विकासात्मक शिक्षण प्रतिमान

इस प्रतिमान का प्रतिपादन जीन पियाजे ने बालकों के संज्ञात्मक वृद्धि के लिए विकास क्रम के अध्ययन के आधार पर किया गया। इसमें छात्रों की मानसिक क्षमता तथा तार्किक चिंतन की क्षमताओं के विकास पर महत्व दिया जाता है। इस कारण छात्रों में इस प्रतिमान से सामाजिक योग्यताओं व ज्ञानात्मक वृद्धि का विकास होता है। इस विकास में शिक्षक इनकी सहायता करता है।

विकासात्मक शिक्षण प्रतिमान के प्रमुख तत्व

इस प्रतिमान के प्रमुख तत्व निम्न है।

  1. केंद्र बिंदु
  2. संरचना
  3. सामाजिक व्यवस्था
  4. सहायक व्यवस्था
  5. उपयोग

केंद्र बिंदु

इस प्रतिमान का मुख्य केंद्र बिंदु छात्रों की सामान्य मानसिक योग्यताओं का विकास करना होता है।

संरचना

इस प्रतिमान में दो अवस्थाएं निम्न है-

  1. इसमें अध्यापक कक्षा में ऐसा वातावरण प्रस्तुत करते हैं जिसमें तार्किक चिंतन की आवश्यकता नहीं होती।
  2. इसमें शिक्षक छात्रों को आवश्यक निर्देश तथा उनको सहायता प्रदान करता है जिससे भी विषय को आत्मचिंतन कर सके।

सामाजिक व्यवस्था

इसमें संरचना उच्च स्तर से साधारण स्तर तक ही हो सकती है। इसमें छात्र एवं शिक्षक के मध्य अंत: क्रिया होती है। इसमें छात्रों के समक्ष ऐसा वातावरण प्रस्तुत होता है जिससे छात्रों को प्रेरणा मिलती है। यह वातावरण स्वतंत्र एवं खुले बौद्धिक विचारों वाला तथा सामाजिक होता है जिसमें शिक्षक विभिन्न प्रकार की सूचनाओं को एकत्रित करने हेतु रास्ता दिखाता है।

सहायक व्यवस्था

इस प्रतिमान में शिक्षक अधिगम के लिए एक वातावरण प्रदान करता है। इसमें छात्रों के मानसिक स्तर के अनुरूप चुनौतीपूर्ण समस्या प्रस्तुत करता है। समस्या के समाधान के लिए सहायक संसाधन उपलब्ध कराता है। इस प्रकार शिक्षक मार्गदर्शक एक परामर्शदाता के रूप में कार्य करता है।

उपयोग

यह तार्किक एवं बौद्धिक चिंतन का विकास करने में सहायक होता है या छात्रों में ज्ञानात्मक एवं सामाजिक व्यवस्थाओं के विकास के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है जिससे उनकी ज्ञानात्मक वृद्धि होती है। इनका प्रयोग उन समस्त विषयों में किया जा सकता है जिनमें किसी प्रकार की समस्या उत्पन्न हो सके।

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