संक्रमित रोग

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रोग मानव शरीर के किसी अंग द्वारा असामान्य कार्य है। संक्रमित रोग के बहुत से विभिन्न कारण होते हैं। कुपोषण के कारण अल्पहीनता रोग उत्पन्न होता है शरीर द्वारा किसी एंजाइम या हार्मोन उत्पादन के असफलता के कारण भी दो पैदा होता है। सूक्ष्म जीवों द्वारा रोग उत्पन्न होता है। हमारे आस पास बहुत से विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म जीव पाए जाते हैं। इनमें कुछ सूचना जो हमारे लिए बहुत लाभदायक होते हैं वे हमारे लिए इतने आवश्यक हैं, जितना वायु जल तथा वृक्ष बहुत से सूक्ष्म जीव हमारे लिए हानिकारक होते हैं। जो वनस्पति जंतुओं तथा मनुष्यों में रोग उत्पन्न करते हैं। यह सूक्ष्मजीव उत्पन्न करने वाले या रोग पैदा करने वाले सूक्ष्म जीव कहलाते हैं। रोग उत्पन्न करने वाले सूक्ष्मजीवों के लिए रोगाणु शब्द का प्रयोग किया जाता है। विषाणु, जीवाणु, कवक तथा प्रोटोजोआ सभी रोगाणु हैं। इनमें से कुछ विश पैदा करते हैं, जो सामान्य शरीर कार्य को व्यवधान पहुंचाते हैं। दूसरे शरीर उतको को नष्ट कर देते हैं वह उत्तक का भक्षण करते हैं, तथा वहां पर विकास और जनन करते हैं, यह परजीवी कहलाते हैं।

विषाणु एक जटिल पदार्थ है जो कोशिका के अंदर विकसित तथा दलित होते हैं बहुत से विषाणु मानव कोशिका में रहते हैं यह विषाणु परजीवी होते हैं जब लोग सर्दी, जुकाम से पीड़ित होते हैं। वे वायु में सर्दी के हजारों विषाणु की छोटी बूंदों के रूप में छोड़ते हैं। यह विषाणु धूल के कणों में मिल जाते हैं तथा इधर-उधर चित्ररा जाते हैं। वे दूसरे वस्तुओं से भी चिपक जाते हैं। यह विषाणु के द्वारा दूसरे लोगों के शरीर में प्रवेश करते हैं, तथा सर्दी पैदा करते हैं।

  • जीवाणु अकोशिकीय जीव है जिसमें केंद्र नहीं होता है। बे भी रोग उत्पन्न करते हैं। जीवाणुओं द्वारा उत्पन्न कुछ रोग प्लेग, टिटनेस, टी०वी० है।
  • प्रोटोजोआ भी मलेरिया, अमीबा पेचिस, निद्रा रोग उत्पन्न करते हैं। अमीबा पेचिस दूषित भोजन या जल के पाचन से एंटअमीबा द्वारा होता है।
  • मलेरिया तथा निद्रा रोग क्रमशः मादा एनाप्लीज मच्छर तथा सी-सी मच्छर के काटने से उत्पन्न होता है।
संक्रमित रोग

संक्रमित रोग

विभिन्न सूक्ष्मजीवो द्वारा होने वाले संक्रमित रोग निम्न हैं-

  1. जीवाणु- टी०वी०, कालरा, डिप्थीरिया, टिटनेस, टाइफाइड, एंथ्रेक्स।
  2. विषाणु- पोलियो, रेबीज, चिकन पॉक्स, सर्दी, खसरा, एड्स आदि।
  3. प्रोटोजोआ- मलेरिया
  4. हेलमिथस- फाइलेरिया, एस्केरिस।

संचरण का तरीका

संक्रमित रोग संक्रमण के स्त्रोत से दूसरे व्यक्ति में विभिन्न तरीकों द्वारा संचालित होता है।

1. प्रत्यक्ष संचरण

  • सीधे संपर्क द्वारा, त्वचा द्वारा, त्वचा के संपर्क से, म्यूकोसा का त्वचा से, म्यूकोसा का म्यूकोसा से; जैसे रोसी आच का संक्रमण, एड्स आदि।
  • बूंदों का संक्रमण: उदाहरण के लिए- कुकर खांसी, टी०बी०, डिप्थीरिया, सर्दी आदि।
  • त्वचा में संचालन: उदाहरण के लिए कुत्ते के काटने के द्वारा रेबीज विषाणु, दूषित सुई और सिरिंज द्वारा हेपेटाइटिस बी विषाणु।
  • दूषित भोजन तथा जल: उदाहरण के लिए कालरा तथा टाइफाइड।

2. अप्रत्यक्ष संचरण

  • जल एवं भोजन द्वारा: उदाहरण के लिए डायरिया, टाइफाइड, कालरा, पोलियो, हेपिटाइटिस ए, भोजन विश तथा परजीवी आदि।
  • रक्त द्वारा संचरण: उदाहरण हेपेटाइटिस बी, मलेरिया।
  • किसी जीवित वाहक द्वारा सूक्ष्मजीवों का संचरण: जैसे मच्छर द्वारा मलेरिया, डेंगू, फाइलेरिया।
  • गंदे कपड़े तौलिए तथा रुमाल द्वारा: जैसे डिप्थीरिया, आंख तथा त्वचा संक्रमण।
  • गंदा हाथ जैसे: टाइफाइड, आत, परजीवी।

सावधानी तथा नियंत्रण

  • उचित स्वास्थ्य विद्या
  • उचित मात्रा में सुरक्षित तथा स्वच्छ जल की आपूर्ति
  • मच्छरों के जन्म को रोकने के लिए कीटाणु मार्ग दवा का छिड़काव
  • व्यक्तिगत आरोग्य शास्त्र
  • टीकाकरण
  • स्वास्थ्य शिक्षा

टीकाकरण

मानव शरीर में बहुत से प्राकृतिक हथियार या रक्षा उपकरण है, जो संक्रमण के प्रभाव को रोकते हैं। शरीर में उपस्थित कुछ प्राकृतिक रक्षा कवच निम्नलिखित हैं-

अखंडित त्वचा जो सूक्ष्मजीवों के प्रवेश को रोकती है। छोटे बाल तथा नाक के बाल फेफड़ों में धूल के कण तथा दूसरे सूक्ष्मजीवों के प्रवेश को रोकती है। अमाशय पाचक रस पैदा करता है जो सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर देता है।

इन तमाम शक्तिशाली रक्षा कवच के पश्चात भी सूक्ष्म जीवों द्वारा रोग उत्पन्न होता है। आत: तब श्वेत रक्त कणिका जो कि रक्त में उपस्थित होता है कुछ रासायनिक पदार्थ छोड़ता है। जो रक्त या शरीर में प्रवेश करने वाले सूक्ष्म जीव को नष्ट कर देता है। शरीर के रक्षा की दूसरी विधी प्रतिरक्षण कहलाती है जो उत्पाद रक्षा तंत्र द्वारा कार्य करती हैं। प्रतिरक्षा का अर्थ है किसी रोग से लड़ने के लिए मानव शरीर में प्रतिरोधक क्षमता विकसित करना। लोग किसी विशेष रोग से प्रती रक्षित हो सकते हैं या वे प्रतिरक्षा बना सकते हैं। यह प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया कृतिम हो सकती है।

प्राकृतिक रूप से प्राप्त प्रतिरक्षा का अर्थ माता-पिता द्वारा प्राप्त प्रतिरक्षा।कृत्रिम रूप से प्राप्त प्रतिरक्षा 2 विधि से विकसित होती है। कृतिम प्रतिरक्षा की एक विधि रक्षक की सुई द्वारा है।जहां प्रतिरक्षा दूसरे लोगों याद जंतुओं से प्राप्त किया जाता है जो पहले इस रोग से गुजर चुके हैं। इस प्रकार का प्रतिरक्षा कुछ महीनों तक होता है। दूसरे प्रकार का कृतिम प्रतिरक्षा टीकाकरण है। टीका सूक्ष्मजीवों को कमजोर कर देता है या नष्ट कर देता है। यह शरीर में सुई के संरोपण द्वारा या बूंद के रूप में दिया जाता है। इसके पश्चात शरीर में प्रतिरक्षा उत्पन्न हो जाता है।

बहुत से रोग, जैसे-चेचक, छोटी माता तथा खसरा द्वारा मुक्ति दिर्घाविधि मुक्ति करण है जिसका अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति जो एक बार इन रोगों से ग्रसित हो चुका है दोबारा ग्रसित नहीं होता है।

टीका

किसी रोग से शरीर को मुक्ति के लिए टीकाकरण एक दूसरी विधि है।टीकाकरण वह प्रक्रिया है जिसमें सूक्ष्मजीवों के प्रति मुक्ति या प्रतिरोध का विकास स्वस्थ सूक्ष्म जीव या लोगों से सूक्ष्म जीवो की या उसके कुछ अंशों की मात्रा को सुई द्वारा सरोपित होता है। यह मुक्तिकरण कहलाता है। टीकाकरण की विधि की खोज सर्वप्रथम ब्रिटिश एडवर्ड जेनर द्वारा 1798 में किया गया था। एडवर्ड जेनर ने अवलोकन किया कि ग्वाले तथा ग्वालिन जो गायों के पास रहते थे। वह छोटी माता से पीड़ित थे उन्होंने यह भी देखा कि ग्वाले गौ चेचक नामक रोग से पीड़ित थे। यह रोग चेचक के समान होता है लेकिन यह चेचक की बात जानलेवा नहीं होता है। जेनर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जो गवाले गौ चेचक से पीड़ित थे वह चेचक के प्रति प्रतिरक्षित थे।

लगभग 50 वर्षों पश्चात लुइ पाश्चर ने पाया कि बहुत से रोग, जैसे- चेचक तथा रेबीज का कारण विषाणु है। टीकाकरण की प्रक्रिया की अवधि में शरीर में टी०वी०, कालरा तथा रेबीज आदि रोगों के प्रति प्रतिरक्षा विकसित करने के लिए रोगाणुओं की छोटी सी मात्रा को शरीर में संरोपित करते हैं।

विषाणु एवं जीवाणु

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