सामाजिक परिवर्तन परिभाषा प्रक्रिया कारक

सामाजिक परिवर्तन- परिवर्तन प्रकृति का नियम है। परिवर्तन का आशय पूर्व की स्थिति या रहन सहन के ढंग में भिन्नता से है। प्रकृति के समान ही प्रत्येक समाज और सामाजिक व्यवस्था में भी परिवर्तन होता रहता है, सामाजिक व्यवस्था के निर्णायक तत्व मनुष्य है, फोन में आए दिन परिवर्तन होता है समाज एक अच्छी संस्था है।

समाज में परिवर्तन होना स्वाभाविक ही है संस्थाओं सामाजिक राजनीतिक एवं आर्थिक व्यवस्था शिक्षा आदर्शों तथा विचारधाराओं गीत रिवाजों तौर-तरीकों व्यक्तियों के पारस्परिक संबंधों में परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। भारत के प्राचीन एवं अर्वाचीन समाज से आधुनिक औद्योगिक क्रांति नगरीकरण नवीन मशीनों का आविष्कार तथा संदेश वाहन की सुविधाओं के कारण जीवन के प्रत्येक पहलू में परिवर्तन दिखाई पड़ता है।

सार रूप समाज में परिवर्तन होना एक वास्तविक आवश्यक एवं सरल क्रिया है। जिस किसी भी समाज के जीवित होने का प्रमाण ही परिवर्तन है। अपरिवर्तित अथवा बगैर परिवर्तन के समाज का विकास होना अत्यंत कठिन है। निरंतर होने वाले सामाजिक परिवर्तन का परिणाम ही हमारी अर्वाचीन सभ्यता एवं संस्कृति है तथा समाज में शिक्षण व्यवस्था का जन्म ही सामाजिक परिवर्तनों का फल है। समझ परिजनों के फल स्वरुप एवं अर्थ को स्पष्ट करने हेतु कतिपय विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाएं निम्न है।

सामाजिक परिवर्तन परिभाषा

सामाजिक संरचना तथा उसके कार्यों में होने वाले परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।

किंग्सले डेविस

सामाजिक संरचना या संबंधों में होने वाले परिवर्तन को ही सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।

मैकाइवर एंड पेज

सांस्कृतिक परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन है क्योंकि संपूर्ण संस्कृति अपनी उत्पत्ति अर्थ तथा प्रयोग में सामाजिक हैं।

डॉसन तथा गेटिस

सामाजिक परिवर्तन को व्यक्ति के कार्य एवं विचार करने के तरीकों में उत्पन्न होने वाला परिवर्तन कह कर परिभाषित किया जा सकता है।

जेन्सन

सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया

समाज तथा समाज की विभिन्न इकाइयों जैसे परिवार विद्यालय एवं धार्मिक संस्थानों आज से मिलकर बना है। समाज की इन विभिन्न इकाइयों एवं साधनों के संगठन व संरचना में जीवन की विभिन्न विचारधाराओं मूल्यों आदर्शों तथा समस्याओं के कारण परिवर्तन होते रहते हैं। या परिवर्तन ही समाज में परिवर्तन लाते हैं इस प्रकार समाज निरंतर परिवर्तनशील ता अवस्था में रहता है।

इन्हीं परिवर्तन के कारण आधुनिक विश्व प्राचीन विश्व के पूर्ण रूप से भिन्न है। आज विश्व में जटिलताएं बढ़ती जा रही है तथा नई नई समस्याएं एवं आवश्यकता है पैदा हो रही है जिन की पूर्ति तथा संतुष्टि के लिए नवीन साधन जुटाने पड़ रहे हैं। इन तथ्यों ने हमारी प्राचीन संस्कृति की संरचना को परिवर्तित कर दिया है।

सामाजिक परिवर्तन को एक विकासशील प्रक्रिया नहीं कहा जा सकता क्योंकि परिवर्तन कभी उन्नत की ओर हो सकता है तो कभी अवनत की ओर तथा यह अनुकूल एवं प्रतिकूल स्थाई एवं अस्थाई भी हो सकता है इस प्रकार अनेक प्रकार के सामाजिक परिवर्तनों में विभिन्नता दृष्टिगोचर होती है।

सामाजिक परिवर्तन के रूप

परिवर्तन की प्रक्रिया निम्नलिखित रूपों में दिखाई देती है-

  1. विकासात्मक रूप
  2. लहरदार रूप
  3. चक्रीय क्रम रूप

1. विकासात्मक रूप

कहां है जिसमें परिवर्तन अचानक होता है परंतु वास्तव में परिवर्तन एकदम अचानक नहीं होता। परिवर्तन किसी साधन या अनुसंधान के कारण होता है तथा यह न्यूनतम अनुसंधान पुरातन ज्ञान के कारण ही संभव होता है।

पुरातन ज्ञान के क्षेत्र धीरे-धीरे विस्तृत होकर नवीन ज्ञान या उपकरण को जन्म देता है। सामाजिक परिवर्तनों का यही विकास है दूसरे शब्दों में समाज प्रगति की ओर अग्रसर होता है। ऐसे परिवर्तन का कारण तो होता है लेकिन वहां अनंत होता है इस प्रकार के परिवर्तन को एक ऊपर चढ़ती हुई रेखा के द्वारा प्रदर्शित कर सकते हैं।

2. लहरदार रूप

ऐसे परिवर्तन जिनमें लहर के समान उतार-चढ़ाव होता है जो कभी अज्ञानता की ओर अग्रसर इत होते हैं तथा कभी अवनति और चलते हैं उन्हें लहरदार परिवर्तन कहते हैं।

3. चक्रीय क्रम रूप

सामाजिक परिवर्तन का तृतीय रूप है चक्रीय। इस रूप को परिवर्तित शत्रु के समान होते हैं अर्थात वही घटित घटनाएं समाज में कुछ समय उपरांत पूरा घटित होती हैं चकरी रूप से होने वाले परिवर्तनों में किसी वस्तु का प्रारंभ उदय विकास तथा अंतर्निहित होते हैं यथा रात दिन होने का क्रम जीवन मृत्यु का क्रम आदि।

यह तीनों रूप परस्पर संबंध है तथा इन्हें वस्तुनिष्ठ रूप से अलग करना अत्यंत जटिल है।

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