भारत में शिक्षा के निजीकरण के कारण

भारत में शिक्षा के निजीकरण के कारण – भारत में स्वतंत्रता से पूर्व निजी क्षेत्र की प्रधानता की, परंतु योजना काल में सार्वजनिक क्षेत्र का महत्व बढ़ा है तथा निजी क्षेत्र के महत्त्व में सापेक्षिक रूप से कमी आई है। सन 1991 में नई आर्थिक नीति की घोषणा की गई। इस नीति के अंतर्गत निजी क्षेत्र को अधिक महत्व दिया गया।

भारत में शिक्षा के निजीकरण के कारण

भारत में शिक्षा के निजीकरण की बढ़ती हुई प्रवृत्ति का एक प्रमुख कारण सार्वजनिक क्षेत्रों की अकुशलता है। इसके मुख्य कारण निम्न है-

  1. समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं का विघटन
  2. अकुशल सार्वजनिक क्षेत्र
  3. अनार्थिक कीमत नीति
  4. सरकार पर भार
  5. एशिया के नए औद्योगिक राष्ट्रों का अनुभव
  6. पूंजीवाद के लाभ उठाने के लिए
  7. सरकार के वित्तीय संकट का समाधान
  8. औद्योगिक विकास की गति को बढ़ाने के लिए
  9. वैश्वीकरण को बढ़ावा देने के लिए
भारत में शिक्षा के निजीकरण के कारण
भारत में शिक्षा के निजीकरण के कारण

1. समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं का विघटन

रूस तथा अन्य समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं का मुख्य आर्थिक क्षेत्र सार्वजनिक क्षेत्र था। इन अर्थव्यवस्थाओं को उदाहरण मानते हुए लगभग सभी अल्प विकसित देशों में सार्वजनिक क्षेत्र को बहुत अधिक महत्व दिया गया था। परंतु इन अर्थव्यवस्थाओं में सार्वजनिक उद्यम अकुशल हो गए तथा इन अर्थव्यवस्थाओं की असफलता के मुख्य कारण सिद्ध हुए।

रूस की अर्थव्यवस्था का विघटन हो गया। इसके फलस्वरूप अन्य अर्थव्यवस्थाओं का भी सार्वजनिक क्षेत्र में विश्वास कम हो गया। दूसरी तरफ यूएसए, जापान, जर्मनी आदि अर्थव्यवस्थाओं में निजी क्षेत्र के कारण तेजी से आर्थिक प्रगति हो रही थी।

इसीलिए इन अर्थव्यवस्थाओं का बाजार अर्थव्यवस्था तथा निजी क्षेत्र की कुशलता में विश्वास बढ़ने लगा। (नेतृत्व के सिद्धांत)

2. अकुशल सार्वजनिक क्षेत्र

सार्वजनिक क्षेत्र के प्रबंधकों को निर्णय लेने की स्वतंत्रता बहुत कम होती है। इस क्षेत्र के उद्यमों से संबंधित अधिकतर निर्णय मंत्रियों द्वारा दिए जाते हैं जो निर्णय लेते समय अपने राजनीतिक हितों का अधिक ध्यान रखते हैं। इसके फलस्वरूप निर्णय लेने में देरी होती है उत्पादन क्षमता का पूरा प्रयोग नहीं हो पाता तथा उत्पादकता कम हो जाती है। यह तत्व सार्वजनिक क्षेत्र को अकुशल बना देते हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र में लालफीताशाही, नौकरशाही, भाई बंधु पक्षपात जैसी बुराइयां पाई जाती हैं। इसी तरह नौकरी की सुरक्षा होने के कारण कर्मचारी अकुशलता से कार्य करते हैं। इन सब बुराइयों के उन्मूलन करने के लिए निजीकरण की आवश्यकता अनुभव हुई। आप भारत में शिक्षा के निजीकरण के कारण Sarkari Focus पर पढ़ रहे हैं।

3. अनार्थिक कीमत नीति

सार्वजनिक उद्यमों, विशेष रूप से जन उपयोगी उद्यमों जैसे बिजली, सिंचाई, यातायात, पानी आदि की कीमतों का निर्धारण, राजनीतिक, सामाजिक तथा अन्य अनार्थिक तत्वों के आधार पर किया जाता है। इसके फलस्वरूप इनकी कीमतें लागत में कम निर्धारित होती हैं। इसके कारण इन उद्योगों को हानि उठानी पड़ती है। इस हानि से बचने के लिए निजी करण का समर्थन किया जाता है। आप भारत में शिक्षा के निजीकरण के कारण Sarkari Focus पर पढ़ रहे हैं।

4. सरकार पर भार

सार्वजनिक उद्यमों को जो हानि होती है, वह उन प्रबंध को या किसी व्यक्ति को नहीं उठानी पड़ती। इस हानि को सरकार की आय से पूरा किया जाता है। इसलिए प्रबंधक इस बात की परवाह नहीं करते कि उद्यम की हानि हो रही है या लाभ हो रहा है। सरकार ने अपना आर्थिक भार कम करने के लिए निजी करण की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है।

5. एशिया के नए औद्योगिक राष्ट्रों का अनुभव

एशिया के नए औद्योगिक राष्ट्र जैसे जापान, कोरिया, सिंगापुर, हांगकांग, ताइवान ने निजीकरण द्वारा आर्थिक विकास की तीव्रगति प्राप्त की। उनके अनुभव ने अन्य देशों को भी सरकार द्वारा नियंत्रित आर्थिक प्रणाली के स्थान पर स्वतंत्र निजी प्रणाली अपनाने के लिए प्रेरित किया है।

इन राष्ट्रों ने निजीकरण के मॉडल को अपनाया है। इस मॉडल के जरिए ज्ञान प्रतियोगिता तथा बाहरी विश्व से संपर्क को बढ़ाया गया है। इसके फलस्वरूप निर्यात बढ़ाना एवं अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता का सामना करना संभव हो सका है।

6. पूंजीवाद के लाभ उठाने के लिए

जापान, अमेरिका, हांगकांग, सिंगापुर, कोरिया, ताइवान आदि देशों में पूंजीवाद बहुत सफल रहा है। इन अर्थव्यवस्थाओं को पूंजीवाद से बहुत लाभ मिले हैं। जैसे प्रतिस्पर्धा में वृद्धि, तकनीकी सुधार, कार्य कुशलता में वृद्धि आदि। निजी करण से पूंजीवाद का लाभ उठाया जा सकता है। अतः पूंजीवाद का लाभ उठाने के लिए हमारी सरकार ने भी निजीकरण का फैसला लिया है।

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7. सरकार के वित्तीय संकट का समाधान

वर्ष 1990-91 मैं हमारी सरकार वित्तीय संकट के दौर से गुजर रही थी और अधोसंरचना के विकास के लिए पर्याप्त धन नहीं जुटा पा रही थी। इस संकट को दूर करने के लिए सरकार ने निजी करण का निर्णय लिया, जिसमें सार्वजनिक उद्योगों में सरकार के अंशों का कुछ हिस्सा निजी क्षेत्रों को बेचा गया।

इससे सरकार को बड़ी राशि में धन मिला। इस धन से सरकार के वित्तीय संकट का समाधान हो पाया इसके अतिरिक्त सरकार 49% अंश बेचकर व शेष 51% अंश अपने पास रख कर भी औद्योगिक इकाई पर नियंत्रण रख सकती है। आप भारत में शिक्षा के निजीकरण के कारण Sarkari Focus पर पढ़ रहे हैं।

8. औद्योगिक विकास की गति को बढ़ाने के लिए

औद्योगिक विकास के लिए अधिक से अधिक औद्योगिक इकाइयां लगाने की जरूरत है। लेकिन इस बढ़ती हुई जरूरत को सार्वजनिक क्षेत्र अकेले पूरा नहीं कर सकता, क्योंकि सरकार के पास भी वित्त की कमी थी। ऐसे में निजी क्षेत्र की सहायता बहुत अनिवार्य थी।

9. वैश्वीकरण को बढ़ावा देने के लिए

निजीकरण, वैश्वीकरण को बढ़ावा देता है। विदेशी उद्यमी निजी क्षेत्र के साथ सहयोग करने को प्राथमिकता देते हैं। वैश्वीकरण के द्वारा विदेशी निवेश विदेशी तकनीक विदेशी ज्ञान विदेशी अनुभव का लाभ उठाया जा सकता है।

सार्वजनिक उद्यमों की बढ़ती हुई हानि तथा कुशलता के कारण निजीकरण का विस्तार हो रहा है। आप भारत में शिक्षा के निजीकरण के कारण Sarkari Focus पर पढ़ रहे हैं।

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