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दीपोत्सव संस्कृत निबन्ध

दीपोत्सव संस्कृत निबन्ध हिंदी में दीपों का उत्सव नामक संस्कृत निबन्ध कभी कभी संस्कृत निबंधों में पूछ लिया जाता है। यह निबन्ध परीक्षा की दृष्टि से काफी अधिक महत्वपूर्ण है। जिन्हें हम निम्न बिंदुओं में पढ़ सकते हैं-

  1. दीपोत्सवस्य महत्वम्
  2. लक्ष्मी पूजनम्
  3. दीप प्रकाशस्स शोभा

1. दीपोत्सवस्य महत्वम्

दीपोत्सव: सर्वे: भारतीयै: सर्वातिशयेन् उत्साहेन् मान्यते। अयम् उत्सव: कार्तिक मासस्य अमावस्या दिने भवति। श्रूयते यत् अस्मिन दिने भगवान श्री रामचंद्र: रावणं हत्वा अयोध्यां निवृत्त: आसीत्। तदाच लोकै: रात्रौ दीपमालां कृत्वा तस्य स्वागतम् कृतम् आसीत्। तत: प्रभृति: जना: तस्मिन एव दिने प्रतिवर्षम् स्वगृहेषु दीपमालां कुर्वंति।

2. लक्ष्मी पूजनम्

अस्मिन् अवसरे रात्रौ लक्ष्मी पूजनं क्रियते। केषुचित् ग्रहेषु होमादि: अपि सम्पाद्यते। वणिज: प्रायेण अस्मात् दिनात् एव बहीखाता इत्यस्य आरम्भं कुर्वंति। अत: ते बहीखाता पूजनं कुर्वंति। उद्योगीन: यंत्र पूजनम् कुर्वंति।

3. दीप प्रकाशस्स शोभा

तैलस्य लघुदीपा:, मोमवर्तिका: लघु विद्युत वल्भानां विविधरगानाम् झालरा: इति विविध प्रकारै: जना: दीपान् प्रज्वलन्ति। बालका: विविध रुपकान् विस्फोटकान् स्फोयन्ति। मिष्ठान सेवनं, मिष्ठान बाटनं च कृत्वा सर्वेषां मंगलकामना विधीयते। मंगलकामना अक्षरै: युक्तानि कार्ड इति पत्राणि अपि मित्रबन्धू न् प्रति प्रेष्यते।

होलिका महोत्सव: संस्कृत निबंध

होलिका महोत्सव: संस्कृत निबंध संस्कृत की परीक्षा में निबंध के रूप में पूछा जाता है। होली एक महान उत्सव है। आइए इस निबंध को निम्न बिंदुओं में पढ़ते हैं।

  1. होलिका महत्वम्
  2. होलिका दहनम्
  3. फाग इति रंगोत्सव:

होलिका महत्वम्

होलिका महोत्सव: फाल्गुन मासस्य पूर्णिमायां समायोज्यते। इदं पर्व: होली इत्यभिधानेन् प्रसिद्धम् अस्ति। परम्परया अयमुत्सव: अपि वसंतोत्सव: कथ्यते यत: इदं पर्व अपि वसंततौ समायोज्यते।

होलिका दहनम्

अनेन् महोत्सवेन् सम्बद्धम् एकम् पौराणिकम् आख्यानम् सर्वे: स्वीक्रियते। अस्मिन दिने होलिका नाम्ना प्रसिद्धा काचित राक्षसी प्रभुभक्तं प्रहलादं अंके निधाय दग्धा जाता। सा प्रहलादम् दुग्धम् कामयते स्म। अगिं प्रविश्य अपि अग्नि: तस्या दहनम् न करिष्यति इति तस्यै वरदानम् आसीत्। परम् विपरीतम् एव जातम्। सा स्वयमेव दग्धा, प्रहलाद अदग्ध: आतिष्ठत्। तस्या: दहनम् अभिनयन्त: जना: अग्निम् परित: तिष्ठन्ति नृत्यंति च। एतत् सर्व सायंकाले भवति दिन मध्ये तु होलिकाया: पूजनं भवति।

फाग इति रंगोत्सव:

होलिकादहन कृत्वा जना: अग्रिमे दिने परस्परं गुलाल इति रंग आदाय अन्योन्य मुखानि लिम्पन्ति, पिचकारी माध्यमेन द्रवं रंग अपि प्रक्षियन्ति विविधाश्च विनोदपूर्णा: चेष्टा: कुर्वंति, इत्यनेम् रंग क्रीडां विधाय सायंकाले मिलित्वा मिष्ठान सेवनानि कुर्वंति।

गृहकार्य की विशेषताएं

गृहकार्य वह साधन है जो छात्रों को स्वयं अभ्यास करके सीखने के लिए अवसर प्रदान करता है। इसके द्वारा छात्रों को कक्षा से बाहर सीखने के अनुभव प्राप्त होते हैं जो शिक्षण के उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक होते हैं। इस प्रकार गृहकार्य प्रभावशाली शिक्षण का एक महत्वपूर्ण भाग है। गृहकार्य को निम्न ढंग से परिभाषित किया जा सकता है-

गृहकार्य

गृहकार्य

गृहकार्य शिक्षक द्वारा उत्पन्न सुनियोजित अधिगम परिस्थिति है। प्रत्येक ग्रह कार्य का मूल उद्देश्य छात्र को विशुद्ध, प्रत्यक्ष एवं प्रेरणात्मक अधिगम अनुभव प्रदान करना होता है। यह अग्रगामी अधिगम प्रक्रिया का एक अंग होता है।

इस प्रकार गृहकार्य का प्रयोग अधिगम को प्रभावशाली एवं दृढ़ बनाने अर्थात शिक्षण के उद्देश्यों की अधिगम प्राप्ति के लिए किया जाता है। अतः यह उद्देश्य केंद्रित होता है। गृहकार्य हेतु विषय सामग्री का चयन एवं निर्माण कुछ सिद्धांतों के आधार पर किया जाना चाहिए। इनके निर्माण के प्रमुख सिद्धांत इस प्रकार हैं-

  1. उपयुक्तता का सिद्धांत
  2. अभिरुचि का सिद्धांत
  3. स्पष्टता का सिद्धांत
  4. यथार्थता का सिद्धांत
  5. क्रमबद्धता एवं स्तरीकरण का सिद्धांत
  6. उद्देश्य का सिद्धांत
  7. मितव्ययिता का सिद्धांत
गृहकार्य

गृहकार्य की विशेषताएं

एक अच्छे गृहकार्य की प्रमुख विशेषताएं निम्न है-

  1. गृहकार्य छात्रों में आत्मविश्वास विकसित करने में सहायक होता है।
  2. गृहकार्य अधिगम अनुभवों का प्रमुख अंग होता है तथा शिक्षण‌ अधिगम उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायक होता है।
  3. गृहकार्य से छात्रों में स्वाध्याय की प्रवृत्ति विकसित होती है तथा यह पाठ्य पुस्तकों तथा अन्य शैक्षिक सामग्री के समुचित प्रयोग के लिए छात्रों को प्रोत्साहित करते हैं।
  4. गृहकार्य से छात्रों की आवश्यकता की पूर्ति होती है तथा उनमें धनात्मक अभिवृत्तियों अभिरुचियों एवं अच्छी आदतों का विकास होता है।
  5. गृह कार्य के मूल्यांकन से छात्रों को पुनर्बलन मिलता है जिससे उन्हें परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
  6. इनके मूल्यांकन से शिक्षक को छात्रों की व्यक्तिगत कठिनाइयों का पता चलता है जिससे उन्हें व्यक्तिगत निर्देशन से दूर करने का प्रयास किया जा सकता है।
  7. गृहकार्य शिक्षक एवं छात्र में निकट संपर्क स्थापित करने में सहायक होते हैं।
  8. गृहकार्य को पूर्ण करने के लिए छात्रों में पुस्तकों को पढ़ने तथा पुस्तकालय का प्रयोग करने की आदत विकसित होती है। इस प्रकार छात्र को अपने ढंग से सीखने का अवसर प्राप्त होता है।
  9. अच्छे गृहकार्य के निर्माण में व्यक्तिगत भिन्नता का भी ध्यान रखा जाता है। प्रतिभाशाली छात्रों को कठिन तथा औसत छात्रों को सरल गृह कार्य दिए जाते हैं।
  10. गृहकार्य ऐसे साधन होते हैं जिनके शिक्षण एवं प्रशिक्षण की क्रियाएं एक साथ संपादित होती हैं।
  11. गृहकार्य छात्र को कक्षा शिक्षण द्वारा सीखे हुए ज्ञान को व्यवस्थित एवं संगठित करने में सहायक होता है।
  12. इसके द्वारा छात्रों के व्यवहार में हुए परिवर्तनों की पुष्टि होती है।
  13. ग्रहकार्यों से छात्रों को सीखने के नए अनुभव प्राप्त होते हैं तथा अधिगम सुदृढ़ होता है।
  14. गृहकार्यों से शिक्षकों को छात्रों की कमजोरियों का निदान करने में सहायता मिलती है।
  15. कक्षा शिक्षण की कमियों को गृहकार्य द्वारा पूरा किया जा सकता है तथा इस प्रकार छात्रों को सीखने के समान अवसर प्राप्त होते हैं।
पाठ्यक्रम अर्थ परिभाषा आवश्यकता महत्वपाठ्यक्रम का क्षेत्र
पाठ्यक्रम का आधारपाठ्यक्रम के लाभ
पाठ्य सहगामी क्रियाएंशैक्षिक उद्देश्य स्रोत आवश्यकता
मूल्यांकन की विशेषताएंपाठ्यक्रम के उद्देश्य
प्रभावशाली शिक्षणअच्छे शिक्षण की विशेषताएं

अच्छे शिक्षण की विशेषताएं

अच्छे शिक्षण की विशेषताएं – एक प्रभावशाली शिक्षक ही अच्छा शिक्षण प्रस्तुत कर सकता है। अतः अच्छा शिक्षण प्रभावशाली शिक्षक के गुणों से संबंधित होता है। प्रभावशाली शिक्षक के तीन प्रमुख गुण इस प्रकार के होते हैं-

  1. शिक्षक की योग्यता
  2. शिक्षक की कुशलता
  3. शिक्षक की उपलब्धियां

समाज एवं शासन के संदर्भ में अच्छे शिक्षण को भिन्न-भिन्न तरह से परिभाषित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए एक तंत्र शासन में अच्छा शिक्षण उसे कहा जाता है, जिसमें शिक्षक अपने व्यक्तिगत गुणों से अंतःक्रिया द्वारा छात्र को प्रभावित कर उसमें ऐसे गुणों एवं मूल्यों का विकास करें, जो राज्य एवं शासन के हित में हो।

अच्छे शिक्षण की विशेषताएं

अच्छे शिक्षण की विशेषताएं

इसी प्रकार प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में अच्छे शिक्षण का तात्पर्य ऐसे शिक्षण से होता है, जिसमें शिक्षक एवं छात्र की अंतः क्रिया द्वारा छात्र की क्षमताओं का सर्वाधिक विकास हो सके। इसमें छात्र का हित सर्वोपरि माना जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत अच्छे शिक्षण की विशेषताएं इस प्रकार हैं-

  1. अच्छा शिक्षण सोद्देश्य होता है।
  2. अच्छा शिक्षण सुनियोजित होता है।
  3. अच्छा शिक्षण छात्रों के पूर्व ज्ञान पर आधारित होता है।
  4. अच्छे शिक्षण से छात्र प्रोत्साहित होते हैं।
  5. अच्छा शिक्षण छात्रों के लिए रोचक एवं प्रभावोत्पादक होता है।
  6. अच्छा शिक्षण छात्रों को उचित मार्गदर्शन प्रदान करता है।
  7. अच्छा शिक्षण वातावरण से अनुकूलन करने में सहायक होता है।
  8. अच्छा शिक्षण छात्रों की मनो-शारीरिक योग्यताओं के अनुकूल होता है।
  9. अच्छे शिक्षण से वांछित सूचनाएं प्राप्त होती हैं।
  10. अच्छा शिक्षण निदानात्मक, उपचारात्मक एवं मूल्यांकन कार्यों से संबंधित होता है।
  11. अच्छे शिक्षण में शिक्षक एवं छात्रों के बीच विचारों का आदान-प्रदान होता है।
  12. अच्छा शिक्षण छात्रों के सभी पक्षों के विकास को प्रभावित करता है।
  13. अच्छा शिक्षण छात्रों को संवेदनात्मक स्थिरता प्रदान करता है।
  14. अच्छे शिक्षण के द्वारा बालकों की सृजनात्मक क्षमताओं के विकास में सहायता मिलती है।
पाठ्यक्रम अर्थ परिभाषा आवश्यकता महत्वपाठ्यक्रम का क्षेत्र
पाठ्यक्रम का आधारपाठ्यक्रम के लाभ
पाठ्य सहगामी क्रियाएंशैक्षिक उद्देश्य स्रोत आवश्यकता
मूल्यांकन की विशेषताएंपाठ्यक्रम के उद्देश्य
प्रभावशाली शिक्षणअच्छे शिक्षण की विशेषताएं

प्रभावशाली शिक्षण

प्रभावशाली शिक्षण वह है जिससे अधिकांश शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सके अर्थात अधिक से अधिक अधिगम हो सके। इस प्रकार प्रभावशाली शिक्षण वह होता है जिससे शिक्षण प्रक्रिया की अधिगम से अधिकतम निकटता होती है। बी• ओ• स्मिथ महोदय का कहना है कि शिक्षण को प्रभावशाली बनाने के लिए उसके विभिन्न चरों एवं उनके कार्यों का सही ज्ञान होना आवश्यक है।

शिक्षण की प्रकृति सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक दोनों ही है तथा यह कला एवं विज्ञान दोनों है। अतः प्रभावशाली शिक्षण के लिए शिक्षण के स्वरूप तथा शिक्षण क्रियाओं को भी जानना आवश्यक है।

प्रभावशाली शिक्षण की संरचना

सामान्यतः जब शिक्षक और छात्र में पाठ्यवस्तु के माध्यम से अंतः प्रक्रिया होती है तो उसे शिक्षण की संज्ञा प्रदान कर दी जाती है। इसलिए शिक्षण को त्रिपक्षी प्रक्रिया भी कहा जाता है। किंतु प्रभावशाली शिक्षण वह होता है जिससे छात्रों के सभी पक्षों का समुचित विकास हो तथा अधिकतम अधिगम हो सके। इसके लिए शिक्षक को कई तरह की शिक्षण क्रियाएं करनी होती हैं। इन शिक्षण क्रियाओं को भी तीन पक्षों में व्यक्त किया जाता है।

अतः इस दृष्टि से भी शिक्षण त्रिपक्षी प्रक्रिया कहलाता है अर्थात् इसकी संरचना के तीन प्रमुख पक्ष होते हैं –

  1. शिक्षण में संकेत एवं चिन्ह
  2. शिक्षण की भाषा विज्ञान प्रक्रिया
  3. शिक्षण का तर्क
प्रभावशाली शिक्षण
प्रभावशाली शिक्षण

1. शिक्षण में संकेत एवं चिन्ह

संकेत एवं चिन्ह शिक्षण प्रक्रिया के बहुत महत्वपूर्ण अवयव होते हैं। प्रारंभिक अर्थात निदानात्मक स्तर से ही शिक्षक संकेत एवं चिन्हों का प्रयोग करने लगता है। छात्र भी चिन्हों एवं संकेतों में अधिक रुचि लेता है तथा उन्हें शीघ्र ही समझने भी लगता है। धीरे-धीरे छात्र इनकी व्याख्या भी करने लगता है तथा संप्रेषण में भी इनका प्रयोग करता है। शिक्षक उपचारात्मक एवं मूल्यांकन स्तर पर भी इनका प्रयोग करता है।

इस प्रकार संकेत एवं शिक्षण की संरचना के प्रमुख पक्ष अथवा अंग होते हैं। विषयवस्तु प्रस्तुतीकरण में संकेतों एवं चिन्हों का प्रयोग शिक्षण में समय एवं शक्ति की बचत करता है। इनके प्रयोग मूल्यांकन में भी सुगमता होती है। अतः संकेत एवं चिन्ह प्रभावशाली शिक्षण संरचना के प्रमुख अवयव हैं।

2. शिक्षण की भाषा विज्ञान प्रक्रिया

शिक्षण प्रक्रिया में भाषा के प्रयोग के बिना शिक्षण प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती है। अतः शिक्षण भाषा विज्ञान की ही एक प्रक्रिया है। भाषा के माध्यम से ही शिक्षक निर्देश देता है, व्याख्या करता है, वर्णन करता है, कथन कहता है। इसके अतिरिक्त शब्दों के द्वारा ही शिक्षक छात्रों को प्रोत्साहित करता है, उनके कार्यों की प्रशंसा करता है तथा उन्हें अभिप्रेरित करता है।

इस प्रकार शिक्षण के तीनों कार्यात्मक, पक्षोनिदानात्मक, उपचारात्मक एवं मूल्यांकन में भाषा का विशेष महत्व होता है। भाषा के अभाव में शिक्षक एवं छात्र के मध्य अंतःक्रिया भी नहीं हो सकती है। अतः शिक्षण की संरचना में भाषा का विशेष स्थान है तथा भाषा विज्ञान की प्रक्रिया इसका दूसरा प्रमुख अवयव है।

प्रभावशाली शिक्षण

3. शिक्षण का तर्क

किसी को भी कोई बात तभी स्वीकार होती है जब वह तर्कसंगत हो। इस दृष्टि से शिक्षण प्रक्रिया में संकेतों, चिन्हों एवं भाषा के साथ-साथ तर्क का भी विशेष महत्व है। पाठ्यवस्तु छात्रों को तभी ग्राह्य होती है जब उसके अवयवों को तर्कपूर्ण ढंग से निर्धारित करके क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किया जाता है। शिक्षण के प्रत्येक स्तर पर तार्किक विश्लेषण एवं तार्किक प्रस्तुतीकरण का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।

प्रभावशाली शिक्षण हेतु शिक्षक को निदानात्मक, उपचारात्मक एवं मूल्यांकन तीनों स्तरों पर तर्कपूर्ण ढंग से निर्णय लेना पड़ता है। शिक्षण क्रियाओं की व्यवस्था में भी तर्क की आवश्यकता पड़ती है। मूल्यांकन हेतु प्रश्नों को भी तर्कपूर्ण ढंग से व्यवस्थित किया जाता है तथा प्रश्नों से सम्मिलित करने के बारे में भी तर्कपूर्ण ढंग से निर्णय लेना पड़ता है। इस प्रकार तर्क शिक्षण प्रक्रिया की संरचना का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसके बिना शिक्षण अपूर्ण रहता है तथा उसकी प्रभावशीलता की तो संभावना ही नहीं रह जाती है।

अत: उपरोक्त तीनों पक्षों का समग्र रूप ही शिक्षण है तथा प्रभावशाली शिक्षण हेतु तीनों का होना आवश्यक है।

प्रभावशाली शिक्षण

प्रभावशाली शिक्षण की प्रमुख समस्याएं

प्रभावशाली शिक्षण हेतु शिक्षक को शिक्षण उद्देश्य, शिक्षण के चरों एवं उनके कार्यों, शिक्षण की संरचना तथा शिक्षण की विभिन्न अवस्थाओं एवं क्रियाओं का ज्ञान होना आवश्यक होता है। परंतु शिक्षक को इन बातों की सम्यक जानकारी होने पर भी यह आवश्यक नहीं है कि शिक्षण प्रभावशाली ही होगा क्योंकि शिक्षण व्यवस्था के अन्य अनेक ऐसे तत्व हैं जो शिक्षण को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।

इस प्रकार प्रभावशाली शिक्षण के मार्ग में कई ऐसी बाधाएं एवं समस्याएं आती हैं जिनका निराकरण अकेले शिक्षक नहीं कर सकता है। इन समस्याओं के समाधान के लिए संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था का सहयोग आवश्यक होता है।

प्रभावशाली शिक्षण की प्रमुख समस्याएं इस प्रकार हैं-

  1. बड़ी कक्षाओं की समस्या
  2. सामूहिक कार्य की समस्या
  3. स्वाध्याय एवं आवश्यक कौशलों के विकास की समस्या
  4. विद्यालय के पुस्तकालय के प्रयोग की समस्या
  5. श्रेणी रहित विद्यालय
  6. समूह शिक्षण
  7. विषयों के एक समूह का समय खंड शिक्षण
  8. एक समय में कई कक्षाओं के लिए एक शिक्षक
  9. सामूहिक वार्ता एवं अन्य क्रियाकलापों का आयोजन
  10. गृहकार्य
पाठ्यक्रम अर्थ परिभाषा आवश्यकता महत्वपाठ्यक्रम का क्षेत्र
पाठ्यक्रम का आधारपाठ्यक्रम के लाभ
पाठ्य सहगामी क्रियाएंशैक्षिक उद्देश्य स्रोत आवश्यकता
मूल्यांकन की विशेषताएंपाठ्यक्रम के उद्देश्य
प्रभावशाली शिक्षणअच्छे शिक्षण की विशेषताएं

पाठ्यक्रम के उद्देश्य

पाठ्यक्रम के उद्देश्य- पाठ्यक्रम देशकाल एवं परिस्थितियों के अनुरूप बदलता रहता है। किसी भी पाठ्यक्रम का निर्माण तत्कालीन शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु किया जाता है। परंतु सामान्य तौर पर पाठ्यक्रम निर्माण के कुछ प्रमुख उद्देश्य निम्न है-

पाठ्यक्रम के उद्देश्य

पाठ्यक्रम के उद्देश्य

  1. छात्रों का सर्वांगीण विकास करनापाठ्यक्रम का प्रथम व सर्वप्रमुख उद्देश्य बालक के व्यक्तित्व के समस्त पहलुओं यथा शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, नैतिक, व्यावसायिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विकास करना है।
  2. सभ्यता व संस्कृति का हस्तांतरण तथा विकास करना– पाठ्यक्रम मनुष्य की सभ्यता व अनमोल संस्कृति को सुरक्षित रखकर उसे आगामी पीढ़ी को हस्तांतरित करता है। इस प्रकार मानव सभ्यता व संस्कृति की रक्षा तथा उसके हस्तांतरण का विकास करना भी पाठ्यक्रम का उद्देश्य है।
  3. बालक का नैतिक व चारित्रिक विकास करना– पाठ्यक्रम के माध्यम से बालक में सहानुभूति, सहयोग, सहनशीलता, सद्भावना, अनुशासन, मित्रता, निष्कपटता व इमानदारी जैसे उच्च नैतिक गुणों का विकास किया जाता है। जिससे बालक एक श्रेष्ठ नागरिक बन सके। इस प्रकार पाठ्यक्रम का एक प्रमुख उद्देश्य बालक का नैतिक व चारित्रिक विकास करना भी है।
  4. बालक की मानसिक शक्तियों का विकास करना– पाठ्यक्रम का एक उद्देश्य बालक की विभिन्न प्रकार की मानसिक शक्तियों तथा चिंतन मनन तारीख को विवेक निर्णय स्मरण आदि का समुचित विकास करना भी होता है। इसी प्रकार बालक के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास होता है।
  5. बालक की रचनात्मक व सृजनात्मक शक्तियों का विकास करना– पाठ्यक्रम के अंतर्गत आने वाले विषयों एवं खेलकूद व अन्य पाठ्येत्तर क्रियाकलापों को आयोजित करने का उद्देश्य बालक में निहित सृजन व निर्माण की शक्तियों को जगाना होता है।
  6. बालक में गतिशील लचीले मस्तिष्क का निर्माण करना– कहा गया है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। इसे स्वस्थ मस्तिष्क का निर्माण भी शिक्षा द्वारा ही किया जा सकता है। वस्तुतः पाठ्यक्रम विभिन्न विज्ञानों, सामाजिक विषयों व अन्य क्रियाओं के द्वारा मस्तिष्क की गतिशीलता व लचीलापन की वृद्धि करने में सहायक होता है।
  7. खोज की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना– पाठ्यक्रम बालकों को विभिन्न प्रकार का गहन ज्ञान प्रदान करके उनमें उत्सुकता व जिज्ञासा की प्रवृत्ति बढ़ाता है, जिससे बालक अधिकारिक ज्ञान प्राप्ति का प्रयास करें। इस प्रकार बालक में खोजी व अनुसंधान के प्रवृत्ति को बढ़ाना भी पाठ्यक्रम के मुख्य उद्देश्य में आता है।
  8. बालक को भावी जीवन के लिए तैयार करना– शिक्षा संपूर्ण जीवन की तैयारी है तथा पाठ्यक्रम वालों को उनके भावी जीवन के लिए तैयार करता है। पाठ्यक्रम विषयवार क्रियाओं के मध्य सामान्य व सामंजस्य स्थापित करके बालकों को शारीरिक, मानसिक व सर्वांगीण विकास करने का प्रयत्न करता है, ताकि बालक का संतुलित विकास हो सके और वह अपने भावी जीवन में सफल मनुष्य बन कर उभर सके।
  9. शैक्षिक प्रक्रिया का स्वरूप निर्धारित करना– पाठ्यक्रम का दायित्व बालक के प्रति होने के साथ-साथ संपूर्ण शिक्षा प्रक्रिया की ओर भी है। पाठ्यक्रम शिक्षण क्रियाओं व शिक्षक के मध्य की अंतः क्रिया को स्पष्ट करता है। साथी शिक्षक व शिक्षार्थी के मध्य किस प्रकार के अंतः क्रिया हो, इसका स्वरूप भी निर्धारित करता है।
  10. बालकों की क्षमता, योग्यता एवं रुचि का विकास करना – पाठ्यक्रम का एक विशेष उद्देश्य बालकों को सुसुप्त क्षमताओं एवं योग्यताओं का विकास करना होता है। साथ ही वह बालकों की विभिन्न प्रकार की सूचियों को भी प्रोत्साहित करता है।
  11. बालकों में लोकतांत्रिक भावना का विकास करना– पाठ्यक्रम का एक अन्य प्रमुख उद्देश्य छात्रों को सामाजिकता एवं सुनागरिकता का प्रशिक्षण देकर उनमें लोकतांत्रिक भावना का विकास करना है, ताकि बालक स्वतंत्रता, समानता, भ्रातत्व अथवा उदारता के मूल्यों को आत्मसात करके अपने समाज व देश का विकास कर सके।

इस प्रकार अपने इन उद्देश्यों के कारण पाठ्यक्रम का शैक्षिक प्रक्रिया में एक विशेष स्थान है। इन्हीं कारणों से पाठ्यक्रम की आवश्यकता होती हैं तथा यह ही वे महत्वपूर्ण कार्य हैं जिन्हें पाठ्यक्रम संपन्न करता है।

पाठ्यक्रम अर्थ परिभाषा आवश्यकता महत्वपाठ्यक्रम का क्षेत्र
पाठ्यक्रम का आधारपाठ्यक्रम के लाभ
पाठ्य सहगामी क्रियाएंशैक्षिक उद्देश्य स्रोत आवश्यकता
मूल्यांकन की विशेषताएंपाठ्यक्रम के उद्देश्य
प्रभावशाली शिक्षणअच्छे शिक्षण की विशेषताएं

मूल्यांकन की विशेषताएं

मूल्यांकन की विशेषताएं- मूल्यांकन कार्य में मापन एवं परीक्षण सम्मिलित होता है। अतः एक अच्छे मूल्यांकन की विशेषताओं में मापन एवं परीक्षण की विशेषताएं अंतर्निहित होनी चाहिए।

मूल्यांकन की विशेषताएं

इस प्रकार मूल्यांकन की विशेषताएं निम्न है-

  1. क्रमबद्धता
  2. वस्तुनिष्ठता
  3. विश्वसनीयता
  4. वैधता  
  5. व्यवहारिकता
  6. व्यापकता
  7. शिक्षार्थी की सहभागिता

1. क्रमबद्धता

मूल्यांकन कार्यक्रम में क्रमिकता या क्रमबद्धता का विशेष महत्व है। मूल्यांकन में क्रमिकता न होने पर शिक्षार्थी या कार्यकर्ता को अपनी प्रगति के बारे में अन्त तक कोई सूचना नहीं मिल पाती है। अत: इसके अभाव में शिक्षार्थी में कार्य के प्रति त्रुटिपूर्ण अभिव्यक्ति विकसित हो सकती है, वह त्रुटिपूर्ण कार्यविधि अपना सकता है तथा गलत निष्कर्ष निकाल सकता है।

मूल्यांकन कार्य के क्रम में निश्चितता का होना भी आवश्यक है। जिस प्रकार पाठ्यक्रम के उद्देश्यों में पूर्व संबंध होता है तथा जिस प्रकार उन्हें महत्त्व के क्रम में व्यवस्थित किया जाता है, उसी प्रकार का क्रम उनकी जांच में भी रहना चाहिए। उदाहरणार्थ, यदि संकल्प नाव को तथ्यों से अधिक महत्वपूर्ण माना गया है, तो मूल्यांकन कार्य में भी महत्त्व के उसी क्रम को बनाए रखना चाहिए।

मूल्यांकन की विशेषताएं
मूल्यांकन की विशेषताएं

2. वस्तुनिष्ठता

एक उत्तम परीक्षा का वस्तुनिष्ठ होना अति आवश्यक है। वस्तुनिष्ठता का अर्थ यह है कि मूल्यांकन में व्यक्तिगत पक्षों का प्रभाव नहीं होना चाहिए। स्पष्ट है कि ज्ञानात्मक क्षेत्र में मूल्यांकन में वस्तुनिष्ठता भावात्मक क्षेत्र की तुलना में अधिक होगी। ज्ञानात्मक क्षेत्र में यह उच्च स्तर की अपेक्षा निम्न स्तर पर अधिक वस्तुनिष्ठ होगा।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि जटिल अधिगम प्रक्रिया के मापन के लिए जब तक संतोषजनक परिभाषाएं विकसित नहीं हो पाती तब तक पर्याप्त सीमा तक हमें विशेषज्ञों द्वारा किए गए मूल्यांकन पर ही निर्भर रहना होगा। यहां पर यह बात भी महत्वपूर्ण है कि आत्मनिष्ठता और वस्तुनिष्ठता में परस्पर उतना विरोध नहीं है जितना प्राय: समझा जाता है।

यह दोनों वास्तव में एक ही सीढ़ी के दो पद हैं। अत: लक्ष्य यह होना चाहिए कि मूल्यांकन के उपकरणों को यथासंभव अधिक से अधिक वस्तुनिष्ठ बनाया जाए। इसके साथ ही इस बात पर भी ध्यान रखने की आवश्यकता होती है कि किसी मूल्यांकन कार्य को उससे अधिक वस्तुनिष्ठ न मान लिया जाए। जितना कि वह वास्तव में है।

3. विश्वसनीयता

एक अच्छा मूल्यांकन विश्वसनीय भी होना चाहिए। इसका तात्पर्य यह है कि बार-बार तथा अनेक लोगों द्वारा मूल्यांकन किए जाने पर भी उसके निष्कर्षों में कोई अंतर नहीं आए। अतः स्पष्ट है कि विश्वसनियता के लिए वस्तुनिष्ठता एक पूर्व आवश्यकता है। इसलिए निबंधात्मक परीक्षा की अपेक्षा वस्तुनिष्ठ परीक्षा अधिक विश्वसनीय होती है।

4. वैधता

एक उत्तम परीक्षण का वैध होना भी आवश्यक है। वैधता से तात्पर्य परीक्षण की सार्थकता से है अर्थात परीक्षण जिस मापन के लिए बनाया गया है, उसे ही उसका मापन करना चाहिए। इसलिए कोई मूल्यांकन प्रक्रिया तभी वैध कहलाती है जब वह उसी गुण, पक्ष, विशेषता आदि का मापन करती है जिसका मापन करना अभीष्ट होता है। अत: पाठ्यक्रम के मूल्यांकन में उन्हीं पक्षों पर ध्यान केंद्रित होना चाहिए जिन पक्षों पर वह पाठ्यक्रम आधारित है।

5. व्यावहारिकता

एक अच्छी परीक्षा की प्रमुख विशेषता यह होती है कि उसका प्रयोग, अंकन एवं प्राप्त प्रदत्तो का अर्थापन करना सरल होता है। किसी भी परीक्षण की रचना शिक्षार्थियों की अधिगम उपलब्धियों के मूल्यांकन के लिए की जाती है। अत: परीक्षण का व्यवहारिक होना अति आवश्यक होता है। इसलिए मूल्यांकन कार्यक्रम इस प्रकार निर्धारित किया जाना चाहिए जो व्यवहारिक भी हो।

मूल्यांकन की विशेषताएं

6. व्यापकता

किसी मूल्यांकन कार्यक्रम में सभी पक्षों पर सभी शैक्षिक उद्देश्यों की जांच की जानी चाहिए। कुछ क्षेत्रों में जांच कार्य कठिन अवश्य होता है, किंतु इसके लिए भी कोई ना कोई उपाय निकालने का प्रयास करना चाहिए। परीक्षण उपकरणों के रूप में मानकीकृत परीक्षाओं के अतिरिक्त शिक्षक निर्मित परीक्षाओं, विधिवत पर्यवेक्षण, अभिलेख, स्तरमापी, प्रश्नावली आदि अनेक विधियों प्रवृत्तियों को भी मूल्यांकन हेतु काम में लाया जा सकता है।

इस प्रकार शिक्षार्थियों के व्यवहार में ज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक सभी क्षेत्रों में हुए परिवर्तनों की जांच करके मूल्यांकन को व्यापक रूप प्रदान किया जाना चाहिए। पाठ्यक्रम के मूल्यांकन में तो व्यापकता का होना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

7. शिक्षार्थी की सहभागिता

परस्परागत दृष्टि में शिक्षार्थी का मूल्यांकन प्रक्रिया में कोई स्थान नहीं होता है। इसके अनुसार छात्र ज्ञान प्राप्त करते हैं तथा शिक्षक, प्रधानाध्यापक एवं विशेष रूप से नियुक्त परीक्षक, उनके कार्यों का मूल्यांकन करते हैं। इस प्रकार से शिक्षार्थी और परीक्षक भी दो प्रथम वर्गों में विभक्त होते आए हैं, किंतु शिक्षार्थी मूल्यांकन प्रक्रिया में भाग लेते हैं। वास्तविकता तो यह है कि प्रत्येक छात्र स्वयं तथा अपने साथियों के व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों का निरंतर मापन एवं मूल्यांकन करता रहता है।

नवीन दृष्टिकोण के विकास के परिणामस्वरूप अब यह अनुभव किया जाने लगा है कि शिक्षकों तथा अन्य बाह्य परीक्षकों द्वारा किए जाने वाले मूल्यांकन की अपनी सीमाएं हैं। चूकि अधिगम एक क्रियाशील प्रक्रिया है, अत: इससे परिणाम के साथ-साथ अधिगम अनुभवों का भी अपना विशेष महत्व है। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि परिणामों के साथ-साथ अधिगम अनुभवों का भी मूल्यांकन किया जाता रहे।

मूल्यांकन को पूर्ण रूप से शिक्षकों एवं बाह्य परीक्षकों को सौंप देने पर अधिगम अनुभवों की उपेक्षा होने की अधिक संभावना रहती है। इससे मूल्यांकन कार्य अपूर्ण रह जाता है तथा अधिगम प्रक्रिया को आवश्यक पुष्ठ पोषण नहीं मिल पाता है।

पाठ्यक्रम अर्थ परिभाषा आवश्यकता महत्वपाठ्यक्रम का क्षेत्र
पाठ्यक्रम का आधारपाठ्यक्रम के लाभ
पाठ्य सहगामी क्रियाएंशैक्षिक उद्देश्य स्रोत आवश्यकता
मूल्यांकन की विशेषताएंपाठ्यक्रम के उद्देश्य
प्रभावशाली शिक्षणअच्छे शिक्षण की विशेषताएं

शैक्षिक उद्देश्य स्रोत आवश्यकता

शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण हेतु इनके प्रमुख स्रोतों का ज्ञान अति महत्वपूर्ण होता है। यद्यपि इन स्रोतों का पता लगाना आसान नहीं होता है क्योंकि एक तो इनकी संख्या अनंत होती है तथा दूसरे उद्देश्यों का निर्धारण इन से विधिवत रूप में नहीं किया जा सकता।

शैक्षिक उद्देश्यों का विभाजन

स्रोतों की प्रकृति एवं विस्तार क्षेत्र का ज्ञान प्राप्त करने की दृष्टि से शैक्षिक उद्देश्य को निम्न वर्गों में नियोजित किया जा सकता है-

  1. समाज
  2. व्यक्ति
  3. ज्ञान

1. समाज

सामान्यत: शैक्षिक उद्देश्यों का निर्धारण समाज द्वारा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति तथा समस्याओं के समाधान के लिए किया जाता है। समाज का आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक और क्या है तथा इसकी आवश्यकताएं किस प्रकार की है, यह बातें शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण के लिए महत्वपूर्ण होती हैं। बालक जिस समाज में रहता है, उसकी कुछ मान्यताएं मूल्य एवं दर्शन होते हैं।

समाज की आवश्यकताओं एवं आकांक्षाओं के अनुकूल ही बालक के व्यक्तित्व का विकास करना होता है। सामाजिक मूल्यों की स्थापना के बिना व्यक्ति को समाज के लिए उपयोगी नहीं बनाया जा सकता। सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा एवं संवर्धन, उसमें सामायिक दृष्टि से संशोधन, प्रजातांत्रिक जीवन मूल्यों का अनुशीलन, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का ज्ञान तथा अन्य अनेक सामाजिक आर्थिक राजनीतिक धार्मिक एवं नैतिक प्रश्न सभी इसके अंतर्गत आ जाते हैं। आता शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण में समाज के इन सभी पक्षों को स्थान देना पड़ता है।

शैक्षिक उद्देश्य

2. व्यक्ति

शैक्षिक उद्देश्यों का दूसरा प्रमुख स्रोत व्यक्ति है। समाज अपने अनुसार शिक्षा के आधारभूत आवश्यकताओं का निर्धारण करता है, किंतु उनकी पूर्ति व्यक्ति के माध्यम से ही होती है। व्यक्ति का महत्व इस कारण और भी है कि उसकी अपनी स्वतंत्र इच्छा शक्ति एवं कुछ विशिष्ट आवश्यकताएं होती हैं। इन आवश्यकताओं का संबंध व्यक्ति का विकास से होता है। बालक का शारीरिक, मानसिक सामाजिक एवं संवेगात्मक विकास कैसे होता है? विभिन्न अवस्थाओं में उसकी आवश्यकताएं, रुचियां एवं रुझान किस प्रकार के होते हैं?

उसकी योग्यताएं एवं क्षमताएं कैसी हैं? आदि बातों का शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण में बहुत महत्व है। क्योंकि शिक्षा प्रक्रिया का प्रमुख केंद्र विद्यार्थी होता है। अत: इन सभी सूचनाओं के आधार पर ही शिक्षा के उद्देश्यों को निश्चित किया जा सकता है।

कुछ विद्वानों के मतानुसार व्यक्ति की आत्मिक अर्थात आध्यात्मिक आवश्यकताओं को भी शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण में स्थान दिया जाना चाहिए।

3. ज्ञान

सभ्यता के विकास का मूल ज्ञान ही है। शिक्षा सभ्यता के विकास का माध्यम है। अत: इसे ज्ञान के विकास और उपयोग में भी सहायक होना चाहिए। ज्ञान के भी अपने अंग एवं पक्ष हैं, जैसे तथ्य, प्रक्रियाएं, विचार, अवधारणाएं, चिंतन प्रणालियां आदि।

ज्ञान के भंडार को विभिन्न वर्गों में आयोजित करके उन्हें अलग-अलग विषयों का नाम प्रदान किया जाता है। इससे स्पष्ट है कि शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण में ज्ञान एक प्रमुख स्रोत अथवा घटक है। शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण में विषय वस्तु की प्रकृति तथा शिक्षा के स्तर को भी ध्यान में रखना होता है।

प्रत्येक विषय की अपनी विशेष प्रकृति होती है। से गणित एक विषय के रूप में बालक में तर्कपूर्ण चिंतन का विकास करता है, जबकि भाषा उसमें अभिव्यक्ति एवं अवबोध की क्षमता विकसित करती है। गणित स्वभाव से ही अनुशासनात्मक प्रभाव डालता है जबकि भाषाएं कौशल के रूप में सामाजिक आदान-प्रदान को सफल बनाती है।

शैक्षिक उद्देश्य

इसी प्रकार सामाजिक अध्ययन बालक की सामाजिक चेतना को प्रबुद्ध बनाता है जबकि विज्ञान उसमें सूक्ष्म निरीक्षण एवं विश्लेषण की शक्ति उत्पन्न करता है। कुछ विषय विचार प्रधान होते हैं और कुछ कौशल के विकास पर बल देते हैं। इसके अतिरिक्त मानव ज्ञान विज्ञान की प्रगति के साथ-साथ विषय के क्षेत्र भी बदलते रहते हैं। अत: शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण विषय की प्रकृति के अनुरूप करना होता है।

प्राथमिक, माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा स्तर पर शिक्षा के उद्देश्य भी बदल जाते हैं। की विषय के शिक्षा के उद्देश्य विभिन्न स्तरों पर भिन्न-भिन्न होते हैं। पता शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण में यह जानना आवश्यक होता है कि पाठ्यक्रम का निर्धारण किस स्तर से किया जाना है।

शैक्षिक उद्देश्यों की आवश्यकता

सभी स्रोतों का अध्ययन एवं विश्लेषण करने, छात्रों की प्रकृति को समझने तथा उनकी आवश्यकताओं का आकलन करने के पश्चात जो सूचनाएं प्राप्त होती है उन्हें समाकलित करके उद्देश्यों का निर्धारण किया जाता है, जिससे उन्हें अपेक्षित व्यवहार गत परिवर्तनों में रूपायित किया जा सके।

शैक्षिक उद्देश्यों को व्यवहारिक रूप प्रदान करने के लिए, निर्माण के समय तीन बातों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है-

  1. क्या यह उद्देश्य समाज की आवश्यकताओं की दृष्टि से उपयुक्त है?
  2. क्या यह उद्देश्य उपलब्ध साधनों की दृष्टि से व्यावहारिक है?
  3. क्या विद्यार्थियों की क्षमता एवं तत्परता की दृष्टि से उन उद्देश्यों के प्राप्त की जा सकती है?

इससे यह स्पष्ट है कि शैक्षिक उद्देश्य समाज, व्यक्ति तथा विषय वस्तु अर्थात ज्ञान से प्राप्त प्रदत्तों पर आधारित दार्शनिक संश्लेषण के द्वारा ही प्राप्त किए जा सकते हैं। क्योंकि यह तीनों क्षेत्र एक दूसरे से बिल्कुल अलग नहीं है तथा इनमें अन्तः क्रिया होती रहती है। अत: शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण में इन क्षेत्रों की पारस्परिक अन्त: क्रिया पर भी ध्यान रखना होता है।

पाठ्यक्रम अर्थ परिभाषा आवश्यकता महत्वपाठ्यक्रम का क्षेत्र
पाठ्यक्रम का आधारपाठ्यक्रम के लाभ
पाठ्य सहगामी क्रियाएंशैक्षिक उद्देश्य स्रोत आवश्यकता
मूल्यांकन की विशेषताएंपाठ्यक्रम के उद्देश्य
प्रभावशाली शिक्षणअच्छे शिक्षण की विशेषताएं

पाठ्य सहगामी क्रियाएं

पाठ्य सहगामी क्रियाएं – शिक्षण को रोचक, सुग्राह्य बनाने में पाठ्य सहगामी क्रियाओं का भी महत्वपूर्ण स्थान है। पाठ्यचर्या शिक्षा का अभिन्न अंग है। यह शिक्षक को यह बताती है कि कौन सी कक्षा विशेष में कितना पढ़ाना है। इसे दौड़ का मैदान भी कहा जाता है। पाठ्यचर्या से शिक्षक विद्यार्थी को उद्देश्य प्राप्ति की ओर ले जाता है।

पाठ्य सहगामी क्रियाएं

प्राचीन काल में पाठ्यचर्या बौद्धिक विषयों तक ही सीमित रहती थी, किंतु वर्तमान में इसकी सीमा बहुत विस्तृत हो गई है। आज पाठ्यचर्या में वे सब अनुभव सम्मिलित किए जाते हैं जो किसी बालक को किसी शैक्षिक संस्था में कक्षा, पुस्तकालय, प्रयोगशालाओं, खेल के मैदान और साहित्य तथा सांस्कृतिक क्रियाओं से प्राप्त होते हैं।

पाठ्य सहगामी क्रियाएं

आधुनिक काल में शिक्षाशास्त्री इस बात पर सहमत हो गए हैं कि यदि इन क्रियाओं के द्वारा समुचित रूप से छात्रों का पथ प्रदर्शन किया जाए तो इसके परिणाम लाभप्रद होंगे। पहले इन्हें शिक्षक में पाठ्येत्तर क्रियाओं के नाम से जाना जाता था किंतु धीरे-धीरे इनके महत्व को भी देखते हुए इन्हें पाठ्यचर्या का अभिन्न अंग समझा जाने लगा। इन क्रियाओं द्वारा विद्यार्थी का सर्वांगीण विकास होता है। पाठ्य सहगामी क्रियाओं की अवधारणा को दो भागों में बांटा जा सकता है-

  1. प्राचीन अवधारणा
  2. आधुनिक अवधारणा

1. प्राचीन अवधारणा

पाठ्य सहगामी क्रियाओं को भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है। जैसे पाठ्येत्तर प्रवृतियां, कक्षेत्तर प्रवृतियां तथा पाठ्य सहगामी क्रियाएं। कुछ समय पूर्व शिक्षा से तात्पर्य केवल पढ़ना, लिखना था। उस समय की शिक्षा अत्यंत संकुचित एवं व्यवहारिक थी। संगीत, नाटक, भ्रमण, स्काउटिंग, वाद विवाद, खेलकूद जैसी क्रियाओं को अशैक्षिक क्रियाएं माना जाता था।

2. आधुनिक अवधारणा

शिक्षा दर्शन की विचारधाराओं में परिवर्तन के साथ ही अतिरिक्त पाठ्यक्रम क्रियाओं के संबंध एवं दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ और वर्तमान में इन्हें अतिरिक्त क्रियाएं न मानकर सहगामी क्रियाएं माना जाने लगा। धीरे-धीरे यह सहगामी क्रियाएं शिक्षा का आवश्यक अंग बन गई। इन क्रियाओं को पाठ्य सहगामी क्रियाएं या पाठ्येत्तर क्रियाएं कहा जाने लगा।

पाठ्य सहगामी क्रियाएं

पाठ्य सहगामी क्रियाओं का महत्व

विद्यालय में पाठ्य सहगामी क्रियाओं को बिना अध्ययन में सरसता उत्पन्न नहीं होती है। इन क्रियाओं से विद्यालयी जीवन में नवीनता उत्पन्न होती है। विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है कि पाठ्य सहगामी क्रियाओं पर पर्याप्त बल दिया जाए। माध्यमिक शिक्षा आयोग एवं राष्ट्रीय शिक्षा आयोग ने पाठ्य एवं पाठ्येत्तर प्रवृत्तियों को पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग माना है। पाठ्य सहगामी क्रियाओं का विद्यार्थियों के लिए बहुत महत्व है, इसे निम्न प्रकार से समझा जा सकता है-

  1. नैतिक प्रशिक्षण – पाठ्य सहगामी क्रियाओं द्वारा नैतिक प्रशिक्षण के लिए वास्तविकता प्रदान की जाती है जिसमें भाग लेकर बालक उन गुणों को सीखता है जो चरित्र निर्माण के लिए आवश्यक है।
  2. सामाजिक प्रशिक्षण – सामाजिक जीवन का विकास करना शिक्षा का मुख्य लक्ष्य है। पाठ्य सहगामी क्रियाएं इस उद्देश्य की प्राप्ति में बहुत सहयोग प्रदान करती हैं। समाज सेवा शिविर, स्काउटिंग, स्कूल, श्रमदान तथा रेडक्रॉस आदि के द्वारा बालकों में सामाजिकता का विकास किया जा सकता है।
  3. नागरिक प्रशिक्षण– पाठ्य सहगामी क्रियाओं की सहायता से किशोरों में अनेक ऐसे गुणों का विकास किया जा सकता है, जो एक श्रेष्ठ नागरिक के लिए आवश्यक है। विद्यार्थियों को अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों का ज्ञान कराने हेतु यह क्रियाएं एक सशक्त साधन है। इनके द्वारा विद्यार्थियों में उत्तरदायित्व की भावना का विकास किया जा सकता है।
  4. किशोरावस्था की आवश्यकताओं की पूर्ति– किशोरावस्था तनाव व तूफान की अवस्था है। विद्यार्थी की मानसिक दशा अत्यंत भावुक हो उठती है उसे अनेक प्रकार के मानसिक विकार घेर लेते हैं। इन क्रियाओं के द्वारा बालक की संपूर्ण शक्ति को रचनात्मक कार्यों में लगाकर शोधित किया जा सकता है।
  5. अवकाश के समय का सदुपयोग– पाठ्य सहगामी क्रियाओं के माध्यम से बालक अपनी रुचि अनुसार कार्यों को कर सकता है। वह अतिरिक्त समय में वाद विवाद, खेलकूद आदि करके समय का सदुपयोग सीखता है।
  6. विद्यार्थियों की रुचि का विकास– रुचि सीखने की प्रक्रिया का आधार है। विभिन्न प्रकार की पाठ्य सहगामी क्रियाएं विद्यार्थियों में कुछ विशेष रूचि यों को उत्पन्न करने में बहुत सहायक है। यह विभिन्न रुचियां व कुशलताएं विद्यार्थी के जीवन को सफल बनाती हैं।
  7. शारीरिक विकास– पाठ्य सहगामी क्रियाएं विद्यार्थियों के शारीरिक विकास में सहायक है, खेलकूद, तैराकी, एनसीसी, ड्रिल तथा परेड आदि स्वस्थ शारीरिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
  8. नेतृत्व की भावना का विकास– पाठ्य सहगामी क्रियाओं के द्वारा विद्यार्थियों में धैर्य आत्मविश्वास साहस कार्य के प्रति उत्साह विश्वास तथा तत्परता की भावना का विकास होता है।
  9. मनोरंजन प्रदान करना– कक्षा के वातावरण को रुचिकर बनाने में पाठ्य सहगामी क्रियाएं सहायक है। विद्यार्थियों में श्रम के प्रति नया दृष्टिकोण उत्पन्न होता है। वे प्रसन्नता पूर्वक स्वयं करके सीखता है।

अतः विद्यालय में पाठ्य सहगामी क्रियाओं का बहुत महत्व है, इनके द्वारा व्यक्तित्व का संतुलित व सर्वांगीण विकास होता है। यह क्रियाएं पाठ्यक्रम की पूरक तथा आवश्यक अंग है।

पाठ्यक्रम अर्थ परिभाषा आवश्यकता महत्वपाठ्यक्रम का क्षेत्र
पाठ्यक्रम का आधारपाठ्यक्रम के लाभ
पाठ्य सहगामी क्रियाएंशैक्षिक उद्देश्य स्रोत आवश्यकता
मूल्यांकन की विशेषताएंपाठ्यक्रम के उद्देश्य
प्रभावशाली शिक्षणअच्छे शिक्षण की विशेषताएं

पाठ्यक्रम के लाभ

पाठ्यक्रम के लाभ – पाठ्यक्रम शिक्षा का एक अभिन्न अंग है, जिसके द्वारा शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति होती है। शिक्षा के संपूर्ण क्षेत्र में इसका एक विशेष स्थान है, जो उद्देश्यों एवं आदर्शों के निर्धारण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह एक ऐसा साधन है जो छात्र एवं अध्यापक को जोड़ता है। अध्यापक पाठ्यक्रम के माध्यम से छात्रों के मानसिक, शारीरिक, नैतिक, सांस्कृतिक, संवेगात्मक, आध्यात्मिक तथा सामाजिक विकास के लिए प्रयास करता है।

पाठ्यक्रम द्वारा छात्रों को प्रशिक्षण एवं अध्यापकों को दिशा-निर्देश के अवसर प्राप्त होते हैं। पाठ्यक्रम एक प्रकार से अध्यापक के पश्चात छात्रों के लिए दूसरा पथ प्रदर्शक है। पाठ्यक्रम में विषयों के साथ-साथ स्कूल के सारे कार्यक्रम आते हैं। शिक्षालय में होने वाले समस्त कार्यक्रम का आधार पाठ्यक्रम ही है। यदि पाठ्यक्रम को शिक्षा का प्राण कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।

पाठ्यक्रम के लाभ

पाठ्यक्रम के लाभ

कुछ विद्वानों ने तो इसे शिक्षा एवं विद्यालय का दर्शनशास्त्र भी कहा है। इस के इस महत्व को देखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि इसका नियोजन वैज्ञानिक रीति से किया जाए। ऐसा होने पर ही विद्यालय का कार्य सुचारु रुप से चल सकता है। पाठ्यक्रम शिक्षण की निपुणता उसके उद्देश्यों और सामाजिक आवश्यकताओं के प्रति उसकी उपयुक्तता निर्धारित करता है।

पाठ्यक्रम के अनेक लाभों में कुछ पाठ्यक्रम के लाभ निम्न हैं-

  1. शिक्षा की प्रक्रिया का व्यवस्थित होना
  2. शिक्षा का स्तर समान रहना
  3. उद्देश्यों की प्राप्ति संभव होती है
  4. समय और शक्ति का सदुपयोग होना
  5. मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति होना

1. शिक्षा की प्रक्रिया का व्यवस्थित होना

पाठ्यक्रम एक ऐसा लेखा-जोखा है, जिसमें यह स्पष्ट किया जाता है कि शिक्षा के किस स्तर पर जैसे पूर्व प्राथमिक, प्राथमिक, माध्यमिक आदि विद्यालयों में किन पांच विषयों का कितना ज्ञान एवं किन क्रियाओं में कितनी दक्षता का विकास किया जाएगा। इस प्रकार निश्चित पाठ्यक्रम शिक्षा की क्रिया को व्यवस्थित करता है।

2. शिक्षा का स्तर समान रहना

निश्चित पाठ्यक्रम से पूरे समाज की शिक्षा का स्तर समान रहता है। जिसके परिणाम स्वरूप हमें शिक्षा में सुधार की सही दिशा प्राप्त होती है। अनिश्चित पाठ्यक्रम की स्थिति में हम शिक्षा के स्तर के उठने तथा गिरने के कारणों का पता नहीं लगा सकते और उस स्थिति में शिक्षा में सुधार नहीं किया जा सकता।

3. उद्देश्यों की प्राप्ति संभव होती है

पाठ्यक्रम का निर्माण उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किया जाता है। यदि पाठ्यक्रम को सुचारू रूप से पूरा किया जाता है, तो शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति होती है। इस संदर्भ में हमें यह बात जान लेनी चाहिए कि यदि कोई निश्चित पाठ्यक्रम हो तो हम यह नहीं जान पाते कि किन विषयों के ज्ञान और किन क्रियाओं के प्रशिक्षण से हम अपने उद्देश्यों की प्राप्ति कर रहे हैं और कौन सी क्रियाएं निरर्थक हैं।

पाठ्यक्रम के लाभ

4. समय और शक्ति का सदुपयोग होना

निश्चित पाठ्यक्रम अध्यापक और विद्यार्थी दोनों के कार्य को निश्चित कर देता है। इससे अध्यापकों को यह पता रहता है कि उन्हें विद्यार्थियों को क्या सिखाने में सहायता करनी है और विद्यार्थियों को यह पता रहता है कि उन्हें क्या सीखना है। अध्यापक अथवा विद्यार्थी किसी की भी भटकने की गुंजाइश नहीं रहती। परिणामत: शिक्षा की प्रक्रिया बड़ी सुचारू रूप से चलती है और अध्यापक तथा विद्यार्थी दोनों ही निश्चित समय में निश्चित कार्यों को पूरा करते हैं। इससे समय और शक्ति दोनों का सदुपयोग होता है।

5. मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति होना

निश्चित पाठ्यक्रम से बच्चों की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो सप्रयोजन क्रियाओं में रुचि लेता है और ऐसा कार्य करना चाहता है जिससे उसकी वर्तमान आवश्यकता ओं की पूर्ति होती है और भावी आवश्यकता की पूर्ति की संभावना बढ़ती है। पाठ्यक्रम का निर्माण इन बातों को ध्यान में रखकर ही किया जाता है। इसलिए बच्चे उसे पूरा करने में रुचि दिखाते हैं। इसके अतिरिक्त जब बच्चे एक निश्चित कार्य को एक निश्चित समय में पूरा कर लेते हैं, तो उन्हें बड़ी प्रसन्नता होती है और वह उत्साह से आगे बढ़ते हैं।

पाठ्यक्रम अर्थ परिभाषा आवश्यकता महत्वपाठ्यक्रम का क्षेत्र
पाठ्यक्रम का आधारपाठ्यक्रम के लाभ
पाठ्य सहगामी क्रियाएंशैक्षिक उद्देश्य स्रोत आवश्यकता
मूल्यांकन की विशेषताएंपाठ्यक्रम के उद्देश्य
प्रभावशाली शिक्षणअच्छे शिक्षण की विशेषताएं

पाठ्यक्रम का आधार

पाठ्यक्रम का आधार – मानव जीवन में शिक्षा का अद्वितीय महत्व है। शिक्षा के अभाव में मानव को मानव कह पाना असंभव होगा। शिक्षा के अभाव में मनुष्य केवल प्राणी मात्र रह सकता है, मानव या इंसान नहीं। शिक्षा प्राप्त करके ही व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी बनता है। शिक्षा एक जटिल एवं व्यापक प्रक्रिया है जो जीवन पर्यंत चलती रहती है। शिक्षा द्वारा ही व्यक्ति अपनी अपरिपक्वता को परिपक्वता, बर्बरता को सभ्यता तथा पाश्विकता को मानवता में परिवर्तित करता है।

पाठ्यक्रम का आधार

शिक्षा प्रक्रिया में पाठ्यक्रम का एक महत्वपूर्ण स्थान है और यह पाठ्यक्रम समय-समय पर अपने तत्कालीन समाज की दशाओं एवं परिवर्तनों से प्रभावित होता रहता है। पाठ्यक्रम निर्माण एवं विकास की प्रक्रिया अनेकों तथ्यों व सिद्धांतों पर निर्भर करती है। अध्ययन की सुविधा के लिए पाठ्यक्रम के प्रमुख आधारों को निम्न रूपों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. दार्शनिक आधार
  2. मनोवैज्ञानिक आधार
  3. ऐतिहासिक आधार
  4. सामाजिक आधार
  5. सांस्कृतिक आधार
  6. वैज्ञानिक आधार
पाठ्यक्रम का आधार

1. दार्शनिक आधार

प्रसिद्ध विद्वान एवं दार्शनिक अरस्तु के मतानुसार “दर्शन एक ऐसा विज्ञान है जो परम तत्व के यथार्थ स्वरूप की जांच करता है।”

ब्राइटमैन के शब्दों में “दर्शन की परिभाषा एक ऐसे प्रयास के रूप में दी जा सकती है, जिसके द्वारा संपूर्ण मानव अनुभूतियों के विषय में सत्यता से विचार किया जाता है अथवा जिसके द्वारा हम अपने अनुभव का वास्तविक सार जानते हैं।”

फिक्टे के शब्दों में, “दर्शन ज्ञान का विज्ञान है”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि दर्शन शास्त्र की प्रकृति वैज्ञानिक है तथा दर्शन का संबंध मानव जीवन की अनुभूतियों से है। दर्शन व शिक्षा में घनिष्ठ संबंध है। शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियां व अनुशासन व्यवस्था आदि सभी पक्ष समसामयिक दर्शन से प्रभावित होते हैं।

पाठ्यक्रम का तो मेरुदंड ही दर्शन है। बालक को क्या पढ़ाना चाहिए और क्या नहीं पढ़ाया जाए? इस प्रश्न का उत्तर व्यक्ति व समाज की दार्शनिक मान्यता के अनुरूप ही तय किया जाता है। शिक्षा की पाठ्यचर्या का निर्धारण शिक्षा के उद्देश्यों के अनुरूप किया जाता है। भिन्न भिन्न प्रकार के उद्देश्यों के अनुसार पाठ्यक्रम भी बदलता रहता है। यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि शिक्षा की पाठ्यचर्या पर दर्शन का प्रभाव पड़े। एक समय था जब भारत में शिक्षा का उद्देश्य आत्मानुभूति था। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उस काल के पाठ्यक्रम में धर्म शास्त्र एवं नीति शास्त्र के अध्ययन तथा इंद्रीय निग्रह को अधिक महत्व दिया जाता था।

इससे भिन्न आधुनिक युग में, जबकि शिक्षा के भौतिकवादी उद्देश्य अत्यधिक प्रबल हैं, तब हमारे शैक्षिक पाठ्यक्रम में तकनीकी ज्ञान, प्रशिक्षण एवं भौतिक विज्ञान को अधिक महत्व दिया जा रहा है।

पाठ्यक्रम का आधार
पाठ्यक्रम का आधार

दर्शनशास्त्र न केवल शिक्षा के लिए उसके पाठ्यक्रम के निर्धारण में योगदान देता है, अपितु दर्शन ही पाठ्य विषयों की संख्या का भी निर्धारण करता है। इसका कारण यह है कि जब समाज में विभिन्न प्रकार की परिस्थितियां आवश्यकताएं व आदर्श उत्पन्न हो जाते हैं, तो उन्हीं के अनुकूल शिक्षा के उद्देश्यों में भी वृद्धि करनी पड़ती है। शिक्षा के उद्देश्यों में वृद्धि के कारण उनकी पूर्ति के लिए पाठ्य विषयों में भी वृद्धि करनी पड़ती है। आज के भौतिकवादी युग में मानवीयता की उपेक्षा न हो, इसलिए इंजीनियरिंग आदि के प्रशिक्षण में मानवीय विज्ञान को भी स्थान दिया जाने लगा है। यह दर्शनशास्त्र द्वारा ही निश्चित हुआ है।

देश और काल के परिवर्तन के फल स्वरुप अभी तक जिन विभिन्न विचारधाराओं का अभ्युदय हुआ है, उनमें प्रमुख विचारधाराएं निम्न है-

  1. आदर्शवाद
  2. प्रकृतिवाद
  3. प्रयोजनवाद
  4. यथार्थवाद
  5. अस्तित्ववाद

2. मनोवैज्ञानिक आधार

वर्तमान समय में शिक्षा के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्व बढ़ता जा रहा है, आधुनिक मनोविज्ञान ही बताता है कि प्रत्येक बालक के विकास की विभिन्न अवस्थाएं होती हैं, जैसे बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था आदि। इन्हीं अवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए बालकों को शिक्षित किया जाना चाहिए। विकास की विभिन्न अवस्थाओं के ज्ञान के अभाव में बालक एक सी‌ व नीरस शिक्षा प्राप्त करते रहते व अपना सर्वांगीण विकास करने में असमर्थ रहते हैं।

शिक्षा में मनोविज्ञान के समावेश के परिणाम स्वरूप अब बालकेंद्रित शिक्षा पर बल दिया जाने लगा है। पाठ्यक्रम का निर्धारण भी बालक को केंद्र बनाकर किया जाता है। आधुनिक मनोवैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार संपूर्ण शिक्षा प्रणाली का केंद्र बालक को होना चाहिए। प्राचीन दृष्टिकोण के अनुसार शिक्षा प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु शिक्षक को माना जाता था व छात्र को गौण स्थान प्राप्त था। शिक्षा की समस्त प्रक्रिया शिक्षा के चारों ओर घूमती रहती है परंतु वर्तमान शिक्षा प्रक्रिया छात्र के चारों ओर घूमती है व छात्र के अनुकूल कार्य करती है।

पाठ्यक्रम का आधार

3. ऐतिहासिक आधार

शिक्षा एवं इतिहास का निकट संबंध है। शिक्षाशास्त्र समाज की आवश्यकतानुसार शिक्षा की व्यवस्था करने का कार्य करता है। साथ ही वह समाज की शिक्षा संबंधी समस्याओं का निवारण करने का प्रयत्न करता है। परंतु वह यह कार्य अकेले संपन्न नहीं कर सकता। अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उपाय व साधन ढूंढने और योजनाएं बनाने में उसे इतिहास के अध्ययन से पर्याप्त सहायता मिलती है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के लिए इतिहास का ज्ञान आवश्यक है। इतिहास के द्वारा ही यह जाना जा सकता है कि पूर्व काल में शिक्षा की क्या व्यवस्था थी और तत्कालीन समाज के लिए यह कहां तक उपयोगी थी। इस प्रकार इतिहास के अध्ययन के द्वारा ही यह ज्ञात हो सकता है कि पूर्व कालीन समाज की शैक्षिक समस्याएं क्या क्या थी। समस्याओं के स्वरूप के अतिरिक्त इतिहास के अध्ययन द्वारा यह भी ज्ञात होता है कि उनके निवास के लिए क्या-क्या प्रयत्न किए गए और उन प्रयत्नो को कहां तक सफलता प्राप्त हुई।

पूर्व कालीन पाठ्यक्रम में जो दोष बा कमियां थी उन्हें इतिहास के अध्ययन द्वारा वर्तमान में दोहराने से बचने का प्रयास किया जाता है।

4. सामाजिक आधार

मानव स्वभाव से ही एक सामाजिक प्राणी है। उनका जन्म तथा विकास समाज में होता है। शिक्षा व्यक्ति को सामाजिक प्राणी बनाती है और समाज शिक्षा के लिए आधार प्रस्तुत करता है। अन्य शब्दों में, शिक्षा एवं सामाजिक जीवन की धारणा में गहरा संबंध है। एक के अभाव में दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती है। समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है जो कि समाजशास्त्री सिद्धांतों को एवं शिक्षा की समग्र प्रक्रिया को व्यावहारिक रूप देता है। इस प्रक्रिया में पाठ्यक्रम, विषय वस्तु, क्रियाएं, शिक्षालय संगठन, विधियां तथा मूल्यांकन सभी सम्मिलित हैं।

ओटावे के मतानुसार, “शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है।” इसकी विधि और इसके लक्ष्य समाज विशेष की मान्यताओं के अनुसार तय होते हैं। जॉन डेवी ने भी सामाजिक चेतना को शैक्षिक विकास का आधार माना है। ब्राउन ने भी इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कहा है कि समूह की सामाजिक चेतना में व्यक्ति का योगदान शिक्षा व समाज के मिले-जुले प्रयासों के कारण ही संभव है।

पाठ्यक्रम का आधार

इस प्रकार स्पष्ट है कि शिक्षा एवं समाजशास्त्र के मध्य गहरा संबंध है। समाजशास्त्र शिक्षाशास्त्र को प्रभावित तत्व प्रदान करता है। इसका कारण है कि समाजशास्त्र में शिक्षा के सामाजिक प्रभावों तथा मनुष्य के जीवन में उसकी गतिशीलता का अध्ययन किया जाता है। दूसरी और शिक्षा शास्त्र में समाज में व शिक्षा के स्वरूप तथा व्यक्तित्व विकास में योगदान आदि कारको का अध्ययन किया जाता है।

5. सांस्कृतिक आधार

समाज की जैसी संस्कृति होती है, उसी के अनुरूप शिक्षा की व्यवस्था की जाती है। जहां की संस्कृत में धर्म तथा आध्यात्मिक भावना प्रधान होती है, वहां पर शिक्षा शाश्वत मूल्यों की प्राप्ति पर बल देती है। यदि समाज की संस्कृति का स्वरूप भौतिक होता है तो शिक्षा द्वारा भौतिक उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रयास किया जाता है। जिस समाज की कोई संस्कृति नहीं होती उसकी शिक्षा का स्वरूप भी अनिश्चित होता है। संस्कृति के द्वारा उसके समाज की शैक्षिक प्रक्रिया पर्याप्त सीमा तक प्रभावित होती है। संस्कृति द्वारा ही शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियां, विद्यालय एवं अनुशासन के स्वरूप का निर्धारण होता है।

शिक्षा के पाठ्यक्रम को भी संस्कृति अत्यंत प्रभावित करती है। क्योंकि समाज की संस्कृति शिक्षा के उद्देश्यों का निर्माण करती है और पाठ्यक्रम इन उद्देश्यों की प्राप्ति का साधन है। अत: पाठ्यक्रम समाज की संस्कृति पर ही आधारित होता है। चूंकि विद्यालय समाज का लघु रूप है। इसलिए समाज में फैली हुई संस्कृति विद्यालयों में दिखाई देती है। इस दृष्टि से विद्यालय समाज की संस्कृति के केंद्र होते हैं। संस्कृति शिक्षक, शिक्षार्थी, शिक्षण विधि और अनुशासन व्यवस्था पर भी व्यापक प्रभाव डालती है।

इसी प्रकार नारी शिक्षा, सह शिक्षा, और शिक्षा आदि शैक्षिक समस्याओं के विषय में निर्णय भी संस्कृत के आधार पर किए जाते हैं।

पाठ्यक्रम का आधार

6. वैज्ञानिक आधार

वर्तमान में विज्ञान की महत्ता सर्वोपरि है। विज्ञान और सभ्यता एवं संस्कृति का पर्याय बन चुका है। शिक्षा के क्षेत्र में भी विज्ञान का बढ़ता प्रभाव एवं महत्त्व सरलता से देखा जा सकता है। अधिकांश विद्यार्थियों ने पाठ्यक्रम में विज्ञान एवं तकनीकी विषयों में समावेश पर बल दिया है ताकि बालक, समाज व पूरे देश का दृष्टिकोण वैज्ञानिक बन सके।

पाठ्यक्रम में वैज्ञानिक विषयों के महत्वपूर्ण स्थान पर बल दिया जाए इस विचार के मुख्य प्रतिपादक हरबर्ट स्पेंसर हैं। उन्होंने माना है कि शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य पूर्ण जीवन की तैयारी है और इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने पाठ्यक्रम में वैज्ञानिक विषयों के सम्मिलित किए जाने पर बल दिया है। उन्होंने बालकों के अध्ययन के लिए शरीर विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, भाषा, गणित, पदार्थ विज्ञान, मनोविज्ञान, सामाजिक विज्ञान, राजनीतिकशास्त्र व अर्थशास्त्र आदि विषयों की सिफारिश की है।

सामान्यतः विज्ञान के तीन प्रमुख अंग माने जाते हैं।

  1. भौतिक विज्ञान
  2. रसायन विज्ञान
  3. जीव विज्ञान
पाठ्यक्रम अर्थ परिभाषा आवश्यकता महत्वपाठ्यक्रम का क्षेत्र
पाठ्यक्रम का आधारपाठ्यक्रम के लाभ
पाठ्य सहगामी क्रियाएंशैक्षिक उद्देश्य स्रोत आवश्यकता
मूल्यांकन की विशेषताएंपाठ्यक्रम के उद्देश्य
प्रभावशाली शिक्षणअच्छे शिक्षण की विशेषताएं

पाठ्यक्रम अर्थ परिभाषा आवश्यकता महत्व

पाठ्यक्रम – शिक्षा एक व्यापक एवं गतिशील प्रक्रिया है। यह मानव विकास की आधारशिला है। यह एक जीवन पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति के व्यवहार में लगातार परिवर्तन होता रहता है। शिक्षा प्रकाश का वह स्रोत है जिससे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हमारा सच्चा पथ प्रदर्शन होता रहता है। इसे मनुष्य का तीसरा नेत्र भी कहा गया है जो मनुष्य को समस्त तत्वों के मूल को समझने की क्षमता प्रदान करता है तथा उसे उचित व्यवहार करने के लिए तैयार करता है।

शिक्षा मनुष्य के जीवन को सार्थक बनाने के लिए अत्यंत आवश्यक है। भारत की तरह विश्व की अन्य संस्थाओं में भी प्रारंभ से ही शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान मिला है। अरस्तू ने इस विषय में ठीक ही लिखा है-

शिक्षित व्यक्ति अशिक्षित व्यक्तियों से उतने ही श्रेष्ठ होते हैं, जितने जीवित मृतकों से।

शिक्षा आदि काल से ही किसी ना किसी रूप में दी जाती रही है। सर्वप्रथम शिक्षा बालक को उसके माता-पिता द्वारा दी जाती थी और वही बालक को जीवन की विभिन्न परिस्थितियों से अवगत कराते थे। परंतु धीरे-धीरे समाज में ज्ञानार्जन की भावना बढ़ी।

पाठ्यक्रम
पाठ्यक्रम

समाज का स्थान गौण हो गया तथा समाज में शिक्षा का अनुभव किया जाने लगा। साथ ही इस बात की आवश्यकता अनुभव होने लगी कि शिक्षा विशेष व्यक्तियों द्वारा विशेष स्थानों पर ही प्रदान की जाए। इस प्रकार शिक्षक तथा विद्यालयों का विकास हुआ। इस प्रकार शिक्षक एवं विद्यालय शिक्षा के औपचारिक माध्यमों के अंतर्गत आते हैं, क्योंकि नियोजन कुछ निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए व्यवस्थित ढंग से सन्स्थापित संस्थाओं में किया जाता है।

साथ ही इसके ठीक विपरीत ऐसी परिस्थितियां जो व्यक्ति को शिक्षित करती हैं तथा साथ ही व्यवहार परिवर्तन करने में सहायक होती हैं वह शिक्षा के अनौपचारिक साधनों में गिनी जाती है।

विद्यालय में शिक्षा के कुछ विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए योजनाबद्ध व सुनियोजित ढंग से ज्ञान प्रदान किया जाता है। यह उद्देश्य व्यक्ति के व्यवहार परिवर्तन के ढंग, मात्रा, दिशा, साधनों आदि से संबंधित हो सकते हैं। यह सभी उद्देश्य किसी विशेष माध्यम से ही पूर्ण किए जा सकते हैं तथा इन माध्यमों में सर्वाधिक उपयुक्त व महत्वपूर्ण नाम पाठ्यक्रम आता है।

इस प्रकार कुछ निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए व्यवस्थित ढंग से नियोजित किए जाने के कारण पाठ्यक्रम को शिक्षा के एक औपचारिक माध्यम के रूप में देखा गया है।

पाठ्यक्रम शाब्दिक अर्थ

पाठ्यक्रम शब्द आंग्ल भाषा के Curriculum शब्द का हिंदी रूपांतरण है तथा आंग्ल भाषा का Curriculum शब्द लैटिन भाषा के Currere शब्द से बना है, जिसका अर्थ है दौड़ का मैदान।

यदि हम पाठ्यक्रम के शाब्दिक अर्थ पर विचार करें तो हमें ज्ञात होता है कि पाठ्यक्रम एक मार्ग है, जिस पर चलकर बालक अपने शिक्षा प्राप्त के लक्ष्य को पूर्ण करते हैं। दूसरे शब्दों में, शिक्षा एक गॉड है जो पाठ्यक्रम के मार्ग पर दौड़ी जाती है और इसके द्वारा बच्चे का सर्वांगीण विकास करने का लक्ष्य प्राप्त किया जाता है। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि पाठ्यक्रम एक ऐसा दौड़ का मैदान है अथवा ऐसा साधन है जिसके द्वारा शिक्षक व जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति होती है।

पाठ्यक्रम
पाठ्यक्रम

पाठ्यक्रम की परिभाषाएं

प्राचीन काल में पाठ्यक्रम को पाठ्यवस्तु का पर्यायवाची माना जाता था। इस दृष्टिकोण से पाठ्यक्रम का क्षेत्र बहुत ही सीमित, संकुचित व मौखिक प्रकृति का होता था। प्राचीन समय में शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान के कुछ क्षेत्रों व कुशलताओं पर अधिकार करा देना मात्र समझा जाता था। इस प्रकार पाठ्यक्रम के प्राचीन मतानुसार कुछ परिभाषाएं निम्न है-

पाठ्यक्रम शिक्षक के हाथ में एक साधन है जिससे वह अपनी सामग्री को अपने आदर्श के अनुसार अपनी चित्रशाला में ढाल सके।

कनिंघम

पाठ्यक्रम स्कूलों में निर्देशन के कार्य के लिए एक निश्चित क्रम में व्यवस्थित किए गए विषयों के समूह अथवा अध्ययन की विषय वस्तु के रूप में जाना गया है।

डा. सफाया

पाठ्यक्रम को मानव जाति के संपूर्ण ज्ञान तथा अनुभव का सार समझना चाहिए।

फ्रोबेल

पाठ्यक्रम में वे समस्त अनुभव निहित हैं जिनको विद्यालय द्वारा शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए उपयोग में लाया जाता है।

मुनरो

पाठ्यक्रम में वे सभी क्रियाएं आती हैं जो स्कूल में विद्यार्थियों को दी जाती हैं।

हेनरी

विद्यालय में बालकों के शैक्षिक अनुभव के लिए एक सामाजिक समूह की रूपरेखा पाठ्यक्रम कहलाता है।

व्यूसैम्प

पाठ्यक्रम की उपरोक्त सभी परिभाषाओं का विवेचन करने के बाद निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि पाठ्यक्रम का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है। यह छात्र के जीवन के सभी पहलुओं को स्पष्ट करता है फिर चाहे वह शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, धार्मिक, राष्ट्रीय, बौद्धिक या नैतिक किसी से भी जुड़े हो। वर्तमान समय में पाठ्यक्रम शिक्षकों को गॉड स्थान देकर तथा विद्यार्थी की क्षमताओं एवं अभिरुचियों को केंद्र में रखकर बनाया जाता है।

इसका ध्येय बालक का सर्वांगीण विकास करना एवं बालक को इस योग्य बनाना होता है कि वह अपने साथ साथ अपने समाज समुदाय व देश का भी विकास व उद्धार कर सके।

प्रत्येक विद्यालय में शिक्षा के निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कुछ विशेष साधनों का उपयोग किया जाता है। पाठ्यक्रम भी एक ऐसा ही साधन है जिसकी सहायता से प्रत्येक विद्यार्थी को उसके समय के सदुपयोग एवं ज्ञानार्जन की दिशा में सजग रखा जा सकता है। इसके साथ ही साथ शिक्षकों को भी उनके कर्तव्यों की पूर्ति हेतु सही दिशा मिलती रहती है।

इस प्रकार शिक्षा की प्रक्रिया में पाठ्यक्रम का विशेष महत्व है। पाठ्यक्रम ही संपूर्ण शिक्षण क्रिया का आधार होता है। पाठ्यक्रम के अभाव में शिक्षण कार्य न तो सफलतापूर्वक संपन्न हो सकता है और न ही अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि शैक्षिक प्रक्रिया में पाठ्यक्रम केंद्र बिंदु का कार्य करता है, जिसके चारों ओर शिक्षक एवं शिक्षार्थीगण अपने कर्तव्यों की पूर्ति व उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।

पाठ्यक्रम आवश्यकता महत्व

पाठ्यक्रम के द्वारा ही विद्यालय का कार्य संगठित व संतुलित रूप से चल सकता है। पाठ्यक्रम का महत्व उसके द्वारा संपादित किए जाने वाले कार्यों के रूप में समझा जा सकता है। संक्षेप में पाठ्यक्रम की आवश्यकता महत्व इस प्रकार है-

  1. शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक
  2. शिक्षण सामग्री के निर्धारण में सहायक
  3. शिक्षण विधियों के निर्धारण में सहायक
  4. विषय सामग्री के विभाजन में सहायक
  5. चरित्र निर्माण में सहायक
  6. व्यक्तित्व के विकास में सहायक
  7. अनुसंधान एवं अविष्कार में सहायक
  8. दर्शन एवं शिक्षा की प्रवृत्तियों को दर्शाने में सहायक
  9. तत्कालीन घटनाओं के ज्ञान में सहायक

1. शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक

प्रत्येक अवधारणा का निर्माण कुछ निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है। उद्देश्यों के अभाव में कोई भी प्रक्रिया सही मार्ग पर नहीं चल सकती है। शिक्षण प्रक्रिया के संबंध में भी यह बात सत्य सिद्ध होती है। बिना उद्देश्यों के चलने वाली शिक्षण प्रक्रिया ठीक उसी प्रकार होती है जैसे पतवार के बिना नाव।

इन उद्देश्यों को प्राप्त करने में पाठ्यक्रम ही सहायता करता है। यह एक ऐसा साधन है जिसके माध्यम से हम शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं तथा उपयुक्त पाठ्यक्रम के अभाव में हम शिक्षा के उद्देश्य प्राप्त करने के बारे में कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

2. शिक्षण सामग्री के निर्धारण में सहायक

प्रत्येक विद्यालय में शिक्षा व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए समय सारणी का निर्माण किया जाता है। जिसके अंतर्गत प्रत्येक विषय के लिए निश्चित समय का आवंटन किया जाता है। इस प्रकार प्रत्येक विषय एवं विषय वस्तु का शिक्षा प्रक्रिया में विशेष महत्व है।

तक शिक्षक व शिक्षार्थी विषय वस्तु या अध्ययन वस्तु से अनभिज्ञ रहते हैं तथा इस बात का उन्हें ज्ञान नहीं होता कि उन्हें क्या पढ़ना है, तब तक वह अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने की दिशा भी प्राप्त नहीं कर सकते। इस प्रकार पाठ्यक्रम ही शिक्षण सामग्री के निर्धारण में सहायक होता है।

3. शिक्षण विधियों के निर्धारण में सहायक

सफल शिक्षण के लिए यह आवश्यक है कि अध्यापक को उचित शिक्षण विधियों का ज्ञान हो। यह ज्ञान अध्यापक को पाठ्यक्रम ही प्रदान करता है। पाठ्यक्रम ही विभिन्न कक्षाओं के लिए विभिन्न प्रकार की शिक्षण सामग्री ओं का निर्धारण करता है तथा उन विभिन्न प्रकार की शिक्षण सामग्रियों के लिए विभिन्न प्रकार की शिक्षण विधियों का निरूपण करता है। प्रत्येक विषय को पढ़ाने के लिए अलग-अलग प्रकार की शिक्षण विधियों का प्रयोग किया जाता है। पाठ्यक्रम के अभाव में शिक्षक को इस बात का ज्ञान नहीं हो सकता है कि किस कक्षा में किस प्रकार की विषय वस्तु को किस विधि से पढ़ाना है। इस प्रकार पाठ्यक्रम शिक्षण विधियों के निर्धारण में सहायक होता है।

4. विषय सामग्री के विभाजन में सहायक

पाठ्यक्रम की विषय सामग्री का निर्धारण करता है तथा साथ ही साथ इस बात का भी निर्धारण करता है कि वह विषय वस्तु विभिन्न स्तरों के अनुरूप किस प्रकार की हो। पाठ्यक्रम छोटी कक्षाओं के लिए सरल व रोचक विषय वस्तु का सुझाव देता है। माध्यमिक कक्षाओं के लिए तर्कपूर्ण व ज्ञानवर्धक अध्ययन वस्तु का निर्देशन करता है तथा कुछ कक्षाओं के लिए गहन व चिंतनशील तथा प्रयोगात्मक अध्ययनक्रम की रूपरेखा रखता है।

विभिन्न स्तरों के अनुरूप विषय वस्तु का विभाजन वैज्ञानिक एवं उचित ढंग से करने में पाठ्यक्रम ही सहायता करता है। पाठ्यक्रम के अभाव में ऐसा तर्क सम्मत विभाजन होना संभव नहीं है।

5. चरित्र निर्माण में सहायक

जैसा कि हमें ज्ञात है कि पाठ्यक्रम एक व्यापक व वृहद अवधारणा है। इसके अंतर्गत केवल पाठ्य विषय ही नहीं बल्कि विभिन्न पाठ्य सहायक गतिविधियां व पाठ्येत्तर क्रियाकलाप भी सम्मिलित होते हैं। इसके अंतर्गत अनेक खेलों का आयोजन, एनसीसी व स्काउटिंग का निर्धारण तथा विभिन्न पर्वों का विशेष महत्व के दिवसों का आयोजन किया जाता है।

जिसका उद्देश्य बालकों का चरित्र निर्माण एवं उचित नागरिकता का विकास करना है। इस प्रकार उचित पाठ्यक्रम चरित्र विकास में सहायक होता है। दूसरे शब्दों में चरित्र निर्माण व नागरिकता के लिए उत्तम गुणों का विकास पाठ्यक्रम के द्वारा ही संभव है।

6. व्यक्तित्व के विकास में सहायक

बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने में पाठ्यक्रम अपना पूर्ण योगदान करता है। व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू होते हैं यथा शारीरिक मानसिक सामाजिक बौद्धिक नैतिक आध्यात्मिक व्यावसायिक तथा सांस्कृतिक आदि।

पाठ्यक्रम विभिन्न खेलकूद की प्रवृत्तियों द्वारा शारीरिक विकास करता है। विभिन्न पाठ्य सहायक गतिविधियों द्वारा नैतिक आध्यात्मिक व सांस्कृतिक विकास करता है तथा आवश्यक विषयों के ज्ञान एवं सही दिशा निर्देशन के द्वारा व्यावसायिक विकास करता है। इस प्रकार पाठ्यक्रम बालक के व्यक्तित्व के विकास में सहायता करता है।

7. अनुसंधान एवं आविष्कार में सहायक

जैसा कि हमें पूर्वविदित है, पाठ्यक्रम केवल अध्ययन वस्तु तक ही सीमित न होकर एक व्यापक अवधारणा है। वर्तमान पाठ्यक्रम में बालक को केंद्र बनाकर भावी जीवन की तैयारी के उद्देश्य से सभी आवश्यक कार्यक्रमों को संगठित किया जाता है। यह जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित करके उनके संतुलित विकास में सहायता करता है।

पाठ्यक्रम उन अनुभवों क्रियाओं तथा जीवन की उन परिस्थितियों का योग है जिनके माध्यम से बालक ज्ञान अर्जित करता है। पाठ्यक्रम उच्च स्तर पर छात्रों का अनुसंधान एवं नित्य नवीन खोज करने के लिए विषय वस्तु, क्षमता एवं पूर्ण सहयोग प्रदान करता है।

8. दर्शन और शिक्षा की प्रवृत्तियों को दर्शाने में सहायक

भारत देश में अनेकों दर्शन की धाराएं प्रचलन में रही है। अनेकों दार्शनिक शिक्षक भी रहे हैं। जिनमें महात्मा गांधी, अरविंदो, रविंद्र नाथ टैगोर आदि। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अपने महत्वपूर्ण दार्शनिक विचार रखे। इन्होंने अपने विचारों द्वारा बालकों के लिए पाठ्यक्रम की अवधारणा का निरूपण किया, जिसमें इनके दार्शनिक विचारों की झलक प्राप्त होती है।

इसी प्रकार वैदिक काल से लेकर वर्तमान काल तक, गुलामी के समय तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शिक्षा व्यवस्था विभिन्न परिवर्तनों से गुजरी है, उन सब की भी झलक हमें पाठ्यक्रम द्वारा प्राप्त होती है। इस प्रकार पाठ्यक्रम शिक्षा की विभिन्न प्रवृत्तियों तथा विभिन्न दर्शनों के परिवर्तनों को दर्शाता है।

9. तत्कालीन घटनाओं के ज्ञान में सहायक

वर्तमान युग में औद्योगिककरण का युग है। विज्ञान व तकनीकी अपने चरम पर है। देशों के मध्य की दूरियां घट रही हैं व उनके मध्य अनेकों संबंध व समझौते हो रहे हैं। विकसित व विकासशील दोनों ही प्रकार के देश अपने आप को सक्षम बनाने में जुटे हुए हैं। ऐसे में आज के युवक-युवतियों के लिए यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि उन्हें वर्तमान युग की तत्कालीन घटनाओं का पूर्ण व सटीक ज्ञान हो।

इन उद्देश्यों की प्राप्ति वर्तमान पाठ्यक्रम के द्वारा की जा सकती है। अपने सामाजिक व भौतिक वातावरण की समझ प्रदान करने के लिए अनेकों विषयों व पाठ्येत्तर क्रियाओं का सहारा लिया जाता है, देश विदेश की विभिन्न घटनाओं से अवगत कराया जाता है, तथा पाठ्यक्रम के द्वारा उन्हें प्रत्येक भौतिक व सामाजिक परिस्थितियों से परिचित कराया जाता है। ताकि बालक अपने आप को तेजी से बदलते हुए भौतिक परिवेश में ढाल सके तथा भावी जीवन के लिए तैयार होकर अपने देश व समाज को सक्षम बना सके।

उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि पाठ्यक्रम अनेकों महत्वपूर्ण कार्य संपादित करता है। पाठ्यक्रम का संपूर्ण शिक्षा प्रक्रिया में अपना एक विशिष्ट महत्व है। उपरोक्त कार्यों को करने के कारण इसकी उपयोगिता स्पष्ट हो जाती है। पाठ्यक्रम के द्वारा ही शिक्षण अधिगम की प्रक्रिया सुचारू रूप से चलती रहती है। इसके अभाव में ऐसा होना संभव नहीं है।

पाठ्यक्रम अर्थ परिभाषा आवश्यकता महत्वपाठ्यक्रम का क्षेत्र
पाठ्यक्रम का आधारपाठ्यक्रम के लाभ
पाठ्य सहगामी क्रियाएंशैक्षिक उद्देश्य स्रोत आवश्यकता
मूल्यांकन की विशेषताएंपाठ्यक्रम के उद्देश्य
प्रभावशाली शिक्षणअच्छे शिक्षण की विशेषताएं

पाठ्यक्रम का क्षेत्र

पाठ्यक्रम का क्षेत्र – यदि हम पाठ्यक्रम के इतिहास पर सरसरी नजर डालें तो स्पष्ट रूप से ज्ञात होता है कि प्रत्येक प्रकार का पाठ्यक्रम अपने समाज द्वारा निर्धारित शैक्षिक उद्देश्यों पर आधारित होता है। इसीलिए देश और काल की भिन्नता के अनुसार, वहां के पाठ्यक्रमों में भी भिन्नता पाई जाती है। उदाहरण स्वरूप वैदिक कालीन शिक्षा व्यवस्था शिक्षा के उद्देश्य बालकों का नैतिक विकास करना, पवित्रता और धार्मिकता का विकास करना, व्यक्तित्व का विकास करना, सामाजिक कुशलता में वृद्धि करना, संस्कृति का संरक्षण व विकास करना तथा चित्त वृत्तियों का निरोध करना आदि था।

इस उद्देश्य के अनुसार ही तत्कालीन पाठ्यक्रम में वैदिक मंत्रों का उच्चारण व स्मरण, भाषा साहित्य व व्याकरण, परविद्या एवं अपरा विद्या को प्रमुख स्थान दिया गया था। बालकों को व्यवसायिक शिक्षा के साथ-साथ सैनिक शिक्षा भी दी जाती थी। साथ ही औषधि शास्त्र का भी ज्ञान दिया जाता था। शिक्षा आश्रम व गुरुकुलों में दी जाती थी।

पाठ्यक्रम का क्षेत्र

इसी प्रकार बौद्ध कालीन शिक्षा के उद्देश्यों में चरित्र निर्माण, व्यक्तित्व का विकास, बौद्ध धर्म का प्रचार तथा जीवन के लिए तैयार करना आदि प्रमुख थे और इन्हीं के अनुसार बालकों को बौद्ध धर्म शास्त्रों का अध्ययन आयुर्वेद कला, शिल्प कला व सैनिक शिक्षा का अध्ययन कराया जाता था। छात्रों को मौन रहकर भिक्षाटन करना होता था। बालकों के शारीरिक विकास हेतु कुश्ती लड़ना, मुक्केबाजी करना, भूमि जोतना, तीर चलाना व रथों की दौड़ का आयोजन करने का प्रावधान था।

बौद्ध काल के पश्चात, भारत पर लगभग 300 वर्षों तक मुस्लिमकालीन शासन व्यवस्था बनी रही। उस समय इस्लाम धर्म व मुस्लिम संस्कृत के प्रसार चरित्र निर्माण तथा सांसारिक एश्वर्य की प्राप्ति को शिक्षा के प्रथम उद्देश्यों में स्थान दिया गया। तदनुसार ही पाठ्यक्रम में कुरान की आयतें, अरबी व फारसी भाषाओं, व्याकरण व पत्र लेखन को प्रमुख स्थान प्राप्त हुआ। साथ ही बालकों को हस्त कलाओं का ज्ञान, व्यवसाय ज्ञान, चिकित्सा शास्त्र का ज्ञान व सैनिक शिक्षा भी दी जाती रही।

पाठ्यक्रम का क्षेत्र

तत्पश्चात ब्रिटिश काल एवं स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात गठित अनेकों आयोगों के दौरान भी शिक्षा के उद्देश्य निर्धारित किए जाते रहे। वह उन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विभिन्न प्रकार का पाठ्यक्रम संगठित किया जाता रहा। इस प्रकार पाठ्यक्रम की व्यापक अवधारणा को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रम के क्षेत्र को सीमाओं में बांधना अत्यंत कठिन कार्य है। फिर भी कुछ शिक्षा शास्त्रियों ने पाठ्यक्रम का क्षेत्र को निम्न बिंदुओं में सीमांकित करने का प्रयास किया है-

पाठ्यक्रम का क्षेत्र
  1. शिक्षा के लक्ष्यों व उद्देश्यों का निर्धारण– जिस प्रकार शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पाठ्यक्रम का निर्माण किया जाता है, उसी प्रकार पाठ्यक्रम बालकों के लिए कुछ निश्चित उद्देश्यों का निर्धारण भी करता है तथा उन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए बालकों को प्रेरित करता है।
  2. नवीन प्रवृत्तियों का साहचर्य– पाठ्यक्रम एक व्यापक अवधारणा का रूप लेता जा रहा है अतः वर्तमान समय में प्रचलन में आने वाली अनेक नवीन प्रवृत्तियों का साहचर्य भी इसके क्षेत्र में आता है।
  3. बालकों के संज्ञानात्मक विकास का पोषण- पाठ्यक्रम का उद्देश्य बालकों का सर्वांगीण विकास एवं ज्ञान वर्धन करना भी होता है और वह बालकों को विभिन्न प्रकार का ज्ञान प्रदान करने उनका संज्ञानात्मक विकास करता है।
  4. बालकों के सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य का संवर्धन– मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तथा समाज में रहते हुए उसे कुछ अधिकारों का उपभोग एवं कर्तव्य का निर्वहन करना होता है। इसके अतिरिक्त एक बालक पूर्ण रूप से स्वस्थ तभी माना जा सकता है। जब वह मानसिक एवं मनोवैज्ञानिक रूप से सुदृढ़ हो पाठ्यक्रम के द्वारा बालकों का सामाजिक विकास एवं मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य का संवर्धन किया जाता है।
  5. अधिगम हेतु व्यवस्था– अधिगम एक जीवन परयंत चलने वाली प्रक्रिया है। जिस प्रकार ठहरे हुए पानी में अनेक गंदगियां एवं बीमारियां पनपने लगती हैं। उसी प्रकार जब व्यक्ति अधिगम कार्य बंद कर देता है तो उसमें भी रूढ़िवादिता आ जाती है। इस प्रकार पाठ्यक्रम समय-समय पर बालकों के नवीन एवं विभिन्न प्रकार के अधिगम हेतु सुविधा प्रदान करता है।
  6. शैक्षणिक स्रोतों का उपयोग– पाठ्यक्रम बालकों के अधिगम के लिए व्यवस्था ही नहीं प्रदान करता, अपितु बालकों को विभिन्न प्रकार का ज्ञान प्रदान करने हेतु आने को शैक्षणिक स्रोतों का भी उपयोग करता है। अनेकों पुरातन शैक्षिक अभिलेखों में से बालकों के लिए उपयोगी विषय वस्तु प्रदान करता है।
  7. छात्रों का व्यक्तिगत बोध एवं उसके अनुरूप शिक्षण व्यवस्था– पाठ्यक्रम द्वारा बालकों का व्यक्तित्व विकास एवं ज्ञानवर्धन किया जाता है। प्रत्येक बालक की अभिरुचि आवाज क्षमताएं भिन्न-भिन्न होती हैं तथा पाठ्यक्रम प्रत्येक बालक के व्यक्तिगत बोध के अनुरूप ही शिक्षण व्यवस्था प्रदान करता है।
  8. समस्त कार्यक्रमों एवं बालकों के कार्यों का मूल्यांकन– जैसा कि पूर्व विदित है पाठ्यक्रम विषय वस्तुओं का समावेश मात्र न होकर विभिन्न क्रियाओं एवं कार्यकलापों का भी समन्वय है। पाठ्यक्रम बालकों को ज्ञान प्रदान करने के साथ ही साथ उनके कार्यों एवं अन्य सभी कार्यक्रमों का मूल्यांकन भी करता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि पाठ्यक्रम का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। विद्यालय में रहते हुए बालक 24 शैक्षिक क्रियाएं करते हैं, जो पाठ्य सहगामी क्रियाएं करते हैं तथा जो अभिरुचि की पूर्ति से संबंधित कार्य करते हैं। उन प्रवृत्तियों के आधार पर ही पाठ्यक्रम का क्षेत्र विस्तृत होता चला जाता है।

पाठ्यक्रम अर्थ परिभाषा आवश्यकता महत्वपाठ्यक्रम का क्षेत्र
पाठ्यक्रम का आधारपाठ्यक्रम के लाभ
पाठ्य सहगामी क्रियाएंशैक्षिक उद्देश्य स्रोत आवश्यकता
मूल्यांकन की विशेषताएंपाठ्यक्रम के उद्देश्य
प्रभावशाली शिक्षणअच्छे शिक्षण की विशेषताएं

व्यक्तित्व

व्यक्तित्व को व्यक्ति के संपूर्ण व्यवहार का दर्पण कहा जाता है। यह व्यक्ति के समूचे व्यवहार को प्रभावित करता है। व्यक्तित्व व्यक्ति के सामाजिक, शारीरिक, मानसिक तथा संवेगात्मक संरचना का योग है जो इच्छाओं, रुचियों, आदर्शों व्यवहारों, तौर-तरीकों, ढंगो, आदतों, स्वभावों तथा लक्षणों के रूप में प्रकट किया जाता है।

वर्तमान शिक्षा का मुख्य उद्देश्य व्यक्तित्व का स्वस्थ संतुलित तथा सर्वांगीण विकास करना है। व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए यह आवश्यक है कि बालकों की शिक्षा उनकी व्यक्तिगत विभिन्न नेताओं के आधार पर प्रदान की जाए तथा बालक के व्यक्तित्व के मूलभूत गुणों का पता लगाया जाए। व्यक्तित्व के गुणों का पता लगाना ही व्यक्तित्व के गुणों का माप कहा जाता है।

व्यक्तित्व शब्द का अर्थ

ऐतिहासिक दृष्टि से व्यक्तित्व शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द परसोना से हुई है जिसका अर्थ है लिबास या नकाब। वर्तमान मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार व्यक्तित्व में केवल बाह्य गुण या शारीरिक गुड ही शामिल नहीं होते हैं, अर्थात् व्यक्तित्व मनो-शारीरिक गुरु का संगठन है।

भारतीय समाज में धर्म की भूमिका, व्यक्तित्व

व्यक्तित्व की परिभाषा

साधारण शब्दों में हम कह सकते हैं कि हम जो कुछ हैं या जो कुछ बनना चाहते हैं यही हमारा व्यक्तित्व है। व्यक्तित्व के अर्थ को भिन्न-भिन्न दार्शनिकों, विचारको, समाज शास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से परिभाषित किया है। व्यक्तित्व से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण परिभाषाएं निम्न हैं-

व्यक्तित्व व्यक्ति के मनोज दैहिक गुणों का वह गत्यात्मक संगठन है जो व्यक्ति के वातावरण के प्रति अपूर्व समायोजन को निर्धारित करता है।

व्यक्तित्व किसी व्यक्ति के संपूर्ण व्यवहार का गुण है।

व्यक्तित्व वातावरण के साथ सामान्य तथा स्थाई समायोजन है।

व्यक्तित्व जन्मजात और अर्जित प्रवृत्तियों या विशेषताओं का योग है।

व्यक्तित्व वह है जिसके द्वारा हम भविष्यवाणी कर सकते हैं कि कोई व्यक्ति किसी विशेष परिस्थिति में क्या करेगा।

व्यक्तित्व

रुचि

व्यक्तित्व के प्रकार

कोई भी दो व्यक्ति समान नहीं हो सकते हैं। यह अलग बात है कि उनमें किसी ना किसी प्रकार या आधार की समानता हो सकती है। इसके आधार पर व्यक्तियों के प्रकार का प्राचीन समय से ही वर्गीकरण किया जाता रहा है। उदाहरण के तौर पर भारतीय आयुर्वेद में व्यक्ति की तीन प्रकार की प्रकृति बताई गई हैं-वात, पित्त और कफ।

इसी प्रकार धर्म शास्त्र में तीन मानसिक व्रतियों को माना गया है- सात्विक, राजसिक व तामसिक। इसके अतिरिक्त विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने भी व्यक्तित्व का भिन्न-भिन्न आधारों पर वर्गीकरण किया है। कुछ महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तित्व का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया है।

युंग ने व्यक्तित्व के दो प्रकार बताए हैं-

  1. बहिर्मुखी व्यक्तित्व – इस प्रकार के व्यक्तित्व वाले व्यक्ति व्यवहार कुशल, समाजवादी, यथार्थवादी, भाव प्रधान, शीघ्र निर्णय लेने वाले, कार्यशील, वर्तमान को महत्व देने वाले, अधिक बोलने वाले तथा वस्तु का दृष्टिकोण आदि विशेषताओं वाले होते हैं।
  2. अंतर्मुखी व्यक्तित्व – इस प्रकार के व्यक्तित्व वाले व्यक्ति का व्यवहार कुशल, एकांत प्रिय, विचार प्रधान, संकोची, आदर्शवादी, देर से निर्णय लेने वाले, भविष्य को महत्त्व देने वाले, कम बोलने वाले तथा आत्म दृष्टिकोण वाले होते हैं।

हिप्पोक्रेट्स ने व्यक्तित्व का वर्गीकरण स्वभाव के आधार पर किया है, जो इस प्रकार से है-

  1. आशावान – इस प्रकार के व्यक्ति फुर्तीले तथा सक्रिय होते हैं।
  2. क्रोधी – इस प्रकार के व्यक्ति शक्तिशाली तथा शीघ्र क्रोधित हो जाते हैं।
  3. विशाद युक्त – इस प्रकार के व्यक्ति सदा उदास तथा निराश रहते हैं।
  4. मन्द – इस प्रकार के व्यक्तित्व वाले व्यक्ति स्वस्थ रहने वाले तथा धीमी गति से कार्य करने वाले होते हैं।

व्यक्तित्व का मूल्यांकन

व्यक्तित्व का मापन करना कोई सरल कार्य नहीं है, क्योंकि व्यक्तित्व के विकास को मापा नहीं जा सकता है उसका तो हम केवल मूल्यांकन कर सकते हैं। अतः व्यक्ति के मापन के स्थान पर व्यक्तित्व का मूल्यांकन शब्द का प्रयोग करना अधिक उचित प्रतीत होता है क्योंकि हमारा उद्देश्य व्यक्तित्व के विकास की उन्नति को जानना होता है।

व्यक्तित्व को मापने की कोई इकाई नहीं है अर्थात व्यक्तित्व को ऊंचाई या भार की मात्रा में नहीं मापा जा सकता क्योंकि व्यक्तित्व के मापन में हमें व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं अनुभवों इच्छाओं अभिरुचियों का भी मूल्यांकन करना होता है।

व्यक्तित्व मापन से संबंधित विधियों को हम मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं, जो निम्न है-

  1. व्यक्तिगत विधियां
  2. वस्तुनिष्ठ विधियां
  3. प्रक्षेपण विधियां
Career After 12th, व्यक्तित्व

व्यक्तिगत विधियां

व्यक्तित्व के मूल्यांकन की व्यक्तिगत विधियां निम्नलिखित हैं-

  1. साक्षात्कार
  2. प्रश्नावली
  3. आत्मकथा
  4. व्यक्तित्व इतिहास
  5. व्यक्तित्व सूची

वस्तुनिष्ठ विधियां

व्यक्तित्व के मूल्यांकन की वस्तुनिष्ठ विधियां निम्न है-

  1. निरीक्षण विधि
  2. क्रम निर्धारण माप
  3. परिस्थिति परीक्षण विधि
  4. समाजमिति विधि
  5. स्वतन्त्र सम्पर्क विधि
निर्देशन अर्थ उद्देश्य विशेषताएंव्यावसायिक निर्देशन
भारत में निर्देशन की समस्याएंशैक्षिक निर्देशन
शैक्षिक व व्यावसायिक निर्देशन में अंतरएक अच्छे परामर्शदाता के गुण व कार्य
परामर्श अर्थ विशेषताएं उद्देश्यसमूह निर्देशन
व्यक्तित्वसमूह गतिशीलता
समूह परामर्शसूचना सेवा
बुद्धिरुचि

रुचि

प्रत्येक व्यक्ति वातावरण की किसी न किसी वस्तु में रुचि रखता है। रुचि से तात्पर्य व्यक्ति के किसी वस्तु या विशेष के प्रति चाहत या लगाव से हैं। जैसे किसी व्यक्ति की क्रिकेट खेलने में, किसी की कविता लिखने में, तो किसी की चित्रकारी में रुचि होती है। रुचि किसी व्यवसाय या पाठ्यक्रम या पाठ्य विषयों की पसंद का नाम है।

रुचि

रुचि किसी भी कार्य के लिए चालक शक्ति तथा प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण कारक का काम देती है। रुचि के कारण व्यक्ति में पूर्ण एकाग्रता और ध्यान केंद्रिता पैदा होती है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में खुशियों का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि एक व्यक्ति क्या और कैसा करेगा, यह बहुत कुछ उसकी रुचियों के द्वारा ही निर्धारित होता है।

इसके अतिरिक्त इस का हमारे जीवन में महत्व इसलिए भी है कि यह सीखने के अभिप्रेरण स्रोत भी है। साधारण शब्दों में हम कह सकते हैं कि रुचि का अर्थ संबंध की भावना से है। जिस वस्तु से हम संबंधित हो जाते हैं या जो वस्तु हमसे संबंधित है उसे हम रूचि की संज्ञा दे देते हैं।

रुचि

रुचि की परिभाषा

भिन्न-भिन्न मनोवैज्ञानिकों ने रुचि के संबंध में भिन्न-भिन्न विचार प्रकट किए हैं। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने रुचि की निम्न परिभाषाएं दी हैं-

रुचि स्वभाव का गतिशील पक्ष होता है।

ड्रैवर

रुचि वह प्रवृत्ति है जिससे हम किसी व्यक्ति, वस्तु या क्रिया की ओर ध्यान देते हैं, उससे आकर्षित होते हैं या संतुष्टि प्राप्त करते हैं।

गिलफोर्ड

रुचि किसी अनुभव में खो जाने या लिप्त हो जाने तथा उसे जारी रखने की प्रवृत्ति है।

बिंघम

रुचि सफलता की मध्य सूचक है।

स्टैंग

रुचि की विशेषताएं

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर रूचि की निम्न विशेषताएं हैं-

  1. रुचियां व्यक्ति के व्यक्तित्व का एक अंग होती हैं।
  2. रुचियां सीखी जाती हैं।यह विशेष चीजों या पदार्थों के बारे में व्यक्त की प्रतिक्रियाओं को दर्शाती हैं।
  3. दोषियों को वंशानुक्रम और वातावरण से संबंधित दोनों प्रकार के कारक प्रभावित करते हैं।
  4. आयु वृद्धि के साथ-साथ व्यक्ति की रुचियों में भिन्नता कम होती जाती है।
  5. रुचि कार्य के लिए एक चालक शक्ति है तथा यह व्यक्ति के व्यवहार का एक पक्ष है।
  6. रुचियां स्थाई होती हैं इनमें आयु तथा समय के अनुसार बदलाव आता है।
  7. रुचियां भूतकाल तथा वर्तमान काल से संबंधित होती हैं
  8. रुचिया का वस्तु परम मापन नहीं किया जा सकता है क्योंकि इनका संबंध अधिकतर भावनाओं से होता है।
  9. व्यावसायिक तथा अव्यवसायिक दोनों प्रकार की रुचियां साथ साथ चलती हैं।
रुचि

रूचियों के प्रकार

रुचियों के प्रकार के संबंध में अनेक अध्ययन किए गए हैं। रुचियों के मुख्य रूप से चार प्रकार होते हैं।

  1. अभिव्यक्ति रुचियां – इस प्रकार की रुचियां वे होती हैं जोकि व्यक्ति द्वारा पूछने पर स्वयं बताई जाती है, अर्थात इस प्रकार की रुचियां व्यक्ति के द्वारा शब्दों या भाषा के द्वारा व्यक्त की जाती हैं। इस प्रकार की रुचियां अविश्वसनीय होती हैं।
  2. प्रदर्शित रुचियां – इस प्रकार की रुचियां व्यक्तियों के व्यवहार द्वारा प्रदर्शित होती हैं। जैसे यदि किसी व्यक्ति के व्यवहार द्वारा यह प्रदर्शित हो कि उसकी रूचि सिनेमा, क्रिकेट या घूमने में है तो यह व्यक्त या प्रदर्शित रूचि कहलाती है।
  3. ज्ञात रुचियां – ये वे रुचियां हैं जो कि विभिन्न रुचि प्रपत्रों या मानकीकृत रुचि परीक्षणों द्वारा ज्ञात होती है।
  4. परीक्षित रुचियां – जिन रूचियों का मापन निष्पत्ति परीक्षणों या वस्तुनिष्ठ परीक्षणों द्वारा किया जाता है, उन्हे परीक्षित रुचियां कहते हैं।
निर्देशन अर्थ उद्देश्य विशेषताएंव्यावसायिक निर्देशन
भारत में निर्देशन की समस्याएंशैक्षिक निर्देशन
शैक्षिक व व्यावसायिक निर्देशन में अंतरएक अच्छे परामर्शदाता के गुण व कार्य
परामर्श अर्थ विशेषताएं उद्देश्यसमूह निर्देशन
व्यक्तित्वसमूह गतिशीलता
समूह परामर्शसूचना सेवा
बुद्धिरुचि

वैद्युत आवेश एवं वैद्युत क्षेत्र

कूलाम का नियम

भौतिक विज्ञान का एक नियम है जो स्थिर इलेक्ट्रिक चार्ज कणों के बीच लगता है।

वैद्युत आवेश एवं वैद्युत क्षेत्र

इस नियम के अनुसार:-

“दो आवेशो के बीच लगने वाला बल उन दोनो आवेशो के मान के अनुक्रमानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युक्रमानुपाती होता है।”

वैद्युत आवेश एवं वैद्युत क्षेत्र

जहां k अनुक्रमणपाती नियतांक है। जिसका मान

वैद्युत आवेश एवं वैद्युत क्षेत्र
वैद्युत आवेश एवं वैद्युत क्षेत्र

F का मात्रक न्यूटन होता है।

K का मान माध्यम पर निर्भर करता है
वैद्युत आवेश एवं वैद्युत क्षेत्र
कूलॉम के नियम की सीमाएँ
  • कूलाम्ब का नियम केवल बिंदु आवेशों के लिए ही सत्य है।
  • यह नियम अधिक दूरी के लिए सत्य नहीं है।
वैद्युत क्षेत्र

यदि किसी स्थान पर स्थित किसी स्थिर आवेशित कण पर बल लगता है तो कहते हैं कि उस स्थान पर विद्युत्-क्षेत्र (electric field) है।

वैद्युत आवेश एवं वैद्युत क्षेत्र

विद्युत क्षेत्र आवेशित कणों के द्वारा उत्पन्न होता है या समय के साथ परिवर्तित हो रहे चुम्बकीय क्षेत्र के कारण।

वैद्युत बल रेखाए

विद्युत बल रेखाएं विद्युत क्षेत्र में खींचा गया वह काल्पनिक चिकना वक्र (smooth curve) है, जिसके किसी भी बिंदु पर खींची गई स्पर्श रेखा, उस बिंदु पर विद्युत क्षेत्र का की दिशा प्रदर्शित करती है।

विद्युत बल रेखाओं के गुण
  1. विद्युत बल रेखाएं धन आवेश से उत्पन्न होती है और ऋण आवेश पर समाप्त हो जाती है।
  2. यह विद्युत बल रेखा के किसी भी बिंदु पर खींची गई स्पर्श रेखा उस बिंदु पर रखे धन आवेश पर लगने वाले बल अर्थात विद्युत क्षेत्र की दिशा प्रदर्शित करती है।
  3. ये विद्युत बल रेखाएं खींची प्रत्यास्थ डोरी की भांति लंबाई में सिकुड़ने की चेष्टा करती है। इसी कारण विजातीय आवेशो में आकर्षण होता है।
  4. विद्युत बल रेखाएं अपनी लंबाई की लंबवत दिशा में परस्पर दूर हटने की चेष्टा करती है। इसी कारण सजातीय आवेश प्रतिकर्षण होता है।
  5. आवेशित चालक से निकलने वाली बल रेखाएं, चालक के तल के लंबवत होती है। यह बल संवृती वक्र (closed curves) न होकर, खुले वक्र (open curves) होती है।
  6. किसी स्थान पर बल रेखाओं का दूर-दूर होना, विद्युत क्षेत्र का क्षीण होना प्रदर्शित करता है तथा बल रेखाओं का पास-पास होना, विद्युत क्षेत्र का तीव्र होना प्रदर्शित करता है।
  7. चूंकि किसी भी बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की केवल एक ही दिशा हो सकती है, अतः प्रत्येक बिंदु पर से केवल एक ही बल रेखा गुजर सकती है। यही कारण है कि विद्युत बल रेखाएं परस्पर कभी नहीं काटती है। यदि दो बल रेखा काटती, तो कटान बिंदु पर दो स्पर्श रेखा खींची जा सकती है, जो उस बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की दो दिशाएं प्रदर्शित करेगी, लेकिन यह असम्भव है।
  8. एकसमान विद्युत क्षेत्र में खींची गई विद्युत बल रेखाएं परस्पर समानांतर होती हैं।
विद्युत बल रेखाओं तथा चुम्बकीय बल रेखाओं में अंतर
विद्युत बल रेखाएंचुम्बकीय बल रेखाएं
ये खुले वक्र होती है।यह बंद वक्र होती है।
यह सदैव आवेशित पृष्ठ के लंबवत होती हैं।इनका चुंबक की सतह के लंबवत होना आवश्यक नहीं है, यह किसी भी दिशा में हो सकती हैं।
ये चालक के अंदर उपस्थित नहीं होती है।यह चुंबक के अंदर भी उपस्थित रहती हैं।

वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता

विद्युत क्षेत्र में किसी बिंदु पर रखे एकांक धन आवेश पर जितना बल लगता है उसे उस बिंदु की विद्युत क्षेत्र की तीव्रता कहते हैं, इसे E से प्रदर्शित करते हैं।

यदि विद्युत क्षेत्र में रखे एकांक धनावेश पर आवेश का मान q है और उस पर लगने वाला बल F है तब विद्युत क्षेत्र की तीव्रता

\fn_jvn \vec{E}=\frac{\vec{F}}{q}

इसका मात्रक न्यूटन/कूलाम होता है।

वैद्युत द्विध्रुव

यदि दो आवेश जिनके बीच की दूरी बहुत कम है और दोनों पर विपरीत आवेश है और बराबर परिमाण है तो इस व्यवस्था या सिस्टम को विद्युत द्विध्रुव कहेंगे।

माना कि दो आवेश – q और +q रखे है इनके बीच की दूरी 2l है। जो बहुत कम है तब इसे विद्युत द्विध्रुव कहेंगे और इनके बीच की दूरी को द्विध्रुव की लंबाई कहेंगे।

दो बराबर परन्तु विपरीत प्रकार के बिन्दु आवेश एक-दूसरे से अल्प दूरी पर स्थित होते हैं। किसी एक आवेश तथा दोनो आवेशों के बीच की दूरी के गुणनफल को वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण'p' कहते हैं।

वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण, p = 2ql

वैद्युत द्विध्रुव का मात्रक कूलाम मीटर होता है।

उदाहरण – HCl ध्रुवी अणु है जिसमे एक H+ तथा दूसरा Cl आयन परस्पर विद्युत आकर्षण बल से बंधे रहते है , दोनों आवेश के मध्य लगभग 10-11 m  की दूरी होती है जो की अल्प है अतः यह एक विद्युत द्विध्रुव का निर्माण करते है।

वैद्युत बलयुग्म का आघूर्ण

विद्युत क्षेत्र E में रखे द्विध्रुव पर लगने वाला बलाघूर्ण τ= pE

बिंदु आवेश के कारण वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता

माना कि किसी बिंदु पर धन आवेश q+ रखा है और उस क्षेत्र का परावैद्युतांक K है और विद्युत आवेश से r मीटर की दूरी पर बिंदु P पर पर Q आवेश  है जिस पर हमें हमें विद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करनी है

अब कूलाम के नियम अनुसार बिंदु P पर आवेश Q  पर लग रहा विद्युत बल F

\fn_jvn F=\frac{1}{4\pi\epsilon}_{0}.\frac{qQ}{^{r^{2}}}

तब विद्युत क्षेत्र का तीव्रता

\fn_jvn E=\frac{F}{q}
\fn_jvn E=\frac{1}{4\pi\epsilon}_{0}.\frac{q}{^{r^{2}}}

जिसका मात्रक न्यूटन/कूलाम होगा

मात्रक, विमाए व राशियों के प्रकार

राशि का नामसदिश/अदिश राशिमात्रकविमाए
बल (F)सदिश राशिन्यूटन[MLT-2]
आवेश (q)अदिश राशिकूलाम[AT]
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता (E)सदिश राशिन्यूटन प्रति कूलाम[MLT-3A]
वैद्युत द्विध्रुव का आघूर्ण (p)सदिश राशिकूलाम मीटर[LAT]
वैद्युत द्विध्रुव के बलयुगम का आघूर्ण (τ)

बुद्धि

बुद्धि एक अत्यंत जटिल मानसिक प्रक्रिया है यद्यपि बुद्धि वास्तव में क्या है? इस पर विद्वानों एवं मनोवैज्ञानिकों में वाद विवाद चलता आ रहा है। पुराने समय में जो छात्र अधिक किताबों को रट लिया करता था, उनको बुद्धिमान समझा जाता था। लेकिन वर्तमान समय में मनोवैज्ञानिकों ने बुद्धि की व्याख्या करने की कोशिश की है।
वास्तविक रूप में यदि देखा जाए तो बुद्धि के स्वरूप की व्याख्या कर सकना असंभव है।

बुद्धि

बुद्धि की परिभाषा

आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने बुद्धि के रूप स्वरूप को निश्चित करने के लिए अलग-अलग परिभाषाएं दी हैं। कुछ महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिकों के द्वारा बुद्धि के संबंध में दी गई परिभाषाएं इस प्रकार हैं-

अमूर्त चिंतन की योग्यता ही बुद्धि है।

बुद्धि पहचानने तथा सुनने की शक्ति है।

अवधान की शक्ति ही बुद्धि है।

बुद्धि के अंतर्गत व्यक्ति की समान योग्यताओं का समावेश है।

व्यक्ति में वस्तु स्थिति के अनुसार प्रतिक्रिया की योग्यता बुद्धि है।

नई परिस्थितियों में समायोजन की योग्यता ही बुद्धि है।

बुद्धि उन समस्याओं को हल करने की योग्यता है जिसमें ज्ञान और प्रतीक के उपयोग की आवश्यकता होती है। जैसे शब्द, रेखाचित्र, समीकरण, सूत्र आदि।

इस प्रकार से विभिन्न मनोवैज्ञानिकों के विचारों में मतभेद होने के कारण बुद्धि के स्वरूप के संबंध में कुछ निश्चित कहना अत्यंत कठिन कार्य है। बेलार्ड जो महोदय के अनुसार बुद्धि की विभिन्न परिभाषाओं को हम मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांट सकते हैं-

  1. बुद्धि दो या तीन विभिन्न योग्यताओं का समूह है।
  2. बुद्धि एक ऐसी योग्यता है जो सभी मानसिक प्रक्रियाओं में सहायता करती है।
  3. बुद्धि सभी प्रकार की विशिष्ट योग्यताओं का निचोड़ है।
बुद्धि

बुद्धि के प्रकार

थार्नडाइक ने बुद्धि के निम्न तीन प्रकार बताए हैं-

  1. अमूर्त बुद्धि – थार्नडाइक ने सूक्ष्म या अमूर्त चिंतन, कल्पना या संवेदन करने की योग्यता को अमूर्त बुद्धि माना है। इस प्रकार की बुद्धि का संबंध शब्द, अंक, प्रतीक, संकेत आदि से समस्याओं को हल करने से होता है।
  2. मूर्त या यांत्रिक बुद्धि – जब हम मूर्त या स्थूल विषयों से संबंधित कार्य करते हैं तो मूर्त या यांत्रिक बुद्धि का सहारा लेते हैं। मूर्त बुद्धि निष्पादन कार्यों, यांत्रिक कार्यों, गामक क्रियाओं आदि के क्षेत्र में प्राणी की सहायता करती है।
  3. सामाजिक बुद्धि – इस प्रकार की बुद्धि या मानसिक योग्यता के द्वारा व्यक्ति सामाजिक कार्य, व्यवहार तथा कुशलताओं को पूर्ण करता है। यह व्यक्ति को समाज के साथ समायोजन स्थापित करने में सहायता करती है।
बुद्धि

बुद्धि की विशेषताएं

बुद्धि की विशेषताएं निम्न है-

  1. बुद्धि सीखने में व्यक्ति की सहायता करती है।
  2. बुद्धि जन्मजात वंशानुक्रम द्वारा प्राप्त की हुई स्वाभाविक विशेषता है।
  3. बुद्धि की सहायता से व्यक्ति कठिन से कठिन परिस्थितियों, समस्याओं, संकटों एवं विषमताओं को आसानी से सामान्य कर लेता है।
  4. वंशानुक्रम का बुद्धि पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।
  5. बुद्धि तथा ज्ञान में गहरा संबंध होता है।
  6. लिंग भेद के कारण बुद्धि में कोई अंतर नहीं होता है।
  7. बुद्धि व्यक्ति को चीजों को सीखने तथा अपने आपको ढालने में सहायता देती है।
  8. बुद्धि जटिल व सूक्ष्म तत्वों को सुलझाने में सहायता देती है।
  9. किशोरावस्था के मध्य तक बुद्धि का पूर्ण विकास हो जाता है।
  10. बुद्धि परीक्षणों से यह ज्ञात हुआ है कि अधिकतर बालक औसत बुद्धि के हुआ करते हैं।
निर्देशन अर्थ उद्देश्य विशेषताएंव्यावसायिक निर्देशन
भारत में निर्देशन की समस्याएंशैक्षिक निर्देशन
शैक्षिक व व्यावसायिक निर्देशन में अंतरएक अच्छे परामर्शदाता के गुण व कार्य
परामर्श अर्थ विशेषताएं उद्देश्यसमूह निर्देशन
व्यक्तित्वसमूह गतिशीलता
समूह परामर्शसूचना सेवा
बुद्धिरुचि

12th Maths Formulae

12th Maths Formulae is a collection of the formulae of NCERT Class 12 Math.

12th Maths Formulae

Chapter 1 Relations and Functions
Chapter 2Inverse Trigonometric Functions
Chapter 3Matrices
Chapter 4Determinants
Chapter 5Continuity and Differentiability
Chapter 6Applications of Derivatives
Chapter 7Integrals
Chapter 8Applications of Integrals
Chapter 9Differential Equations
Chapter 10Vector Algebra
Chapter 11Three dimensional Geometry
Chapter 12Linear Programming
Chapter 13Probability

Statics

  • Equilibrium of Forces
  • Centre of Gravity
  • Common Catenary
Formulae

12th Maths Formulae
12th Maths Formulae
12th Maths Formulae
12th Maths Formulae
12th Maths Formulae

Dynamics

  1. Projectile
  2. Work Power and Energy
  3. Direct impact of Elastic Bodies
  4. Moment of Inertia
  5. D’Alembert Principle
Formulae
12th Maths Formulae
12th Maths Formulae
12th Maths Formulae
12th Maths Formulae
12th Maths Formulae
12th Maths Formulae
12th Maths Formulae
12th Maths Formulae
12th Maths Formulae
12th Maths Formulae

Sarkari Focus

सूचना सेवा

सूचना सेवा – निर्देशन कार्यक्रम में सूचनाओं का बहुत अधिक महत्व है। सूचनाओं की जानकारी छात्र एवं निर्देशन प्रदाताओं दोनों के लिए आवश्यक है। व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सूचनाओं की आवश्यकता होती है।

निर्देशन के क्षेत्र में सूचनाओं का महत्व निम्न रूप से देखा जा सकता है-

  1. सूचना सेवा छात्र को विश्वसनीय तरीके से सूचनाएं प्रदान करती है।
  2. इन सेवाओं के माध्यम से आवश्यक, उपयोगी तथा संगत एवं समुचित जानकारी प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
  3. सूचना संप्रेषण की क्रिया अल्पव्ययी बनाई जा सकती है।
  4. सूचनाओं के द्वारा छात्र में वांछनीय स्तर की संवेदनशीलता का विकास किया जा सकता है, जिससे छात्र स्वयं को जाने समझे और उनकी भावनाओं के लिए आवश्यक कदम उठा सके।
वुड का घोषणा पत्र, संप्रेषण, सूचना सेवा

सूचना सेवा

इन सेवाओं के द्वारा दी जाने वाली सूचनाओं को तीन भागों में बांटा जा सकता है-

  1. शैक्षिक सूचनाएं
  2. व्यावसायिक सूचनाएं
  3. व्यक्तिगत, सामाजिक सूचनाएं

1. शैक्षिक सूचना सेवा

शैक्षिक निर्देशन में आवश्यक सूचनाएं इस प्रकार हैं-

  1. शिक्षा अवधि से संबंधित सूचनाएं
  2. विभिन्न शिक्षण संस्थाओं – विद्यालय, विश्वविद्यालय, व्यावसायिक, तकनीकी संस्थान, पॉलिटेक्निक स्कूल और शिक्षक प्रशिक्षण से संबंधित सूचनाएं।
  3. विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में उपलब्ध विभिन्न पाठ्यक्रमों के संबंध में सूचनाएं।
  4. विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेशार्थ निर्धारित शैक्षिक अहर्ताएं संबंधी सूचनाएं।
  5. पाठ्यक्रमों में प्रयोग में लाई जाने वाली शिक्षण पद्धतियां, नियुक्त अध्यापकों तथा विभिन्न पाठ्यक्रमों में सफलता सूचक विभिन्न प्राप्त अंकों के बारे में सूचनाएं।

2. व्यावसायिक सूचना सेवा

जार्ज ई• मायर्स ने व्यावसायिक निर्देशन हेतु आवश्यक सूचनाओं का उल्लेख इस प्रकार किया है-

  1. व्यवसाय का महत्व– विभिन्न व्यावसायिक का सामाजिक महत्व बताते हुए व्यवसाय के स्थानीय अथवा राष्ट्रीय क्षेत्रों के प्रमुख केंद्रों का उल्लेख किया जाता है।
  2. कार्य की प्रकृति– कर्मिको द्वारा किए जाने वाले कार्यों एवं उनकी विविधता आदि का उल्लेख प्राप्त होता है।
  3. कार्य की दशाएं– बाह्य एवं आंतरिक स्थितियां, कार्य एवं समय के साथ कार्य करने वाले व्यक्तियों का स्तर तथा संगठन आदि के संबंध में सूचनाएं देती हैं।
  4. आवश्यक शारीरिक योग्यता– संवेगात्मक स्थिरता, मानसिक स्थिरता, व्यक्तित्व संबंधी सापेक्षिक गुण आदि की सूचनाएं प्रदान की जाती हैं।
  5. आवश्यक तैयारी– व्यवसाय हेतु आवश्यक सामान्य शैक्षिक योग्यता व प्रवेश संबंधी जानकारी प्रदान की जाती है।
  6. पदोन्नति के अवसर– व्यवसाय में उपलब्ध प्रशासनिक तथा पर्यवेक्षण संबंधी उत्तरदायित्व, संबंधित व्यवसाय एवं अवसरों के संबंध में उल्लेख किया जाता है।
  7. क्षतिपूर्ति– इसमें औसत वार्षिक आय, भुगतान पद्धतियां, बोनस, विशिष्ट लाभ इत्यादि का वर्णन होता है।
  8. लाभ और हानि– व्यवसाय के विभिन्न पहलुओं हानि की संभावनाओं के संबंध में सही, समुचित एवं स्पष्ट जानकारी प्राप्त होती है।

मायर्स के अनुसार इन 8 शीर्षकों के अंतर्गत सूचनाएं संकलित करना आवश्यक है। इनको ध्यान में रखकर तैयार की गई रूपरेखा व्यावसायिक निर्देशन के कार्य को सहज एवं प्रभावशाली बनाती है।

3. व्यक्तिगत सूचनाएं

व्यक्तिगत निर्देशन हेतु सूचनाओं का स्रोत असीमित होता है। अनेक प्रकार से सूचना एकत्र की जा सकती हैं। सबसे पहले उनकी एक सूची तैयार की जाती है तथा उनके संबंध में में व्यापक वर्णन भी रखना पड़ता है। जिसमें सूचनाओं की शुद्धता वस्तुनिष्ठता और विश्वसनीयता के स्तर को ज्ञात किया जा सके। व्यक्तिगत निर्देशन के अंतर्गत निम्नलिखित प्रकार की सूचनाओं का विवरण प्राप्त करना आवश्यक है-

  1. व्यक्ति के मित्रों के संबंध में सूचनाएं
  2. उनकी रूचियों के बारे में सूचनाएं
  3. व्यक्ति के पारिवारिक जीवन से संबंधित सूचनाएं
  4. व्यक्ति के निजी जीवन, सामान्य शारीरिक स्वास्थ्य तथा मानसिक संतुलन संबंधी विशेषताओं को अभिव्यक्त करने वाली घटनाओं के संबंध में जानकारी।
  5. सेवार्थी के परिचित व्यक्तियों सगे संबंधियों तथा रिश्तेदारों से संबंधित सूचनाएं।
  6. छात्र के परिवार के सदस्य, अध्यापक, अनुदेशन इत्यादि से संबंधित सूचनाएं।
प्रबन्धन, शैक्षिक निर्देशन, परामर्शदाता

सूचना सेवा के उद्देश्य

सूचना सेवा के उद्देश्य निम्न है-

  1. सूचना के विभिन्न स्रोतों का वास्तुनिष्ठ मूल्यांकन करने में छात्रों की सहायता करना।
  2. इस सेवा का मुख्य उद्देश्य निर्देशन की प्रक्रिया को वस्तुनिष्ठ तथा वैज्ञानिक बनाने में सहायता प्रदान करना।
  3. निर्देशन प्रदाता द्वारा छात्रों को एक ही स्थान पर समय एवं धन का दुरुपयोग किए बिना सूचना उपलब्ध कराना, सूचना सेवाओं का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
  4. अद्यतन विश्वसनीय एवं शुद्ध सूचनाओं का विवरण रखना जिससे छात्र उनका प्रयोग समुचित रूप से कर सके।
  5. निर्देशन कार्यकर्ताओं एवं छात्रों को स्वयं के प्रयत्नों के माध्यम से विशुद्ध एवं विश्वसनीय सूचना एकत्रित करने, उन्हे भली-भांति समझने तथा उनके निहितार्थों का मूल्यांकन करने हेतु उचित प्रकार के प्रशिक्षण एवं ओरियंटेशन कार्यक्रमों को आयोजित करना भी इन सेवाओं का उद्देश्य होता है।
  6. विद्यालयों एवं विद्यालयों के बाहर संगठित सेवाओं का एक उद्देश्य यह भी होता है कि वे सूचनाओं का संकलन समुचित रूप से करें तथा उन्हें उनकी प्रकृति के अनुसार वर्गीकृत करने में सहायता प्रदान करना।
निर्देशन अर्थ उद्देश्य विशेषताएंव्यावसायिक निर्देशन
भारत में निर्देशन की समस्याएंशैक्षिक निर्देशन
शैक्षिक व व्यावसायिक निर्देशन में अंतरएक अच्छे परामर्शदाता के गुण व कार्य
परामर्श अर्थ विशेषताएं उद्देश्यसमूह निर्देशन
व्यक्तित्वसमूह गतिशीलता
समूह परामर्शसूचना सेवा
बुद्धिरुचि

समूह गतिशीलता

समूह गतिशीलता डायनॉमिक्स भौतिक शास्त्र से लिया गया है। डायनॉमिक्स ग्रीक भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ है शक्ति। इस प्रकार समूह गत्यात्मकता समूह में छिपी हुई शक्ति के अध्ययन से संबंधित विषय है। समूह गति विज्ञान उन विषयों का ज्ञान देता है जो एक समूह में सक्रिय होती हैं। उन व्यक्तियों का अध्ययन समूह गति विज्ञान का अन्वेषण का विषय होता है।

यह अन्वेषण उस दिशा में होते हैं जिससे पता चल जाए कि शक्तियां किस प्रकार उभरती हैं, किन देशों में यह शक्तियां सक्रिय होती हैं, इनके क्या परिणाम होते हैं और किस प्रकार से उनका रूपांतरण किया जा सकता है अर्थात समूह गति विज्ञान वह विज्ञान है जो समूह को गतिशील करने वाली शक्तियों का अध्ययन करता है।

समूह गतिशीलता परिभाषा

समूह गतिशीलता के अध्ययन में इसे समूह गत्यात्मकता, समूह मनोविज्ञान के नाम से भी संबोधित किया गया है।

समूह गति विज्ञान उन शक्तियों की जानकारी प्रदान करता है जो एक समूह में सक्रिय होती हैं।

समूह गतिकी अध्ययन का एक ऐसा क्षेत्र है जो उन बलोया दबावों पर प्रकाश डालता है जिनसे छोटे समूह में व्यक्तियों का व्यवहार प्रभावित होता है।

Career After 12th, समूह गतिशीलता

समूह गतिशीलता की विशेषताएं

समूह गतिशीलता व निर्देशन एक पृथक सेवा के रूप में अपना अस्तित्व नहीं रखता है किंतु यह निर्देशन कार्यक्रम के आधारभूत तत्व को मितव्ययिता, कुशलता एवं प्रभावशाली ढंग से पूर्ण करने का एक साधन है।

यह तो निर्देशन की एक रीति है जिसके द्वारा छात्रों को उनके विकास में सहायता प्रदान की जाती है। सामूहिक गतिशीलता क्रियाओं की शक्ति बढ़ाने में योग देती है। यह तो अन्य क्रियाओं की सहयोगी मात्र हैं। वह किसी क्रिया का स्थान नहीं लेती हैं। यहां पर समूह एवं व्यक्तिगत निर्देशन की तुलनात्मक उपयोगिता के विवादास्पद विषय पर अधिक ना लिखकर सामूहिक निदेशक द्वारा सेवित उद्देश्यों पर विचार करना उपयुक्त होगा।

समूह गतिशीलता के लक्ष्य या उद्देश्य विद्यालय के स्तर प्रसाद की दर्शन विद्यार्थियों की आवश्यकताओं एवं विद्यालय में उपलब्ध प्रशिक्षण निर्देशन कर्मचारियों द्वारा प्रभावित हुआ निश्चित होते हैं। कक्षा कक्ष में सामूहिक गतिशीलता की विशेषताएं निम्न है –

  1. आत्मविश्वास का विकास
  2. अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता वाले छात्रों का ज्ञान
  3. सामाजिक कुशलता का विकास
  4. अधिकांश छात्रों के साथ परामर्शदाता का संपर्क स्थापन
  5. छात्रों की चिंताओं और तनाव में कमी
  6. परामर्शदाता की कुशलता में वृद्धि
  7. विविध शैक्षिक अनुभवों को समन्वित करने के लिए
  8. व्यक्तिगत परामर्श की तत्परता की तैयारी

1. आत्मविश्वास का विकास

जब समुचित रूप से संगठित समूह में नवयुवकों को अपनी संबंधित रुचियों, भावात्मक, प्रतिक्रियाओं एवं अभिलाषाओं पर विचार करने का अवसर प्राप्त होता है। तो वह अनुभव करने लगते हैं कि उनकी समस्याओं में अधिकांशतः ऐसी है जो उनकी आयु के छात्रों द्वारा अनुभव की जाती है। समूह गतिशीलता का ज्ञान छात्रों में शक्ति एवं आत्मविश्वास को बढ़ाने में सहायक होता है।

2. अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता वाले छात्रों का ज्ञान

सामूहिक गतिशीलता निर्देशन में भाग लेने वाले सदस्यों में से जैसे छात्रों को पहचानना सरल होता है जिनको व्यक्तिगत सहायता की अधिक आवश्यकता होती है।

3. सामाजिक कुशलता का विकास

सामूहिक परिस्थितियों में छात्रों को परस्पर मिलने झुलने, मौखिक विचार विमर्श करने एवं किसी कार्य की सामूहिक रूप से योजना बनाने के अवसर प्राप्त होते हैं। समूह गतिशीलता अर्थात् सामूहिक रूप से कार्य करने से छात्रों में परस्पर सहयोग और सहकारिता की भावना विकसित होती है।

व्यावसायिक निर्देशन, शैक्षिक पर्यवेक्षण, समूह निर्देशन

4. अधिकांश छात्रों के साथ परामर्शदाता का संपर्क स्थापना

सामूहिक निर्देशन द्वारा छात्रों का डरपोक व शर्मिला पन दूर होता है वह अपने परामर्शदाता के निकट संपर्क में आते हैं। उनको फिर परामर्शदाता से व्यक्तिगत संपर्क स्थापित करने में कोई भय या बाधा नहीं होती है। किंतु जब वे सामूहिक कार्यों में परामर्शदाता के व्यवहार का अवलोकन करते हैं तो उनको अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करना पड़ता है। इसके साथ ही परामर्शदाता भी अनेक छात्रों एवं उनकी समस्याओं से अवगत होकर उनकी उत्तम सेवा करने की स्थिति में अपने को पाता है।

5. छात्रों की चिंताओं और तनाव में कमी

कुछ छात्र भावात्मक दृष्टि से इतने अधिक विचलित हो जाते हैं कि अपना दैनिक कार्य नहीं कर पाते हैं। वे कठिन स्थितियों या दशाओं में अशांत हो जाते हैं। ऐसे छात्र चिंताओं से ग्रसित एवं मानसिक तनाव की बीमारी से जकड़े हुए होते हैं। इनका उपचार सामूहिक निर्देशन या सामूहिक गतिशीलता द्वारा ही संभव है। यहां मित्रता पूर्ण एवं इसने युक्त वातावरण स्पष्ट वार्तालाप के लिए प्राप्त होता है।

6. परामर्शदाता की कुशलता में वृद्धि

समूह गतिशीलता के माध्यम से परामर्शदाता ने छात्रों के संपर्क में आता है। परिणाम स्वरूप यह अनेक छात्रों की आवश्यकताओं से परिचित होता है। छात्रों की आवश्यकताओं का ज्ञान परामर्शदाता को निर्देशन सेवा में सुधार करने की प्रेरणा एवं प्रोत्साहन देता है।

7. विविध शैक्षिक अनुभवों को समन्वित करने के लिए

सामूहिक निर्देशन विधि विविध शैक्षिक अनुभवों को समन्वित रूप से प्रदान करने में सहायक बनती है। सामूहिक निर्देशन में छात्रों की समस्याओं पर वार्तालाप एवं प्रतिक्रियाओं के स्पष्टीकरण से विद्यालय कार्यक्रम के समस्त तत्वों के मध्य एक स्वाभाविक संबंध स्थापित होता है।

8. व्यक्तिगत परामर्श की तत्परता की तैयारी

समूह में छात्रों को अनेक सामूहिक अनुभव अर्जित करने का अवसर प्राप्त होता है। छात्रों की अनेक समस्याएं समूह में वार्तालाप एवं विचार विनिमय द्वारा स्पष्ट हो जाती हैं। किंतु कुछ समस्याएं या मानसिक तनाव जो सामूहिक अनुभव द्वारा इस वर्ष नहीं हो पाते उनके समाधान के लिए छात्रों में व्यक्तिगत परामर्श प्राप्त करने की तत्परता बढ़ती है।

निर्देशन अर्थ उद्देश्य विशेषताएंव्यावसायिक निर्देशन
भारत में निर्देशन की समस्याएंशैक्षिक निर्देशन
शैक्षिक व व्यावसायिक निर्देशन में अंतरएक अच्छे परामर्शदाता के गुण व कार्य
परामर्श अर्थ विशेषताएं उद्देश्यसमूह निर्देशन
व्यक्तित्वसमूह गतिशीलता
समूह परामर्शसूचना सेवा
बुद्धिरुचि

समूह परामर्श

समूह परामर्श – आधुनिक जीवन में समूह का अधिक महत्व है। व्यक्ति अपने जीवन काल में किसी ना किसी प्रकार के समूह के संपर्क में रहता है। मनोवैज्ञानिक कैंप ने “सामूहिक परामर्श के आधार” नामक पुस्तक में लिखा है – व्यक्तियों को जीवन के सभी क्षेत्रों में अर्थ पूर्ण संबंधों की आवश्यकता होती है।

इन्हीं संबंधों के आधार पर बहुतों को जीवन में उद्देश्य व महत्व से संबंधित ज्ञान प्राप्त होता है। अतः सामूहिक परामर्श में रुचि व संबंधों का प्रयोग अधिक होने लगा है।

समूह परामर्श

समूह परामर्श में समूह को सार्थक अनुभव प्रदान किए जाते हैं जिससे बालक सामूहिक व्यवहार में दक्ष हो सके।

समूह परामर्श एक प्रक्रिया है जिसमें एक परामर्श अब एक ही समय में कई प्रार्थियो के साथ कार्यरत रहता है।

समूह परामर्श व्यक्तिगत परामर्श का वर्णन है जहां सदस्यों के मध्य खुले संप्रेषण को प्रोत्साहित किया जाता है।इसमें ऐसा वातावरण बनाए रखा जाता है जो व्यक्ति को एक दूसरे के विचारों को समझने तथा मूल्यांकन के लिए प्रेरित करता है। किस प्रक्रिया द्वारा नकारात्मक भावनाएं शांत होती हैं।

समूह परामर्श

समूह परामर्श की विशेषताएं

कार्ट, राइट तथा जॉन्डर के अनुसार समूह में व्यक्तियों में निम्न विशेषताएं परिलक्षित होती हैं-

  1. समूह में व्यक्ति पारस्परिक अंत: क्रिया करते हैं।
  2. वे स्वयं को समूह के सदस्य के रूप में परिभाषित करते हैं।
  3. सामान्य रुचि के विषयों पर वह सामान्य मानकों को स्वीकारते हैं।
  4. वे वातावरण के प्रति एक इकाई के रूप में क्रियाशील होते हैं।

गजाजा के अनुसार समूह परामर्श की निम्न तीन विशेषताएं हैं –

  1. यह सचेतन व्यवहार तथा विचारों पर केंद्रित होता है।
  2. इसके अंतर्गत उनमुक्ता, यथार्थ उन्मुक्तता, पारस्परिक विश्वास, आपसी समझ तथा स्वीकृति की भावना पाई जाती है।
  3. इसमें मूल रूप से सामान्य व्यक्तियों का समूह होता है।
समूह परामर्श

समूह परामर्श के उद्देश्य

नॉरिस एवं जेरन के अनुसार समूह निर्देशन के निम्न उद्देश्य हैं-

  1. सामान्य प्रकृति की समस्याओं को ज्ञात करना।
  2. समूह स्थिति के सहयोगी व सहायक मूल्यों को ज्ञात करना।
  3. परामर्श व अन्य निर्देशन सेवाओं की उपलब्धता तथा आवश्यकता हेतु जागरूकता पैदा करना।
  4. विद्यार्थियों को जीवन के विविध सामान्य व विशिष्ट क्रिया पक्षों से अवगत कराना।
  5. विद्यार्थियों को विभिन्न शैक्षिक एवं व्यवसाय तथा सामाजिक क्रिया हेतु उनका वास्तविक मूल्यांकन करने हेतु सहायता देना।
  6. व्यक्तिगत परामर्श के इच्छुक विद्यार्थियों का पता लगाना।
  7. सभी विद्यार्थियों को ज्ञान की नई दिशा दिखाना अर्थात जो बातें हुए विस्मृत कर चुके हैं। उन्हें थोड़ा समय लगा कर सामूहिक ढंग से विद्यार्थियों को पुनः ताजा करना।
  8. किन्हीं विशेष प्रकार की सूचनाओं को समूह में अधिक प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करना।
  9. रचनात्मक अभिवृत्तियों व रुचियों का विकास करना।
  10. समूह के सभी व्यक्तियों के अनुभवों को समूह के प्रत्येक सदस्य के लाभार्थ संकलित करना।
निर्देशन अर्थ उद्देश्य विशेषताएंव्यावसायिक निर्देशन
भारत में निर्देशन की समस्याएंशैक्षिक निर्देशन
शैक्षिक व व्यावसायिक निर्देशन में अंतरएक अच्छे परामर्शदाता के गुण व कार्य
परामर्श अर्थ विशेषताएं उद्देश्यसमूह निर्देशन
व्यक्तित्वसमूह गतिशीलता
समूह परामर्शसूचना सेवा
बुद्धिरुचि

One Word Substitution

One Word Substitution is an important part of the English vocabulary. One word can take place for a bundle of words. As the name suggests, questions based on this concept ask you to replace a given sentence with an appropriate word. Such questions frequently feature in the verbal section of many competitive exams. It is one of the integral parts of vocabulary. It simply means that a sentence has to be replaced with a single word.

One Word Substitution

One Word Substitution

A-One Word Substitution question requires you to replace a sentence with a single word. There will be 5 stages to get the expert certificate. You need to clear all the stages of challenges. Each stage contains 200 questions.

One Word Substitutions form an essential part of the vocabulary. As the name suggests, questions based on this concept ask you to replace a given sentence with an appropriate word. Such questions frequently feature in the verbal section of many competitive exams. In this series of articles, you will be acquainted with the concept of one-word substitutions. You are presented with the list of most commonly asked one-word substitutions. Each list contains 15-40 words/terms of a particular category. Learn the essential words and enhance your vocabulary.

  1. Fields of Study
  2. People Likes & Dislikes
  3. Beliefs
  4. Governance
  5. Killings & Manias
  6. Speech & Writing
  7. Things
  8. Events & Places
  9. Food Eaters
  10. Action
  11. Time & Direction
One Word Substitution
TopicOne Word Substitution
SubjectEnglish
CategoryQuestion Practice
Sub CategoryEnglish Vocabulary
Websitesarkarifocus.com

One Word Substitution Question Paper

Test Name One Word Substitution Question Practice
Total Question 50
Maximum Time 30 मिनट

Leaderboard: One Word Substitution

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समूह निर्देशन

निर्देशन कार्यक्रम के आधारभूत तत्वों को मितव्ययता, कुशलता एवं प्रभावी ढंग से पूर्ण करने का एक साधन समूह निर्देशन है।यह निर्देशन की एक पद्धति है जिसके द्वारा छात्रों को उनके विकास में सहायता प्रदान की जाती है। सामूहिक निर्देशन क्रियाएं अन्य क्रियाओं में सहयोग प्रदान करती हैं। उनका विकल्प नहीं है। निसंदेह पहले निर्देशन पर व्यक्तिगत प्रक्रिया के रूप में विशेष बल दिया गया किंतु वर्तमान में शैक्षिक, सामाजिक व सांस्कृतिक मूल्यों में परिवर्तन के फल स्वरुप सामूहिक निर्देशन की ओर विद्वानों का ध्यान आकृष्ट हुआ।

विद्यार्थियों की बहुत सी आवश्यकताओं की पूर्ति सर्वोत्तम ढंग से समूह में कार्य करने पर होती है। निर्देशन सेवाओं में संतुलित कार्यक्रम में व्यक्तिगत व सामूहिक कार्य एक दूसरे के पूरक होते हैं।

समूह निर्देशन

समूह निर्देशन किसी भी समूह का वह उद्यम है जिसमें व्यक्ति को समूह में अपनी समस्या का समाधान सुझाया जाता है और समायोजन का प्रयास किया जाता है।

समूह निर्देशन प्रक्रिया में समूह को सार्थक अनुभव प्रदान किए जाते हैं जिससे बालक सामाजिक व्यवहार में दक्ष हो सके।

व्यावसायिक निर्देशन, शैक्षिक पर्यवेक्षण, समूह निर्देशन
समूह निर्देशन

समूह निर्देशन वाह कोई भी सामूहिक क्रिया है जो कुल निर्देशन कार्यक्रम को सुविधा देने या सुधार करने हेतु संपन्न की जाती है।

सामूहिक निर्देशन व्यक्ति के उत्तम विकास में सामूहिक अनुभवों में सहायता प्रदान करने एवं शिक्षित उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु चेतनापूर्ण प्रयास है।

समूह निर्देशन की आवश्यकता

समूह निर्देशन की आवश्यकता इसलिए है-

  1. समूह में विद्यार्थियों को भावात्मक अभिव्यक्ति का अवसर प्राप्त होता है जिसके कारण तनाव में न्यूनता आती है।
  2. विद्यालय में अनेक विद्यार्थियों की समस्याएं समान होती हैं यदि इन पर पृथक पृथक रूप से विचार किया जाए तो अधिक समय लगता है। अतः समय की बचत हेतु सामान्य समस्याओं पर एक समूह में विचार विनिमय करना अधिक औचित्यपूर्ण है।
  3. अधिकांश विद्यालयों में पर्याप्त निर्देशन कार्मिक हो यह आवश्यक नहीं। अतः निर्देशन कार्यकर्ता के लिए बढ़ती हुई विद्यार्थी संख्या के कारण व्यक्तिगत रूप से निर्देशन देना संभव नहीं हो पाता।
  4. कुछ क्रियाओं हेतु सामूहिक निर्देशन उपयुक्त रहता है। यथा व्यवसाय के बारे में, शिक्षण संस्थाओं के बारे में, विद्यालय नियमों के बारे में, समान अधिगम संबंधी कठिनाइयों को हल करने हेतु।
  5. व्यक्तिगत परामर्श के लिए उचित पृष्ठभूमि तैयार करने में सहायक विद्यार्थी समूह निर्देशन की प्रक्रिया के दौरान परामर्श किया निर्देशन परामर्शदाता से परिचित हो जाते हैं फिर उनको अपनी व्यक्तिगत समस्याओं हेतु उनके पास जाने में संकोच नहीं होता है।
  6. विद्यार्थियों के मन से यह भावना दूर हो जाती है कि अमुक समस्या उनकी ही है।समूह में उन्हें आभास होता है कि ऐसी समस्याएं अन्यों की भी हैं। इससे उनके मन का संकोच समाप्त हो जाता है।
  7. समूह में विद्यार्थी मनोभावों पर नियंत्रण करना सीखते हैं व उनमें उचित अभिवृत्ति ओं का विकास होता है। इस प्रकार समूह निर्देशन व्यक्तित्व विकास में सहायक होता है।
  8. सभी वर्ग के विद्यार्थियों के प्रति समान भाव रखने की वृद्धि का विकास होता है। पिछड़े, भिन्न आर्थिक स्तर वाले, भिन्न लिंगी विद्यार्थियों के प्रति उनका दृष्टिकोण विकसित होता है।
  9. निर्देशन कर्मिको की कुशलता में वृद्धि होती है। समूह निर्देशन के माध्यम से वह अनेक विद्यार्थियों के संपर्क में आता है। जिससे वह भिन्न-भिन्न प्रकार की समस्याओं से अवगत होता है और अपनी निर्देशन सेवा में सुधार करने के लिए प्रोत्साहित होता है।
समूह निर्देशन
समूह निर्देशन

समूह निर्देशन के उद्देश्य

आर्थर ई• ट्रेक्सलर ने समूह निर्देशन के पांच उद्देश्य बताएं हैं-

  1. उपस्थापन
  2. सीखने के अनुभवों की व्यवस्था
  3. व्यक्तिगत परामर्श की आवश्यकता का अनुभव होने पर उसकी व्यवस्था
  4. समायोजन एवं चिकित्सा

1. उपस्थापन

विद्यार्थियों को अपरिचित वातावरण तथा नवीन अनुभवों का ज्ञान कराना। नए विद्यालयों महाविद्यालयों में प्रवेश लेने के बाद छात्र कुसुमायोजित ना हो सके। इसके लिए उन्हें परिदर्शन की व्यवस्था कर विद्यार्थियों को वहां के माहौल से परिचित करा दिया जाए। शैक्षिक अवसरों एवं व्यावसायिक संभावनाओं की विविधता की जानकारी भी सामूहिक निर्देशन से दी जा सकती है।

2. सीखने के अनुभवों की व्यवस्था

विद्यार्थियों के कुछ अनुभव कक्षा में विषयाध्ययन द्वारा प्राप्त अनुभवों से भिन्न हो सकते हैं। यथा पुस्तकालय के उपयोग को समझना, सामान्य रुचि वाले व्यवसायियों की जानकारी देना आदि। इन्हें समूह निर्देशन द्वारा प्रदान किया जा सकता है।

समूह निर्देशन

3. व्यक्तिगत परामर्श की आवश्यकता का अनुभव होने पर उसकी व्यवस्था

यदि विद्यार्थी की सामूहिक निर्देशन से समस्या का हल नहीं निकलता है तो वह व्यक्ति निर्देशन की आवश्यकता का अनुभव करता है और वह परामर्शक के पास वार्ता हेतु जाता है तो इस समय इस सम्मेलन की भूमिका तैयार करने में समय नष्ट होने से बच सकता है।

4. समायोजन एवं चिकित्सा

समूह निर्देशन का एक उद्देश्य समायोजन में सहायता देना है।कई बार सामूहिक वार्ता के समय यह पता लगाया जा सकता है कि कौन समायोजन संबंधी समस्या का सामना कर रहा है। समूह निर्देशन के माध्यम से चिकित्सा संबंधी कार्य भी संपन्न हो सकता है।

निर्देशन अर्थ उद्देश्य विशेषताएंव्यावसायिक निर्देशन
भारत में निर्देशन की समस्याएंशैक्षिक निर्देशन
शैक्षिक व व्यावसायिक निर्देशन में अंतरएक अच्छे परामर्शदाता के गुण व कार्य
परामर्श अर्थ विशेषताएं उद्देश्यसमूह निर्देशन
व्यक्तित्वसमूह गतिशीलता
समूह परामर्शसूचना सेवा
बुद्धिरुचि

एक अच्छे परामर्शदाता के गुण व कार्य

एक अच्छे परामर्शदाता में किसी एक विशेषता का समावेश न होकर अनेक गुणों एवं विशेषताओं का समावेश होता है। एक परामर्शदाता के गुणों एवं विशेषताओं के बारे में हार्डी महोदय का कहना है-

यदि कोई व्यक्ति उन विशेषताओं की सूची तैयार करें जिनका परामर्शदाता में होना आवश्यक है तो सूची सर्वोत्तम गुणों के संग्रह में समान हो सकती है।

केलर के अनुसार एक परामर्शदाता में निम्नलिखित गुणों का होना आवश्यक है-

  • गहरा विशिष्ट ज्ञान
  • साक्षात्कार, परीक्षण तथा नियोजन की तकनीक में कुशलता।
  • अच्छी आधार शक्ति।
  • विवेकशीलता, उत्साह एवं संवेदनशीलता, सहानुभूति।
एक अच्छे परामर्शदाता के गुण व कार्य

एक अच्छे परामर्शदाता के गुण

कुछ मुख्य विद्वानों के अनुसार एक अच्छे परामर्शदाता में निम्नलिखित गुणों एवं विशेषताओं का होना आवश्यक है-

  1. परामर्शदाता को छात्रों की सभी प्रकार की सूचियों के बारे में संपूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए पूर्ण रूप से प्रशिक्षित होना चाहिए।
  2. परामर्शदाता की विभिन्न व्यवसाय से संबंधित संपूर्ण जानकारी आवश्यक है। साथ ही उसे विभिन्न विषयों एवं भविष्य में उत्पन्न होने वाले नए नए रोजगार के बारे में गहन एवं विशिष्ट ज्ञान होना चाहिए।
  3. परामर्शदाता को अपने छात्रों के प्रति तथा परामर्श चाहने वाले के प्रति नम्र होना चाहिए।
  4. परामर्शदाता को विद्यालय के भौतिक साधनों, मानवीय साधनों तथा विभिन्न व्यवसाय से संबंधित पर्याप्त जानकारी होनी चाहिए।
  5. एक अच्छे परामर्शदाता को मानव व्यवहार के मूल सिद्धांतों के बारे में पूरी जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है।
  6. एक अच्छे परामर्शदाता को आसपास के सामाजिक, भौतिक, व्यावसायिक तथा सांस्कृतिक वातावरण के बारे में गहन सामान्य ज्ञान होना चाहिए।
  7. परामर्शदाता में कितनी शैक्षिक योग्यता होनी चाहिए कि बाल एवं किशोर मनोविज्ञान से वह पूरी तरह परिचित हो।
  8. परामर्शदाता को छात्रों की विभिन्न प्रकार की समस्याओं को समझने तथा जानने के लिए कार्य का स्वयं अनुभव होना चाहिए।
प्रबन्धन, शैक्षिक निर्देशन, परामर्शदाता

एक अच्छे परामर्शदाता के कार्य

परामर्शदाता बहुत से कार्य और सेवाओं का निर्वहन करता है, जिनमे से कुछ निम्न हैं-

  1. व्यक्तिगत परामर्श – परामर्शदाता विद्यालय में अलग से समय निर्धारित कर छात्रों को उनकी शैक्षिक और व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान के लिए परामर्श प्रक्रिया को पूरा करता है।
  2. सामूहिक परामर्श – परामर्शदाता छात्रों के छोटे-छोटे समूह बनाकर उनको समस्याओं के समाधान हेतु प्रेरित करता है। छात्रों के विचारों और आवश्यकताओं को समझकर शैक्षिक योजना का निर्माण करता है।
  3. अर्पण कार्य – परामर्शदाता एक अर्पण कार्यकर्ता की भांति कार्य करता है। वहां छात्रों की समस्या के समाधान हेतु उनके परिवार और अन्य स्रोतों से प्राप्त अभिलेखों के साथ परामर्शी को अन्य परामर्शदाता के पास भी भेज सकता है तथा दूसरों से प्राप्त करता है।
  4. परामर्शदाता छात्र की योग्यता और आवश्यकता के अनुरूप शिक्षकों और अभिभावकों को सलाह व सुझाव देता है।
  5. छात्रों की अभिवृद्धि रुचि, योग्यता क्षमता के अनुरूप उन्हें रोजगार परक विषयों के चयन करने में सहायता प्रदान करता है ताकि भविष्य में जीवन में सफल हो सके।
  6. परामर्शदाता अपने कार्यों और सेवाओं द्वारा छात्र, परिवार, शिक्षकों, प्रधानाचार्य एवं चिकित्सकों के मध्य समन्वय स्थापित करने का कार्य करता है। उदाहरण के तौर पर परामर्शदाता विद्यालयों में मानवीयकृत परीक्षण के सत्र के आयोजन के लिए छात्रों शिक्षकों और प्रशासकों के मध्य समन्वय का कार्य करता है।
  7. मूल्यांकन के द्वारा परामर्शी की क्रियाओं और सफलता की प्रभाव वक्ता का मापन किया जाता है।
प्रधानाचार्य के कर्तव्य, परामर्शदाता
परामर्शदाता
  1. शोधकार्य – परामर्शदाता निरंतर शोधकार्य में संलग्न रहता है तथा उस कार्य का उपयोग भावी परिस्थितियों में परामर्शदाता स्वयं अथवा अन्य परामर्श को द्वारा परामर्श सेवा में किया जाता है। इन कार्यों के अतिरिक्त परामर्शदाता निम्न कार्य करता है-
    1. परामर्शदाता को अपने क्षेत्र अथवा सीमा के बाहर नहीं जाना चाहिए।
    2. परामर्शदाता का लक्ष्य सेवार्थी को समस्या से परिचित कराना है
    3. परामर्शदाता को किसी वस्तु को सही करने वाले के रूप में कार्य करना चाहिए।
    4. परामर्शदाता को सेवार्थी के समक्ष समस्त संभावनाओं को प्रस्तुत कर देना चाहिए।
    5. अंतिम निर्णय सेवार्थी को लेने में सहयोग करना।
    6. परामर्शदाता को सेवार्थी की समस्या पर विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार करना चाहिए।
    7. विभिन्न व्यवसायों से संबंधित सूचनाओं को एकत्रित करना
    8. समुचित भौतिक परिस्थितियां तथा सेवाएं उपलब्ध कराना
    9. उचित अनुमोदन तथा प्रक्रिया का अनुसरण करना
    10. सेवार्थी से संबंधित विभिन्न आंकड़ों का संकलन करना।
निर्देशन अर्थ उद्देश्य विशेषताएंव्यावसायिक निर्देशन
भारत में निर्देशन की समस्याएंशैक्षिक निर्देशन
शैक्षिक व व्यावसायिक निर्देशन में अंतरएक अच्छे परामर्शदाता के गुण व कार्य
परामर्श अर्थ विशेषताएं उद्देश्यसमूह निर्देशन
व्यक्तित्वसमूह गतिशीलता
समूह परामर्शसूचना सेवा
बुद्धिरुचि

परामर्श अर्थ विशेषताएं उद्देश्य

निर्देशन तथा परामर्श एक सिक्के के दो पहलू हैं। एक दूसरे के अभाव में दोनों निष्प्राण रहते हैं। परामर्श शब्द दो व्यक्तियों के संपर्क को व्यक्त करता है। परामर्श प्रक्रिया में एक परामर्श देने वाला और दूसरा परामर्श चाहने वाला या परामर्श प्रार्थी होता है। परामर्श की प्रक्रिया के अंतर्गत उन सभी प्रकार की स्थितियों का समावेश होता है, जिनमें परामर्शदाता परामर्श चाहने वाले की समस्या को समझाने का प्रयास करता है।

उसके बारे में परामर्शदाता तथा परामर्श चाहने वाले दोनों के बीच विचारों का आदान-प्रदान अर्थात् पारस्परिक बातचीत होती है और अंत में परामर्श चाहने वाले अर्थात् परामर्श प्रार्थी की समस्या का समाधान करने में परामर्शदाता सहायता करता है।

परामर्श

परामर्श

विभिन्न निर्देशन शास्त्रियों ने निर्देशन सेवाओं को ध्यान में रखकर अपने अपने दृष्टिकोण के अनुसार परामर्श के संबंध में अनेक परिभाषाएं दी हैं। इनमें से परामर्श की कुछ परिभाषाएं निम्न है-

साक्षात्कार के समान परामर्श में आमने-सामने का, व्यक्ति से व्यक्ति का संपर्क होता है।

पूछताछ, पारस्परिक तर्क वितर्क या विचारों का पारस्परिक विनिमय है।

परामर्श साक्षात्कार विधि के द्वारा किसी व्यक्ति को अपनी समस्याओं का समाधान करने में सहायता देने की प्रक्रिया है।

परामर्श विद्यालय और अन्य संस्थाओं के कर्मचारियों की सेवाओं का व्यक्तियों की समस्याओं के लिए किए जाने वाला उपयोग है।

परामर्श का अभिप्राय है दो व्यक्तियों का संपर्क जिसमें एक व्यक्ति को किसी प्रकार की सहायता दी जाती है।

अतः हम कह सकते हैं की परामर्श मुख्य रूप से दो व्यक्तियों के बीच संपर्क है जिसके अंतर्गत एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को समझने में सहायता देता है। परामर्श की प्रक्रिया में परामर्शदाता तथा परामर्श चाहने वाला दोनों आमने-सामने होते हैं तथा परामर्शदाता परामर्श प्रार्थी को उसकी समस्याओं का समाधान ढूंढने में सहायता देता है।

ऊपर दी गई विभिन्न परिभाषाओं के आधार पर परामर्श के संबंध में निम्नलिखित 3 तथ्य निकलते हैं-

  1. परामर्श प्रक्रिया में दो व्यक्तियों का संपर्क होता है।
  2. परामर्शदाता और परामर्श प्रार्थी के बीच विचार-विमर्श के अनेक साधन हो सकते हैं।
  3. परामर्श के कार्य के लिए प्रशिक्षित एवं अनुभवी व्यक्ति का होना आवश्यक है।
परामर्श की विशेषताएं

परामर्श की विशेषताएं

विभिन्न विद्वानों ने परामर्श की विभिन्न विशेषताएं बताई हैं। जिनमें से कुछ निम्न है-

  1. परामर्श में किसी व्यक्ति की समस्याओं का समाधान नहीं किया जाता, अपितु उसे अपनी समस्या का समाधान करने में सहायता दी जाती है।
  2. परामर्श में केवल दो व्यक्तियों का संपर्क होता है। यदि दो से अधिक व्यक्ति उसमें शामिल हो तो उसे हम परामर्श नहीं कर सकते।
  3. परामर्श सलाह देना नहीं है और ना ही परामर्शदाता द्वारा परामर्श प्रार्थी के लिए किसी प्रकार का निर्णय करना है। निर्णय को तो वह स्वयं व्यक्ति या परामर्श प्रार्थी पर छोड़ देता है।
  4. परामर्श में व्यक्ति को दी जाने वाली सहायता प्रत्यक्ष सलाह या उपयोगी सूचना प्रदान करते नहीं बल्कि प्रशिक्षित परामर्शदाता के द्वारा व्यक्तिगत मुलाकातों के द्वारा दी जाती है।
  5. परामर्श की प्रक्रिया की समाप्ति उसी समय हो जाती है जब परामर्शदाता व्यक्ति को किसी निर्णय पर पहुंचने में सहायता देता है।

परामर्श के उद्देश्य

परामर्श के उद्देश्य बहुत व्यापक हैं। अतः उन सबका वर्णन करना कठिन है। कुछ महत्वपूर्ण विद्वानों द्वारा बताए गए परामर्श के उद्देश्य से निम्न है-

परामर्श के उद्देश्य

राबर्ट्स के अनुसार परामर्श के उद्देश्य

राबर्ट्स ने परामर्श के निम्नलिखित उद्देश्य बताएं हैं-

  1. व्यक्ति को अपनी समस्याओं के स्वयं समाधान की योजनाएं बनाने में सहायता देना।
  2. व्यक्ति को खुद से संबंधित तथ्यों की व्याख्या करने में सहायता प्रदान करना।
  3. व्यक्ति को अपनी योजनाओं को पूरा करने की दिशा में कार्य प्रारंभ करने में सहायता करना।
  4. व्यक्ति की शैक्षिक, व्यवसायिक, व्यक्तिक समस्याओं को समझाने में सहायता देना।
  5. व्यक्ति को अपनी योजनाओं में आवश्यक फेर-बदल करने में सहायता देना।

हार्डी के अनुसार परामर्श के उद्देश्य

हार्डी ने परामर्श के निम्नलिखित तीन उद्देश्य बताएं हैं-

  1. व्यक्ति को खुद के विकास से संबंधित उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायता देना।
  2. व्यक्ति को अपने समाज में उचित समझे जाने वाले ज्ञान दृष्टिकोण तथा कुशलता ओं को प्राप्त करने में सहायता प्रदान करना।
  3. पारिवारिक जीवन, व्यवसाय एवं नागरिकता से संबंधित क्षेत्रों में व्यक्ति को अपने उद्देश्यों को निर्धारित करने में सहायता करना।

थट तथा गेरविरच ने परामर्श के उद्देश्यों को अत्यंत संक्षेप में इस प्रकार कहा है

परामर्श का उद्देश्य छात्रों को अपनी समस्याओं का समाधान करने में इस प्रकार सहायता देने के अवसर प्रदान करना है, जिससे कि किसी प्रकार की सहायता के बिना समस्याओं का समाधान करने की उनकी योग्यता का विकास हो जाए।

अमेरिकन मनोवैज्ञानिक संघ ने परामर्श के उद्देश्यों को निम्न शब्दों में परिभाषित किया है

  1. परामर्श प्रार्थी द्वारा अपनी क्षमताओं अभी प्रेरकों तथा आत्म दृष्टिकोणों की यथार्थ स्वीकृति।
  2. परामर्श प्रार्थी के द्वारा सामाजिक, आर्थिक तथा व्यावसायिक परिवेश के साथ तर्कसंगत सामंजस्य की प्राप्ति।
  3. व्यक्तिक भिन्नताओं की समाज द्वारा स्वीकृति तथा समुदाय, रोजगार एवं वैवाहिक संबंधी के क्षेत्र में उनका निहितार्थ।

उपर्युक्त उद्देश्यों के विश्लेषण के आधार पर निम्न बिंदु ध्यान में आते हैं-

  1. परामर्श का लक्ष्य व्यक्ति को अपने संबंधों में सही मूल्यांकन प्राप्त करना है।
  2. व्यक्ति को अपने परिवेश के साथ सामंजस्य स्थापित करना।
  3. समाज में उपलब्ध आर्थिक एवं व्यावसायिक क्षेत्रों एवं संभावनाओं को उसे अपनी योग्यताओं एवं सीमाओं के संदर्भ में देखना।
  4. व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य के लिए जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उसका सामंजस्य वास्तविक धरातल पर करना।
परामर्श के सिद्धांत

परामर्श के सिद्धांत

परामर्श के सिद्धांत निम्न है-

  1. स्वीकृति – परामर्श से संबंधित सभी विचारधाराएं यह मानती हैं कि परामर्श प्रार्थी को एक पूर्ण मनुष्य या मानव समझना चाहिए।
  2. व्यक्ति के लिए आदर भाव – निर्देशन तथा परामर्श की सभी विचारधाराएं इस बात से सहमत हैं कि व्यक्ति का आदर किया जाना चाहिए।
  3. आशा – सभी विचारधाराएं परामर्श के आशा के तत्व अर्थात सापेक्ष संबंधों को स्वीकार करती हैं।
  4. सीखना – परामर्श की सभी विचारधाराएं सीखने के महत्व को स्वीकार करती हैं।
  5. परामर्श-प्रार्थी के साथ सोचना – परामर्श में प्रार्थी के लिए सोचने की अपेक्षा प्रार्थी के साथ उसके विचारों के अनुकूल सोचकर परामर्श देना सर्वमान्य सिद्धांत है।

परामर्श की आवश्यकता

परामर्श निर्देशन कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण अंग है। परामर्श के बिना विद्यालय से संबंधित निर्देशन कार्यक्रम को सुचारू रूप से संपन्न नहीं किया जा सकता है। परामर्श व्यक्ति की व्यक्तिक, शैक्षिक व्यवसायिक तथा मनोवैज्ञानिक क्षेत्र से संबंधित समस्याओं को हल करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

छात्रों के लिए परामर्श की आवश्यकता

परामर्श निर्देशन कार्यक्रम का एक अत्यधिक महत्वपूर्ण अंग है। परामर्श के बिना निर्देशन कार्य को सुचारू रूप से नहीं चलाया जा सकता है। स्कूलों में छात्रों की वर्तमान समस्याओं के समाधान के लिए तथा भावी समस्याओं की रक्षा हेतु परामर्श अत्यंत आवश्यक है। छात्रों के द्वारा अपनी शिक्षा से अधिक से अधिक लाभ उठाने की योग्यता प्रदान करने के लिए भी परामर्श आवश्यक है।

परामर्श छात्रों के व्यक्तिक समायोजन के लिए भी बहुत जरूरी है। परामर्श छात्र का शैक्षिक विकास करने में समय समय पर छात्र का अर्थ मूल्यांकन करने में तथा छात्र के व्यक्तित्व का एकीकारण करने में सहायता प्रदान करता है। अत: यह कहा जा सकता है कि छात्र के व्यक्तिक और व्यावसायिक समायोजन के लिए उसके शैक्षिक कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए शैक्षिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए परामर्श अत्यंत आवश्यक है।

परामर्श की आवश्यकता

परामर्श का निर्देशन में महत्व

निर्देशन की प्रक्रिया में परामर्श का अत्यधिक महत्व है। इस महत्व को निम्न प्रकार से प्रकट किया जा सकता है-

  1. जब शिक्षक एवं छात्र में संबंध स्थापित हो जाता है वहीं कुछ समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। उनका उचित समाधान परामर्श के द्वारा किया जा सकता है।
  2. जो प्रश्न छात्र के भावी व्यवसाय चयन से संबंध रखते हैं उनका निराकरण परामर्श सेवा द्वारा किया जा सकता है।
  3. विशेषकर किशोरावस्था में भावी जीवन को व्यवस्थित करने संबंधी सुझाव अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इस काल को जीवन का सबसे कठिन काल माना गया है। किस काल में स्व समंजन, परिवार समंजन के प्रश्नों का हल परामर्श से ही किया जा सकता है।
  4. वर्तमान समाज आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक एवं नैतिक रूप से अत्यंत जटिल हो गया है। इस कारण अध्यापक उचित रूप से परामर्श नहीं दे पाता। इसके लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित परामर्शदाताओं की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि जटिल समाज में परामर्श का क्षेत्र, रूप, आकार एवं अर्थ बदल गया है। इसी कारण परामर्श की आवश्यकता है।
  5. परामर्श साक्षात्कार के माध्यम से छात्रों की योग्यताओं, अभिरुचियों, प्रतिभाओं का पता लगाकर परामर्शदाता योग्य मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है।
निर्देशन अर्थ उद्देश्य विशेषताएंव्यावसायिक निर्देशन
भारत में निर्देशन की समस्याएंशैक्षिक निर्देशन
शैक्षिक व व्यावसायिक निर्देशन में अंतरएक अच्छे परामर्शदाता के गुण व कार्य
परामर्श अर्थ विशेषताएं उद्देश्यसमूह निर्देशन
व्यक्तित्वसमूह गतिशीलता
समूह परामर्शसूचना सेवा
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शैक्षिक व व्यावसायिक निर्देशन में अंतर

शैक्षिक तथा व्यावसायिक निर्देशन के बीच परस्पर गहरा संबंध है। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को अजीब का कमाने के योग्य बनाना है। व्यावसायिक निर्देशन का आधार शैक्षिक उपलब्धि है। शिक्षा शास्त्री दोनों के रूप में कोई अंतर नहीं मानते परंतु फिर भी सूक्ष्मता की दृष्टि से दोनों में निम्न अंतर पाया जाता है।

शैक्षिक व व्यावसायिक निर्देशन में अंतर

शैक्षिक व व्यावसायिक निर्देशन में अंतर

क्रम संख्याशैक्षिक निर्देशनव्यावसायिक निर्देशन
1.शैक्षिक निर्देशन में छात्रों को विभिन्न शैक्षिक विषयों तथा संस्थाओं के बारे में जानकारी प्रदान की जाती है।व्यावसायिक निर्देशन में विभिन्न व्यावसायिक विषयों तथा व्यावसायिक संस्थाओं के बारे में जानकारी प्रदान की जाती है।
2.शैक्षिक निर्देशन में छात्रों के बौद्धिक विकास पर अधिक जोर दिया जाता है।व्यावसायिक निर्देशन में व्यावहारिक पक्ष पर अधिक जोर दिया जाता है।
3.शैक्षिक विकास में छात्रों की व्यक्तिगत भिन्नता तथा शैक्षिक अवसरों की विविधता में संतुलन रखा जाता है।व्यावसायिक निर्देशन में व्यावसायिक विकास पर जोर दिया जाता है।
4.शैक्षिक निर्देशन में पाठ्यक्रम के बारे में जानकारी दी जाती है।व्यावसायिक निर्देशन में व्यवसाय संबंधी जानकारी दी जाती है।
5.शैक्षिक निर्देशन उपयुक्त पाठ्यक्रम को चुनने में सहायता प्रदान करता है।व्यावसायिक निर्देशन उपयुक्त व्यवसाय को चुनने में सहायता प्रदान करता है।
6.शैक्षिक निर्देशन में अन्य विधियों के साथ निबंधात्मक परीक्षा प्रणाली ही उपयुक्त है।व्यावसायिक निर्देशन मानवीयकृत परीक्षा प्रणाली पर आधारित होता है।
7.शैक्षिक निर्देशन का प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर पर विशेष महत्व है।व्यावसायिक निर्देशन उच्च माध्यमिक स्तर पर अधिक महत्वपूर्ण है।
8.शैक्षिक निर्देशन सामान्य अध्यापकों के सहयोग से भी सफल हो सकता है।व्यावसायिक निर्देशन के लिए प्रशिक्षित तथा अनुभवी व्यक्तियों का योगदान आवश्यक है।
निर्देशन अर्थ उद्देश्य विशेषताएंव्यावसायिक निर्देशन
भारत में निर्देशन की समस्याएंशैक्षिक निर्देशन
शैक्षिक व व्यावसायिक निर्देशन में अंतरएक अच्छे परामर्शदाता के गुण व कार्य
परामर्श अर्थ विशेषताएं उद्देश्यसमूह निर्देशन
व्यक्तित्वसमूह गतिशीलता
समूह परामर्शसूचना सेवा
बुद्धिरुचि

शैक्षिक निर्देशन

Contents

शैक्षिक निर्देशन – शिक्षा के क्षेत्र में अपव्यय तथा औरोधन बहुत है। परीक्षा में असफल रहने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। रुचियो, प्रतिभाओं और क्षमताओं को धारण करने वाले विद्यार्थियों का विकास नहीं हो रहा। विद्यालय तथा जीवन में सामंजस्य प्राप्त करने में विद्यार्थियों को कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में शैक्षिक निर्देशन का महत्व बढ़ रहा है। अधिकतर ‌’शैक्षिक निर्देशन का अर्थ’ निर्देशन के रूप में शिक्षा से लगाया जाता है लेकिन यह उचित नहीं है।

वास्तव में शैक्षिक निर्देशन का संबंध मुख्य रूप से शिक्षा की इस प्रकार की समस्या से है। जिन्हें छात्र अपने व्यवसायिक तैयारियों के सिलसिले में विभिन्न व्यवसायों के अध्ययन में महसूस करते हैं। विभिन्न विद्वानों ने शैक्षिक निर्देशन को व्यापक रूप में माना है। ब्रेवर महोदय ने निर्देशन का इतना व्यापक अर्थ लिया है की शिक्षा और शैक्षिक निर्देशन में अंतर करना कठिन हो जाता है। सरल व्यापक अर्थ लिया है की शिक्षा और शैक्षिक निर्देशन में अंतर करना कठिन हो जाता है।

शैक्षिक निर्देशन

शिक्षा के क्षेत्र में अपनाए गए निर्देश के कार्यक्रम को ही शैक्षिक निर्देशन कहा जाता है।

शैक्षिक निर्देशन का कार्य छात्रों को पाठ्य- विषयों को चुनने, शिक्षा में सफलता प्रदान करने और शिक्षा प्राप्त करते समय उत्पन्न होने वाली समस्याओं का समाधान करना है। इसके अतिरिक्त आज के इस जटिल और प्रतिस्पर्धात्मक युग में विद्यार्थी को अपने अध्ययन काल में ही अनेक प्रकार की शैक्षिक वातावरण से संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं का समाधान शैक्षिक निर्देशन के द्वारा किया जाता है।

प्रबन्धन, शैक्षिक निर्देशन
शैक्षिक निर्देशन

शैक्षिक निर्देशन का संबंध विद्यार्थी और विद्यालय जगत से होता है। ऐसा निर्देशन विद्यार्थी की रुचियां, क्षमताओं, कुशलताऔ एवं योग्यताओं का पता लगाकर उनके व्यक्तित्व का सर्वागीण विकास कराने में सहायक होता है। भिन्न-भिन्न विद्वानों और शिक्षा स्त्रियों शारिश्रयो ने शैक्षिक निर्देशन को भिन्न भिन्न प्रकार से परिभाषित किया है। उनमें से कुछ प्रमुख विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाएं इस प्रकार हैं।

शैक्षिक निर्देशन परिभाषा

शैक्षिक निर्देशन की परिभाषा व्यक्ति के मानसिक विकास में सहायता देने के लिए सचेत प्रयास के रूप से दी जा सकती है। कोई भी बात जिसका संबंध सीखने शिक्षा से हो, शैक्षिक निर्देशन शब्द के अंतर्गत है।

शैक्षिक निर्देशन का संबंध उस सहायता से होता है जो छात्रों को उनके विद्यालय, पाठ्यक्रम विषयों के चुनावो और समायोजनो एवं उनकी शैक्षिक उपलब्धियों के बारे में दी जाती है।

शैक्षिक निर्देशन का संबंध स्कूल के प्रत्येक पहलू से है। जैसे कि पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियों, पढ़ाई के निरीक्षण, अनुशासन विधियां, उपस्थित, योजनाबद्घता की समस्याएं, पाठ्य-अतिरिक्त क्रियाएं , स्वास्थ्य तथा शारीरिक योग्यता कार्यक्रम तथा घर और समुदाय इत्यादि।

शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने का मुख्य उद्देश्य समुचित कार्यक्रम चुनाव तथा उनके प्रकृत करने में सहायता देना है।

निर्देशन, शैक्षिक निर्देशन
शैक्षिक निर्देशन

शैक्षिक निर्देशन की विशेषताएं

शैक्षिक निर्देशन की विशेषताएं निम्न हैं-

  1. शैक्षिक निर्देशन छात्रों द्वारा नए विद्यालयों में प्रवेश करते समय आने वाली कठिनाइयों को दूर करने और छात्रों को शिक्षा के लिए उपयुक्त वातावरण चुनने में सहायता करता है।
  2. शैक्षिक निर्देशन शैक्षिक उपलब्धियों को प्राप्त करने और शैक्षिक कार्यक्रम को विचार पूर्ण ढंग से नियोजित करने में सहायता देता है।
  3. शैक्षिक निर्देशन का संबंध उन सभी समस्याओं से है जिनका अनुभव बालक शैक्षिक परिवेश में अपने समायोजन में करता है।
  4. शैक्षिक निर्देशन का संबंध विद्यालय और विद्यालय संबंधित क्रियाओं से होता है।
  5. यह विद्यार्थियों को उनके विषयों का चयन करने में सहायक है।
  6. शैक्षिक निर्देशन उचित कार्यक्रमों के वरण एवं उनमें प्रगति करने में सहायता प्रदान करता है।

शैक्षिक निर्देशन के उद्देश्य

शैक्षिक उद्देश्य या लक्ष्यों का निर्धारण शिक्षा के उद्देश्यों की व्यापक रूप रेखा के अंतर्गत किया जा सकता है। बालक के शारीरिक संवेगात्मक दैनिक व्यक्तित्व सामाजिक और नैतिक विकास को शैक्षिक लक्ष्यों के रूप में माना जा सकता है। इसके अतिरिक्त शैक्षिक निर्देशन के मुख्य रूप से चार महत्वपूर्ण कार्य उद्देश्य हैं जो कि एक दूसरे से संबंधित है। शैक्षिक निर्देशन के निम्नलिखित हैं-

  1. विद्यार्थी के साथ कार्यक्रम में उचित प्रगति करने में सहायता करना।
  2. विद्यार्थियों की रुचि योग्यता एवं साथियों के अनुसार शिक्षा की योजना तैयार करना तथा उचित पाठ्यक्रमों को चुनने में विद्यार्थी की सहायता करना।
  3. शिक्षण संस्थाओं से संबंधित कर्मचारियों, आवश्यक पाठ्यक्रम एवं प्रशासनिक प्रबंध ने परिवर्तनों का सुझाव देना। जिससे कि विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को अच्छी तरह पूरा किया जा सके तथा शैक्षिक क्षेत्र में भी वांछित प्रगति प्राप्त कर सकें।
  4. वर्तमान शिक्षा स्तर को ध्यान में रखते हुए विद्यार्थियों की शैक्षिक संभावनाओं का पता लगाने में विद्यार्थियों को सहायता प्रदान करना।
शैक्षिक निर्देशन के उद्देश्य
शैक्षिक निर्देशन

शैक्षिक निर्देशन आवश्यकता

शिक्षा के क्षेत्र में आजकल बहुत अधिक परिवर्तन हो रहे हैं। शिक्षा के उद्देश्य समाज और व्यक्ति की आवश्यकता अनुसार निर्धारित किए जाते हैं। आज की शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत छात्रों की बौद्धिक योग्यता और क्षमता की और विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है। छात्रों को उनकी रूचि, अभिरुचि और योग्यता के अनुसार शिक्षा नहीं दी जाती, जिसके परिणाम स्वरूप छात्रों का समय, उनका ढाना और उनकी शक्ति का अपब्यय होता है।

जिसके कारण वे अपने जीवन में इच्छा अनुसार सफलता प्राप्त नहीं कर पाते। अपव्यय और सफलता को शैक्षिक निर्देशन की सहायता से काफी सीमा तक कम किया जा सकता है। शैक्षिक निर्देशन की आवश्यकता किसी कारण से नहीं बल विभिन्न कारणों से अनुभव होती है। इसके कुछ महत्वपूर्ण कारण निम्नलिखित हैं।

1. विद्यालयों में उचित समायोजन के लिए

शैक्षिक समायोजन छात्र को किसी भी क्षेत्र में वाछनीय प्रगति के लिए आवश्यक है। बहुत से विद्यार्थी विद्यालय में दाखिला लेने के पश्चात वहां के वातावरण के साथ उचित समायोजन नहीं कर पाते हैं जिसके कारण या तो वे विद्यालय छोड़ देते हैं अथवा असफल हो जाते हैं। शैक्षिक निर्देशन की सहायता से छात्रों को नए विद्यालय में भली-भांति समायोजित किया जा सकता है।

2. आगामी शिक्षा से संबंधित जानकारी के लिए

शिक्षा समाप्त करने के पश्चात अथवा कॉलेज की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात छात्रों के लिए यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि उनकी आगे की शिक्षा कैसी होनी चाहिए, अर्थात वह कौन से व्यवसायिक विद्यालय में, औद्योगिक विद्यालय में या व्यापारिक विद्यालय में अध्ययन करें। अग्रिम भविष्य के संबंध में तथा उच्च शिक्षा के संबंध में निर्णय लेने के लिए शैक्षिक निर्देशन की अत्यंत आवश्यकता होती है।

3. पिछड़े बालको तथा प्रतिभाशाली बालकों की समस्याओं को दूर करने के लिए

प्रत्येक विद्यालय में कुछ ऐसे बालक होते हैं जो अन्य बच्चों की अपेक्षा शिक्षा में पिछड़ जाते हैं। ऐसे बालको के लिए के लिए शिक्षा विधि में संशोधन करना, रुचिकर पाठ्यक्रमों का चुनाव और उनके लिए उचित श्रव्य साधनों का निबंध निर्देशन के द्वारा ही संभव है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक विद्यालय में कुछ बालक अन्य बालकों की तुलना में अधिक प्रतिभाशाली और कुशाग्र बुद्धि के होते हैं जो कि सामान्य पाठ्यक्रम, सामान्य ज्ञान और सामान्य शिक्षण विधियों से संतुष्ट नहीं हो पाते हैं। ऐसे बालकों को निर्देशन के द्वारा ऐसी सुविधाएं प्रदान की जा सकती है जिससे वे बौद्धिक क्षमता के अनुसार शिक्षा प्राप्त कर सकें।

4. नौकरियों के अवसरों की जानकारी के लिए

आजकल विभिन्न व्यवसायों में जटिलता निरंतर बढ़ती जा रही है। छात्रों को उनकी रूचि, क्षमताओं और योग्यता के अनुसार व्यवसाय का चुनाव ना कर पाने के कारण वह अपने व्यवसाय में अपने आप को पूर्णत: समायोजित नहीं कर पाते हैं। दूसरे बेरोजगारी की समस्या का मुख्य कारण पाठ्यक्रम का उचित चुनाव न कर पाना बिना सोचे समझे उच्च शिक्षा प्राप्त करते रहना तथा विभिन्न व्यवसायों की उचित जानकारी न होना है। इन सभी समस्याओं को दूर करने के लिए निर्देशन आवश्यक है।

निर्देशन, शैक्षिक निर्देशन
शैक्षिक निर्देशन

5. पाठ्य विषयों का चुनाव करने के लिए

वर्तमान समय में विज्ञान कला वाणिज्य तकनीकी कंप्यूटर और व्यवसायिक क्षेत्रों से संबंधित विभिन्न विषय छात्रों को पढ़ाए जाते हैं। इन विभिन्न विषयो का चुनाव छात्रों को अपनी रुचियों, क्षमताओं और योग्यताओं के अनुसार होना चाहिए। छात्र विभिन्न विषयों का चुनाव करने में अपने आप को असफल अनुभव करते हैं। इसलिए उचित पाठ्य विषयों के चुनाव के लिए निर्देशन की आवश्यकता है।

6. बाल अपराधियों की बढ़ती हुई संख्या के कारण

आज के जटिल समाज में बाल अपराधों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी होती जा रही है। यदि बालकों को उचित समय पर सही निर्देशन लेकर दूषित वातावरण से अलग कर दिया जाए तो अनेक प्रकार के अपराधों से बालकों को बचाया जा सकता है। यही कारण है कि हमारे देश में समायोजित निर्देशन पर अधिक बल दिया जा रहा है। अतः बालकों द्वारा किए जाने वाले विभिन्न अपराधों को रोकने के लिए और उन बालकों का सही मार्गदर्शन करने के लिए निर्देशन की आवश्यकता है।

व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता, भारत में निर्देशन की समस्याएं

7. विद्यार्थियों की संख्या में निरंतर वृद्धि

वर्तमान समय में शिक्षा के सभी स्तरों पर विद्यार्थियों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। जिसके कारण इस वृद्धि को ध्यान में रखते हुए एवं सामाजिक व्यवस्था के अनुसार उनकी शिक्षा व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के लिए निर्देशन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

8. अनुशासनहीनता की समस्या को नियंत्रित करने के लिए

आजकल विद्यालयों और महाविद्यालयों के छात्रों में अनुशासनहीनता की समस्या दिन प्रतिदिन तेजी से बढ़ती जा रही है। छोटी-छोटी बातों के लिए हड़ताल करना और सार्वजनिक संपत्ति को तोड़फोड़ डालना तथा अध्यापकों का अनादर करना एक साधारण बात हो गई है।इसका मुख्य कारण है वर्तमान शिक्षा छात्रों की आवश्यकताओं को संतुष्ट करने में असफल है। अनुशासनहीनता की इन सभी समस्याओं को दूर करने के लिए शैक्षिक निर्देशन की आवश्यकता है।

9. व्यक्तिगत विभिन्नताएं

कोई दो बालक एक जैसे नहीं होते उनमें अनेक प्रकार की शारीरिक मानसिक तथा भावात्मक भिन्नताएं पाई जाती हैं। उनको उचित पाठ्यक्रम चुनने में सहायता देने के लिए शैक्षिक निर्देशन अत्यंत आवश्यक है।

10. विद्यार्थियों की स्कूल और कॉलेजों से संबंधित समस्याओं को हल करने के लिए

विद्यार्थियों कोई स्कूल और कॉलेज से संबंधित विभिन्न प्रकार की समस्याओं जैसे पुस्तकों का चुनाव करने, पाठ्यक्रम संबंधी क्रियाओं का चयन करने, पढ़ाई में मन को एकाग्र करने, सामाजिक संबंधों को कायम रखने, शिक्षा में संतोषजनक उन्नति तथा समायोजन प्राप्त करने तथा पढ़ने की आदतों का विकास करने आदि का सामना करना पड़ता है। जिसके कारण यह विद्यार्थी शिक्षा के क्षेत्र में वांछित सफलता प्राप्त नहीं कर पाते हैं। इन सभी प्रकार की विद्यार्थियों की समस्याओं को निर्देशन की सहायता से हल नहीं किया जा सकता।

निर्देशन अर्थ उद्देश्य विशेषताएंव्यावसायिक निर्देशन
भारत में निर्देशन की समस्याएंशैक्षिक निर्देशन
शैक्षिक व व्यावसायिक निर्देशन में अंतरएक अच्छे परामर्शदाता के गुण व कार्य
परामर्श अर्थ विशेषताएं उद्देश्यसमूह निर्देशन
व्यक्तित्वसमूह गतिशीलता
समूह परामर्शसूचना सेवा
बुद्धिरुचि

भारत में निर्देशन की समस्याएं

भारत में निर्देशन की समस्याएं – भारत में निर्देशन का प्रारंभ अपनी शिशु अवस्था में है और धीरे-धीरे इसका विकास हो रहा है, परंतु इस विकास में निर्देशन निम्नलिखित समस्याओं का सामना कर रहा है। इसकी वजह से इसकी प्रगति धीमी है-

भारत में निर्देशन की समस्याएं

भारत में निर्देशन की समस्याएं निम्न है-

  1. अप्रशिक्षित शिक्षक
  2. शिक्षकों पर अति कार्यभार
  3. प्रभाकृत टेस्टों का अभाव
  4. विद्यालयों में पाठ्यक्रम
  5. एक राष्ट्रभाषा का अभाव
  6. विद्यालयों की दयनीय आर्थिक व्यवस्था
  7. शिक्षा में अन्वेषण ने अभी तक प्रवेश नहीं किया
  8. जाति प्रथा
  9. त्रुटिपूर्ण परीक्षा प्रणाली
  10. सूचनाओं का संकलन तथा विश्लेषण करने के व्यवस्थित संगठन का भाव
  11. बेकारी तथा अर्द्धबेकारी

1. अप्रशिक्षित शिक्षक

भारत में वैसे ही साधारण शिक्षा प्रदान करने हेतु प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव है और जहां तक प्रशिक्षित निर्देशकों का प्रश्न है यह अभाव तो और भी अधिक है। हमारे देश में प्रशिक्षित निर्देशकों के अभाव के कारण निर्देशन देने में परेशानी होती है क्योंकि निर्देशन देना जनसाधारण का कार्य नहीं। यह कार्य तो अत्यंत योग्य, प्रशिक्षित तथा धैर्यशील व्यक्तियों द्वारा संपन्न किया जाता है।

क्योंकि निर्देशन प्रक्रिया में जरा सी असावधानी एक मनुष्य के संपूर्ण जीवन को ही बदल सकती है, इसलिए आप पूर्ण ज्ञान युक्त निर्देशक के हाथों में निर्देशन का कार्य हम नहीं सौंप सकते। भारत में भी आयोग्य निर्देशकों के द्वारा निर्देशन प्राप्त करने से तो अच्छा है कि निर्देशन हो ही नहीं। परंतु हर्ष की बात यह है कि भारत के कुछ राज्यों ने इस प्रकार के प्रशिक्षण हेतु कदम उठाए हैं। जैसे पश्चिमी बंगाल में कैरियर मास्टर का प्रशिक्षण दिया जाने लगा है।

व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता, भारत में निर्देशन की समस्याएं
भारत में निर्देशन की समस्याएं

2. शिक्षकों पर अति कार्यभार

भारत में शिक्षकों को अत्यधिक कार्य करना पड़ता है। अध्यापन कार्य के अतिरिक्त अध्यापक को अन्य कार्य इतने करने पड़ते हैं कि वह और किसी कार्य हेतु अपना समय नहीं बचा सकता। अध्यापकों पर अध्यापन कार्य भी इतना रहता है कि वह उसी कार्य को कुशलता पूर्वक संपन्न नहीं कर पाते। साधारणतया एक अध्यापक को 36 घंटे प्रति सप्ताह लेने पड़ते हैं। नौकरी के भय से बेचारा अध्यापक पढ़ाता तो है पर यह उसका पढ़ाना भर मात्र ही है, वास्तविक शिक्षा देना नहीं। फिर भी हम आशा करें यह निर्देशन भी दे यह असंभव है।

3. प्रभातकृत टेस्टों का अभाव

निर्देशन क्रिया हेतु सबसे अधिक आवश्यक सामग्री टेस्ट है योद्धा के हथियार के सामान्य हथियार ही ना होगा। तो युद्ध कैसे इसी प्रकार जब टेस्ट ही नहीं तो निर्देशन कैसे भारत में जो भी हैं वे अंग्रेजी में हैं। जो हमारा कार्य सिद्ध नहीं कर सकते हैं क्योंकि छात्रों के एक बड़ी संख्या अंग्रेजी नहीं जानती किंतु हर्ष की बात यह है कि भारत में भी टेस्ट निर्माण कार्य, राज्य भाषाओं में बनाने की दिशा में कुछ विद्वानों ने कदम उठाएं हैं, परंतु इस प्रकार के टेस्टों की संख्या इतनी अधिक नहीं है कि उनके द्वारा हम छात्रों के संबंध में पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकें।

4. विद्यालयों में पाठ्यक्रम

अब तक शिक्षा की विचारधाराएं ब्रिटिश राजनीति से प्रभावित रही, अतः निर्देशन को पाठ्यक्रम में या स्कूल में स्थान मिलने का प्रश्न ही नहीं था। अब स्वतंत्र भारत में बेसिक शिक्षा तथा बहुउद्देशीय विद्यालयों का विकास हो रहा है, परंतु इन विद्यालयों में ज्ञान की समस्त शाखाओं के अध्यापन की व्यवस्था नहीं है। फलत: छात्रों को उनकी योग्यता क्षमता तथा रूचि के अनुसार शिक्षा नहीं दी जा सकती है। जैसे इंजीनियरिंग, टेक्निकल व्यवसाय हेतु उन विद्यालयों में क्या निर्देश दिया जा सकता है जहां पर गणित, और विज्ञान या रसायन विज्ञान के अध्ययन की सुविधा नहीं है।

(भारत में निर्देशन की समस्याएं)

भारत में निर्देशन की समस्याएं
भारत में निर्देशन की समस्याएं

5. एक राष्ट्रभाषा का अभाव

भारत में विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं। प्रत्येक राज्य की अपनी-अपनी पृथक राज्य भाषा है इतना ही नहीं एक राज्य में भी कई कई भाषाएं बोली जाती हैं। अगर यह कहा जाए कि विभिन्न भाषाओं की उपस्थिति के कारण यह देश एक महाद्वीप है, तो अतिशयोक्ति न होगी। इस प्रकार एक राज्य का रहने वाला निर्देशन दूसरे राज्य में जाकर निर्देशन का कार्य सफलतापूर्वक नहीं कर सकता। उदाहरणार्थ पश्चिम बंगाल से आए हुए कैरियर मास्टर्स उत्तर प्रदेश या राजस्थान में निर्देशन कार्य सफलतापूर्वक नहीं कर सकते क्योंकि पश्चिम बंगाल से आए हुए निदेशक ना भाषा समझ पाएगा और ना ही छात्र उसकी भाषा समझ पाएंगे।

दूसरे विभिन्न भाषाएं होने के कारण यह भी आवश्यक हो जाता है टेस्ट भी विभिन्न भाषाओं में हों। भारत में कुछ भाषाओं में तो कोई भी टेस्ट नहीं है। इस कारण भी भारत में निर्देशन क्रिया में कठिनाइयां आती हैं।

6. विद्यालयों की दयनीय आर्थिक व्यवस्था

भारत के विद्यालयों की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय कुछ विद्यालयों की दशा तो इतनी खराब है कि वह अध्यापकों का वेतन पर्याप्त समय पर नहीं दे पाते। इस अवस्था में यह उम्मीद करना कि यह विद्यालय निर्देशन दिशा में होने वाले खर्चों का भार भी वहीं कर सकेंगे। इस तरह आर्थिक कारण भी निर्देशन मार्ग में कठिनाई उपस्थित करते हैं। (भारत में निर्देशन की समस्याएं)

7. शिक्षा में अन्वेषण नें अभी तक प्रवेश नहीं किया

शिक्षा में अभी अन्वेषण कार्य में प्रवेश नहीं किया है तथा थोड़े बहुत जो काम हुआ है। वह अत्यंत कम है इस कारण भी भारत में अभी निर्देशन सफलतापूर्वक कार्य नहीं कर पा रहा है।

व्यावसायिक निर्देशन
भारत में निर्देशन की समस्याएं

8. जाति प्रथा

जाति प्रथा भारत में निर्देशन के कार्य में समस्या उत्पन्न करती है। वास्तविक रूप से यदि देखा जाए तो जात प्रथा भारत में व्यवसायिक निर्देशन का प्राचीनतम रूप है। परंतु यह प्रथा दोष युक्त थी क्योंकि इस प्रणाली में बच्चे की क्षमता भी का ध्यान नहीं देखा जाता था। जातिगत तथा परिवारगत व्यवसाय का बच्चे के व्यवसाय चयन पर प्रभाव पड़ता था। उसके लिए जातिगत व्यवसाय के अलावा अन्य व्यवसाय का चयन कल्पना मात्र था। उदाहरण के लिए एक हरिजन बच्चे को चाहे उसकी योग्यताएं कुछ भी क्यों ना हो व्यापार या व्यवसाय संबंधी