शिक्षक शिक्षा की समस्याएं

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स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से ही भारतीय अध्यापक शिक्षा में बहुत अधिक सुधार हुए हैं, परंतु फिर भी सभी समस्याओं का हल खोजना संभव नहीं हो सका है।

शिक्षक शिक्षा की समस्याएं

शिक्षक शिक्षा की समस्याएं अति विचारणीय है जो कि इस प्रकार हैं –

  1. विविध स्तरीय प्रशिक्षण में संपर्क ना होना।
  2. बुनियादी एवं गैर बुनियादी पाठ्यक्रमों में असमानता।
  3. अध्यापक प्रशिक्षण का जीवन से सहसंबंधित ना होना।
  4. प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में संकीर्णता एवं अवधि की अनुपयुक्तता।
  5. कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों के अध्यापकों का प्रशिक्षित ना होना।
  6. प्रशिक्षण संस्थाओं में एकरूपता का अभाव।
  7. शोध कार्य।

1. विविधस्तरीय प्रशिक्षणों में संपर्क न होना

प्रायः पूर्व प्राथमिक विद्यालयों के अध्यापकों के प्रशिक्षण से लेकर स्नातक अध्यापकों के प्रशिक्षण तक प्रशिक्षण व्यवस्था में कोई संपर्क नहीं है। विश्वविद्यालयों में अध्यापक शिक्षा में होने वाले अनुसंधानों, शोध कार्यों एवं नवीन मनोवैज्ञानिक शिक्षण पद्धतियों की जानकारी प्राथमिक एवं पूर्व स्तरीय योग्यता के अध्यापकों को नहीं हो पाती है।

विश्वविद्यालयों को केवल संबंधित छात्र अध्यापकों के प्रशिक्षण की समस्याओं का ज्ञान ही हो पाता है, परंतु प्राथमिक विद्यालयों एवं पूर्व माध्यमिक विद्यालयों की अध्यापक प्रशिक्षण सेवाओं का ज्ञान उन्हें बिल्कुल नहीं होता। इस प्रकार उनकी समस्याएं ज्यों की त्यों बनी रहती है।

इस समस्या के समाधान हेतु केंद्र सरकार की सहायता से एनसीईआरटी तथा केंद्रीय शिक्षा संस्था दिल्ली द्वारा सभी स्तरों के अध्यापक शिक्षा पर ध्यान दिया जा रहा है। कोठारी आयोग ने भी इस प्रस्ताव को दूर करने पर बल दिया।

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2. बुनियादी एवं गैर बुनियादी पाठ्यक्रमों में असमानता

विद्यालयों में बुनियादी और गैर बुनियादी पाठ्यक्रमों की भिन्नता होने के कारण इनका शिक्षण देने वाले अध्यापकों की प्रशिक्षण व्यवस्था में सामाजिक जीवन अभ्यास तथा ग्रामीण जीवन की घटनाओं पर बल नहीं दिया जाता। वरन् शिक्षण अभ्यास एवं सैद्धांतिक ज्ञान पर अधिक बल दिया जाता है।

इस समस्या के समाधान हेतु बुनियादी और गैर बुनियादी अध्यापकों शिक्षा की भिन्नता समाप्त की जाए। एक व्यापक एवं संबंधित पाठ्यक्रम निर्मित किया जाए। अध्यापक को उत्पादनशील बनाने का प्रयास किया जाना आवश्यक है। b.ed एवं बीटीसी के पाठ्यक्रमों में परिवर्तन लाकर थोड़ी बुनियादी बातें लाई जाए तथा सैद्धांतिक प्रशिक्षण की जगह व्यावहारिक प्रशिक्षण पर बल दिया जाए।

3. अध्यापक प्रशिक्षण का जीवन से सहसंबंधित ना होना

जैसा शिक्षा का उद्देश्य होता है वैसे ही अध्यापक तैयार किए जाते हैं। हमारी आधुनिक शिक्षा का भारी दोष यह है कि वह जीवन उपयोगी और जीवन से संबंधित नहीं है। उसका स्थान बुनियादी शिक्षा को इसी दृष्टिकोण से दिया जा रहा है, क्योंकि बुनियादी शिक्षा ज्ञान को जीवन से संबंधित करती है। b.ed के पाठ्यक्रम में बुनियादी दृष्टिकोण उत्पन्न करके प्रशिक्षण देने की व्यवस्था की जानी चाहिए। उसी के अनुरूप बुनियादी शिक्षा का पाठ्यक्रम बनाना चाहिए।

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4. प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में संकीर्णता एवं अवधि की अनुपयुक्तता

B.Ed. प्रशिक्षण में सैद्धांतिक शिक्षा पर अधिक बल दिया जाता है स्वतंत्रता से पूर्व बुनियादी शिक्षा का विस्तृत उपयोग एवं उसकी व्यवस्था नहीं की जा सकी थी। परंतु अब बुनियादी शिक्षा का विकास और विस्तार पर्याप्त मात्रा में किया जा रहा है। इसलिए अब पहले की भांति बीएड प्रशिक्षण व्यवस्थाओं में सैद्धांतिक शिक्षा पर ही बल नहीं दिया जाना चाहिए।

एम.एड तथा एमएस शिक्षा का पाठ्यक्रम संकीर्ण होने के कारण उपर्युक्त आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं करता। एम.एड एवं एम.ए. शिक्षा का पाठ्यक्रम व्यापक बनाया जाना चाहिए। इस पाठ्यक्रम में अनिवार्य वैकल्पिक एवं मौखिक तीन प्रकार के पाठ्यक्रम संचालित होने चाहिए।

अनिवार्य पाठ्यक्रम

ऐसे में शैक्षणिक सांख्यिकी, अनुसंधान विधि, शिक्षण तत्वज्ञान, शिक्षा मनोविज्ञान, शिक्षा प्रशासन नियमों तथा शिक्षा प्रणालियों की विदेशी शिक्षण प्रतिक्रियाओं के आधार पर तुलनात्मक अध्ययन होना चाहिए।

वैकल्पिक पाठ्यक्रम

इससे अध्यापक अपने संबंधित क्षेत्र का विशेष ज्ञान ले सकता है।

मौखिक पाठ्यक्रम

इसमें लिखित परीक्षा के स्थान पर उपर्युक्त पाठ्यक्रमों में मौखिक जांच की व्यवस्था संचालित की जानी आवश्यक है।

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5. कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों के अध्यापकों का प्रशिक्षित न होना

विश्वविद्यालयों एवं संबंधित महाविद्यालयों के प्राध्यापक प्रशिक्षित नहीं होते। यद्यपि वे अपने विषय के पंडित होते हैं, फिर भी प्रयोगशाला के अभाव में उनका शिक्षण रोचक और प्रभावपूर्ण नहीं होता। अतः यह आवश्यकता अनुभव की जा रही है कि इन अध्यापकों में शिक्षण विधि नवीन ज्ञान की जिज्ञासा उत्पन्न करने की कला, विषय को सुगम एवं रोचक बनाने की शैली का विकास किया जाना आवश्यक है।

6. प्रशिक्षण संस्थाओं में एकरूपता का अभाव

भारत में एक ही स्तर के अध्यापकों के प्रशिक्षण की विविध व्यवस्थाएं हैं, इनके पाठ्यक्रमों उपाधियों तथा प्रमाण पत्रों आदि में पर्याप्त भिन्नता पाई जाती हैं। इन प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में अवध की समानता भी नहीं मिलती। किसी किसी राज्य में तो एक ही स्तर की विभिन्न अवधि वाली प्रशिक्षण व्यवस्थाएं पाई जाती हैं। इन परीक्षा प्रमाण पत्रों को अन्य राज्य मान्यता प्रदान करने में हिचकते हैं इस स्थिति में शिक्षक को भारी क्षोभ होता है। शिक्षा विभाग द्वारा तथा विश्वविद्यालयों द्वारा संचालित सामान्य स्तर की प्रशिक्षण व्यवस्थाओं में भारी अंतर मिलता है।

इन अंतरों को समाप्त करके एकरूपता लाने में माध्यमिक शिक्षा आयोग 1953 न्यू सुझाव दिया था कि स्नातक स्तर की प्रशिक्षण व्यवस्था विश्वविद्यालयों द्वारा तथा पूर्व स्नातक की प्रशिक्षण व्यवस्था राज्य के शिक्षा विभागों द्वारा संचालित की जानी चाहिए। इसमें पारस्परिक संपर्क होना आवश्यक है।

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7. शोध कार्य

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शिक्षक शिक्षा की समस्याएं

अध्यापक शिक्षा का उद्देश्य केवल शिक्षकों को प्रशिक्षित करना ही नहीं वरन अध्यापन संबंधी अनुसंधान की व्यवस्था करना भी है। छात्र अध्यापक एवं माध्यमिक शिक्षकों का योग इस व्यवस्था में लिया जाना आवश्यक है। प्रशिक्षण केंद्रों का कर्तव्य है कि वे प्रशिक्षण के साथ-साथ अनुसंधान कार्य भी करें। शिक्षण समाजशास्त्र, पाठ्यक्रम निर्माण, शिशु मनोविज्ञान, शिक्षण पद्धति, बुद्धि परीक्षण, परीक्षण विधियों, अध्यापकों की कार्यभार संबंधी समस्याओं, व्यवसायिक कुशलता में वृद्धि आदि की अनुसंधान एवं शोध क्रियाएं प्रशिक्षण केंद्रों पर की जानी आवश्यक है।

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