प्रयोगशाला विधि

विज्ञान के सभी विषय इस प्रकार के हैं कि उनके लिए प्रयोगशाला का होना आवश्यक है। उदाहरण के तौर पर भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, जीव विज्ञान, भू विज्ञान आदि। इन विषयों की वास्तविक शिक्षा के लिए प्रयोगशाला के द्वारा सही ज्ञान बालक को मिलता है। प्रयोगशाला में विद्यार्थी स्वयं प्रयोग करता है। उसे निरीक्षण करने का सुअवसर मिलता है तथा अपने ही प्रयासों से परिणाम निकालने की कोशिश करता है।

प्रयोगशाला में अध्यापक उसके कार्य का निरीक्षण करते हैं और विद्यार्थी लिखित कार्य भी करते हैं। इसीलिए आजकल की शिक्षा प्रणाली में विज्ञान अनिवार्य है और विज्ञान कक्षाओं के लिए हर विद्यालय में प्रयोगशाला का होना भी आवश्यक है। इन प्रयोगशालाओं में विज्ञान संबंधी सा सामान उपकरण तथा रासायनिक पदार्थ में जो पर क्रमानुसार रखे जाते हैं।

प्रयोगशाला विधि के गुण

  1. यह विधि बालकों में वैज्ञानिक क्षमता उत्पन्न करती है। बालक कार्य करते समय बड़े उत्साह और उत्सुकता से भर जाता है और कुछ ना कुछ निकालने की तलाश में रहता है।
  2. इस प्रणाली में अधिकतर बालक सक्रिय रहते हैं क्योंकि प्रत्येक को अपनी सीट पर खड़े होकर कार्य करना पड़ता है और सब की यही एकमात्र कोशिश होती है कि निश्चित लक्ष्य को प्राप्त किया जाए।
  3. इस विधि में विद्यार्थी पुस्तक में पड़े हुए अथवा अध्यापक द्वारा समझाएं गए ज्ञान का सत्यापन स्वयं प्रयोगशाला में करते हैं। पुणे प्रयोगशाला में पाई जाने वाली वस्तुओं और उपकरणों का सही उपयोग करने का अवसर भी मिलता है।
  4. विद्यार्थी स्वयं प्रयोग करता है इसलिए उनका दृष्टिकोण पूर्णता वैज्ञानिक हो जाता है। इस प्रकार स्वयं प्रयोग करने उपकरणों का प्रयोग करने तथा निरीक्षण करने के लिए विवेकपूर्ण चिंतन की दक्षता प्राप्त करता है।
  5. प्रयोगशाला में विद्यार्थी मान्य वैज्ञानिक परिणामों की स्वता जांच करता है इसीलिए उनके मन मस्तिष्क में तथा सिद्धांत पूर्ण रूप से स्पष्ट हो जाते हैं और स्थाई बनकर याद भी हो जाते हैं।

प्रयोगशाला विधि के दोष

  1. यह विधि छोटी दशाओं के विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि बालक प्रयोगशाला में ठीक प्रकार से ना तो कार्य कर पाएंगे और ना उनकी समझ में कुछ आया था वे उपकरणों का प्रयोग भी ठीक से नहीं कर पाएंगे।
  2. कक्षा में पिछड़े हुए तथा मंदबुद्धि वाले बालक प्रयोग नहीं कर पाते हैं इसलिए वे अक्सर अच्छे बच्चों की कॉपियों से नकल कर लिख लेते हैं।
  3. किसी प्रयोग को करने में काफी समय लग जाता है इसके अलावा उपकरणों को समझने में भी कठिनाई होती है या देखा गया है कि अक्सर प्रयोगों के चक्कर में पाठ्यक्रम पूर्ण नहीं हो पाता है।
  4. क्योंकि प्रत्येक विद्यार्थी अलग-अलग सीट पर अपने उपकरणों तथा सामग्री के प्रयोग से प्रयोग करता है, जिससे काफी धन खर्च होता है अध्यापक को भी प्रत्येक विद्यार्थी को उसी सीट पर जाकर देखने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

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