शिक्षण उद्देश्य

शिक्षण उद्देश्य – सामान्य उद्देश्य को संक्षेप में लक्ष्य कहा जाता है। लक्ष्य आदर्श होते हैं, जिनका क्षेत्र असीमित होता है तथा जिनको पूर्ण रूप से प्राप्त करना प्रायः असंभव होता है। इसकी प्राप्ति के लिए संपूर्ण स्कूल, समाज तथा राष्ट्र उत्तरदाई होता है।

मानव जीवन संपूर्ण प्राणी जगत के मध्य ईश्वर की एक अनुपम कृति है। मनुष्य अपने बौद्धिक व्यवहार के कारण ही प्राणी समुदाय में सबसे उच्च सोपान पर पदासीन है। बौद्धिक उन्नति के कारण ही मनुष्य में सामाजिक व्यक्तित्व का भाव उत्पन्न हुआ है जो मानव में पशु जीवों के व्यवहार की नैसर्गिक प्रवृत्तियों से अलग पहचान प्रदान करता है। सामाजिक दृष्टिकोण से बालक के जन्म उपरांत मानसिक विकास की व्यावहारिक प्रवृत्तियों को विकसित करने का उत्तरदायित्व पहले माता-पिता और फिर विद्यालय पर होता है।

मूल्यांकन के प्रकार, शिक्षण उद्देश्य

शिक्षण उद्देश्य

विद्यालय में यह शिक्षा शिक्षक और पाठ्यक्रम के माध्यम से बालकों को प्रदान की जाती है। इस प्रकार शिक्षण का उद्देश्य मनुष्य के मानसिक व व्यावहारिक विकास से है। जो स्वाभाविक रूप से सामाजिक मान्यताओं द्वारा प्रेरित होता है, जो समय एवं परिस्थितियों में बदलाव के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं।

अतः विज्ञान शिक्षण भी सामाजिक परंपराओं और परिस्थितियों के प्रभाव से अछूता नहीं रहा है इस प्रकार ज्ञानार्जन उद्देश्यों को दो भागों में बांटा जा सकता है-

  1. शैक्षिक उद्देश्य – वे व्यावहारिक परिवर्तन जो छात्रों में पूर्व नियोजित शिक्षण क्रियाओं के द्वारा विकसित किए जाते हैं शैक्षिक उद्देश्य के अंतर्गत आते हैं। इनका स्वरूप विस्तृत तथा प्राकृतिक दार्शनिक होती है।
  2. शिक्षण उद्देश्य – यह छात्रों के व्यवहारिक ज्ञान में किए गए बदलाव से संबंध रखता है। इनका आकार शैक्षिक उद्देश्यों की तुलना में संकुचित तथा विशिष्ट होता है और प्रकृति मनोवैज्ञानिक होती है। शिक्षण उद्देश्य शिक्षण विधि के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होते हैं।

शिक्षण उद्देश्य परिभाषा

NCERT के परीक्षा एवं मूल्यांकन विभाग द्वारा शिक्षण उद्देश्य परिभाषा निम्न प्रकार दी गई है –

उद्देश्य वह बिंदु अथवा अभीष्ट है जिस की दिशा में कार्य किया जा सकता है वह व्यवस्थित परिवर्तन है जिसे क्रिया द्वारा प्राप्त करके हम कार्य करते हैं।

उद्देश्य लक्ष्य मात्र नहीं होते जिनकी सहायता से पाठ्यक्रम को निर्मित किया जाता है या अनुदेशन के लिए निर्देशन दिया जाता है, बल्कि यह मूल्यांकन की प्रक्रिया के विशिष्टीकरण में भी सहायक होते हैं।

बी एस ब्लूम के अनुसार

इस प्रकार शिक्षण उद्देश्य से आशय विद्यार्थी की इच्छा अनुसार उसके व्यवहार में किए गए परिवर्तन से है।

परियोजना विधि

शिक्षण उद्देश्य के प्रकार

शिक्षण उद्देश्यों को दो भागों में बांटा गया है।

  1. सामान्य उद्देश्य – शिक्षण के सामान्य उद्देश्य को संक्षेप में लक्ष्य भी कहा जाता है। यह शिक्षण कार्य से पूर्णता संबंधित होते हैं तथा इनका कार्य क्षेत्र भी विस्तृत होता है। इनकी सफलता प्रत्यक्ष रूप से समाज और स्कूल के शैक्षिक वातावरण पर निर्भर करता है।
  2. विशिष्ट उद्देश्य – विशिष्ट उद्देश्यों का स्वरूप संकुचित होता है। यह पाठ्यवस्तु के प्रत्यय और सिद्धांतों तक ही सीमित होते हैं। इनका प्रयोग शिक्षण कार्यों के अतिरिक्त छात्रों के बौद्धिक मूल्यांकन के लिए भी किया जाता है।

शिक्षा के उद्देश्य की आवश्यकता

किसी भी कार्य को करने से पहले यह आवश्यक है कि उसके उद्देश्य व परिणाम के बारे में पहले से ही सोचा जाए व सावधानी रखी जाए। इसीलिए उद्देश्य को निर्धारित करना आवश्यक है इसी तथ्य को दृष्टिकोण रखते हुए हम यह कह सकते हैं कि शिक्षा को प्रभावी बनाने के लिए यह आवश्यक है कि शिक्षा के कुछ निश्चित उद्देश्य हो तथा शिक्षा प्रदान करने वाली शिक्षक को इन उद्देश्यों का भली-भांति ज्ञान हो।

जिससे कि वह अपने छात्रों को उन मापदंडों पर खरा बना सके जो उन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक है। बिना उद्देश्य के किसी कार्य को करने से उसे पूर्ण वर्ग विधि सम्मत ढंग से नहीं किया जा सकता है। जिससे समाज का राष्ट्र का तथा स्वयं छात्रों का भविष्य अंधकार में होने की आशंका बनी रहती है।

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