भारत में नव सामाजिक व्यवस्था

भारत में नव सामाजिक व्यवस्था – नवीन भारत में देश की सामाजिक व्यवस्था मुख्य रूप से राजतंत्र, अर्थतंत्र और शिक्षा व सामाजिक व्यवस्थाओं पर आधारित है। परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि इसके इस स्वरूप निर्धारण में धर्म तथा अन्य सामाजिक व्यवस्थाओं का योगदान नहीं है।

भारत में नव सामाजिक व्यवस्था

भारत विभिन्न संस्कृतियों से परिपूर्ण देश है। भारतीय संस्कृति में वसुधैव कुटुंबकम की भावना निहित है। भारतीय संविधान के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है परंतु असामाजिक तत्व एवं कट्टरपंथी धर्म के नाम पर देश में अलगाववादी विचार उत्पन्न कर रहे हैं। राजनीतिक लोग अपने हित के लिए देश को धर्म के नाम पर विभाजित कर रहे हैं। साथ ही साथ जनता भी उनकी इस नीति को स्वीकार कर रही है। उसमें छिपे अपने अतीत को देख नहीं पा रही है परंतु शिक्षा के प्रसार और विकास से रूढ़िवादिता समाप्त होने लगी है।

भारत में नव सामाजिक व्यवस्था
भारत में नव सामाजिक व्यवस्था

लोग देश को एक सशक्त शक्ति के रूप में देखना चाहते हैं। देश में इन सभी सामाजिक व्यवस्थाओं का एक सुंदर समन्वय है। भारत में उस नवीन सामाजिक व्यवस्था का सृजन हो रहा है। जो लोकतांत्रिक शासन प्रणाली पर आधारित उस वृक्ष के रूप में फल-फूल रही है। जिसकी समस्त पत्तियां फल फूल हरित है।

जनतंत्र आधार पर जनता को जो मूल अधिकार प्रदान किए गए हैं। वे उसे और सशक्त बना रहे हैं। जनता अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग है। देश ने अपनी अस्मिता को बनाए रखते हुए एक ऐसी आधुनिक सामाजिक व्यवस्था को अपनाया है। जो पश्चिम से प्रभावित होते हुए भी पूर्ण भारतीय से परिपूर्ण है। (भारत में नव सामाजिक व्यवस्था)

राजतंत्र

वर्तमान भारतीय शासन प्रणाली लोकतंत्र पर आधारित है। संविधान की प्रस्तावना में इसकी मूल भावना को बहुत कम शब्दों में व्यक्त किया गया है। इसमें कहा गया है कि भारत प्रभुत्व संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य है। यह 6 मूल सिद्धांतों स्वतंत्रता, समानता, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और न्याय पर आधारित है।

भारत में नव सामाजिक व्यवस्था
भारत में नव सामाजिक व्यवस्था

इन सिद्धांतों के अनुपालन में इस संविधान में सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए गए हैं। सभी के लिए समान कर्तव्य निश्चित किए गए हैं और समाज में जाति धर्म एवं लिंग आदि किसी भी आधार पर वर्ण भेद की समाप्ति के लिए स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं। जिससे देश में नवीन सामाजिक व्यवस्था का निर्माण हो रहा है। व्यक्तियों को समान अधिकार प्राप्त है। नागरिकों को अपना विचार व्यक्त करने में और अपना विकास करने की पूर्ण स्वतंत्रता है। लोगों से आशा की जाती है कि वह तत्व की भावना से रहें भारत एक पूर्ण धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। भारत में समाजवादी व्यवस्था को अपनाया है यह समाजवाद अन्य देशों के समाजवाद से भिन्न है।

अर्थतंत्र

भारत एक कृषि प्रधान देश है और धीरे-धीरे हम औद्योगिकीकरण की ओर बढ़ रहे हैं। देश की अर्थव्यवस्था तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था है। देश में तीव्र औद्योगीकरण और शहरीकरण हो रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में निवेश कर रही है। शिक्षा की व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण हो रहा है। देश विकसित देशों से प्रतिस्पर्धा हेतु तैयार हो रहा है परंतु इन सभी के बीच हमारी संस्कृत आज भी विश्व के समक्ष अतुलनीय है। देश में भावात्मक और आर्थिक आधार में समाज के मध्य संतुलन की व्यवस्था है। वैश्विक मंदी का प्रभाव संपूर्ण विश्व पर पड़ रहा है, परंतु हमारा देश इस संकट का सामना सूझबूझ के साथ कर रहा है।

भारत में नव सामाजिक व्यवस्था
भारत में नव सामाजिक व्यवस्था

शिक्षा

किसी भी देश के सामाजिक परिवर्तन की भूमिका में शिक्षा की अहम भूमिका होती है। भारत के सामाजिक परिवर्तन में भी शिक्षा की अहम भूमिका रही है। सामाजिक व्यवस्था हो एवं शिक्षा दोनों ही एक दूसरे पर आधारित है। अच्छी समाज व्यवस्था का प्रभाव शिक्षा पर पड़ता है तथा शिक्षा से ही सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन होता है। यह गति चकरा कार चलती रहती है जैसे औद्योगिकरण से देश में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की शिक्षा की मांग निरंतर बढ़ी है। वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी से ही शिक्षा क्षेत्र को बढ़ावा मिल रहा है। देश में अंधविश्वास और रूढ़िवादिता शिक्षा की प्रगति से दूर हो रही है। जीवन का प्रत्येक क्षेत्र शिक्षा से प्रभावित हो रहा है।

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