व्यक्ति और समाज में संबंध

जन्म से मानव पशु की भांति होता है जब कोई प्राणी जन्म लेता है तो उसके द्वारा कुछ समय को व प्रवृत्तियां भी होती हैं। समाज के द्वारा ही उन मूल संवेग ओवर प्रवृत्तियों को शोधन व मार्गी करण होता है। मानव मनुष्य तब तक नहीं बन सकता जब तक समाज उसको सहारा ना दे। हम सभी जानते हैं कि जैसी संगत होती है वैसा ही आचरण होता है।

यदि मनुष्य जाति में जन्म लेकर ही भेड़ियों के साथ रहेगा तो वह भी भेड़िया ही बन जाएगा। इससे यह सिद्ध होता है कि व्यक्ति जन्म से पशु होता है और फिर उसको मानव समाज ही बनाता है समाज की गति को बोलना लिखना पढ़ना आचार व्यवहार सिखाता है समाज के द्वारा ही मनुष्य पशु से मनुष्य तत्व व मनुष्य से देवतत्व पहुंचता है।

व्यक्ति समाज पर अपनी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के लिए निर्भर रहता है। समाज में ही उसके विचार स्वतंत्र कल्पनाएं इच्छाएं जागृत होती हैं और समाज ही उसका प्रिया क्षेत्र है जहां यह सभी पूरी हो सकती है।

मनुष्य समाज पर अपनी सुरक्षा आराम पालन पोषण तथा अन्य महत्वपूर्ण अवसरों एवं सेवाओं के लिए निर्भर है वह समाज पर अपने विचारों स्वपनों तथा आकांक्षाओं एवं अपने मन और शरीर की बहुत सी व्याधियों के लिए निर्भर है उसका समाज में जन्म होंगे ना ही समाज की आवश्यकताओं को अपने साथ लाना है।

जिस प्रकार फूलों की बिना बाग नहीं होता, वैसे ही बिना व्यक्तियों के समाज भी नहीं हो सकता है। समाज और व्यक्ति एक दूसरे पर निर्भर है। यह व्यवस्था तब तक निरंतर चलती रहती है जब तक समाज जनतांत्रिक व्यवस्था पर आधारित होता है। इसी कारण समाज व्यक्तियों की योग्यताओं, रुचियों, क्षमताओं का सम्मान करता है तथा व्यक्ति की सामाजिक अपेक्षाओं का सम्मान करता है।

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