विद्यालय प्रबंधन

विद्यालय प्रबंधन एक विशिष्ट प्रक्रिया है जिसका कार्य विद्यालय के मानवीय एवं भौतिक संसाधनों को ऐसी गतिशील संगठन इकाइयों में परिवर्तित करना है। जिसके द्वारा उद्देश्यों की पूर्ति हेतु इस प्रकार से कार्य किया जा सके कि शिक्षार्थियों के लिए उन्हें संतुष्टि प्राप्त हो सके और जो कार्य कर रहे हैं, उनमें उच्च नैतिक स्तर बनाए रखते हुए उत्तरदायित्व निभाने की भावना भी बनी रहे।

विद्यालय प्रबंधन

प्रतीक संस्था के अपने आदर्श लक्ष्य और उद्देश्य होते हैं और उनकी सफलता पूर्वक प्राप्ति के लिए ही उचित प्रबंधन की आवश्यकता होती है। विद्यालय एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था है।अतः इसकी एक संगठित प्रबंधात्मक व्यवस्था होती है। किसी प्रभावशाली प्रबंधन के अभाव में विद्यालय जीवन में दूर व्यवस्था एवं संभ्रांत फैल जाने की संभावना बनी रहती है।

एक प्रभावशाली प्रबंध विद्यालय में उचित व्यवस्था करने में सक्षम रहता है। यह उचित व्यक्तियों को उचित समय में उचित स्थान पर उचित ढंग से रखता है। विद्यालय प्रबंधन के अंतर्गत निम्न आते हैं-

प्रौढ़ शिक्षा, विद्यालय प्रबंधन
  1. शिक्षाविदों द्वारा बनाए गए लक्ष्यों की निष्ठापूर्वक प्राप्ति
  2. मिलजुल कर रहने की कला सिखाना
  3. स्कूल संबंधी गतिविधियों तथा कार्यों का संचालन तथा संयोजन
  4. विद्यालय को सामुदायिक केंद्र के रूप में बनाना
  5. विद्यालय में सहयोग की भावना लाना तथा जटिल कार्यों की सुलभता
  6. शिक्षा संबंधी प्रयोग तथा अनुसंधान के लिए समुचित व्यवस्था करना

विद्यालय की आवश्यकता

ऐसा समाज बिगड़ा हुआ समाज ही माना जाएगा जिसके विद्यालय सुचारू रूप से नहीं चलाए जाते। दूसरे शब्दों में विद्यालय ही समाज की उन्नति तथा अवनति का सूचक है।

जो कुछ सबसे श्रेष्ठ और बुद्धिमान माता-पिता अपने बालक के लिए चाहते हैं वही समाज अपने बालक के लिए चाहता है। हमारे विद्यालयों के लिए कोई अन्य आदर्श संकुचित और अप्रिय है और यदि इस पर व्यवहार किए जाएं तो यह हमारे जनतंत्र को नष्ट करेगा।

विद्यालय प्रबंधन के सिद्धांत

विद्यालय प्रबंधन के सिद्धांत निम्न है-

  1. कार्य विभाजन का सिद्धांत
  2. अधिकार एवं दायित्व का सिद्धांत
  3. अनुशासन का सिद्धांत
  4. आदेश की एकता का सिद्धांत
  5. निर्देश की एकता का सिद्धांत
  6. कर्मचारियों का पारिश्रमिक
  7. समन्वय का सिद्धांत
  8. संप्रेषण का सिद्धांत
  9. प्रजातांत्रिक विद्यालय प्रबंधन का सिद्धांत
  10. नियोजन का सिद्धांत
प्रौढ़ शिक्षा, केंद्र सरकार के शैक्षिक उत्तरदायित्व, विद्यालय प्रबंधन

1. कार्य विभाजन का सिद्धांत

ऐसे सिद्धांत के अनुसार, शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु सर्वप्रथम आवश्यक क्रियाओं का पूर्वानुमान लगाया जाना चाहिए। तत्पश्चात वर्गीकरण विभागीयकरण होना चाहिए और शिक्षकों, कर्मचारियों में उनकी योग्यता और कुशलता अनुसार कार्य का विभाजन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। जिससे कार्य उचित समय पर और आवश्यक मात्रा में संपादित हो सके।

कार्य विभाजन एवं वर्गीकरण करने से विद्यालय में सभी कर्मचारियों शिक्षकों छात्रों का पूर्व निर्धारित कार्यक्रम निश्चित हो जाता है, जिससे कार्य सुगमता एवं कुशलतापूर्वक संपन्न हो जाता है। कार्य पूर्व निर्धारित होने से कार्य में त्रुटि होने की संभावना पूर्ण रूप से समाप्त हो जाती है और विद्यालय की शैक्षिक क्रियाएं बिना किसी विघ्न के संपन्न होती रहती हैं। कम से कम समय में अधिक से अधिक कार्य हो जाते हैं।

2. अधिकार एवं दायित्व का सिद्धांत

अधिकार तथा उत्तरदायित्व एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं।प्रत्येक प्रबंधक को भार आरक्षण करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि यदि किसी व्यक्ति को किसी कार्य को करने का दायित्व सौंपा जाए तो कार्य के सुव्यवस्थित निष्पादन हेतु आवश्यक अधिकार भी दिए जाने चाहिए। बिना अधिकार के कोई भी विद्यालय कर्मचारी कुशलता पूर्वक अपने कर्तव्यों का निर्वाह सुनिश्चित नहीं कर सकता है तथा इनमें एकरूपता रहना भी आवश्यक है।

3. अनुशासन का सिद्धान्त

विद्यालय में अनुशासन का विशेष महत्व है। अनुशासन किसी संगठन का प्रमुख आधार है। अनुशासन के अभाव में संगठन तथा विद्यालय में शिक्षण अधिगम और शिक्षण सहगामी क्रियाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अतः विद्यालय के शिक्षक, छात्र, कर्मचारी सभी का कार्य और व्यवहार अनुशासन पूर्ण होना चाहिए। विद्यालय को चलने के लिए विद्यालय कर्मचारियों में अनुशासन पर बल दिया जाना चाहिए तथा अनुशासन तोड़ने पर दंड की व्यवस्था होनी चाहिए।

4. आदेश की एकता का सिद्धांत

विद्यालय के समस्त आदेश एक ही अधिकारी द्वारा जारी करना चाहिए। इससे यह लाभ होता है कि कर्मचारी एक ही अधिकारी के प्रति उत्तरदाई होता है। आदेश की एकता के अभाव में अनुशासन भंग होने की संभावना बनी रहती है तथा विद्यालय में भ्रांति का माहौल रहता है। अतः आदेश को एक प्राध्यापक से आना चाहिए जिससे कि प्रशिक्षण कार्य का सफल क्रियान्वयन संभव हो सके और अनुशासन बना रहे।

5. निर्देश की एकता का सिद्धांत

विद्यालय में निर्देश की एकता के सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए जिससे शैक्षिक क्रियाओं में समरूपता बनी रह सके। निर्देशों का एक से अधिक केंद्र होने से शिक्षण कार्य प्रभावित होता है। शिक्षण कार्य उचित प्रक्रिया से पूर्ण एवं शैक्षिक सत्र में समय पर पूर्ण नहीं होता है। विद्यालयी क्रियाओं में समन्वय की कमी हो जाती है।

6. कर्मचारियों का पारिश्रमिक

विद्यालय कर्मचारियों का पारिश्रमिक दर तथा वेतन की विधि उचित व संतोषप्रद होनी चाहिए। यदि भुगतान की पद्धति उचित होगी तो कर्मचारी सदैव संतुष्ट रहेंगे एवं विद्यालय संबंधों मैं कमी भी तनाव में नहीं बदलेगी। उचित वेतन एवं भत्ते प्राप्त होने पर अध्यापक का मन शिक्षण एवं शैक्षिक क्रियाओं में लगता है। उसकी पारिवारिक आशंकाएं समाप्त हो जाती हैं।

विद्यालय प्रबंधन
विद्यालय प्रबंधन

7. समन्वय का सिद्धांत

प्रत्येक संगठन में दो प्रकार के संसाधन जुड़े होते हैं। भौतिक संसाधन तथा मानवीय संसाधन। भौतिक संसाधनों में विद्यालय, भवन, उपकरण, साज-सज्जा, चाक, मेज, श्यामपट्ट आदि आते हैं। मानवीय संसाधनों में प्राचार्य एवं अन्य अधिकारी शिक्षक कर्मचारी छात्र आदि आते हैं। विद्यालय प्रबंधन का सबसे बड़ा कार्य है कि इन संसाधनों की शक्तियों का इस प्रकार न्यायोचित सार्थक एवं मित्रता पूर्ण प्रयोग करें जिससे संगठन के निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति हो सके। इसके लिए प्रबंधन इन के मध्य आश्रिता और अंतरसंबंध स्थापित करे।

8. संप्रेषण का सिद्धांत

संप्रेषण वह क्रिया है जिसमें आदेश, सूचनाएं, विचार, प्रश्न, आंकड़े आदि एक व्यक्ति से दूसरे वक्त तक पहुंचाए जाते हैं। औपचारिक संगठनों में इसका एक निश्चित स्वरूप होता है। विद्यालय में दायित्व पदों का जो क्रम होता है उसके अनुसार ही संप्रेषण की प्रक्रिया कार्य करती है।

9. प्रजातांत्रिक विद्यालय प्रबंधन का सिद्धांत

विद्यालय प्रबंधन का आधार प्रजातांत्रिक नियमों पर आधारित होना चाहिए। विद्यालय प्रबंधन को प्रजातंत्र के नियमों का ज्ञान होना चाहिए। उसे प्रजातंत्र के सिद्धांतों पर विश्वास होना चाहिए। प्रजातंत्र के नियमों से तात्पर्य यह है कि प्रबंधन को सद्भावना, सहनशीलता, न्याय, स्वतंत्रता, दूसरों के विचारों का आदर आदि पर आधारित होना चाहिए।

प्रत्येक विद्यालय का यह लक्ष्य होना चाहिए कि उसे विद्यालय के सामाजिक व बौद्धिक विचारों को विकसित करना है। प्रजातांत्रिक विद्यालय प्रबंधन में मूल्य का 2 तथ्यों को ध्यान में रखा जाता है-

  • शैक्षिक प्रशासन में एकाधिकार प्राप्त प्रबंधक नहीं होना चाहिए।
  • संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था स्वतंत्रता, समानता, न्याय, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता से युक्त होना चाहिए।
प्रबन्धन

10. नियोजन का सिद्धांत

नियोजन का सामान्य अर्थ किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किए जाने वाले कार्य उनकी कार्यप्रणाली और सहयोगी व्यक्तियों एवं परिस्थितियों तथा सहायक सामग्री व वस्तुओं की एक सारगर्भित रूपरेखा बनाना है। इस प्रकार की रूपरेखा निर्धारित किए बिना कोई भी कार्य पूर्णत: सफल नहीं हो सकता है। यदि किसी प्रकार का पूर्व निर्धारण नहीं किया जाएगा तो लक्ष्य प्राप्ति के पहले ही मार्ग बदल जाने की संभावना अधिक रहेगी। विद्यालय प्रबंधन में शैक्षिक नियोजन एक प्रगतिशील प्रक्रिया है। इसमें ना केवल वर्तमान का ध्यान रखना होता है वरन् भविष्य को भी दृष्टिगत रखना पड़ता है।

शैक्षिक नियोजन में अतीत के निर्देशों, अनुभवों से भी लाभ उठाना अनिवार्य है और व्यक्ति एवं समाज या समुदाय अथवा संस्था विशेष की आवश्यकताओं सिद्धांतों, आदर्शों तथा मूल्यों एवं उनके साधनों आदि को भी ध्यान में रखना पड़ता है। शैक्षिक नियोजन का लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए अर्थात जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए नियोजन किया जाए वह लक्ष्य पूर्ण रूप से स्पष्ट एवं निश्चित होना चाहिए। उद्देश्य निर्धारण के उपरांत उसकी पूर्ति के लिए किए जाने वाले कार्यों की विस्तृत सूची बना लेनी चाहिए।साथ ही यह भी निश्चित करना चाहिए कि विविध विद्यालय कार्य किन प्रणालियों एवं प्रवृत्तियों द्वारा संपन्न किए जा सकते हैं।

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