सुमित्रानंदन पंत कविताए और व्याख्या

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शिक्षा - दीक्षा
पद्य साहित्य में योगदान
गद्य साहित्य में योगदान

हिंदी साहित्य के अमर स्तंभ कविवर सुमित्रानंदन पंत जी का जन्म अल्मोड़ा जनपद के कौसानी नामक ग्राम में सन 1900 में हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित गंगोदत्त पंत था तथा माता का नाम श्रीमती सरस्वती देवी था। हाई स्कूल की परीक्षा पंत जी ने वाराणसी से उत्तीर्ण की तथा आगे की पढ़ाई के लिए वे प्रयाग के म्योर सेंट्रल कॉलेज में प्रविष्ट हुए। सन 1921 ईस्वी में असहयोग आंदोलन प्रारंभ होने पर कॉलेज छोड़कर के साहित्य साधना में संलग्न हुए।

इनके बचपन का नाम गोसाई दत्त था। बाद में इन्होंने बदलकर सुमित्रानंदन पंत रखा। उन्होंने उपनिषद दर्शन आध्यात्मिक साहित्य और रविंद्र नाथ टैगोर के साहित्य का गंभीर अध्ययन किया। सन 1931 ईस्वी में कालाकाकर जाकर मार्क्सवाद का भी अध्ययन किया। सन 1950 में पंत जी ‘ऑल इंडिया रेडियो’ में परामर्शदाता पद पर नियुक्त हुए। पंत जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे। उन्होंने मात्र 7 वर्ष की अवस्था में ही कविताएं लिखनी प्रारंभ कर दी थी। उनकी पहली रचना ‘गिरिजे का घंटा’ सन 1916 ईस्वी में प्रकाशित हुई।

सन 1920 ईस्वी में उनकी अमर कृति उच्छ्वास और ग्रंथि प्रकाशित हुई। विमला और पल्लव जैसे दो प्रसिद्ध काव्यसंग्रह सन 1927 ईसवी में प्रकाशित हुई। वीणा, पल्लव, गुंजन, ग्रंथि, ग्राम्या, युगांत, युगवाणी आदि इनकी की प्रसिद्ध रचनाएं हैं। पंत प्रकृति के सुकुमार कवि कहे जाते हैं। पल्लव में लगभग 40 प्रश्नों की एक भूमिका दी गई है। जिसमें भाषा, अलंकार, छंद, शब्द चयन पर विचार व्यक्त किए गए हैं। पंत की काव्य कृति चिदंबरा पर इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ है। पंत ने अपनी कविता नौका विहार में जिस चांदनी रात का वर्णन किया है।

वह शुक्ल पक्ष की दशमी की तिथि की उदित चांदनी का वर्णन है। कभी चांदनी रात के प्रथम प्रहर में कालाकांकर के राजभवन से लगी हुई नदी में अपने मित्रों के साथ नौका विहार कर रहा है। चंद्रमा की ज्योत्सना के प्रभाव से नदी के धवलता मैं रजत के कांति का आभास सर्वत्र होता है। उसी का अलंकारता भाषा में प्रस्तुत कविता में वर्णन किया गया है। जगत के जीवन पत्र कविता में कवि ने पतझड़ में डाल से टूटकर झड़ते हुए पत्तों के बहाने समाज में परिवर्तन के आकांक्षा व्यक्त की है।

इस कविता में कवि ने जीवन जगत में नई चेतना एवं नवोद साह के संचार की कामना को बादल के माध्यम से व्यक्त किया है। दर्शन अनुभूति के बाद की उस गंभीर ज्ञानात्मक अवस्था को कहा जाता है। जिसमें व्यक्ति भावना के क्षेत्र में उधर्वोमुख होकर जीवन और जगत के प्रति विश्लेषण की प्रवृत्ति अपनाता है।दर्शन के रूप में सामाजिक तथा आध्यात्मिक दर्शन में संकरी होने के कारण अंत में दार्शनिक बाद विवादों से मुक्त खंडन मंडात्मक प्रवत्ति नहीं पाई जाती।

अपितु उन्होंने अपने प्रत्येक सिद्धांत को जीवन की उपयोगिता की कसौटी पर परख कर स्वीकार है। पंत के काव्य पर उपनिषदों की विचारधारा के साथ ही अद्वैतवाद, मार्क्सवाद तथा गांधीवाद का प्रभाव भी देखा जा सकता है। उपनिषदों का मूल तत्व है। जिज्ञासा भाव पंत के इस भाव के मौन नियंत्रण कविता में देखा जा सकता है। वह प्रारंभ से ही प्रकृति और उसके पीछे अव्यक्त सत्ता के प्रति जिज्ञासु है। ‘ना जाने तपक तड़ित में मौन निमंत्रण देता मुझको मौन’ सोनजुही कविता के रचयिता पंत ने सोनजुही लता के सौंदर्य का वर्णन प्रस्तुत कविता में किया है।

  • सुमित्रानंदन पंत जी का जन्म अल्मोड़ा जनपद के कौसानी नामक ग्राम में सन 1900 में हुआ था।
  • पंत जी के पिता का नाम पंडित गंगोदत्त पंत तथा माता का नाम श्रीमती सरस्वती देवी था।
  • हाई स्कूल की परीक्षा पंत जी ने वाराणसी से उत्तरण की तथा आगे की पढ़ाई के लिए प्रयाग आए।
  • पंत जी की कविताएं जब सरस्वती में प्रकाशित होकर आई तो काव्य मर्मज्ञ का अध्ययन की ओर आकृष्ट हुआ।
  • पंत जी की पहली रचना गिरजे का घंटा सन 1916 में प्रकाशित हुई।
  • गुंजन में गंभीर चिंतन से युक्त कविताएं हैं।
  • वियोग श्रृंगार की कविताएं ग्रंथि में संकलित है।
  • सन 1938 में कालाकाकर से उन्होंने रुपाभ नामक पत्र का संपादन किया।
  • पंत की कविता तंबाकू का धुआं अल्मोड़ा अखबार में प्रकाशित हुआ।
  • ग्रंथि पंत जी का विरह काव्य है।
  • युगवाणी में मार्क्सवाद का प्रभाव ब्रह्म जीवन के आमूल परिवर्तन एवं क्रांतिकारी भावना का समावेश किया गया है।
  • ग्राम्या नामक रचना में पंत जी ने ग्राम जीवन से संबंधित चुनाव को स्थान दिया है।
  • पंत जी ने अपनी कविता नौका विहार में प्रतापगढ़ जनपद में स्थित कालाकाकर नामक स्थान पर नौका विहार करते हुए चांदनी रात में गंगा की अपूर्व शोभा का वर्णन किया है।
  • पंत जी को प्रकृति का सुकोमल कवि कहा जाता है।
  • पंत जी के पिता जमींदार थे।
  • छायावादी युग को पंत जी ने सृजन का सुंदर युग कहा है।
  • पंत जी का बचपन का नाम गोसाई दत्त था।
  • पंत जी प्रगतिवादी विचारधारा से भी प्रभावित थे।
  • चींटी कविता के रचयिता पंत जी हैं।
  • पंत जी को अंग्रेजी कविता की रचनाओं को पढ़ने के लिए पंडित शिवधर पांडे ने प्रोत्साहित किया था।
  • ‘खादी के फूल’ नामक कविता संग्रह में पंत जी एवं बच्चन जी की महात्मा गांधी के निधन पर कविताएं सम्मिलित रूप से प्रकाशित की गई हैं।

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