शैशवावस्था में मानसिक विकास

शैशवावस्था में मानसिक विकास का मुख्य साधन ज्ञानेंद्रियों की क्षमता एवं गुणवत्ता का विकास होता है। इस विकास के अंतर्गत भाषा स्मृति तर्क चिंतन कल्पना निर्णय जैसी योग्यताओं को शामिल किया जाता है।

नवजात शिशु का मस्तिष्क कोरे कागज के समान होता है। अनुभव के साथ साथ उसके ऊपर हर बात लिख दी जाती है।

जॉन लॉक के अनुसार

जन्म से 2 सप्ताह तक का मानसिक विकास

जन्म के समय शिशु मेरी अवस्था में होता है वह केवल अपनी शारीरिक दशाओं के अनुसार प्रतिवर्ती क्रियाए जैसे रोना, सांस लेना, अधिक सर्दी लगने पर कांपना आदि प्रदर्शित करता है। कभी-कभी तीव्र ध्वनियों को सुनकर चौक जाता है। जन्म के दूसरे सप्ताह में वह तीव्र रोशनी की ओर भी ध्यान देने लगता है।

बचपनावस्था में बौद्धिक विकास

इस अवधि में शिशु मां को पहचानने लगता है इसलिए रोता हुआ बालक मां की गोद में जाने पर चुप हो जाता है। भूख लगने और पीड़ा होने पर वह गर्दन इधर-उधर घुमा कर या देखने का प्रयास करता है कि मां उसके पास है या नहीं।

प्रथम माह

प्रथम माह में वह अपने दुख सुख का अनुभव करने लगता है। इसके अतिरिक्त वहां अपने आसपास व्यक्तियों की उपस्थिति और अनुपस्थिति को स्पष्ट रूप से महसूस करने लगता है।

द्वितीय माह

2 माह का बालक वस्तुओं की ओर अधिक ध्यान देने लगता है। इसलिए सिर को इधर-उधर घुमाने लगता है जैसे व्यक्ति और वस्तु है उसके सामने आती हैं। उन्हें ध्यान से देखने लगता है। मां को देखकर प्रसन्न होता है और स्पष्ट ध्वनि मुंह से निकालने लगता है।

तीसरा माह

तीन माह का शिशु वस्तुओ पर और अधिक ध्यान केंद्रित करने लगता है। वस्तुओं को हाथों से कसकर पकड़ लेता है।

3 माह की आयु में बालक उत्तेजना के प्रति प्रतिक्रियाएं प्रदर्शित करता है। विचित्र स्थितियों के प्रति सचेत होता है। उठाने पर सफलतापूर्वक समायोजन करता है।

इस प्रकार 3 माह के शिशु में ध्यान और विवेक की योग्यता का विकास होने लगता है।

चौथा माह

इस अवधि में सिर्फ क्रोध और इसने में अंतर समझने लगता है। इस समय उसमें जिज्ञासा का भाव भी देखा जाता है क्योंकि जब उसके पास से वस्तुओं को हटा लिया जाता है। तो वह उन्हें खींचने का प्रयास करता है। इस अवधि में भाषा विकास भी हो जाता है। यह विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का उच्चारण मुंह से करता है।

पांचवा माह

मां को अच्छी तरह पहचाने लगता है। इसलिए उसी के संपर्क में रहना चाहता है। मां के साथ प्रसन्नता का अनुभव करता है और मां से अलग होने पर कंपन करता है। अपने आसपास रहने वाले व्यक्तियों को पहचानता है। आवाजों की ओर ध्यान देता है, विभिन्न वस्तुओं को पकड़ने के लिए हाथों को आगे बढ़ाता है।

छठवां माह

इस अवस्था में बालक में अनुकरण की क्षमता का विकास होता है। वह बड़ों के हाव भाव का अनुकरण करने लगता है, दुख की अवस्था में क्रोध का प्रदर्शन करता है। सही समय पर दूध ना मिलने पर क्रोधित होता है और दूध मिलने पर मुस्कुराता है।

सातवां माह

7 माह का शिशु विभिन्न वस्तुओं को स्पष्ट रूप से पहचानने लगता है। जैसे यदि उसे दूध के समय पानी देने पर वह स्पष्ट रूप से नकारात्मक उत्तर देता है। इस अवस्था में उसी अभिरुचि का भी विकास हो जाता है। जो वस्तुएं व क्रियाएं उसे पसंद नहीं होती उनकी उपस्थिति में रोता है इस समय उसकी इंद्रियों का पर्याप्त विकास हो जाता है। अतः ठंडा गर्म खट्टा मीठा प्रकाश अंधकार आदि वस्तुओं का ज्ञान होने लगता है।

आठवां माह

अनुकरण शक्ति का विकास और अधिक हो जाता है। वह अपनी विभिन्न वस्तुओं को पहचानता है। इसलिए उसका खिलौना दूसरे बालक द्वारा ले लिए जाने पर क्रोधित हो जाता है। संकेतों को समझने लगता है और उसके अनुरूप प्रतिक्रिया प्रदर्शित करता है। अन्य सामान आयोग के बालकों के साथ खेलने का प्रयास भी करता है।

नवा माह

शिशु की आवर्धन शक्ति बढ़ जाती है। समान आयु के बच्चों को पहचान कर उनके साथ खेलता है। सामूहिक क्रियाओं में उसे आनंद आता है।

दसवां माह

इस अवस्था में व सहयोग और विरोध दोनों का प्रकाशन करता है। इस समय ऐसा प्रवृत्ति भी बालकों में देखी जाती है अनुकरण क्षमता और अधिक बढ़ जाती है। अपनी भाषा द्वारा दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करता है।

11वां व 12वा माह

भाषा विकास अधिक हो जाता है, इस समय वह स्पष्ट एक अक्षरी भाषा का प्रयोग करता है। भिन्नता की भावना का विकास होता है। जिससे अन्य लोगों के साथ रहना भी सीखता है। निरीक्षण क्षमता का विकास होता है। फल स्वरुप वह विभिन्न वस्तुओं को उठाकर और छूकर देखता है।

प्रथम व द्वितीय वर्ष

इस अवस्था में बालक के बोलने की शक्ति का विकास हो जाता है। वह अपनी भाषा द्वारा दूसरे तक अपने विचारों को पहुंचाने का प्रयास करता है। एक शब्द वाक्य को बोलता है समूह में रहना पसंद करता है। समूह के विचारों को ग्रहण करता है और सामाजिक क्रियाओं का अनुकरण करने लगता है। 2 वर्ष का बालक छोटे-छोटे वाक्यों को बोलने लगता है। भाषा के माध्यम से उनका सामाजिक संपर्क बढ़ता है। शब्द भंडार में वृद्धि होती है। कल्पना, चिंतन और स्मरण शक्ति का भी विकास होता है। बालक छोटे छोटे शब्दों अंको आदि को सीख जाता है।

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