शुकनास का चरित्रचित्रण

राजा तारापीड के अमात्य शुकनास एक कुशल एवं बुद्धिमान मंत्री हैं। उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर राज्य का संचालन अच्छी तरह से किया था। अपने कार्यकाल में राजा के प्रति स्वामी भक्ति राज्य की देखभाल अनुशासन प्रशासन आदि का कार्य बड़ी ही निपुणता से किया है। परंतु जब युवराज चंद्रापीड का राज्याभिषेक होता है तब उन्होंने अपनी निपुणता कार्य कुशलता का परिचय देते हुए मंत्री पद की गंभीरता को और अधिक बढ़ा दिया।

कुशल प्रशासक के रूप में सुखनाथ में राजकुमार चंद्रापीड का राज्याभिषेक को शुभ अवसर पर राज्य गृह में शुकनास उसे उपदेश देते हैं। यद्यपि तुम सभी विद्याओं में निपुण होकर लौटे हो परंतु उनके द्वारा उत्पन्न अहंकार अत्यधिक गहन है। जो कि सूर्य, प्रदीप एवं रत्नों के द्वारा भी नष्ट नहीं किया जा सकता है। लक्ष्मी के प्रति सचेत करते हुए मंत्री शुकनास ने चंद्रापीड से यह कहा कि यह लक्ष्मी अत्यंत चंचल है। एक बार सबको अवसर देती है परंतु स्थिर नहीं रहती लक्ष्मी का दारू इतना भयानक है कि वृद्धावस्था में भी व्यक्ति ऐसा जरूपी अंधकार से मुक्त नहीं होता, इस चंचला से सावधान रहने की आवश्यकता है।

एक निपुण योद्धा होने के कारण विषय के प्रति आसक्त ना होने की शिक्षा शुकनास ने चंद्रापीड को देते हुए कहा कि राज्य के प्रति सदैव सावधान रहना तथा गुरु का देश भारत करके कामदेव को पराजित करना, इतना ही नहीं यह लक्ष्मी विषय भोगों की ओर प्रेरित करती है। जिससे व्यक्ति रास्ता भटक जाता है। मंगल प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम प्रयत्नशील लक्ष्मी के ही संबंध में विचार करने पर योद्धाओं के खड़क समूह में विचरण करती है।

नैतिक ज्ञान एवं शिक्षा को प्रदान करते हुए शुकनास ने चंद्रापीड से यह कहा कि विद्या विनयादि जन्य संतोष ने ही मुझे तुमसे इस रूप में कहने के लिए प्रेरित किया है। और मैं तुमसे लक्ष्मी के प्रति पुनः सावधान करता हुआ कहता हूं कि जिस राजा का प्रताप सर्वत्र व्याप्त हो जाता है। उसका आदेश भी सभी पालन करते हैं।

इतना उपदेश देकर शुकनास चुप हो जाते हैं।

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