शिक्षण प्रतिमान के मौलिक तत्व

शिक्षण प्रतिमान के मुख्य पांच तत्व होते हैं जो निम्न प्रकार हैं-

  1. उद्देश्य
  2. संरचना
  3. सामाजिक प्रणाली
  4. मूल्यांकन प्रणाली
  5. प्रयोग

उद्देश्य

प्रत्येक प्रतिमान का अपना उद्देश्य होता है जिसे उसका लक्ष्य बिंदु कहते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए प्रतिमान को विकसित किया जाता है।

संरचना

शिक्षण प्रतिमान की संरचना का अर्थ उसकी संरचना तथा नियमों से है। अतः शिक्षण प्रतिमान की संरचना के अंतर्गत उसके उद्देश्यों के आधार पर शिक्षण पक्षों तथा उनकी क्रियाओं विधियों युक्तियों तथा शिक्षक व छात्रों की अंतः क्रियाओं को क्रमबद्ध रूप प्रदान किया जाता है। जिससे सीखने की उपयुक्त परिस्थितियां उत्पन्न की जा सके ताकि प्रतिमान के लक्ष्य को सरलता से प्राप्त किया जा सके।

सामाजिक व्यवस्था

शिक्षण एक सामाजिक कार्य है अतः सामाजिक प्रणाली ही प्रत्येक शिक्षण प्रतिमान का आधार होती है जबकि प्रत्येक शिक्षण प्रतिमान का उद्देश्य अलग अलग होता है। इसीके अनुसार उसकी सामाजिक प्रणाली भी अलग-अलग होती है। जैसे प्रत्येक कक्षा एक वास्तविक रुप में प्रणाली या व्यवस्था होती है तथा जिसकी सामाजिक प्रणाली का निर्माण शिक्षक छात्रा तथा पाठ्यक्रम करते हैं। यही चीजें अपनी अंतः क्रियाओं के द्वारा कक्षा में शिक्षण कार्य को सक्रिय बनाते हैं। जिससे छात्रों के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन हो जाए। अतः सामाजिक प्रणाली द्वारा शिक्षण प्रतिमान को प्रभावशाली बनाया जाता है।

मूल्यांकन प्रणाली

मूल्यांकन प्रणाली में मौखिक अथवा लिखित परीक्षाओं द्वारा यह जाना जाता है कि शिक्षण प्रतिमान का उद्देश्य प्राप्त हुआ अथवा नहीं। दूसरे रूप में शिक्षण प्रतिमान के उद्देश्यों की सफलता अथवा असफलता का पता लगाया जाता है। अतः इसके अंतर्गत शिक्षण प्रतिमान के कार्य का मूल्यांकन किया जाता है। जिस में भिन्न-भिन्न उद्देश्यों के अनुरूप अलग-अलग मूल्यांकन विधियों का प्रयोग किया जाता है।

प्रयोग

यह अंतिम तत्व है इसके द्वारा शिक्षण प्रतिमान का प्रयोग तथा उपयोगिता के संबंध में बताया जाता है कि प्रत्येक प्रतिमान किस परिस्थिति में प्रयोग किया जा सकता है तथा लाभदायक सिद्ध हो सकता है।

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