विकास

विकास एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है जो जन्म से लेकर जीवनपर्यन्त तक अविराम होता रहता है। विकास केवल शारीरिक वृद्धि की ओर ही संकेत नहीं करता बल्कि इसके अंतर्गत वह सभी शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और संवेगात्मक परिवर्तन सम्मिलित रहते हैं, जो गर्भावस्था से लेकर मृत्युपर्यन्त तक निरंतर प्राणी में प्रकट होते रहते हैं।

विकास केवल अभिवृद्धि तक ही सीमित नहीं है बल्कि वह अव्यवस्थित तथा समान उगत परिवर्तन है जिसमें की प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तनों का प्रगतिशील क्रम नहीं रहता है जिसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएं व योग्यताएं प्रकट होती हैं।

हरलाक के अनुसार

विकास को क्रमिक परिवर्तनों की संख्या भी कहा जाता है, इसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताओं का उदय होता है तथा पुरानी विशेषताओं की समाप्ति हो जाती है। प्रौढ़ावस्था में पहुंचकर मनुष्य स्वयं को जिन गुणों से संपन्न पाता है वह विकास की प्रक्रिया के ही परिणाम होते हैं।

विकास परिवर्तन संखला की व्यवस्था है जिसमें बच्चा भ्रूण अवस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक गुजरता है।

मुनरो के अनुसार
विकास

आज की प्रक्रिया में होने वाले परिवर्तन वंशानुक्रम से प्राप्त गुणों तथा वातावरण दोनों का ही परिणाम होता है। बाल विकास की प्रक्रिया में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों को आसानी से देखा जा सकता है किंतु अन्य दिशाओं में होने वाले परिवर्तनों को समझने में समय लग सकता है।

विकास के रूप

विकास की प्रक्रिया चार प्रकार की होती हैं।

  1. आकार में परिवर्तन
  2. अनुपात में परिवर्तन
  3. पुरानी रूपरेखा में परिवर्तन
  4. नए गुणों की प्राप्ति

आकार में परिवर्तन

शारीरिक विकास क्रम में निरंतर शरीर के आकार में परिवर्तन होता रहता है। आकार में होने वाले परिवर्तनों को आसानी से देखा जा सकता है। शारीरिक विकास क्रम में आयु वृद्धि के साथ-साथ शरीर के आकार व भार में निरंतर परिवर्तन होता रहता है।

अनुपात में परिवर्तन

विकास क्रम में पहले आकारों में परिवर्तन होता है लेकिन यह परिवर्तन अनुपातिक होता है। प्राणी के शरीर के सभी अंग विकसित नहीं होते हैं और ना ही उनमें एक साथ परिपक्वता आती है। अतः सभी अंगों के विकास का एक निश्चित अनुपात नहीं होता है।

पुरानी रूपरेखा में परिवर्तन

प्राणी के विकास क्रम में नवीन विशेषताओं का उदय होने से पूर्व पुरानी विशेषताओं का लोप होता रहता है। उदाहरण के लिए बचपन के बालों और दातों का समाप्त हो जाना बचपन की अस्पष्ट ध्वनियां, खिसकना, घुटनों के बल चलना, रोना, चिल्लाना इत्यादि गुण समाप्त हो जाते हैं।

नए गुणों की प्राप्ति

विकास क्रम में जहां एक तरफ पुरानी रूपरेखा में परिवर्तन होता है वही उसका स्थान नए गुण प्राप्त कर लेते हैं। जैसे कि स्थाई दांत निकलना स्पष्ट उच्चारण करना उछलना कूदना और भागने दौड़ने की क्षमताओं का विकास इत्यादि विकास क्रम में नए गुण के रूप में प्राप्त होते हैं।

विकास
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विकास के नियम

विकास सार्वभौमिक एवं निरंतर चलती रहने वाली क्रिया है लेकिन प्रत्येक प्राणी का विकास निश्चित नियमों के आधार पर ही होता है। इन नियमों के आधार पर अनेक शारीरिक व मानसिक क्रियाएं विकसित होती रहती है। विकास के कुछ नियम निम्न है

  1. विकास का एक निश्चित प्रतिरूप होता है – मनुष्य का शारीरिक विकास दो दिशाओं में होता है मस्तकाधोमुखी तथा निकट दूर दिशा
    • मस्तकाधोमुखी विकास क्रम मैं शारीरिक विकास सिर से पैर की ओर होता है। भ्रूणावस्था से लेकर बाद की सभी अवस्थाओं में विकास का यही क्रम रहता है।
    • निकट दूर विकास क्रम में शारीरिक विकास पहले केंद्रीय भागों में प्रारंभ होता है तत्पश्चात केंद्र से दूर के भागों में होता है।
  2. विकास सामान्य से विशिष्ट की ओर होता है – विकास क्रम में कोई भी बालक पहले सामान्य क्रियाएं करता है तत्पश्चात विशेष क्रियाओं की ओर अग्रसर होता है। यह आपका यह नियम शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, सामाजिक सभी प्रकार के विकास पर लागू होता है।
  3. विकास अवस्थाओं के अनुसार होता है – सामान्य रूप से देखने पर ऐसा लगता है कि बालक का विकास रुक रुक कर हो रहा है परंतु वास्तव में ऐसा नहीं होता है। उदाहरण के लिए जब बालक के दूध के दांत निकलते हैं तो ऐसा लगता है कि एकाएक निकल आए परंतु न्यू गर्भावस्था के पांचवे माह में पड़ जाती है और दात 5 से 6 माह में आते हैं।

किसी भी प्राणी का विकास सदैव एक ही गति से आगे नहीं बढ़ता है उसमें निरंतर उतार-चढ़ाव होते रहते हैं।विकास एक अविराम प्रक्रिया है प्राणी के जीवन में निरंतर चलती रहती है। उदाहरण के लिए शारीरिक विकास गर्भावस्था से लेकर परिपक्वता तक निरंतर चलता रहता है परंतु आगे चलकर वा उठने बैठने, चलने फिरने और दौड़ने भागने की क्रियाएं करने लगता है।

विकास

विकास को प्रभावित करने वाले कारक

बालक के विकास को प्रभावित करने वाले कारक निम्न है –

  1. वंशानुक्रम
  2. वातावरण
  3. आहार
  4. रोग
  5. अंतः स्त्रावी ग्रंथियां
  6. बुद्धि
  7. यौन

1. वंशानुक्रम

रानी का रंग, रूप, लंबाई, अन्य शारीरिक विशेषताएं, बुद्धि, तर्क, स्मृति तथा अन्य मानसिक योग्यताओं का निर्धारण वंशानुक्रम द्वारा ही होता है। माता के राज तथा पिता के वीर्य कणों में बालक का वंशानुक्रम निहित होता है। गर्भाधान के समय चीन भिन्न भिन्न प्रकार से संयुक्त होते हैं। यह जीन वंशानुक्रम के वाहक हैं। अतः एक ही माता-पिता की संतानों में भिन्नता दिखाई देती है यह भिन्नता का नियम है।

प्रतिगमन के नियम के अनुसार प्रतिभाशाली माता-पिता की संताने दुर्बल बुद्धि के भी हो सकते हैं।

वंशानुगत कारक वह जन्मजात विशेषताएं हैं जो बालक में जन्म के समय से ही पाई जाती हैं। प्राणी के विकास में वंशानुगत शक्तियां प्रधान तत्व होने के कारण प्राणी के मौलिक स्वभाव और उनके जीवन चक्र की गति को नियंत्रित करती हैं।

डिंकमेयर के अनुसार

2. वातावरण

वातावरण में वे सभी बाह्य शक्तियां, प्रभाव परिस्थितियां आदि सम्मिलित हैं, जो प्राणी के व्यवहार, शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित करती हैं। अन्य क्षेत्रों के वातावरण की अपेक्षा बालक के घर का वातावरण उसके विकास को सर्वाधिक महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करता है।

विकास

3. आहार

मां का आहार गर्व कालीन अवस्था से लेकर जन्म के उपरांत तक शिशु के विकास को प्रभावित करता है। आहार की मात्रा की अपेक्षा आहार में विद्यमान तत्व बालक के विकास को अधिक महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करता है।

4. रोग

शारीरिक बीमारियां भी बालक के शारीरिक और मानसिक विकास को महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करती हैं। बाल्यावस्था में यदि कोई बालक अधिक दिनों तक बीमार रहता है तो उसका शारीरिक और मानसिक विकास अवरुद्ध हो जाता है।

5. अंतः स्त्रावी ग्रंथियां

बालक के अंदर पाए जाने वाली ग्रंथियों से जो स्त्राव निकालते हैं। वह बालक के शारीरिक और मानसिक विकास तथा व्यवहार को महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करते हैं।

  • पैरा थायराइड ग्रंथि से जो स्त्राव निकलता है उस पर हड्डियों तथा दांतों का विकास निर्भर करता है। बालक के संवेगात्मक व्यवहार और शांति को भी इस ग्रंथ द्वारा स्त्राव प्रभावित करता है।
  • बालक की लंबाई का संबंध थायराइड ग्रंथि के इस तरह से होता है। पुरुषत्व के लक्षणों तथा स्त्रीत्व के लक्षणों का विकास जन्म ग्रंथियों पर निर्भर करता है।

6. बुद्धि

बालक का बुद्धि भी एक महत्वपूर्ण कारक है जो बालक के शारीरिक और मानसिक विकास को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। तीव्र बुद्धि वाले बालकों का विकास मंद बुद्धि वाले बालकों की अपेक्षा तीव्र गति से होता है। दुर्बल बुद्धि वाले बालकों में बुद्धि का विकास तीव्र बुद्धि वाले बालकों की अपेक्षा मंद गति से होता है तथा विभिन्न विकास प्रतिमान अपेक्षाकृत अधिक आयु स्तरों पर पूर्ण होते हैं।

7. यौन

योन भेदों का भी शारीरिक और मानसिक विकास पर प्रभाव पड़ता है जन्म के समय लड़कियां लड़कों की अपेक्षा कम लंबी उत्पन्न होती है परंतु वयःसंधि अवस्था के प्रारंभ होते ही लड़कियों में परिपक्वता के लक्षण लड़कों की अपेक्षा शीघ्र विकसित होने लगता है। लड़कों की अपेक्षा लड़कियों का मानसिक विकास भी कुछ पहले पूर्ण हो जाता है।

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