संविधान

किसी भी सभ्य समाज वाले राज्य में संविधान का विशेष महत्व होता है। प्रत्येक प्रकार के राज्य अपनी अपनी परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुसार संविधान का निर्माण करते हैं। यही कारण है कि प्रत्येक राज्य का संविधान उस राज्य की जीवन पद्धति का लिखित प्रारूप होता है। चाहे वह राज्य लोकतंत्रात्मक हो या फिर राजतंत्रात्मक।

संविधान उस जीवन पद्धति का प्रतीक है जो किसी राज्य द्वारा अपने लिए अपनाई जाती है

अरस्तु के अनुसार

संविधानहीन राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती संविधान के अभाव में राज्य, राज्य ना होकर एक प्रकार की अराजकता होगी।

जैलीनेक के अनुसार

संविधान ऐसे निश्चित नियमों का एक संग्रह होता है जिसमें सरकार की कार्यविधि प्रतिपादित होती है और जिसके द्वारा संचालन होता है।

ब्राइस के शब्दो में

वह सब कानून संविधान में सम्मिलित होते हैं जिनका राज्य से प्रभुत्व सत्य के प्रयोग अथवा वितरण पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ता है।

प्रो. डायसी के अनुसार

संविधान लिखित या अलिखित नियमों अथवा कानूनों का समूह होता है जिनके द्वारा सरकार का संगठन सरकार की शक्तियों विभिन्न अंगों में वितरण और इन शक्तियों के प्रयोग के सामान्य सिद्धांत विकसित किए जाते हैं।

गिलक्रिस्ट के अनुसार

संविधान आधारभूत राजनीतिक संस्थाओं की व्यवस्था होती है।

डा काइनर के अनुसार

संविधान के संबंध में बूल्जे का कथन इस प्रकार है- उन नियमों का समूह संविधान कहलाता है जिसके अनुसार सरकार की शक्ति शासित के अधिकार और दोनों के संबंधों का समायोजन होता है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.