लैंगिक असमानता

लैंगिक असमानता का आशय समाज में स्त्रियों एवं पुरुषों में भेदभाव किए जाने से है। लैंगिक असमानता का प्रयोग जैविकीय एवं सामाजिक दोनों भावो में किया जाता है। जीव विज्ञान में लिंग का आशय विशिष्ट जैविककीय संरचना से है। इसमें विशेष शारीरिक व मानसिक दशाओं का समावेश होता है।

समाजशास्त्र में स्त्री पुरुषों का अध्ययन सामाजिक संबंध की गहराई तक जानने हेतु किया जाता है। लिंगभेद सामाजिक सांस्कृतिक होता है। लैंगिक असमानता में स्त्री पुरुष का अध्ययन पति-पत्नी, माता पिता, पुत्र पुत्री, भाई बहन के रूप में सामाजिक सांस्कृतिक विचार से होता है।

लैंगिक असमानता
लैंगिक असमानता

लिंग भेद का आशय स्त्रीत्व अथवा पुरुषत्व के रूप में समांतर व सामाजिक रूप में असमान विभाजन करने से हैं। समाजशास्त्र के विचार से लैंगिक असमानता हुआ स्थिति है जिसमें निम्न आधारों पर लिंगभेद होता है।

  1. पारिवारिक तथा सामाजिक निर्णयो में स्त्री पुरुषों की भूमिका
  2. स्त्री पुरुषों को प्राप्त सामाजिक सहभागिता के अवसर
  3. व्यक्तिक सामाजिक और आर्थिक जीवन में प्राप्त स्वतंत्रता
  4. स्त्रियों के प्रति मनोवृतिया तथा वास्तविक व्यवहार
  5. राजनीतिक जीवन में स्त्रियों के अधिकारों की सीमा

लैंगिक असमानता के कारण

लैंगिक असमानता के अनेक कारण हैं, जिनमें मुख्य निम्न है-

  1. पुरुष प्रधान समाज – स्त्रियों पर पुरुषों का वर्चस्व रहा है जनजातीय समुदायों के अलावा सभी समाजों में सामाजिक व्यवस्था पुरुष प्रधान ही रही है सामाजिक व्यवस्था का उन्नयन पुरुषों द्वारा ही होता है। स्त्रियों को पुरुषों के समान दर्जा प्राप्त नहीं हो सका।
  2. देश की ग्रामीण सामाजिक प्रणाली – ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था में स्त्रियों को घर के अंदर रहकर घरेलू कार्य करने होते हैं।
  3. शिक्षा का अभाव – स्त्रियों के अशिक्षित होने के कारण व अंधविश्वासों तथा मनगढ़ंत धार्मिक गाथाओं की झूठी बातों में दबी रहती है।
लैंगिक असमानता के कारण
लैंगिक असमानता के कारण

जाति की असमानता

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लैंगिक असमानता के क्षेत्र

समाज में लैंगिक असमानता के मुख्य रूप से तीन क्षेत्र है।

  1. सामाजिक क्षेत्र में असमानता
  2. आर्थिक क्षेत्र में असमानता
  3. राजनीतिक क्षेत्र में असमानता

1. सामाजिक क्षेत्र में असमानता

सामाजिक एवं प्राकृतिक जीवन में सर्वाधिक लैंगिक असमानता विद्यमान है। सामाजिक जीवन में लैंगिक असमानता निम्न दो रूपो में विद्यमान है।

  1. अधीन सामाजिक प्रतिष्थिति – सामाजिक जीवन में स्त्रियां पुरुषों के अधीन है। अधिकांश का स्त्रियों के निर्णय पुरुषों पर निर्भर होते हैं। स्त्रियों के सामाजिक संबंधों का क्षेत्र भी पुरुषों द्वारा तय किया गया होता है।
  2. शैक्षणिक असमानता – अधिकांश रूप में या देखने में आता है कि माता-पिता द्वारा लड़कियों की शिक्षा पर कम तथा पुरुषों की शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाता है। लड़कियों को उच्च शिक्षा देना सामाजिक मर्यादाओं के विपरीत माना जाता है।

2. आर्थिक क्षेत्र में असमानता

स्त्रियां आर्थिक रूप से पुरुषों पर निर्भर है। नौकरी से प्राप्त वेतन पर प्राय: उनके माता पिता पति आदि अधिकार जमा लेते हैं। स्त्रियों को शारीरिक एवं मानसिक दृष्टिकोण से कमजोर माना जाता है। स्त्रियों के लिए कुछ रोजगारो में कार्य करना भी प्रतिबंधित है।

यद्यपि कानूनी तौर पर स्त्रियों को संपत्ति अधिकार मिले हुए हैं, परंतु व्यवहार में ऐसा नहीं है। उत्तराधिकार में संपत्ति पुत्रों को ही प्राप्त होती है। भारत में अधिकांश स्त्रियों को अपने संपत्ति अधिकार का ज्ञान भी नहीं होता।

3. राजनीतिक क्षेत्र में असमानता

राजनीतिक क्षेत्र में स्त्रियों तथा पुरुषों की समानता समझने की कसौटी यह है कि स्त्रियों को राजनीतिक क्रियाओं में भाग लेने अपने मताधिकार का उपयोग करने तथा कोई राजनीतिक पद प्राप्त करने की दिशा में निर्णय लेने में कितनी समानता और आजादी मिली हुई है। यदि इस कसौटी को आधार मानकर चलें तो स्त्री पुरुष का विवेक आज भी पूरी तरह कायम है।

  1. सर्वप्रथम कठिनता से गांव क्षेत्रों में 3% तथा शहरी क्षेत्रों में 10% महिलाएं ऐसी होती हैं जिन्हें विभिन्न राजनीतिक दलों के बारे में कोई जानकारी नहीं होती है।
  2. राजनीतिक राजनीतिक दलों में स्त्रियों की भागीदारी बहुत कम है क्योंकि साधारणतया परिवार के पुरुष सदस्यों द्वारा इसे पसंद नहीं किया जाता।
  3. पंचायती राज अधिनियम, 1992 के द्वारा गांव पंचायत, क्षेत्र पंचायत तथा जिला पंचायत में एक तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित करने से यह समझा गया था स्त्रियों में राजनीतिक भागीदारी बढ़ेगी तथा इस क्षेत्र में लैंगिक विषमता का समाधान हो जाएगा।

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