भारत में कंपनी राज का प्रभाव

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अंग्रेजों ने भारत के विशाल साम्राज्य पर कब्जा जमाने के बाद उस पर नियंत्रण रखने और शासन चलाने के तरीके तैयार किए। प्लासी के युद्ध 1757 ईस्वी से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 ईस्वी की 100 वर्षों की लंबी अवधि के दौरान भारत पर कंपनी की पकड़ को बनाए रखा और सुदृढ़ करने की प्रशासनिक नीति में अक्सर बदलाव आता रहा। भारत में कंपनी राज का प्रभाव के बारे में आज हम जनेगे।

अंग्रेजी शासन का प्रशासनिक ढांचा इन्हीं उद्देश्यों को पूरा करने के लिए बनाया गया था। सबसे अधिक जोर कानून और व्यवस्था को बनाए रखने पर दिया जाता था, जिससे बिना रुकावट के भारत के साथ व्यापार किया जा सके तथा उसके भौतिक एवं प्राकृतिक संसाधनों का अधिक से अधिक अपने लाभ के लिए उपयोग किया जा सके।

भारत में कंपनी राज

बंगाल में दोहरी शासन व्यवस्था

बंगाल पर नियंत्रण होने के बाद क्लाइव ने बंगाल में दोहरी शासन व्यवस्था प्रारंभ की।इस व्यवस्था में कंपनी के पास राजस्व वसूली का कार्य था और नवाब के पास राज्य की कानून व्यवस्था तथा राज्य के विकास कार्यों की जिम्मेदारी थी। कंपनी के पास अधिकार थे, परंतु कोई दायित्व नहीं। जबकि नवाब के जबकि नवाब के पास दायित्व थे,परंतु अधिकार नहीं।

इसी दौरान 1769 से 70 ईस्वी में अकाल पड़ने के कारण बंगाल की जनता की कठिनाई और भी बढ़ गई थी। जनता को राहत पहुंचाने का कोई कार्य नहीं किया गया था। इससे इंग्लैंड में कंपनी की बहुत आलोचना हुई, परंतु कंपनी के अधिकारी अधिक धन कमाने में लगे रहे।

कंपनी के अधिकारियों को कीमती उपहार में काफी धन प्राप्त हो रहा था। निजी व्यापार से भी वे काफी धन कमा रहे थे। कंपनी के अधिकारियों के भ्रष्टाचार को देखकर बिटेन वासी मांग करने लगे कि कंपनी अधिकारियों की नियुक्ति में योग्यता में मापदंड निश्चित किए जाएं तथा कंपनी के अधिकारियों से आय-व्यय का लेखा-जोखा लिया जाए।

इन भ्रष्ट अधिकारियों के पास कंपनी घाटे में जा रही थी।अब ऐसी स्थिति आ गई कि कंपनी को व्यापार करने के लिए ब्रिटिश सरकार से लगभग 1000000 पाउंड ब्रिटिश मुद्रा के क्षण की माप करनी पड़ी।ऐसी स्थिति में ब्रिटेन की संसद में इस बात की जोरदार मांग होने लगी कि कंपनी एवं उसके अधिकारियों के कार्यो की देख-रेख, उसके लेखे-जोखे, उसकी योग्यता, नियुक्ति आदि के लिए पूर्व कानून में परिवर्तन किया जाए। साथ-साथ कंपनी की गतिविधियों पर प्रभावी सरकारी नियंत्रण के लिए कानून बनाया जाए।

ब्रिटेन के नए उद्योगपति, जो व्यापार पर कंपनी के एकल अधिकार से असंतुष्ट थे, उन्होंने भी कंपनी के कानूनों में बदलाव का समर्थन किया। इन्हीं कारणों से निम्नलिखित एक्ट(धारा)बनाए गए-

भारत में वैधानिक विकास का प्रारंभ रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 ई.(Regulating Act)

कंपनी की गतिविधियों को नियंत्रित एवं निर्देशित करने के लिए 1773 इसी में रेगुलेटिंग एक्ट बनाया गया। कंपनी के डायरेक्टरों से कहा गया कि

  1. वे कंपनी के राजनैतिक, व्यापारिक, असैनिक और राजस्व संबंधी सभी तथ्य ब्रिटिश संसद के सामने रखा करें।
  2. कंपनी के अधिकारी अतिरिक्त धन्ना कमाए इसके लिए वह आवश्यक हो गया कि इंग्लैंड वापस लौटने पर अपनी संपत्ति का ब्यौरा दें।
  3. इस एक्ट के अंतर्गत बंगाल के गवर्नर को कंपनी के संपूर्ण भारतीय क्षेत्र का गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया। उसकी मदद के लिए 4 सदस्यों की एक परिषद बनाई गई।
  4. न्याय व्यवस्था को पुनगठित करने के लिए कोलकाता में एक सर्वोच्च न्यायालय स्थापित किया गया।

पिट्स इंडिया एक्ट-1784(Pits India Act)

ब्रिटिश संसद में 1784 इसवी में एक नया कानून पारित किया जो पिट्स इंडिया एक्ट कहलाया। इस अधिनियम के द्वारा ब्रिटेन में एक नियंत्रण परिषद (बोर्ड ऑफ कंट्रोल) की स्थापना हुई। इस पर सब के द्वारा ब्रिटिश सरकार को भारत में कंपनी के सैनिक, असैनिक तथा राजस्व संबंधी मामलों में एकाधिकार प्राप्त हो गया। गवर्नर जनरल को भारत स्थित सभी ब्रिटिश फौजों का मुख्य सेनापति बनाया गया। व्यवसायिक मामलों में कंपनी की स्थिति यथावत रखी गई।

उच्च प्रशासनिक अधिकारियों का प्रशिक्षण

प्रशासन की जिम्मेदारियां बढ़ती गई तो यह महसूस किया गया कि प्रशासनिक अधिकारियों को भारत की शासन व्यवस्था, भाषाओं तथा परंपराओं के भली-भांति परिचित होना चाहिए।इन विषयों की शिक्षा देने के लिए 18 से 1 ईसवी को कोलकाता(कोलकाता)में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की गई।

सन 1853 में नागरिक सेवा में भर्ती होने के लिए भारतीयों के लिए नागरिक सेवा प्रतियोगिता आरंभ की गई। उनकी परीक्षा इंग्लैंड में होती थी। 1853 ईसवी में इस प्रतियोगिता में प्रवेश की उम्र 23 वर्ष थी, किंतु 1863 मैं प्रवेश की उम्र 23 वर्ष से घटाकर 21 वर्ष तक 1876 ईसवी में 21 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष तक कर दी गई। इस परीक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा थी। इस कारण भारतीयों के लिए नागरिक सेवा में चयन कठिन हो गया।

शिक्षा और सामाजिक सुधार

अंग्रेजों ने 1781 ईस्वी में कोलकाता में एक मदरसा और 1792 ईस्वी में बनारस में एक संस्कृत कॉलेज की स्थापना की। विलियम जोंस ने एशियाटिकसोसाइटी नामक संस्था की स्थापना की जिसका उद्देश्य प्राचीन भारतीय इतिहास व संस्कृति की जानकारी कराना था।

मान समाज सुधारक राजा राममोहन राय भारतीय समाज में बदलाव लाना चाहते थे। वे यह मानते थे कि भारतीय नए ज्ञान विज्ञान, तकनीकी आदि को सीखे जिसके लिए अंग्रेजी सीखना अनिवार्य था। उन्होंने अंग्रेजी सरकार को चिट्ठी लिखकर अंग्रेजी शिक्षा की मांग की।

उधर अंग्रेज सरकार खुद समझने लगी थी कि अगर उसे भारत में लंबे समय तक शासन करना है तो अंग्रेजी पढ़े लिखे लोगों की बहुत जरूरत होगी। यह सोच कर अंग्रेज सरकार ने भारत में अंग्रेजी शिक्षा फैलाने की योजना बनाई।

फलत: सन 1835 में सरकार ने लॉर्ड मैकाले ने नेतृत्व में अंग्रेजी माध्यम से यूरोपीय ढंग की शिक्षा प्रणाली अपनाने की नीति घोषित की, जिसके तहत फारसी का स्थान अंग्रेजी ने ले लिया। अंग्रेजी शिक्षा की मांग बढ़ती गई।

भूमि सुधार

अंग्रेज सरकार अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए मालगुजारी वसूल करने के तरीकों पर भी विचार करने लगी। वारेन हेस्टिंग्सनया नियम बनाया कि गांवों की मालगुजारी वसूल करने के लिए किसी को ठेका दे दिया जाए और यदि मालगुजारी वसूल करने वाले का काम ठीक ना हो तो दूसरे व्यक्ति को या काम सौंप दिया जाए। लार्ड कार्नवालिस इस प्रथा में निम्न सुधार किए-

  • स्थाई बंदोबस्त लागू

    उसने अधिक से अधिक मालगुजारी वसूल करके देने वाले को नीलामी बोली के आधार पर उन्हें तथा उनके पुत्रों को आजीवन स्थाई रूप से उस गांव का जमीदार घोषित कर दिया। यही जमीदारी प्रथा या स्थाई बंदोबस्त कहलाता है। अब यही लोग जमीन के मालिक हो गए किंतु या स्वामित्व तभी तक रहता जब तक वह मालगुजारी देते रहते थे। उन्हें जमीन जोतने बोने वाले काश्तकारों को हटाने और उनसे जमीन छीन लेने का भी अधिकार था। या प्रथा बंगाल, उड़ीसा और अवध प्रांतों में प्रारंभ की गई।

  • रैयतवाड़ी प्रथा

    दक्षिण भारत के मद्रास प्रांत मैं मालगुजारी देने का उत्तरदायित्व रैयत को सौंपा गया। मालगुजारी की धनराशि लगभग 30 वर्ष के लिए निश्चित कर दी गई। रयत अपनी उपाधि का लगभग आधा भाग सरकार को मालगुजारी के रूप में देता था।

  • महालवाड़ी प्रथा

    उत्तर प्रदेश के पश्चिम में दिल्ली और पंजाब के आसपास, मालगुजारी कई गांवों के समूह के स्वामियों से वसूल की जाती थी, यह समूह ‘महाल’ कहलाते थे। इसीलिए इस प्रथा को महालवाड़ी प्रथा कहते हैं। सरकार महाल पर स्वामित्व रखने वाले से मालगुजारी वसूल करने का समझौता करती थी।

भारतीय उद्योग धंधों का विनाश

अंग्रेज भारत से कच्चा माल ले जाते थे तथा मशीनों से माल तैयार करते थे जो कि हाथ से बने सामान से सस्ता होता था। वह तैयार माल को ज्यादा दाम में भारत में बेच देते थे। इसी कारण भारतीय उद्योग इंग्लैंड के उद्योग के समक्ष टिक नहीं पाए। इसी कारण भारतीय उद्योग धंधों का विनाश होने लगा।

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