शैक्षिक निर्देशन

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शैक्षिक निर्देशन – शिक्षा के क्षेत्र में अपव्यय तथा औरोधन बहुत है। परीक्षा में असफल रहने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। रुचियो, प्रतिभाओं और क्षमताओं को धारण करने वाले विद्यार्थियों का विकास नहीं हो रहा। विद्यालय तथा जीवन में सामंजस्य प्राप्त करने में विद्यार्थियों को कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में शैक्षिक निर्देशन का महत्व बढ़ रहा है। अधिकतर ‌’शैक्षिक निर्देशन का अर्थ’ निर्देशन के रूप में शिक्षा से लगाया जाता है लेकिन यह उचित नहीं है।

वास्तव में शैक्षिक निर्देशन का संबंध मुख्य रूप से शिक्षा की इस प्रकार की समस्या से है। जिन्हें छात्र अपने व्यवसायिक तैयारियों के सिलसिले में विभिन्न व्यवसायों के अध्ययन में महसूस करते हैं। विभिन्न विद्वानों ने शैक्षिक निर्देशन को व्यापक रूप में माना है। ब्रेवर महोदय ने निर्देशन का इतना व्यापक अर्थ लिया है की शिक्षा और शैक्षिक निर्देशन में अंतर करना कठिन हो जाता है। सरल व्यापक अर्थ लिया है की शिक्षा और शैक्षिक निर्देशन में अंतर करना कठिन हो जाता है।

शैक्षिक निर्देशन

शिक्षा के क्षेत्र में अपनाए गए निर्देश के कार्यक्रम को ही शैक्षिक निर्देशन कहा जाता है।

शैक्षिक निर्देशन का कार्य छात्रों को पाठ्य- विषयों को चुनने, शिक्षा में सफलता प्रदान करने और शिक्षा प्राप्त करते समय उत्पन्न होने वाली समस्याओं का समाधान करना है। इसके अतिरिक्त आज के इस जटिल और प्रतिस्पर्धात्मक युग में विद्यार्थी को अपने अध्ययन काल में ही अनेक प्रकार की शैक्षिक वातावरण से संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं का समाधान शैक्षिक निर्देशन के द्वारा किया जाता है।

प्रबन्धन, शैक्षिक निर्देशन
शैक्षिक निर्देशन

शैक्षिक निर्देशन का संबंध विद्यार्थी और विद्यालय जगत से होता है। ऐसा निर्देशन विद्यार्थी की रुचियां, क्षमताओं, कुशलताऔ एवं योग्यताओं का पता लगाकर उनके व्यक्तित्व का सर्वागीण विकास कराने में सहायक होता है। भिन्न-भिन्न विद्वानों और शिक्षा स्त्रियों शारिश्रयो ने शैक्षिक निर्देशन को भिन्न भिन्न प्रकार से परिभाषित किया है। उनमें से कुछ प्रमुख विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाएं इस प्रकार हैं।

शैक्षिक निर्देशन परिभाषा

शैक्षिक निर्देशन की परिभाषा व्यक्ति के मानसिक विकास में सहायता देने के लिए सचेत प्रयास के रूप से दी जा सकती है। कोई भी बात जिसका संबंध सीखने शिक्षा से हो, शैक्षिक निर्देशन शब्द के अंतर्गत है।

शैक्षिक निर्देशन का संबंध उस सहायता से होता है जो छात्रों को उनके विद्यालय, पाठ्यक्रम विषयों के चुनावो और समायोजनो एवं उनकी शैक्षिक उपलब्धियों के बारे में दी जाती है।

शैक्षिक निर्देशन का संबंध स्कूल के प्रत्येक पहलू से है। जैसे कि पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियों, पढ़ाई के निरीक्षण, अनुशासन विधियां, उपस्थित, योजनाबद्घता की समस्याएं, पाठ्य-अतिरिक्त क्रियाएं , स्वास्थ्य तथा शारीरिक योग्यता कार्यक्रम तथा घर और समुदाय इत्यादि।

शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने का मुख्य उद्देश्य समुचित कार्यक्रम चुनाव तथा उनके प्रकृत करने में सहायता देना है।

निर्देशन, शैक्षिक निर्देशन
शैक्षिक निर्देशन

शैक्षिक निर्देशन की विशेषताएं

शैक्षिक निर्देशन की विशेषताएं निम्न हैं-

  1. शैक्षिक निर्देशन छात्रों द्वारा नए विद्यालयों में प्रवेश करते समय आने वाली कठिनाइयों को दूर करने और छात्रों को शिक्षा के लिए उपयुक्त वातावरण चुनने में सहायता करता है।
  2. शैक्षिक निर्देशन शैक्षिक उपलब्धियों को प्राप्त करने और शैक्षिक कार्यक्रम को विचार पूर्ण ढंग से नियोजित करने में सहायता देता है।
  3. शैक्षिक निर्देशन का संबंध उन सभी समस्याओं से है जिनका अनुभव बालक शैक्षिक परिवेश में अपने समायोजन में करता है।
  4. शैक्षिक निर्देशन का संबंध विद्यालय और विद्यालय संबंधित क्रियाओं से होता है।
  5. यह विद्यार्थियों को उनके विषयों का चयन करने में सहायक है।
  6. शैक्षिक निर्देशन उचित कार्यक्रमों के वरण एवं उनमें प्रगति करने में सहायता प्रदान करता है।

शैक्षिक निर्देशन के उद्देश्य

शैक्षिक उद्देश्य या लक्ष्यों का निर्धारण शिक्षा के उद्देश्यों की व्यापक रूप रेखा के अंतर्गत किया जा सकता है। बालक के शारीरिक संवेगात्मक दैनिक व्यक्तित्व सामाजिक और नैतिक विकास को शैक्षिक लक्ष्यों के रूप में माना जा सकता है। इसके अतिरिक्त शैक्षिक निर्देशन के मुख्य रूप से चार महत्वपूर्ण कार्य उद्देश्य हैं जो कि एक दूसरे से संबंधित है। शैक्षिक निर्देशन के निम्नलिखित हैं-

  1. विद्यार्थी के साथ कार्यक्रम में उचित प्रगति करने में सहायता करना।
  2. विद्यार्थियों की रुचि योग्यता एवं साथियों के अनुसार शिक्षा की योजना तैयार करना तथा उचित पाठ्यक्रमों को चुनने में विद्यार्थी की सहायता करना।
  3. शिक्षण संस्थाओं से संबंधित कर्मचारियों, आवश्यक पाठ्यक्रम एवं प्रशासनिक प्रबंध ने परिवर्तनों का सुझाव देना। जिससे कि विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को अच्छी तरह पूरा किया जा सके तथा शैक्षिक क्षेत्र में भी वांछित प्रगति प्राप्त कर सकें।
  4. वर्तमान शिक्षा स्तर को ध्यान में रखते हुए विद्यार्थियों की शैक्षिक संभावनाओं का पता लगाने में विद्यार्थियों को सहायता प्रदान करना।
शैक्षिक निर्देशन के उद्देश्य
शैक्षिक निर्देशन

शैक्षिक निर्देशन आवश्यकता

शिक्षा के क्षेत्र में आजकल बहुत अधिक परिवर्तन हो रहे हैं। शिक्षा के उद्देश्य समाज और व्यक्ति की आवश्यकता अनुसार निर्धारित किए जाते हैं। आज की शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत छात्रों की बौद्धिक योग्यता और क्षमता की और विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है। छात्रों को उनकी रूचि, अभिरुचि और योग्यता के अनुसार शिक्षा नहीं दी जाती, जिसके परिणाम स्वरूप छात्रों का समय, उनका ढाना और उनकी शक्ति का अपब्यय होता है।

जिसके कारण वे अपने जीवन में इच्छा अनुसार सफलता प्राप्त नहीं कर पाते। अपव्यय और सफलता को शैक्षिक निर्देशन की सहायता से काफी सीमा तक कम किया जा सकता है। शैक्षिक निर्देशन की आवश्यकता किसी कारण से नहीं बल विभिन्न कारणों से अनुभव होती है। इसके कुछ महत्वपूर्ण कारण निम्नलिखित हैं।

1. विद्यालयों में उचित समायोजन के लिए

शैक्षिक समायोजन छात्र को किसी भी क्षेत्र में वाछनीय प्रगति के लिए आवश्यक है। बहुत से विद्यार्थी विद्यालय में दाखिला लेने के पश्चात वहां के वातावरण के साथ उचित समायोजन नहीं कर पाते हैं जिसके कारण या तो वे विद्यालय छोड़ देते हैं अथवा असफल हो जाते हैं। शैक्षिक निर्देशन की सहायता से छात्रों को नए विद्यालय में भली-भांति समायोजित किया जा सकता है।

2. आगामी शिक्षा से संबंधित जानकारी के लिए

शिक्षा समाप्त करने के पश्चात अथवा कॉलेज की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात छात्रों के लिए यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि उनकी आगे की शिक्षा कैसी होनी चाहिए, अर्थात वह कौन से व्यवसायिक विद्यालय में, औद्योगिक विद्यालय में या व्यापारिक विद्यालय में अध्ययन करें। अग्रिम भविष्य के संबंध में तथा उच्च शिक्षा के संबंध में निर्णय लेने के लिए शैक्षिक निर्देशन की अत्यंत आवश्यकता होती है।

3. पिछड़े बालको तथा प्रतिभाशाली बालकों की समस्याओं को दूर करने के लिए

प्रत्येक विद्यालय में कुछ ऐसे बालक होते हैं जो अन्य बच्चों की अपेक्षा शिक्षा में पिछड़ जाते हैं। ऐसे बालको के लिए के लिए शिक्षा विधि में संशोधन करना, रुचिकर पाठ्यक्रमों का चुनाव और उनके लिए उचित श्रव्य साधनों का निबंध निर्देशन के द्वारा ही संभव है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक विद्यालय में कुछ बालक अन्य बालकों की तुलना में अधिक प्रतिभाशाली और कुशाग्र बुद्धि के होते हैं जो कि सामान्य पाठ्यक्रम, सामान्य ज्ञान और सामान्य शिक्षण विधियों से संतुष्ट नहीं हो पाते हैं। ऐसे बालकों को निर्देशन के द्वारा ऐसी सुविधाएं प्रदान की जा सकती है जिससे वे बौद्धिक क्षमता के अनुसार शिक्षा प्राप्त कर सकें।

4. नौकरियों के अवसरों की जानकारी के लिए

आजकल विभिन्न व्यवसायों में जटिलता निरंतर बढ़ती जा रही है। छात्रों को उनकी रूचि, क्षमताओं और योग्यता के अनुसार व्यवसाय का चुनाव ना कर पाने के कारण वह अपने व्यवसाय में अपने आप को पूर्णत: समायोजित नहीं कर पाते हैं। दूसरे बेरोजगारी की समस्या का मुख्य कारण पाठ्यक्रम का उचित चुनाव न कर पाना बिना सोचे समझे उच्च शिक्षा प्राप्त करते रहना तथा विभिन्न व्यवसायों की उचित जानकारी न होना है। इन सभी समस्याओं को दूर करने के लिए निर्देशन आवश्यक है।

निर्देशन, शैक्षिक निर्देशन
शैक्षिक निर्देशन

5. पाठ्य विषयों का चुनाव करने के लिए

वर्तमान समय में विज्ञान कला वाणिज्य तकनीकी कंप्यूटर और व्यवसायिक क्षेत्रों से संबंधित विभिन्न विषय छात्रों को पढ़ाए जाते हैं। इन विभिन्न विषयो का चुनाव छात्रों को अपनी रुचियों, क्षमताओं और योग्यताओं के अनुसार होना चाहिए। छात्र विभिन्न विषयों का चुनाव करने में अपने आप को असफल अनुभव करते हैं। इसलिए उचित पाठ्य विषयों के चुनाव के लिए निर्देशन की आवश्यकता है।

6. बाल अपराधियों की बढ़ती हुई संख्या के कारण

आज के जटिल समाज में बाल अपराधों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी होती जा रही है। यदि बालकों को उचित समय पर सही निर्देशन लेकर दूषित वातावरण से अलग कर दिया जाए तो अनेक प्रकार के अपराधों से बालकों को बचाया जा सकता है। यही कारण है कि हमारे देश में समायोजित निर्देशन पर अधिक बल दिया जा रहा है। अतः बालकों द्वारा किए जाने वाले विभिन्न अपराधों को रोकने के लिए और उन बालकों का सही मार्गदर्शन करने के लिए निर्देशन की आवश्यकता है।

व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता, भारत में निर्देशन की समस्याएं

7. विद्यार्थियों की संख्या में निरंतर वृद्धि

वर्तमान समय में शिक्षा के सभी स्तरों पर विद्यार्थियों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। जिसके कारण इस वृद्धि को ध्यान में रखते हुए एवं सामाजिक व्यवस्था के अनुसार उनकी शिक्षा व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के लिए निर्देशन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

8. अनुशासनहीनता की समस्या को नियंत्रित करने के लिए

आजकल विद्यालयों और महाविद्यालयों के छात्रों में अनुशासनहीनता की समस्या दिन प्रतिदिन तेजी से बढ़ती जा रही है। छोटी-छोटी बातों के लिए हड़ताल करना और सार्वजनिक संपत्ति को तोड़फोड़ डालना तथा अध्यापकों का अनादर करना एक साधारण बात हो गई है।इसका मुख्य कारण है वर्तमान शिक्षा छात्रों की आवश्यकताओं को संतुष्ट करने में असफल है। अनुशासनहीनता की इन सभी समस्याओं को दूर करने के लिए शैक्षिक निर्देशन की आवश्यकता है।

9. व्यक्तिगत विभिन्नताएं

कोई दो बालक एक जैसे नहीं होते उनमें अनेक प्रकार की शारीरिक मानसिक तथा भावात्मक भिन्नताएं पाई जाती हैं। उनको उचित पाठ्यक्रम चुनने में सहायता देने के लिए शैक्षिक निर्देशन अत्यंत आवश्यक है।

10. विद्यार्थियों की स्कूल और कॉलेजों से संबंधित समस्याओं को हल करने के लिए

विद्यार्थियों कोई स्कूल और कॉलेज से संबंधित विभिन्न प्रकार की समस्याओं जैसे पुस्तकों का चुनाव करने, पाठ्यक्रम संबंधी क्रियाओं का चयन करने, पढ़ाई में मन को एकाग्र करने, सामाजिक संबंधों को कायम रखने, शिक्षा में संतोषजनक उन्नति तथा समायोजन प्राप्त करने तथा पढ़ने की आदतों का विकास करने आदि का सामना करना पड़ता है। जिसके कारण यह विद्यार्थी शिक्षा के क्षेत्र में वांछित सफलता प्राप्त नहीं कर पाते हैं। इन सभी प्रकार की विद्यार्थियों की समस्याओं को निर्देशन की सहायता से हल नहीं किया जा सकता।

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