मानवाधिकार आयोग

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भारत में राष्ट्रीय स्तर व राज्य स्तर दोनों पर मानवाधिकार आयोग की स्थापना की गई है। जिसका मुख्य उद्देश्य मानव के अधिकार का संरक्षण करना, जागरूकता फैलाना व शोध कार्य करना है। राष्ट्रीय तथा राज्य स्तरीय मानवाधिकार आयोगों का अध्ययन हम लोग करने वाले हैं।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग

मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा 3 में प्रावधान किया गया है की केंद्रीय सरकार द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के नाम से एक निकाय की स्थापना करेगी। इस आयोग में निम्नलिखित को शामिल किया जाएगा।

  1. एक अध्यक्ष जो सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका हो।
  2. एक सदस्य जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका हो या वर्तमान में हो।
  3. मानवाधिकारों से संबंधित व्यवहारिक ज्ञान व अनुभव रखने वाले दो सदस्य।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग

आयोग का मुख्यालय दिल्ली में होगा। यह स्थान बदला भी जा सकता है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग का सदस्य समझा जाएगा अर्थात् इन तीनों आयोगों के अध्यक्ष राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के सदस्य माने जाएंगे।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की शक्तियां

  1. लोक सेवक के खिलाफ की गई शिकायत पर जांच तथा अन्वेषण करने का अधिकार राष्ट्रीय मानवाधिकार को प्राप्त है।
  2. न्यायालय में विचाराधीन मामले की दशा में, आयोग द्वारा उच्च न्यायालय की पूर्व अनुमति लेकर उस मामले में हस्तक्षेप कर सकता है।
  3. राज्य सरकार द्वारा सूचित किए जाने पर आयोग को जेल या संस्था का निरीक्षण करने का अधिकार है तथा सरकार को सिफारिश दे सकता है।
  4. आयोग का यह कर्तव्य तथा शक्ति भी है कि वह भारत के संविधान तथा तक समय प्रचलित किसी विधि व कानून के अंतर्गत प्रदत्त मानवाधिकार के संरक्षण के लिए व्यवस्थित किए गए सुरक्षा कवचो का पुनरीक्षण करें। तथा इन्हें भाग्यशाली ढंग से कार्यान्वित करने के लिए अपना एक निश्चित मापदंड अपनाने के लिए सरकार को सुझाव दें।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के कर्तव्य

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के कर्तव्य निम्नलिखित हैं-

  1. आयोग का कर्तव्य है कि वह व्यक्ति को मानवाधिकारों के प्रयोग करने से रोकने वाले कारणों, जिनमें आतंकी गतिविधियां भी शामिल है का पता लगाए तथा उपचारात्मक उपायों की सिफारिश करें।
  2. आयोग का कर्तव्य है कि वह मानवाधिकार के संबंध में संधियों तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय साधनों का अध्ययन करें तथा उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करें।
  3. आयोग का कार्य है कि वह मानवाधिकार के क्षेत्र में शोध कार्य करे।
  4. मानवाधिकार के संबंध में समाज में जागरूकता फैलाए तथा उन्हें शिक्षित करे तथा प्रकाशनो, प्रेस, संगोष्ठियों आदि द्वारा जागरूकता फैलाए।
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राज्य मानवाधिकार आयोग

राज्यों में राज्य मानवाधिकार आयोग की स्थापना मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के अंतर्गत की जाती है। इसका गठन मानवाधिकारों के श्रेष्ठ करण हेतु वांछित है। प्रत्येक राज्य द्वारा एक राज्य मानवाधिकार आयोग गठित होता है, जिला स्तर पर सत्र न्यायालयों को मानवाधिकार न्यायालय के रूप में अधिकृत किया जाता है।

गठन

प्रत्येक राज्य सरकार को अपने-अपने राज्यों में राज्य स्तर पर एक राज्य मानवाधिकार आयोग की स्थापना हेतु अधिकृत किया गया है। इस आयोग में निम्नलिखित को शामिल किया जाएगा

  1. आयोग का अध्यक्ष जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका हो।
  2. एक सदस्य जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका हो।
  3. कोई व्यक्ति किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त के लिए तभी अर्ह होगा जब भारत का नागरिक हो।

यदि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति के संबंध में कोई प्रश्न उठता है, तो उस प्रश्न का निर्णय भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करने के उपरांत राष्ट्रपति द्वारा किया जाएगा एवं राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम होगा।

राज्य मानवाधिकार आयोग की शक्तियां

राज्य मानवाधिकार आयोग की शक्तियां निम्नलिखित हैं-

  1. जांच एवं अन्वेषण की शक्ति – राज्य आयोग द्वारा स्वच्छता या पीड़ित व्यक्ति या किसी प्राधिकृत व्यक्ति की शिकायत पर मानवाधिकार के उल्लंघन को रोकने हेतु लोकसेवक के विरुद्ध की गई शिकायत की जांच एवं अन्वेषण कर सकता है।
  2. न्यायालय की स्वीकृति से हस्तक्षेप – न्यायालय में विचाराधीन मानवाधिकार के मामले में न्यायालय राष्ट्रपति की अनुमति से हस्तक्षेप कर सकता है।

राज्य मानवाधिकार आयोग के कर्तव्य

राज्य मानवाधिकार आयोग के कर्तव्य निम्नलिखित हैं-

  1. मानवाधिकार संबंधी सुविधाओं का परीक्षण करना
  2. मानवाधिकार संबंधी सुविधाओं को प्रभावपूर्ण तरीके से लागू करने हेतु सरकार को सिफारिश करना
  3. मानवाधिकार के उपयोग को रोकने वाले आतंकवादी कार्यों को रोकना
  4. समुचित उपचारात्मक मापदंड हेतु सरकार को उपाय सुझाना
  5. मानवाधिकार के मामले में संधियों अनुबंधों के कार्यान्वयन हेतु सुझाव देना
  6. शोध कार्य करना।
  7. गैर सरकारी संगठनों एवं संस्थाओं को प्रोत्साहन देना।

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