शैक्षिक प्रबन्धन कार्य

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शैक्षिक प्रबन्धन कार्य – विद्यालय का मुख्य उद्देश्य बालक का सर्वांगीण विकास करना है। बालक सजग गतिशील तथा विशिष्ट जीव है। प्रत्येक बालक दूसरे बालक से क्षमताओं तथा विशेषताओं में भिन्न है। अतः आवश्यक है कि विद्यालय का वातावरण ऐसा हो कि सभी बालकों को विकास के पूर्ण अवसर प्राप्त हो सके। विद्यालय का प्रबंधन जितना अधिक अच्छा होगा उतना ही अधिक विद्यालय अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल होगा।

शैक्षिक प्रबन्धन कार्य

विद्यालय की सफलता बालकों के विकास पर निर्भर करती है। शैक्षिक प्रबन्धन प्रक्रिया द्वारा विद्यालय नियोजित रूप में शैक्षिक कार्यक्रमों को पूर्ण करने का प्रयत्न करता है। शैक्षिक प्रबंधन प्रक्रिया गतिशील प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार के कार्यों को किया जाता है। इन कार्यों को मुख्यतः 6 भागों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. नियोजन
  2. संगठन
  3. निर्देशन
  4. नियंत्रण
  5. समन्वय
  6. मूल्यांकन
प्रबन्धन, शैक्षिक प्रबन्धन कार्य
शैक्षिक प्रबन्धन कार्य

1. नियोजन

नियोजन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु विधिवत् कार्य करने की प्रक्रिया का निर्माण करना है। नियोजन कार्य करने से पूर्व ही कार्य करने की विधि पर विचार करता है तथा कार्य के दौरान आने वाली कठिनाइयों का अनुमान लगाता है। इस प्रकार कह सकते हैं कि यह भविष्य में किए जाने वाले कार्यो के लिए उपयुक्त कार्य विधि का चयन करने की प्रक्रिया है जिससे अनदेखी समस्याओं तथा परिणामों का पूर्वानुमान लगाकर उनसे बचा जा सके। नियोजन प्रक्रिया के मुख्य तीन अंग हैं-

  1. उद्देश्यों का निर्धारण
  2. उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए उपयुक्त वातावरण
  3. कर्मचारियों में कार्य विभाजन

विद्यालय में शैक्षिक नियोजन से तात्पर्य विद्यालय में उद्देश्यों को निर्धारित करना, संसाधनों का अनुमान लगाना, उद्देश्य प्राप्ति के लिए कार्यक्रमों का चयन करना, पाठ्यक्रम का निर्धारण करना, कार्यविधि का निर्धारण करना, कार्यक्रमों को पूर्ण करने के लिए शिक्षकों की योग्यता अनुसार उनमें कार्य का विभाजन करना तथा विद्यालय के भावी विकास की योजना तैयार करने से है।

2. संगठन

संगठन का अर्थ है उन सभी वस्तुओं की व्यवस्था करना जो कि संस्था के संचालन के लिए आवश्यक है, जैसे भौतिक संसाधन, धन तथा कर्मचारी आदि। (शैक्षिक प्रबन्धन कार्य)

संगठन वह संरचना है जो कार्य के स्पष्टीकरण तथा समूहीकरण, सत्ता तथा उत्तरदायित्व के परिभाषा करण तथा दायित्व सौंपने एवं संबंध स्थापित करने के परिणाम स्वरुप विकसित होती है।

एल ए एलेन

संगठन मानव निर्मित एक ऐसी कार्यप्रणाली है, जिसके द्वारा विद्यालय में उपलब्ध समस्त संसाधनों को इस प्रकार संयोजित करके रखा जाता है कि संसाधनों का अधिकतम तथा प्रभावी उपयोग उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सुनिश्चित किया जा सके। शिक्षा के क्षेत्र में तीन प्रकार का संगठन आवश्यक होता है-

  1. मानव संसाधन का संगठन
  2. भौतिक तथा वित्तीय संसाधन संगठन
  3. शैक्षिक पाठ्य सहगामी क्रियाओं का संगठन

विद्यालय उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए तीनों प्रकार के संगठन में भी समन्वय करना आवश्यक है। मानवीय तत्वों का संगठन शिक्षकों, छात्रों, शिक्षणेत्तर कर्मचारियों में किया जाता है। भौतिक तत्वों का संगठन विद्यालय भवन उपकरण, फर्नीचर शिक्षण सामग्री आदि की व्यवस्था के लिए किया जाता है। समस्त संसाधनों का समुचित प्रयोग कुशल व प्रशिक्षित शिक्षकों पर निर्भर करता है अतः आवश्यकतानुसार शिक्षकों तथा शिक्षणेत्तर कर्मचारियों की कार्यकुशलता बढ़ाने के प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा कार्य शालाओं की भी व्यवस्था की जाती है।

3. निर्देशन

निर्देशन से तात्पर्य शिक्षकों तथा शिक्षणेत्तर कर्मचारियों के प्रयत्नों को सही दिशा प्रदान करना है। प्रबंधक विद्यालय में उपयुक्त कार्य संस्कृति तथा समन्वय आत्मक वातावरण विकसित करके समस्त शिक्षकों को निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए मार्ग प्रशस्त करता है। निर्देशन के मुख्य तीन कार्य हैं-

  1. संप्रेषण
  2. नेतृत्व
  3. प्रेरणा

प्रत्येक शिक्षक को उनके कार्य के संबंध में पूर्ण सूचना देना प्रबंधक का दायित्व है। कार्य किस प्रकार किया जाएगा, कितने समय में पूरा किया जाएगा, कार्य में आने वाली समस्याओं को किस प्रकार सुलझाएं आदि प्रश्नों के उत्तर भी प्रबंधक देता है। प्रबंधक नेता के रूप में अपने सहकर्मियों के समक्ष आदर्श प्रस्तुत करता है तथा कार्य संबंधी समस्याओं को हल करने में सहायता करता है। इतना ही नहीं वह अपने सहकर्मियों के कार्य की प्रशंसा करके उनको कार्य अधिक लगन उत्साह व कुशलता से करने के लिए प्रेरित करता है, निर्देशन एक प्रेरणात्मक शक्ति है जो संस्था के कार्यों को गति प्रदान करती है।

4. नियंत्रण

नियंत्रण का अर्थ है विद्यालय की सभी गतिविधियों पर ध्यान रखना जिससे संस्था में होने वाले समस्त कार्य निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति की दिशा में हों। प्रबंधक का कर्तव्य है कि वह सुनिश्चित करे की संस्था में सभी कार्य निर्धारित योजना के अनुरूप हो रहे हैं। यदि नहीं हो रहे हैं तो कहां और क्यों नहीं हो रहे हैं। (शैक्षिक प्रबन्धन कार्य)

इसका पता लगाना तथा सुधारात्मक कार्यवाही करना प्रभावी नियंत्रण के लिए आवश्यक है। नियंत्रण रखने के लिए विद्यालय में नियम, नीतियां तथा विधियां निर्धारित की जाती हैं। साथ ही पर्यवेक्षण तथा मूल्यांकन द्वारा नियंत्रण रखा जाता है। अतः नियंत्रण कार्य के प्रारंभ से लेकर पूरा होने तक रखा जाना चाहिए। नियंत्रण प्रक्रिया के तीन मुख्य तत्व है जिनके आधार पर नियंत्रण रखा जाना चाहिए-

  1. कार्य का मापदंड निर्धारित करना
  2. निर्धारित मापदंड के आधार पर वर्तमान कार्य की तुलना करना
  3. निर्धारित मापदंड ना पूर्ण करने वाले कार्य में सुधार लाना

5. समन्वय

समन्वय से तात्पर्य है संस्था के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु शिक्षकों व अन्य कर्मचारियों द्वारा किए गए प्रयत्नों में क्रमबद्धता। विद्यालय में छात्रों के विकास के लिए विभिन्न क्रियाएं की जाती है। इन क्रियाओं को किस समय किसके द्वारा तथा किस प्रकार करवाया जाएगा इसमें समन्वय होना आवश्यक है। विभिन्न कार्यक्रमों में समन्वय होगा तभी कार्यक्रम व्यवस्थित ढंग से पूर्ण किए जा सकेंगे। कार्यक्रमों के समन्वित संचालन के साथ साथ विद्यालय के उद्देश्यों, कार्यक्रमों संसाधनों के मध्य समन्वय होना आवश्यक है। (शैक्षिक प्रबन्धन कार्य)

6. मूल्यांकन

मूल्यांकन प्रबंधन प्रक्रिया का अति महत्वपूर्ण सोपान है। मूल्यांकन द्वारा ही संस्था की सफलता असफलता का अनुमान लगाया जा सकता है। मूल्यांकन से तात्पर्य है उद्देश्यों के संदर्भ में विद्यालय की उपलब्धियों का आकलन करना तथा कमियों का पता लगाना। मूल्यांकन विद्यालय के समस्त कार्यक्रमों का किया जाता है। संस्था द्वारा उद्देश्य प्राप्ति के लिए किए गए कुछ प्रयत्नों तथा प्रयुक्त संसाधनों के संदर्भ में उपलब्धियों का आकलन किया जाता है तथा कार्यक्रम की प्रभावशीलता प्राप्त की जाती है। विद्यालय का मूल्यांकन निम्न आधार पर किया जा सकता है-

  1. किन किन उद्देश्यों की प्राप्ति हो सके, पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से।
  2. किन उद्देश्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता।
  3. उद्देश्य प्राप्त ना होने के कारण ज्ञात करना

विद्यालय के संपूर्ण मूल्यांकन के साथ ही शिक्षकों तथा शिक्षणेत्तर कर्मचारियों के कार्यों का मूल्यांकन व्यक्तिगत आधार पर किया जाता है। यह मूल्यांकन शिक्षकों को दिए गए दायित्वों के संदर्भ में किया जाता है। व्यक्तिगत मूल्यांकन निम्न आधार पर किया जाता है –

  • कार्य पूरा करने की अवधि
  • कार्य की गुणवत्ता
  • कार्य की कमियां तथा कारण
  • प्रशिक्षण तथा निर्देशन की आवश्यकता का अनुमान लगाना
  • संस्था के अन्य शिक्षकों से संबंध
  • छात्रों के साथ शिक्षक के संबंध

मूल्यांकन ही यह प्रदर्शित करता है कि कार्य विधिवत किया गया है या नहीं। इसके आधार पर भावी शैक्षिक गतिविधियों में सुधार किया जा सकता है तथा वांछित परिवर्तन किए जा सकते हैं।

शैक्षिक प्रबन्धन आवश्यकता

आधुनिक युग में शिक्षा में प्रबंधन का महत्व बढ़ता जा रहा है। शैक्षिक प्रबन्धन कार्य की आवश्यकता और महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर जाना जा सकता है-

  1. कुशल मानव संस्थाओं की सम्पूर्ति- शिक्षा प्रबंधन के अंतर्गत प्रत्येक कर्मचारी पूर्ण कुशलता से अपने कार्यों को करता है क्योंकि उसे अपने कार्यों के प्रति जवाबदेही का सामना करना पड़ता है जिससे उसमें उत्तरदायित्व की भावना का विकास होता है।
  2. शिक्षा की गुणवत्ता उन्नति– शिक्षा प्रबंधन के अंतर्गत शिक्षा की गुणत्मक उन्नति होती है क्योंकि शिक्षक कक्षा, पाठ्यचर्या, अनुशासन व पाठ्य सहगामी क्रियाओं का प्रभावपूर्ण प्रबंधन करता है। जिससे छात्रों को ज्ञान ग्रहण करने में रुचि उत्पन्न होती है, वह समय-समय पर नवीन तकनीकियों का भी प्रयोग करता रहता है।
  3. शैक्षिक समस्याओं का समाधान– जैसे-जैसे वैज्ञानिक तकनीकी प्रगति होती जा रही है वैसे-वैसे शिक्षा के क्षेत्र में अनेक समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। इन समस्त समस्याओं का समाधान करने में शिक्षा प्रबंधन महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
  4. अल्प साधनों में उन्नत परिणाम की प्राप्ति– शैक्षिक प्रबंधन के द्वारा विद्यालय में उपलब्ध अल्प साधनों का उच्चतम व अनुकूलतम प्रयोग करके सर्वश्रेष्ठ परिणाम प्राप्त किए जाते हैं।
  5. आधुनिक तकनीकी का प्रयोग – नवीन युग में शिक्षा के क्षेत्र में नवीन तकनीकों का विकास हो गया है। अतः शिक्षा प्रबंधन के माध्यम से शैक्षिक संस्था में समय-समय पर आवश्यकतानुसार नवीन तकनीकों का प्रयोग किया जाता है जिससे कम समय में सुखद परिणाम प्राप्त किए जा सके।
  6. सामाजिक मांग की संपूर्ति – शिक्षा प्रबंधन में सामाजिक आवश्यकताओं का विशेष ख्याल रखा जाता है। सहयोग, प्रेम, सहानुभूति की भावना को विकसित करके शिक्षार्थियों का विकास किया जाता है।
  7. शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति – शैक्षिक प्रबंधन का प्रमुख कार्य संस्था के उद्देश्यों की प्राप्ति करना है। अतः उद्देश्यों को प्राप्त करने की दिशा में समस्याओं का पूर्वानुमान प्रबंधन के माध्यम से लगाए जाते हैं और इन पूर्वानुमान के आधार पर ही नीतियों का निर्धारण किया जाता है।
  8. निर्देशन एवं परामर्श की पूर्ति – आधुनिक समय में छात्रों को प्रत्येक क्षेत्र में निर्देशन व परामर्श की आवश्यकता पड़ती है अतः शिक्षा प्रबंधन निर्देशन व परामर्श की पूर्ण व्यवस्था करता है।
  9. व्यक्तिगत भिन्नता के अनुरूप शिक्षा की उपलब्धता – मनोवैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रत्येक छात्र की रुचियों, योग्यताओं व आवश्यकताओं में भिन्नता होती है अतः शिक्षा प्रबंधन छात्रों को उनकी व्यक्तिगत भिन्नता ओं के अनुरूप शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था करता है।
  10. लोकतंत्र की सुदृढ़ता– शिक्षा मूलतः लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित होती है अतः शिक्षा प्रबंधन में स्वतंत्रता, समानता, भ्रातत्व, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता को महत्व दिया जाता है इससे लोकतंत्र को मजबूती मिलती है।
संप्रेषण अर्थ आवश्यकता महत्वसंप्रेषण की समस्याएं
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