शिक्षा के प्रकार

शिक्षा के प्रकार (रूप) अनेक हैं –

  1. औपचारिक एवं अनौपचारिक शिक्षा
  2. प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष शिक्षा
  3. वैयक्तिक व सामूहिक शिक्षा
  4. सामान्य व विशिष्ट शिक्षा
  5. सकारात्मक व नकारात्मक शिक्षा

1. औपचारिक एवं अनौपचारिक शिक्षा

औपचारिक शिक्षा से अर्थ है कि इस प्रकार की शिक्षा विद्यार्थियों को विद्यालय में शिक्षकों के द्वारा एक निश्चित योजना व पाठ्यक्रम के अंतर्गत दी जाती है। इस प्रकार के शिक्षण की योजना पहले से ही बना दी जाती है तथा इसका उद्देश्य भी निश्चित कर दिया जाता है। इस प्रकार की शिक्षा को विद्यार्थी भी जानते बुझते प्राप्त करता है। इस प्रकार की शिक्षा में विद्यार्थी को निश्चित समय पर नियमित रूप से ज्ञान प्रदान किया जाता है। इस प्रकार की शिक्षा का प्रमुख साधन व केंद्र विद्यालय होते हैं परंतु विद्यालय के साथ-साथ, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, अजायबघर, पुस्तकें आदि अन्य साधन होते हैं, जिनसे विद्यार्थी ज्ञानार्जन करते हैं।

अनौपचारिक शिक्षा को अनियमित शिक्षा भी कहते हैं। इस प्रकार की शिक्षा जन्म भर चलती रहती है। इस प्रकार की शिक्षा में विद्यालय या शिक्षक की औपचारिकता नगण्य होती है। इस प्रकार की शिक्षा में बालक को हंसते-खेलते, खाते पीते, उठते-बैठते, आकस्मिक व अनायास ज्ञान प्राप्त होता है।

अपने मां-बाप मित्र भाई बहन पड़ोसी समाज के अन्य व्यक्ति जिनसे भी बालक का परिचय होता है वह सब से कोई ना कोई ज्ञान की बात ग्रहण करता रहता है। अनौपचारिक शिक्षा में कोई निश्चित योजना निश्चित सीमा निश्चित समय नहीं होता है। बच्चे का परिवार, मित्र समूह, पड़ोसी, समाचार पत्र, पत्रिकाएं, टीवी, रेडियो व जनसंचार के अन्य साधन व खेल आदि उसकी अनौपचारिक शिक्षा के साधन है।

2. प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष शिक्षा

इस प्रकार की शिक्षा विद्यार्थियों व शिक्षकों के प्रत्यक्ष संपर्क के फल स्वरुप होती है। शिक्षक अपने ज्ञान, व्यवहार, चरित्र आदेशों व उद्देश्यों से छात्र के मन को उसके व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं। इस प्रकार की शिक्षा में औपचारिक साधनों का प्रयोग किया जाता है।

अप्रत्यक्ष शिक्षा को अवैक्तिक शिक्षा भी कहा जाता है। यह अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त की जाती है। इस प्रकार की शिक्षा स्वतंत्र वातावरण में अप्रत्यक्ष साधनों के द्वारा प्राप्त की जाती है। इस प्रकार की शिक्षा में छात्र पर शिक्षक का कोई व्यक्तित्व का प्रभाव नहीं पड़ता है।

3. वैयक्तिक व सामूहिक शिक्षा

वैयक्तिक शिक्षा से आशय है कि कोई शिक्षक अपने विद्यार्थी की रूचि उसकी मनोवृत्ति उसकी योग्यता व उसकी विशिष्टता को ध्यान में रखते हुए शिक्षित करता है। इस प्रकार की शिक्षण प्रक्रिया में वयक्तिक शिक्षण प्रक्रिया तथा शिक्षण विधियों का ही प्रयोग किया जाता है।

सामूहिक शिक्षा से तात्पर्य है कि बालकों के एक समूह को एक साथ शिक्षा प्रदान करना। इस प्रकार की शिक्षा कक्षा में विद्यार्थियों के एक समूह को दी जाती है। इस प्रकार की शिक्षण पद्धति में छात्रों को व्यक्तित्व योग्यताओं को कोई महत्व नहीं दिया जाता है। आजकल प्रत्येक देश में प्रत्येक विद्यालय में शिक्षण कार्य ही प्रकार चल रहा है।

4. सामान्य व विशिष्ट शिक्षा

सामान्य शिक्षा को आमतौर पर उधार शिक्षा भी कहा जाता है या शिक्षा बालकों को सामान्य जीवन जीने के लिए तैयार करती है तथा उनकी सामान्य बुद्धि व सामान्य ज्ञान का विकास करती है, इससे बालकों की सामान्य बुद्धि प्रशिक्षित होती है।

विशिष्ट शिक्षा का अर्थ है किसी विशेष उद्देश्य के लिए प्राप्त की जाने वाली शिक्षा। इस प्रकार की शिक्षा का एक विशिष्ट लक्ष्य होता है तथा या बालकों को किसी व्यवसाय विशेष में प्रवीणता हासिल करने के लिए प्रदान की जाती है। इस प्रकार की शिक्षा को ग्रहण करने के बाद बालक जीवन के एक विशेष क्षेत्र में कार्य करने में सक्षम व निपुण हो जाता है।

5. सकारात्मक व नकारात्मक शिक्षा

सकारात्मक शिक्षा से तात्पर्य है कि बच्चों को विज्ञान से संबंधित बातें जैसे पृथ्वी गोल है पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है, आज तक या ब्रह्माणी सत्य हैं जैसे सदा सत्य बोलो, गरीबों की सहायता करो, पाप से घृणा करो आदि को बताया जाता है।

किसी शिक्षण में बालकों को किसी प्रकार बिना अनुभव के या तर्क से अथवा पूर्व निश्चित तथ्यों एवं मूल्यों को सिखाना ही सकारात्मक शिक्षा कहलाती है।

नकारात्मक शिक्षा में बालकों को स्वयं अनुभव करने के आधार पर तथ्यों की खोज करने व आदर्शों का निर्माण करने के अवसर प्रदान किए जाते हैं।

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