विद्यार्थी जीवन

विद्यार्थी जीवन – भारतीय संस्कृति में मानव जीवन को चार भागों ( आश्रमों ) में विभक्त किया गया है – ब्रह्मचर्य आश्रम , गृहस्थ आश्रम , वानप्रस्थ आश्रम तथा संन्यास आश्रम । जीवन का पहला आश्रम ब्रह्मचर्य आश्रम ही विद्यार्थी जीवन है । जीवन के इस भाग में विद्या का अध्ययन किया जाता था । विद्यार्थी का अर्थ है विद्या पाने की इच्छा रखने वाला विद्या + अर्थी ।

 विद्यार्थी जीवन का महत्त्व : विद्यार्थी जीवन मानव जीवन का सर्वश्रेष्ठ काल है । इस काल में छात्र जो कुछ सीखता है , वही उसके जीवन भर काम आता है । यही काल पूरे जीवन की आधारशिला का निर्माण करता है । आधारशिला जितनी मजबूत होती है , भवन भी उतना ही मजबूत होता है । इसी काल में विद्यार्थी के चरित्र का निर्माण होता है तथा संस्कार पल्लवित होते हैं ।

केंद्र सरकार के शैक्षिक उत्तरदायित्व, विद्यार्थी जीवन
विद्यार्थी जीवन

प्राचीन तथा आधुनिक विद्यार्थी : प्राचीन काल में विद्यार्थी को नगरों से दूर गुरु के आश्रमों में विद्याध्ययन करने के लिए जाना पड़ता था , जहाँ रहकर वह ज्ञान प्राप्त करता तथा गुरु के कठोर अनुशासन में रहता था । आज स्थिति बदल गई है । आज वह अपने ही नगर या गाँव में शिक्षा प्राप्त करता है । हाँ , उच्च शिक्षा के लिए अवश्य उसे अपने नगरों से दूर जाना पड़ सकता है , पर वहाँ भी गुरुकुलों जैसा वातावरण नहीं होता । प्राचीनकाल में विद्यार्थी आज्ञाकारी , विनम्र , अनुशासित , चरित्रवान तथा अध्वसायी होते थे , पर आज तो वह अनुशासनहीन , उग्र तथा आलसी हो गया है । आज उसमें नैतिक मूल्यों का अभाव हो गया है । 

आदर्श विद्यार्थी के गुण : आदर्श विद्यार्थी के गुणों की चर्चा इस प्रकार की गई है —

         काक चेष्टा वको ध्यानं , श्वान निद्रा तथैव च । अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पंच लक्षणम् ।।

 विद्यार्थी को बगुले की तरह एकाग्रचित्त, कौए के समान सतर्क, कुत्ते की भाँति कम सोने वाला, कम भोजन करने वाला तथा विद्याध्ययन के लिए घर को त्यागने वाला होना चाहिए। विद्यार्थी में विनम्रता, आज्ञाकारिता, परिश्रमशीलता, सत्यनिष्ठा, समयबद्धता तथा संयम जैसे गुणों का होना भी आवश्यक है।

 निष्कर्ष : विद्यार्थी जीवन भावी जीवन की आधारशिला है । अतः विद्यार्थियों को इस समय का सदुपयोग करना चाहिए तथा अपनी संस्कृति के अनुरूप अपने चरित्र को विकसित करना चाहिए । विद्यार्थी को सादगी का जीवन बिताना चाहिए तथा फैशन से दूर रहना चाहिए ।

 विद्यार्थी और अनुशासन 

अनुशासन नियमों का ही परिमार्जित तथा समाज में स्वीकृत रूप है। किसी भी राष्ट्र , समाज या संस्था की उन्नति उसके नागरिकों की अनुशासनवद्धता , नियमबद्धता आदि पर निर्भर करती है। अनुशासन मानव जीवन का प्राण है। अनुशासनहीन समाज शीघ्र ही पतन के गर्त में गिर जाता है।

 अनुशासन के अर्थ तथा प्रकार: ‘अनुशासन’ दो शब्दों के मेल से बना है – ‘ अनु + शासन ‘ , जिसका शाब्दिक अर्थ है – शासन ( नियमों ) के अनुसार आचरण करना । जब व्यक्ति समाज के नियमों के अनुरूप आचरण करता है , तो कहा जाता है , वह अनुशासित है । अनुशासन दो प्रकार का होता है – बाह्य अनुशासन और आत्मानुशासन। जब व्यक्ति दंड के भय से नियमों का पालन करता है , तो अनुशासन का यह रूप बाह्य अनुशासन है , पर जब वह स्वेच्छा से नियमों का पालन करता है , तो इसे आत्मानुशासन कहा जाता है। आत्मानुशासन श्रेष्ठ होता है क्योंकि इसका पालन स्वेच्छा से किया जाता है। 

वैदिककालीन शिक्षा, उच्च शिक्षा के उद्देश्य
 विद्यार्थी और अनुशासन 

विद्यार्थी जीवन में अनुशासन का महत्त्व : वैसे तो मानव जीवन के हर मोड़ पर अनुशासन का महत्त्व है , पर विद्यार्थी जीवन में इसका विशेष महत्त्व है। विद्यार्थी जीवन संपूर्ण जीवन की आधारशिला है। इस काल में जो संस्कार , जो जीवन मूल्य तथा जो आदतें पड़ जाती हैं , वे जीवन भर साथ देती हैं इसीलिए विद्याथीं जीवन में अनुशासित रहने वाले विद्यार्थी जीवन भर अनुशासित रहते हैं तथा कर्तव्यनिष्ठ नागरिक बन कर देश के विकास में भागीदार बनते हैं। इसके विपरीत इस काल में अनुशासनहीन हो जाने वाला जीवन भर अनुशासनहीन रहता है तथा न तो अपना , न समाज का और न ही राष्ट्र का कोई भला कर पाता है।

अनुशासनहीनता के कारण : दुर्भाग्य से आज का विद्यार्थीवर्ग अनुशासित नहीं है । वह अपनी संस्कृति से विमुख है , फैशन का दीवाना है , उसमें विनयशीलता , शिष्टाचार , आज्ञाकारिता , सादगी , परिश्रमशीलता , सत्यनिष्ठा , समयबद्धता जैसे गुणों का अभाव है । उसके कारणों पर ध्यान दें तो पाते हैं कि सबसे पहले तो आज की शिक्षा पद्धति ही दोषपूर्ण है । शिक्षा में नैतिक शिक्षा का कोई स्थान नहीं है , अच्छे शिक्षकों का भी अभाव है । आज की शिक्षा एक व्यवसाय बनकर रह गई है । पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध ने विद्यार्थी वर्ग को दिग्भ्रमित कर दिया है ।

राजनैतिक दल विद्यार्थियों को अपने स्वार्थ के लिए गलत मार्ग पर ले जाते हैं । दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले विदेशी कार्यक्रमों , फिल्मों ने विद्यार्थियों के अपरिपक्व मस्तिष्क को अनैतिक गतिविधियों की ओर अग्रसर कर दिया है । भारतीय समाज पर विदेशी संस्कृति का जो दुष्प्रभाव पड़ा है विद्यार्थी वर्ग भी उससे अछूता नहीं रह गया है । 

समाधान : आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा पद्धति में व्यापक सुधार किए जाएं । विद्यार्थियों को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखने का प्रावधान किया जाए तथा विदेशी फिल्मों , कार्यक्रमों आदि की समीक्षा की जाए । साथ ही आर्थिक विषमता , गरीबी , बेरोजगारी भी विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता को जन्म देती है । सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए ।

विद्यार्थियों में बढ़ता फैशन तथा उसके कारण

फैशन का अर्थ : साधारण शब्दों में अपने को आकर्षक बनाकर समाज में प्रतिष्ठा पाने का नाम ही फैशन है । फैशन एक ऐसी युग प्रवृत्ति है जिसका प्रायः समाज पर प्रभाव पड़ता ही पड़ता है , उससे कोई अछूता नहीं रह पाता । फैशन का संबंध व्यक्ति की रुचि – बोध , कला दृष्टि तथा सौंदर्यप्रियता से है । आज जिसे देखें , वही फैशन की बुराई करता नज़र आता है , पर फैशन अपनाने में सभी को आनंद आता है । 

फैशन का प्रभाव : यह कहना अनुचित होगा कि फैशन वर्तमान युग की देन है । फैशन की प्रवृत्ति तो न जाने कब से विद्यमान है । यदि प्राचीन मूर्तियों को देखें , तो इस बात का प्रमाण मिल जाएगा कि उस युग में फैशन था । मूर्तियों के केश – विन्यास , आभूषण तथा वस्त्र तत्कालीन फैशन की साक्षी हैं । आदिकाल से ही स्त्री और पुरुष स्वयं को सुंदर तथा आकर्षक दिखाने के लिए तरह – तरह के बनाव – शृंगार किया करते थे । जैसे – जैसे समाज विकसित होता गया , रीति रिवाज बदलते गए , फैशन का स्वरूप भी बदलता गया।

विद्यार्थी भी समाज का ही अंग हैं । समाज की प्रवृत्तियों तथा रुचियों का उन पर भी प्रभाव पड़ता है इसलिए वे फैशन जैसी प्रवृत्ति से अछूते नहीं रह सकते । उनमें अनुकरण की प्रवृत्ति अधिक होती है । जब परिवार के बड़े लोग फैशन करते हैं , तो इसका प्रभाव विद्यार्थियों पर भी पड़ना स्वाभाविक है । जैसे – जैसे समाज की रुचियों में परिवर्तन होता जाता है वैसे – वैसे फैशन का स्वरूप भी बदलता जाता है । आज सब समाज में बड़ी आयु के लोग फैशन के दीवाने हो रहे हैं तो विद्यार्थी वर्ग भला पीछे क्यों रहता । वह तो अपने बड़ों का अनुकरण करता है ।

विद्यार्थी, विद्यार्थी जीवन
विद्यार्थी जीवन

विदेशी तथा भारतीय फिल्में , नृत्य , पत्र – पत्रिकाएँ दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले अन्य विदेशी कार्यक्रम जैसे फैशन शो आदि के कारण विद्यार्थियों में फैशन की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है । साथ ही जब विदेशी पर्यटक यहाँ आते हैं या भारत के लोग विदेशों में जाते हैं तो उसका प्रभाव भी पड़ता है तथा युवक इनसे प्रभावित होकर तरह – तरह के फैशन करने लगते हैं । फिल्मों के हीरो तथा हीरोइनों की वेशभूषा भी युवाओं को आकर्षित करती है तथा वे उसे अपनाने को लालायित हो उठते हैं । 

सतत शिक्षा

दुभाव : बढ़ते फैशन के कारण अनुशासनहीनता , अनैतिक घटनाएँ , अपराध जैसी घटनाओं में वृद्धि होती है । बलात्कार जैसा जघन्य अपराध भी कहीं न कहीं फैशन की दुष्प्रवृत्ति से जुड़ा है । फैशन , हमें अपनी संस्कृति से विमुख करके पश्चिमी सभ्यता की ओर ले जाता है । तड़क – भड़क वाली वेशभूषा का आकर्षण युवक – युवतियों के मन में दूषित भावना को जन्म देता है । आज की युवतियाँ जिस प्रकार फैशन के नाम पर छोटे – छोटे वस्त्र पहनकर अंग – प्रदर्शन करती हैं , उससे अनेक अपराधों का जन्म होता है ।

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