संस्कृति अर्थ महत्व

संस्कृत शब्द का जन्म संस्कार शब्द से हुआ है जो संस्कार व्यक्ति को संस्कृत बनाते हैं उसे संस्कृति नाम से संबोधित किया जाता है। भारतीय संविधान के अंतर्गत संस्कारों का बहुत महत्व है। गर्भाधान से लेकर मानव के पुनर्जन्म तक विवेक संस्कार किए जाते हैं, जिससे मानव सुसंस्कृत बनता है।

जन्म होने पर नामकरण संस्कार, वेदारंभ संस्कार, उपनयन संस्कार, विवाह संस्कार तथा मृत्यु संस्कार इत्यादि विविध संस्कार होते हैं। जो विकासशील बालक को उसके सदाचार पूर्ण कर्तव्यों का स्मरण दिलाते रहते हैं और एक आदर्श मानव बनने के लिए प्रेरित करते हैं।

सही अर्थ में संस्कारों द्वारा सुसंस्कृत होकर जीवन के सभी दृश्य कोणों का व्यवहारिक प्रदर्शन ही संस्कृत में इसके आधार व्यवहार की भाषा का उल्लेख जीवन सर्वशक्तिमान सत्ता में विश्वास, आर्थिक व्यवस्था, नियंत्रण साधन, ऐश्वर्य, मान्यताएं, परंपराएं, प्रथाएं और मनोवृतिया होती है। जीवन के आदर्श और लक्ष्य की सांस्कृतिक प्रक्रियाओं की दिशा निर्धारित किया करते हैं।

संस्कृति की आवश्यकता एवं महत्व

संस्कृति की आवश्यकता निम्न कारणों से होती है-

  1. संस्कृत सामाजीकरण में सहायक होती है- शिक्षा का एक प्रमुख कार्य बालक का सामाजिक करण करना भी है। एक समाज की संस्कृति उसकी मान्यताओं परंपराओं तथा विश्वासों में होती है, यही सामाजीकरण के आधार भी होते हैं। जब बालक संस्कृत का अध्ययन करता है तो उसे सामाजीकरण के आधार प्राप्त हो जाते हैं। उन सामाजिक आधारों को ग्रहण करके वह सामाजिक व्यवहार करना सीख जाता है।
  2. संस्कृति व्यक्तित्व निर्माण में सहायक है- जैसे-जैसे बालक की आयु बढ़ती है वैसे ही उसके अनुभव में भी वृद्धि होती है। पहले व कुटुंब से संपर्क में आता है फिर कई कुटुंब ओके संपर्क में आता है और इस प्रकार वह अपने नगर जिले प्रदेश देश और विश्व के संपर्क में आता है। उसे संपर्क पड़ने के साथ ही विशिष्ट स्वभाव प्राप्त होते हैं जिसमें वह अपने जीवन का अंग बना लेता है। उसके जीवन में आए अनुभव का उसे व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ता है इस प्रकार उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
  3. संस्कृति के माध्यम से बालक जीवन यापन करना सीखता है- शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को इस योग्य बनाना है कि वह सुख पूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सके व्यक्ति ऐसा जीवन तभी व्यतीत करता है जब उसके जीवन में संघर्ष कमाए और उसमें अनुकूल शक्ति विद्यमान हो संस्कृति व्यक्ति के जीवन में संघर्षों को कम करती है और उसे वातावरण के प्रति अनुकूलित होने की क्षमता प्रदान करती हैं।
  4. संस्कृति सामाजिक व्यवहार की दिशा निर्धारित करती है- जब बालक अपनी संस्कृति से परिचित होता है तो वह उसके अनुकूल सामाजिक आदर्शों मान्यताओं विश्वासों तथा परंपराओं के अनुकूल कार्य करना प्रारंभ कर देता है। इस प्रकार बालक संस्कृत के माध्यम से सामाजिक व्यवहार की दिशा प्राप्त करता है।
  5. संस्कृत पारस्परिक प्रेम और एकता में बांधती है- सभी देशों की अपनी संस्कृति होती है जो व्यक्ति अपने देश और समाज की संस्कृत से प्रेम करता है वह सभी संबंधित संस्कृतियों में विश्वास रखने वाले व्यक्तियों के प्रति प्रेम का भाव रखने लगता है। इससे एकता की भावना का विकास होता है।
  6. संस्कृति राष्ट्रीय भाषा का स्वरूप निर्धारित करती है- संस्कृत का आधार प्रचलित भाषा होती है आज भारत में हिंदी भाषा को पराया सभी क्षेत्रों के लोग समझते हैं। इसलिए हिंदी भाषा को भारतीय संस्कृत का वाहक मानकर राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया गया है।
  7. संस्कृत के द्वारा व्यक्ति प्रकृतिक से अनुकूलन करना सीखता है- एक विकसित संस्कृत का पोषक व्यक्ति प्रकृति को अपने अनुकूल ढालने का प्रयास करता है। वह दुर्गम स्थानों पर अपने आवागमन के मार्ग प्रशस्त करता है, रहने के समुचित आवास बनाता है। सिंचाई के साधन ना होने पर उसकी व्यवस्था करता है और समुद्र पर विजय पाने के लिए जलयान बनाता है। इस प्रकार व्यक्ति प्राकृतिक वातावरण से संघर्ष करके उसे अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करता है।
आधुनिक भारतीय समाजभारतीय समाज का बालक पर प्रभाव
आदर्श शैक्षिक पाठ्यक्रमव्यक्ति और समाज में संबंध
अनेकता में एकता के उपायधर्मनिरपेक्षता अर्थ विशेषताएं
धर्मनिरपेक्षता को प्रभावित करने वाले कारकसामाजिक परिवर्तन परिभाषा प्रक्रिया कारक
धर्मनिरपेक्ष शिक्षा की विशेषताएंआर्थिक विकास
संस्कृति अर्थ महत्वसांस्कृतिक विरासत
संविधानभारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएं
विधि निर्माण शासनभारतीय संविधान के मौलिक अधिकार
भारतीय संविधान के मौलिक कर्तव्यप्रजातंत्र परिभाषा व रूप
प्रजातंत्र के गुण व दोषलोकतंत्र और शिक्षा के उद्देश्य
सतत शिक्षा

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.