विज्ञान की प्रकृति

मनुष्य सदा से सृष्टि के पीछे छिपे सत्य की खोज में रहा है। उसे प्रकृति की बनावट, उसकी कार्यशैली तथा उसके मूल सिद्धांतों को जानने की तीव्र इच्छा रहती है। प्रकृति के कार्यों के नियमों को समझे बिना प्रकृत की शक्तियों को अपने सुख के लिए प्रयोग से लाना असंभव था। प्रकृति के नियमों के प्रतिकूल कार्य करने में कहीं संपूर्ण जीवन नष्ट ना हो जाए। विज्ञान प्रत्येक तत्व का विश्लेषण करके प्रकृति के प्रत्येक भाग को बारीकी से समझने का प्रयत्न करता है। सृष्टि में बहुत से तथ्य बहुत जटिल है, इसलिए यदि उनका विश्लेषण करके उन्हें छोटे-छोटे भागों में बांट दिया जाए और फिर समझा जाए तो समझना आसान हो जाता है।

उदाहरण – चुंबकीय आकर्षण किस पर निर्भर है? इसे हम कई भागों में बांट सकते हैं जैसे क्या वह आकर्षित करने वाले चुंबक के ध्रुव की शक्ति पर निर्भर है? तथा क्या वह दोनों के बीच की दूरी पर निर्भर है? आदि।

जब कभी हम दो तथ्यों को सदा एक साथ घटित होते हुए देखते हैं तो हम तुरंत उनके बीच किसी संबंध की कल्पना कर लेते हैं। फिर इस कल्पना के आधार पर नए तत्वों की खोज की जाती है। वैज्ञानिक विचारणा पक्षपात रहित होती है। वैज्ञानिक विचार किसी व्यक्ति विशेष की धारणाओं पर निर्भर नहीं है और ना ही उन्हें किसी व्यक्ति की भावनाओं का कोई स्थान है। वैज्ञानिक केवल सत्य की खोज में रहता है।

जिन व्यक्तियों को वैज्ञानिक विधि में प्रशिक्षण नहीं मिला होता है वह अटकल से या व्यक्तिगत अनुमान से मूल्यांकन करते हैं। लेकिन जो वैज्ञानिक विधि में प्रशिक्षण प्राप्त होते हैं उनका मूल्यांकन तथ्यों के परिणामों के माप तोल या अन्य किन्हीं परीक्षणों पर आधारित होता है। इसलिए विज्ञान की प्रगति अच्छे मार्गों पर उस सीमा तक निर्भर रहती है जितना उन मापक यंत्रों का शोधन होता है और जितनी उनमें सूक्ष्मता आती है।

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