राज्य स्तर पर शैक्षिक प्रशासन

राज्य स्तर पर शैक्षिक प्रशासन – भारत में कुल 29 राज्य हैं। राज्यपाल राज्य का संवैधानिक अध्यक्ष होता है। उसको शासन कार्यों में परामर्श देने के लिए प्रत्येक राज्य में एक मंत्रिपरिषद होता है। मंत्री परिषद का अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है। मंत्रिपरिषद के मंत्रियों में एक शिक्षा मंत्री होता है। शिक्षा मंत्री शिक्षा से संबंधित नीतियों एवं मामलों के लिए उत्तरदाई होता है। शिक्षा मंत्री राज्य में सभी प्रकार की शिक्षा के लिए उत्तरदाई नहीं होता है।

राज्य स्तर पर शैक्षिक प्रशासन

राज्य में अन्य मंत्री भी अपने मंत्रालयों से संबंधित शैक्षिक मामलों के लिए उत्तरदाई होते हैं। उदाहरण के रूप में कृषि मंत्री कृषि शिक्षा से संबंधित होता है, बहुत से राज्यों में शिक्षा की सहायता के लिए एक या दो उपमंत्री होते हैं।

प्रत्येक राज्य में शिक्षा निदेशक या सार्वजनिक शिक्षा निदेशक राज्य के शिक्षा विभाग का प्रशासकीय अध्यक्ष होता है, परंतु वह शिक्षा मंत्री के निर्णय में कार्य करता है। शिक्षा प्रशासन के प्रति दिन के मामलों में शिक्षा मंत्री की सहायता के लिए प्रत्येक राज्य में एक शिक्षा सचिव होता है।

सचिवालय निदेशालय के कार्य कारक मामलों तथा विधानमंडल के नीति निर्धारण संबंधी कार्यों में कड़ी के रूप में कार्य करता है। शिक्षा विभाग के अधिकारी तीन स्तरों पर कार्य करते हैं –

  1. निदेशालय स्तर
  2. क्षेत्रीय स्तर
  3. जिला स्तर

कुछ राज्यों में एक और स्तर होता है जिसे ब्लॉक स्तर के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार राज्य में शिक्षा प्रशासन निम्न स्तरों पर संचालित होता है।

अधिकारीस्तर
शिक्षा मंत्रीराज्य का शिक्षा मंत्रालय
शिक्षा सचिवशिक्षा सचिवालय
शिक्षा निदेशकशिक्षा निदेशालय
उप शिक्षा निदेशकक्षेत्रीय या सर्किल स्तर
जिला विद्यालय निरीक्षकजिला स्तर
ब्लॉक शिक्षा अधिकारीब्लॉक स्तर
हण्टर आयोग 1882, सैडलर आयोग, राज्य स्तर पर शैक्षिक प्रशासन
राज्य स्तर पर शैक्षिक प्रशासन

1. शिक्षा मंत्रालय

राज्य स्तर पर शिक्षा मंत्रालय का प्रमुख अधिकारी शिक्षा मंत्री होता है। इसकी सहायता के लिए एक या दो उपमंत्री भी हो सकते हैं। जैसे महाराष्ट्र, मैसूर, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, जम्मू कश्मीर आदि। शिक्षा मंत्री जनता का चुनाव हुआ प्रतिनिधि होता है तथा राज्य के विधान मंडल के प्रति उत्तरदाई होता है।

वह शिक्षा की नीति का निर्धारण एवं उनको क्रियान्वित भी करता है। परंतु शिक्षा मंत्री संपूर्ण शिक्षा के लिए उत्तरदाई नहीं होता। राज्यों में कुछ ऐसे विभाग एवं मंत्रालय हैं जो अपने विशेष क्षेत्रों की शिक्षा के लिए उत्तरदाई होते हैं। कृषि, इंजीनियरिंग, वाणिज्य एवं उद्योग, सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं पशु चिकित्सा आदि सरकारी विभाग अपने नियंत्रण में विभिन्न विद्यालयों व कालेजों को रखते हैं। प्रायः यह विभाग एक दूसरे की क्रियाओं से कोई संबंध नहीं रखते और ना ही शिक्षा विभाग इनकी क्रियाओं में कोई समन्वय स्थापित कर पाता है।

इसलिए यह आवश्यक है कि इनको गतिविधियों में समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया जाए। इस संबंध में कोठारी कमीशन का सुझाव है कि प्रत्येक राज्य में एक शिक्षा परिषद की स्थापना की जाए। इसका चेयरमैन शिक्षा मंत्री होता था उसमें राज्य के विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधियों, शिक्षा की विभिन्न शाखाओं के संचालकों तथा कुछ शिक्षा मर्मज्ञ को सदस्यता प्रदान की जाए। इसका कार्य क्षेत्र विद्यालय शिक्षा तक सीमित हो। यहां विद्यालय शिक्षा से संबंधित मामलों में राज्य सरकार को परामर्श दे।

इसके अतिरिक्त यह विभिन्न साधनों के माध्यम से विद्यालय शिक्षा से संबंधित विभिन्न प्रकार के संचालित कार्यक्रमों का मूल्यांकन तथा राज्य में शिक्षा के विकास का पुनरीक्षण करे। इस परिषद को प्रमुख सलाहकार समिति का स्थान प्रदान किया जाए। यहां अपने कार्यों को पूर्ण करने के लिए विभिन्न समितियों का निर्माण कर सकती है। इस परिषद के वार्षिक प्रतिवेदन ओं को इसकी सिफारिशों के साथ राज्य के विधान मंडल के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। आप राज्य स्तर पर शैक्षिक प्रशासन Sarkari Focus पर पढ़ रहे हैं।

शिक्षामंत्री के कार्य

शिक्षा मंत्री के महत्वपूर्ण कार्य निम्न है-

  1. शिक्षा नीति का निर्धारण तथा राज्य की शिक्षा पद्धति के लिए नेतृत्व प्रदान करना।
  2. शिक्षा से संबंधित विषयों पर पूछे गए प्रश्नों का विधानमंडल के समक्ष उत्तर देना तथा शिक्षा संबंधी विधायक में विधानमंडल को परामर्श देना।
  3. निजी प्रबंधकों तथा स्थानीय संस्थाओं को स्कूलों के संचालन में सहायता देना।
  4. शैक्षिक समस्याओं के समाधान के लिए अनुसंधान कार्यों को प्रोत्साहन देना एवं राज्य की शैक्षिक क्रियाओं में सामंजस्य स्थापित करना तथा विभिन्न कार्यक्रमों के परिणामों की जांच करना।

उपरोक्त कार्यो को पूर्ण करने के लिए राज्य के शिक्षा विभाग के 2 अंग होते हैं, शिक्षा सचिवालय तथा शिक्षा निदेशालय।

राज्य स्तर पर शैक्षिक प्रशासन

2. शिक्षा सचिवालय

राज्य का शिक्षा सचिवालय अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा मंत्री तथा उपमंत्री से संबंधित है। शिक्षा से संबंधित सभी नीतियां शिक्षा सचिवालय में निर्धारित की जाती हैं। सचिवालय का अध्यक्ष शिक्षा सचिव होता है और उसकी सहायता के लिए उप सचिव तथा अधीन सचिव आदि भी नियुक्त किए जाते हैं। यह अखिल भारतीय सेवा का सदस्य होता है। पश्चिमी बंगाल के सिवाय प्रत्येक राज्य में शिक्षा सचिव का पद शिक्षा संचालक के पद से पृथक होता है।

प्रतिदिन के मामलों को शिक्षा सचिव द्वारा पूरा किया जाता है और सरकार के सभी आदेश उसी के नाम से निकलते हैं। शिक्षा संचालक द्वारा जो नीतियां एवं प्रस्ताव प्रस्तुत किए जाते हैं वह पहले सचिवालय के अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा अध्ययन किए जाने के पश्चात शिक्षा सचिव के पास जाते हैं और तब वह उन्हें शिक्षा मंत्री के समक्ष प्रस्तुत करता है।

मैकाले का विवरण पत्र 1835, त्रिभाषा सूत्र, राज्य स्तर पर शैक्षिक प्रशासन

3. शिक्षा निदेशालय

यह एक कार्यपालक संस्था है। वस्तुतः यह सरकार तथा राज्य में फैली हुई सैकड़ों शिक्षा संस्थाओं के बीच एक जोड़ने वाली कड़ी है। यह सरकार को शिक्षा की विभिन्न शाखाओं की दशाओं से पूर्णतया परिचित कराता है तथा सरकार की शिक्षा नीति के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया उनकी आवश्यकता एवं शिक्षा की प्रगति से भी परिचित कराता है।

शिक्षा निदेशालय का सबसे बड़ा अधिकारी शिक्षा निदेशक है, जो कि शिक्षा संबंधी मामलों में शिक्षा मंत्री का विशेषज्ञ परामर्शदाता होता है। वह शिक्षा के क्षेत्र में सर्वोच्च कार्यपालिका शक्ति है और संपूर्ण राज्य की शिक्षा के प्रशासन के लिए उत्तरदाई है। उसका विभिन्न जिलों के सरकारी एवं गैर सरकारी विद्यालयों एवं कालेजों से संबंध है।

उसको प्राथमिक तथा माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए भी व्यवस्था करनी पड़ती है। इसके लिए ही उसे स्थानीय संस्थाओं से भी संबंध रखना होता है, जो प्राथमिक शिक्षा के लिए उत्तरदाई है।

शिक्षा संचालक लड़कियों की शिक्षा के लिए भी उत्तरदाई है, इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि राज्य स्तर पर शैक्षिक प्रशासन का उस पर उत्तरदायित्व है।

4. क्षेत्रीय या सर्किल स्तर

सामान्यतः प्रत्येक राज्य को शिक्षा प्रशासन की दृष्टि से कई क्षेत्रों या सर्किलों या डिवीजनो में विभाजित कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश में यह क्षेत्र यादी जन उप शिक्षा निदेशक के अधीन है। पंजाब के क्षेत्र सर्किल शिक्षा अधिकारी के अधीन है। कुछ राज्यों में डिवीजन इंस्पेक्टर या सुपरिंटेंडेंट के अधीन है। क्षेत्रीय व्यवस्था इस कारण की गई है जिससे उसके क्षेत्र में आने वाली जिला अधिकारियों के कार्यों में समन्वय एवं सुव्यवस्था स्थापित की जा सके।

5. जिला स्तर

शिक्षा प्रशासन में यह स्तर सबसे महत्वपूर्ण है। इस स्तर के कार्य संचालन पर ही विद्यालय शिक्षा के किसी कार्यक्रम की सफलता या असफलता निर्भर है। जिला स्तर पर शिक्षा का मुख्य अधिकारी जिला विद्यालय निरीक्षक किया जिला शिक्षा अधिकारी होता है। उसकी सहायता के लिए अन्य बहुत से अधिकारी रहते हैं।

6. ब्लॉक स्तर

कुछ राज्यों में शिक्षा प्रशासन का एक स्तर ब्लॉक स्तर है। पंजाब तथा हरियाणा में प्राइमरी शिक्षा प्रशासन के लिए इस स्तर पर प्रशासन बहुत ही महत्वपूर्ण समझा जाता है। जिन राज्यों में प्राथमिक शिक्षा राज्य के प्रत्यक्ष नियंत्रण में है, वहां स्थानीय बोर्ड का इस संबंध में कोई उत्तरदायित्व नहीं है। कुछ राज्यों में ब्लॉक शिक्षा अधिकारी का कार्य उप विद्यालय निरीक्षक द्वारा किया जाता है परंतु इन अधिकारियों को जिला स्तर से संबंधित करके उन्हें प्राइमरी विद्यालयों के निरीक्षण का कार्य सौंप दिया गया है।

संप्रेषण अर्थ आवश्यकता महत्वसंप्रेषण की समस्याएं
नेतृत्व अर्थ प्रकार आवश्यकतानेतृत्व के सिद्धांत
प्रधानाचार्य शिक्षक संबंधप्रधानाचार्य के कर्तव्य
प्रयोगशाला लाभ सिद्धांत महत्त्वविद्यालय पुस्तकालय
नेता के सामान्य गुणपर्यवेक्षण
शैक्षिक पर्यवेक्षणप्रबन्धन अर्थ परिभाषा विशेषताएं
शैक्षिक प्रबन्धन कार्यशैक्षिक प्रबन्धन आवश्यकता
शैक्षिक प्रबंधन समस्याएंविद्यालय प्रबंधन
राज्य स्तर पर शैक्षिक प्रशासनआदर्श शैक्षिक प्रशासक
प्राथमिक शिक्षा प्रशासनकेंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड
शैक्षिक नेतृत्वडायट
विश्वविद्यालय शिक्षा प्रशासनविद्यालय प्रबंधन

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.