संस्कृत गद्य साहित्य का विकास

संस्कृत वाडमय में गद्य का अतिशय महत्वपूर्ण स्थान है। जब हम गद्य के उद्भव के विषय में विचार करते हैं तो इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि मानव ने प्रारंभ में गद्य में ही परस्पर वार्तालाप प्रारंभ किया होगा। जब उसने अपने मनोभावों को साहित्यिक रूप में प्रस्तुत करना चाहा होगा तो उसकी प्रारंभिक अभिव्यक्त गद्य में हुई होगी, क्योंकि प्राथमिक अभिव्यक्ति छंद बद्ध या पद्य में होना संभव नहीं।

अतः इस दृष्टि से विचार करने पर यह सिद्ध होता है कि पद की अपने गद्य प्राचीनतर है। परंतु छंदों बद्ध रचना सहज में कंठाग्र की जा सकती है, इस प्रकार उसे उसी रूप में बहुत समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है, परंतु गद्य के साथ ऐसा नहीं है गद्य की रचना तो सहज में की जा सकती है परंतु संपूर्ण गद्य को यथावत कंठाग्र करके सुरक्षित रखना अपेक्षाकृत कठिन है।

यद्यपि ऋग्वेद में गद्य प्राप्त नहीं होता तथापि विद्वानों का विशेष रूप से जर्मन के विद्वान ओल्डेन वर्ग का यह मानना है कि ऋग्वेद में गद्य की स्थिति रही होगी। क्योंकि संवाद सूक्तो में गद्य की अपेक्षा गद्य की स्मृति कठिन है। अत एव संवाद सूक्तो का गद्द लुप्त हो गया होगा। वैदिक गद्य का प्राचीनतम रूप कृष्ण यजुर्वेद में प्राप्त होता है। यह भी मान्यता है कि कृष्ण यजुर्वेद को कृष्ण कहने का हेतु गद्य का मिश्रण ही रहा है। कृष्ण यजुर्वेद के अतिरिक्त ब्राह्मण ग्रंथों, अरण्यको और उपनिषद ग्रंथों में भी गद्य प्रचुर रूप में प्राप्त होता है। संस्कृत गद्य साहित्य को स्थूल रूप में हम दो भागों में विभक्त कर सकते हैं।

  1. वैदिक साहित्य का गद्य
  2. शास्त्रीय गद्य
  3. शिलालेखीय गद्य

वैदिक साहित्य का गद्य

वैदिक साहित्य के गद्य को हम चार भागों में विभक्त कर सकते हैं-

  1. संहिता कालीन गद्य
  2. ब्राह्मण कालीन गद्य
  3. उपनिषद कालीन गद्य
  4. उपनिषदुत्तर कालीन गद्य

शास्त्रीय गद्य

व्याकरण, दर्शन आदि से संबंधित बात से आत्मक एवं व्याख्यात्मक ग्रंथों में हमें शास्त्रीय गद्य के दर्शन होते हैं। इस गद्य का उद्देश्य सहज रूप से अर्थाभिव्यक्ति है। इस प्रकार के गद्य को हम पतंजलि, सबर स्वामी, शंकराचार्य और जयंत भट्ट की कृतियों में प्राप्त कर सकते हैं। भावाभिव्यक्ति इस गद्य की मुख्य विशेषता है।

शिलालेखीय गद्य

अनेक शिलालेखों में उत्कृष्ट कोटि के गद्यों के दर्शन होते हैं। शिलालेखों में प्रयुक्त गद्य तत्कालीन गध के वशिष्ठ को प्रकाशित करता है।

इस प्रकार के गद्य के अवलोकन से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि इस समय तक प्रौढ़ गद्य लेखन की कला विकसित हो चुकी थी कुछ इस प्रकार के संकेत मिलते हैं जिसमें अलंकृत गद्य ग्रंथों का अनुमान किया जा सकता है।

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