से श्वास तथा फेफड़ों से संबंधित रोगों का जन्म होता है । जल प्रदूषण से पेट तथा आँतों के रोग जैसे हैजा , पीलिया आदि हो जाते हैं । ध्वनि प्रदूषण से मानसिक तनाव , उच्च रक्तचाप , हृदय रोग आदि की संभावना रहती है । प्रदूषण के कारण आज तो कैंसर , एलर्जी तथा चर्म रोगों में भी वृद्धि हो रही है ।

समाधान : यद्यपि प्रदूषण की समस्या विश्वव्यापी है तथापि वृक्षारोपण इसे रोकने का सर्वोत्तम उपाय है । वृक्ष हमें शुद्ध वायु प्रदान करते हैं । वनों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगाई जानी चाहिए । वाहनों द्वारा प्रदूषण को रोकने के लिए उनके लिए सी.एन.जी. के प्रयोग को अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए । औद्योगिक इकाइयों द्वारा होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए ये इकाइयाँ नगरों से दूर स्थापित की जाएँ ।

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