बाल्यावस्था में मानसिक विकास

बाल्यावस्था में मानसिक विकास शैशवावस्था की अपेक्षा काफी तेजी से होता है। मानसिक दृष्टि से परिपक्व व्यक्ति वह है जो बौद्धिक रूप से चरम सीमा तक पहुंच चुका है। बाल्यावस्था 3 वर्ष से 12 वर्ष की आयु तक को माना जाता है। बाल्यावस्था में मानसिक विकास निम्न प्रकार होता है।

तीसरा वर्ष

इस अवस्था में जिज्ञासा शक्ति बढ़ती है अतः बालक विभिन्न वस्तुओं के संबंध में प्रश्न करने लगता है। मानसिक शक्ति का विकास होता है जिससे वह अपना नाम, कुछ फल, अपने शरीर के अंग आदि को संकेतों से बता देता है। दैनिक प्रयोग की विभिन्न वस्तुएं मांगने पर उठाकर ले आता है।

चौथा वर्ष

स्कूल जाने की अवस्था होने के कारण इस समय बालक को 100 तक के अंको का ज्ञान हो जाता है। अतः पैसों के बारे में जानने लगता है। इसके अतिरिक्त तारीख का प्रयोग कर लेता है। छोटी बड़ी रेखाओं और आकारों में अंतर कर लेता है। लिखना भी आरंभ कर देता है तथा स्कूल जाने के कारण उसकी दिनचर्या तथा क्रियाओं में संतुलन आ जाता है।

पांचवां वर्ष

इस अवस्था में उसे विभिन्न वस्तुओं के तुलनात्मक अध्ययन की जानकारी होती जाती है। वह अपना नाम पता परिवार के लोगों का नाम तथा पास पड़ोस के बारे में जानकारी रखता है। भाषा विकास अधिक हो जाता है वाक्य बनाने की क्षमता आ जाती है। सरल तथा कुछ सीमा तक जटिल वाक्य बनाने लगता है। गणिती ज्ञान में भी वृद्धि होती है। विभिन्न प्रत्यय जैसे रंग, समय, दिन, संख्या आदि का ज्ञान हो जाता है। दैनिक जीवन के उपयोग में आने वाली विभिन्न वस्तुओं के सही उपयोग को समझने लगता है।

छठवां वर्ष

इस आयु में बालक का भाषा विकास और अधिक हो जाता है। विभिन्न वस्तुओं का प्रत्याशी ज्ञान बढ़ता है। गलती योगिता में भी वृद्धि होती है 100 तक की गिनती आसानी से गिन लेता है। चित्रों से विभिन्न वस्तुओं को पहचान लेता है। अनुकरण की क्षमता बढ़ जाती है। जिससे आसपास की वस्तुओं और व्यक्तियों के अनुकरण को सीखने की क्षमता का विकास होता है। ध्यान की क्षमता में भी विकास होता है। विभिन्न प्रश्नों के उत्तर अपनी क्षमता के आधार पर देने लगता है।

सातवां वर्ष

स्कूल जाने के कारण इस अवस्था में बालक के भाषा विकास में प्रगति होती है। वह सरल से जटिल वाक्यों की रचना करने लगता है। विभिन्न प्रत्यय जैसे स्वाद, रंग, रूप, गंध आदि का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। विभिन्न वस्तुओं में परस्पर समानता और अंतर समझने लगता है। जिज्ञासा प्रवृत्ति बढ़ जाने के कारण छोटे-छोटे प्रश्न पूछता है। छोटी-छोटी समस्याओं का हल अपनी तर्कशक्ति के आधार पर करता है। इस प्रकार इस अवस्था तक बालक में जिज्ञासा, स्मृति, तर्क, चिंतन, समस्या समाधान तथा भाषा का विकास बहुत अधिक मात्रा में हो जाता है।

आठवां वर्ष

भाषा और अधिक विकसित हो जाती है। भाषा की अभिव्यक्ति में प्रवाह आ जाता है। वाक्य रचना शुद्ध हो जाती है बालक 15 से 16 शब्द ही वाक्य आसानी से बोल लेता है। विभिन्न समस्याओं के समाधान के संबंध में उचित निर्णय लेने का प्रयास करता है। समूह में रहने की प्रवृत्ति का विकास होता है। वह घर की अपेक्षा बाहर रहना अधिक पसंद करता है। स्मरण शक्ति का विकास अधिक हो जाता है। जिससे वह छोटी-छोटी कविताओं और कक्षा में बताई गई विभिन्न बातों को आसानी से याद कर लेता है।

नवा वर्ष

इस अवस्था में बालक की भाषा इस अमृत कल्पना चिंतन और ध्यान आदि क्षमताओं का और अधिक विकास हो जाता है। इस अवस्था में बाद समय दूरी, ऊंचाई, लंबाई, दिन, समय, तारीख, महीना और वर्ष आदि को आसानी से बता देता है। विभिन्न प्रकार के सिक्कों और नोटों का सही मूल्य बता सकता है। पढ़ाई की तरफ ध्यान केंद्रित हो जाता है विद्यालय क्रियाओं में रुचि लेता है। सामाजिक सहभागिता बढ़ जाती है।

दसवां वर्ष

इस अवस्था में उसकी वाक शक्ति बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त निरीक्षण, ध्यान, तर्क, स्मरण और रुचियो का भी उत्तरोत्तर विकास होता है। वह 20 से 25 शब्दों के वाक्य को आसानी से बोल लेता है। वह छोटी-छोटी कहानियां चुटकुले कक्षा की घटनाएं कविताएं आदि को आसानी से बोलकर याद कर लेता है। आसानी से दोहराता भी है। बालक के जीवन में नियमितता आ जाती है। आज्ञा पालन की आदत का विकास होता है। गति योगिता का भी विकास होता है।

11वा वर्ष

इस अवस्था में बालक विभिन्न वस्तुओं की समानता और भिन्नता के बारे में अधिकाधिक जानकारी रखता है। गणितीय ज्ञान भी बहुत अधिक विकसित हो जाता है। अपने आसपास के विभिन्न वस्तुओं की जानकारी रखता है तथा उनसे संबंधित समस्याओं के उचित समाधान भी प्रस्तुत करता है तथा अपने ज्ञानात्मक विकास के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहता है। विभिन्न प्रकार की सूचियों का विकास होता है जैसे खेल, अभिनय, संगीत, नृत्य।

बारहवां वर्ष

इस अवस्था में बालक की चिंतन और तर्क शक्ति बढ़ती है। अनुभवों के आधार पर वह विभिन्न समस्याओं का समाधान स्वयं करने लगता है। तर्कशक्ति के आधार पर विभिन्न समस्याओं के परिणाम के बारे में पूर्वानुमान लगा लेता है। जिज्ञासा बढ़ जाती है। अतः विभिन्न परिस्थितियों का निरीक्षण ही स्वयं कर लेता है। शब्द भंडार बढ़ जाता है। वह शक्ति अधिक हो जाती है। वाक्य रचना में शुद्धता आ जाती है। विभिन्न प्रश्नों के तर्कपूर्ण उत्तर देने में सफल रहता है। ध्यान और एकाग्रता बढ़ती है। अब यह अधिक समय तक किसी कार्य को लगातार कर सकता है। विभिन्न प्रकार की रूचि ओं का विकास होता है। खेलो और मनोरंजन के प्रति रुचि बढ़ती है। यदि इस अवस्था में सीखने का अवसर मिले तो बालक एक से अधिक भाषाओं का ज्ञान रख सकता है।

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