बाणभट्ट जीवनी

महाकवि बाणभट्ट संस्कृत गद्य के सर्वश्रेष्ठ रचनाकार हैं। उनके गद्य काव्य में हमें गद्य का चरमोत्कर्ष देखने को मिलता है। उन्होंने अपने हर्षचरित के प्रारंभ में अपने वंश आदि के संबंध में जानकारी दी है। कादंबरी के प्रारंभिक श्लोकों में भी वंश क्रम के विषय में प्रकाश डाला है। महाकवि बाणभट्ट प्रतिष्ठित वात्सायन वंश में उत्पन्न हुए थे। इस कुल में कुबेर नामक प्रकांड पंडित का जन्म हुआ।

कुबेर के यहां रहने वाले तोता मैना भी इतने पंडित थे कि अशुद्ध पाठ करने वाले विद्यार्थियों का वे बीच में ठोक दिया करते थे। इन कुबेर पंडित के 4 पुत्र हुए उनके नाम थे अछूत ईशान हर और पक्षपात इन में पक्षपात के अर्थ पति नाम का एक ही पुत्र हुआ। अर्थपति के 11 पुत्रों में से चित्रभानु बाण के पिता थे। बाल्यावस्था में भी बाढ़ में माता पिता की मृत्यु हो जाने से स्वतंत्र बुद्धि बाल बाल सुलभ चपलताओं सेशन ग्रसित हो गए। और वे देश देशांतर भ्रमण के लिए निकल पड़े। उन्होंने अपने प्रवास काल में विविध प्रकार के अनुभव प्राप्त किए। विभिन्न देशों के पर्यटन के पश्चात वे अपने ग्राम प्रीतिकोट वापस आ गए।

बाण को जब यह ज्ञात हुआ कि किसी व्यक्ति ने सम्राट हर्षवर्धन से उनकी शिकायत कर दी है तो अपनी स्थिति को स्पष्ट करने के लिए वे राज दरबार में उपस्थित हुए। उनके विकृत वेश को देखकर सम्राट हर्षवर्धन ने उन्हें महादुष्ट कह दिया। परंतु परंतु बाणभट्ट पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा और उन्होंने विनम्रता पूर्वक अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी। जिसके फलस्वरूप वे कुछ दिनों के पश्चात राजा के कृपा पात्र बन गए। उन्होंने अपने कनिष्ठ चचेरे भाई श्यामल के आग्रह पर सम्राट हर्षवर्धन के चरित्र को लेकर हर्षचरित की रचना की।।

सुभाषितावली और शार्डग्धर पद्धति में राजशेखर के नाम से उद्धत एक श्लोक के द्वारा यह प्रमाणित होता है कि बाण मयूर और मार्तंड दिवाकर हर्ष की सभा में प्रतिष्ठित थे। एक किवदंती के अनुसार बाणभट्ट मयूर के समकालीन सिद्ध होते हैं इसके अनुसार मयूर बाढ़ के ससुर थे। एक दिन प्रातः काल मयूर बाण से मिलने गए वे उन्हें इस प्रकार मना रहे थे-

गतप्राया रात्रि कृशतनु शशी शीर्यत इव प्रदीपपोयं निद्रावशमुपगतो घूर्णत इव।

प्राणामान्तो मानस्त्यजसि न तथापि क्रुधमहो
कुचप्रत्यासत्या हृदयमपि ते चण्डि! कठिनम्।

हे क्रोध सिले लगता है कि कठोर स्तनों के समीप रहने के कारण तुम्हारा हृदय भी कठोर हो गया है ऐसा कहा जाता है कि इससे लज्जित और खुद होकर बाण ने अपने ससुर मयूर को पूरी हो जाने का शाप दे डाला और मयूर ने भी बाढ़ को शाप दे दिया। शाप से मुक्त होने के लिए मयूर ने सूर्य शतक की और बाण ने चंडीशतक की रचना की। बाणभट्ट के 2 पुत्र थे। उनके द्वितीय पुत्र ने उत्तर कादंबरी की रचना की।

परंतु उसने अपने नाम तक की उस में चर्चा नहीं की कुछ पांडुलिपियों ने उसका नाम भूषण भट्ट और कुछ में पुलिन्द भट्ट या पुलिनभट्ट तक प्राप्त होता है।

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