विधि निर्माण शासन

भारतीय संविधान ने विधि निर्माण का कार्य विधायिका को सौंपा है जो संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप व्यवस्था को सुचारू रूप से बनाए रखने के लिए यथा समय यथा आवश्यक विधि का निर्माण करती है जिसे लागू करने का कार्य कार्यपालिका को सौंपा गया है।

न्यायपालिका को संविधान का संरक्षण दिया गया है अतः न्यायपालिका विधायिका द्वारा बनाए गए किसी भी विधि का पुनरावलोकन कर सकती है कि निर्मित विधि संविधान के अनुरूप है या नहीं। यदि विधि संविधान का उल्लंघन करती है तो न्यायपालिका उसे आविधिमान्य घोषित कर सकती है।

भारत में विधि के शासन का इतिहास

भारत में विधि का इतिहास अति प्राचीन है जिसका उल्लेख विविध प्राचीन ग्रंथों में विस्तृत मिलता है। डॉ पी• के• सेन प्रख्यात दंड शास्त्री के विचार मनु और आचार्य कौटिल्य के समय में भारत में एक सुविकसित न्याय व्यवस्था प्रचलन में थी। अपराधियों को दंड देना राजा का ही कर्तव्य हुआ करता था। भारतीय प्राचीन अर्थव्यवस्था में मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन पर विशेष बल दिया जाता था और उस समय अपराध को पाप समझा जाता था।

दंड नीति के अंतर्गत दंड शास्त्र को सामाजिक सुरक्षा का साधन माना गया है। अतः गांड स्वयं लक्ष्य ना होकर साधन मात्र था जिसका उद्देश्य सामाजिक शांति बनाए रखना था। उस समय दंड व्यवस्था में चार प्रकार के दंड दिए जाने का प्रावधान था।

  1. वाक दंड
  2. चेतावनी
  3. अर्थदंड
  4. कारावास/प्राणदण्ड

इनमें से जैसा अपराध होता था ऐसा ही दंड दिया जाता था। यदि देखा जाए तो हिंदू अपराध अपराध विधि अधिक कठोर थी। किंतु मुस्लिम दंड विधि तथा अंग्रेजी दंड विधि बहुत ही कम कठोर थी।

वर्तमान में विधि का शासन

भारत में संवैधानिक व्यवस्था के साथ ही विधि के शासन को भी स्वीकार किया गया जिसके तहत विधि के समक्ष समता लोगों का मौलिक अधिकार है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार राज्य भारत के राज्य क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधि के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।

निश्चित रूप से समानता और विधि के समान संरक्षण की धारणा राजनीतिक लोकतंत्र में सामाजिक और आर्थिक न्याय को अपनी परिधि में ले जाती है।

विधि के समक्ष समता के सिद्धांत को इंग्लैंड के दार्शनिक दिल्ली ने प्रस्तुत किया जिसकी उद्देश्य सामाजिक विषमताओं को दूर कर सभी व्यक्तियों को सभी हितों की सुरक्षा करना था।

सर्च सामाजिक व्यवस्था के संबंध मूल्यांकन के लिए विधि के समक्ष समता विधि सम्मत शासन की धारणा के परस्पर संबंधित है जिसका अर्थ या है कि कोई भी व्यक्ति देश की विधि के ऊपर नहीं है और प्रत्येक व्यक्ति चाहे उसकी पंक्तियां प्रतिष्ठा कुछ भी हो सामान विधि के अधीन है और इन सामान्य न्यायालय की अधिकारिता के अंतर्गत है।

प्रत्येक नागरिक चाहे वह प्रधानमंत्री से लेकर सामान्य कृषक कोई भी क्यों ना हो यदि कोई कार्य विधि और चित्र के बिना करता है तो वह उस कार्य के लिए सामान्य रूप से उत्तरदाई होगा। विधि के समान संरक्षण से अभिप्राय है समान लोगों में विधि समान होगी और समान रूप से प्रसारित की जाएगी अर्थात संभाल लोगों के लिए साथ समान व्यवहार होगा समान संरक्षण आसमान व्यक्तियों की सुविधाएं और अवसर प्रदान करके राज द्वारा सकारात्मक कार्य किए जाने की अपेक्षा करता है।

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