बाल विकास

सृजनात्मकता Creativity

सृजनात्मकता मौलिक परिणामों को व्यक्त करने की मानसिक प्रक्रिया है। क्रो एंड क्रो जब किसी कार्य का परिणाम नवीन हो जो किसी समय में समूह द्वारा उपयोगी मानने हो वह कार्य सृजनात्मकता कहलाता है। स्टेन सृजनात्मकता मुख्यता नवीन रचना या उत्पादन में होती है। जेम्स ड्रैवर सृजनात्मकता मौलिकता वास्तव में किसी प्रकार की क्रिया में घटित होती है। रूच के अनुसार सृजनात्मकता एक मौलिक उत्पादन के रूप में मानव मन की ग्रहण करके अभिव्यक्त करने और गुणाकन करने की योग्यता एवं क्रिया है। कोल एंड ब्रूस सृजनात्मकता के प्रकार सृजनात्मकता मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है। शाब्दिक सृजनात्मकता अशाब्दिक सृजनात्मकता सृजनात्मकता के परीक्षण सृजनात्मकता की पहचान के लिए गिलफोर्ड ने अनेक परीक्षणों का निर्माण किया है। यह परीक्षण …

सृजनात्मकता Creativity Read More »

बाल्यावस्था में मानसिक विकास

बाल्यावस्था में मानसिक विकास शैशवावस्था की अपेक्षा काफी तेजी से होता है। मानसिक दृष्टि से परिपक्व व्यक्ति वह है जो बौद्धिक रूप से चरम सीमा तक पहुंच चुका है। बाल्यावस्था 3 वर्ष से 12 वर्ष की आयु तक को माना जाता है। बाल्यावस्था में मानसिक विकास निम्न प्रकार होता है। तीसरा वर्ष इस अवस्था में जिज्ञासा शक्ति बढ़ती है अतः बालक विभिन्न वस्तुओं के संबंध में प्रश्न करने लगता है। मानसिक शक्ति का विकास होता है जिससे वह अपना नाम, कुछ फल, अपने शरीर के अंग आदि को संकेतों से बता देता है। दैनिक प्रयोग की विभिन्न वस्तुएं मांगने पर उठाकर ले आता है। चौथा वर्ष स्कूल जाने की अवस्था होने के कारण इस समय बालक को 100 तक के …

बाल्यावस्था में मानसिक विकास Read More »

मानव के विकास की अवस्थाएं

मानव के विकास की अवस्थाएं हमको यह बताती है कि मानव का विकास किस अवस्था में कितना होता है। अनेक मनोवैज्ञानिकों ने मानव के विकास की अवस्थाओं को विभाजित किया है – रास के अनुसार मानव विकास की अवस्थाएं युवावस्था (1 से 3 वर्ष) पूर्व बाल्यकाल (3 से 6 वर्ष) उत्तर बाल्यकाल (6 से 12 वर्ष) किशोरावस्था (12 से 18 वर्ष) ई• बी• हरलाक के अनुसार मानव विकास की अवस्थाएं जन्म से पूर्व की अवस्था – गर्भाधान से जन्म तक का समय अर्थात 280 दिन शैशवावस्था – जन्म से लेकर 2 सप्ताह शिशुकाल – 2 वर्ष तक बाल्यकाल – 2 से 11 या 12 वर्ष पूर्व बाल्यकाल – 6 वर्ष तक उत्तर बाल्यकाल – 7 वर्ष से 12 वर्ष तक …

मानव के विकास की अवस्थाएं Read More »

मानव का शारीरिक विकास

मानव का शारीरिक विकास मुख्य रूप से शैशवावस्था तथा बाल्यावस्था में ही हो जाता है। मानव विकास की मुख्य रूप से तीन अवस्थाएं हैं शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था। शैशवावस्था में शारीरिक विकास शैशवावस्था में शारीरिक विकास निम्न प्रकार से होता है – भार – जन्म के समय और पूरी शैशवावस्था में बालक का भार बालिका से अधिक होता है जन्म के समय बालक का भार लगभग 7.15 पाउंड होता है जबकि बालिका का भार 7.13 पाउंड होता है। पहले 6 माह में शिशु का भार दुगना और 1 वर्ष के अंत में तिगुना हो जाता है। लंबाई – जन्म के समय और संपूर्ण शैशवावस्था में बालक की लंबाई बालिका से अधिक होती है। जन्म के समय बालको की लंबाई लगभग 20.5 …

मानव का शारीरिक विकास Read More »

शैशवावस्था में मानसिक विकास

शैशवावस्था में मानसिक विकास का मुख्य साधन ज्ञानेंद्रियों की क्षमता एवं गुणवत्ता का विकास होता है। इस विकास के अंतर्गत भाषा स्मृति तर्क चिंतन कल्पना निर्णय जैसी योग्यताओं को शामिल किया जाता है। नवजात शिशु का मस्तिष्क कोरे कागज के समान होता है। अनुभव के साथ साथ उसके ऊपर हर बात लिख दी जाती है। जॉन लॉक के अनुसार जन्म से 2 सप्ताह तक का मानसिक विकास जन्म के समय शिशु मेरी अवस्था में होता है वह केवल अपनी शारीरिक दशाओं के अनुसार प्रतिवर्ती क्रियाए जैसे रोना, सांस लेना, अधिक सर्दी लगने पर कांपना आदि प्रदर्शित करता है। कभी-कभी तीव्र ध्वनियों को सुनकर चौक जाता है। जन्म के दूसरे सप्ताह में वह तीव्र रोशनी की ओर भी ध्यान देने लगता …

शैशवावस्था में मानसिक विकास Read More »

बाल विकास के सिद्धांत

बाल विकास के सिद्धांत – जब बालक विकास की एक अवस्था से दूसरे में प्रवेश करता है तब हम उस में कुछ परिवर्तन देखते हैं। अध्ययनों ने सिद्ध कर दिया है कि यह परिवर्तन निश्चित सिद्धांतों के अनुसार होते हैं। इन्हीं को बाल विकास का सिद्धांत कहा जाता है। बाल विकास के सिद्धांत बाल विकास के सिद्धांत अनेक हैं, बाल विकास के कुछ मुख्य सिद्धांत नीचे दिए जा रहे हैं- निरंतर विकास का सिद्धांत विकास की विभिन्न गति का सिद्धांत विकास क्रम का सिद्धांत विकास दिशा का सिद्धांत एकीकरण का सिद्धांत परस्पर संबंध का सिद्धांत व्यक्तिक विभिन्नताओं का सिद्धांत समान प्रतिमान का सिद्धांत सामान्य से विशिष्ट प्रतिक्रियाओं का सिद्धांत वंशानुक्रम वातावरण की अंतः क्रिया का सिद्धांत 1. निरंतर विकास का …

बाल विकास के सिद्धांत Read More »

बाल विकास के सिद्धांत

वृद्धि और विकास प्रकृति व अंतर

वृद्धि और विकास – वृद्धि को आमतौर पर मानव के शरीर के विभिन्न अंगों के विकास तथा उन अंगों की कार्य करने की क्षमता का विकास माना जाता है। जबकि विकास एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है जो जन्म से लेकर जीवन पर्यंत तक अभिराम गति से चलती रहती है। विकास केवल शारीरिक वृद्धि की ओर संकेत नहीं करता वर्ण इसके अंतर्गत के सभी शारीरिक मानसिक सामाजिक और संवेगात्मक परिवर्तन सम्मिलित रहते हैं। जो गर्भकाल से लेकर मृत्यु पर्यंत तक निरंतर प्राणी में प्रकट होते रहते हैं। अतः प्राणी के भीतर विभिन्न प्रकार के शारीरिक व मानसिक क्रमिक परिवर्तनों की उत्पत्ति ही विकास है। शरीर के किसी विशेष पक्ष में जो परिवर्तन आता है उसे वृद्धि कहते हैं। फ्रैंक के अनुसार विकास …

वृद्धि और विकास प्रकृति व अंतर Read More »

वृद्धि और विकास प्रकृति व अंतर

बाल विकास

बाल विकास मनोविज्ञान की एक शाखा के रूप में विकसित हुआ है। इसके अंतर्गत बालकों के व्यवहार, स्थितियां समस्याओं तथा उन सभी कारणों का अध्ययन किया जाता है जिसका प्रभाव बालक के व्यवहार पर पड़ता है। बाल विकास विज्ञान की वह शाखा है जो बालक के व्यवहार का अध्ययन गर्भावस्था से मृत्यु पर्यंत तक करता है। बाल विकास व्यवहारों का वह विज्ञान है जो बालकों के व्यवहार का अध्ययन गर्भावस्था से मृत्युपर्यंत तक करता है। बाल विकास मनोविज्ञान की वह शाखा है जो गर्भाधान से लेकर मृत्यु पर्यंत तक होने वाले मनुष्य के विकास की विभिन्न अवस्थाओं में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करता है। इस प्रकार उपर्युक्त परिभाषा ओं से यह स्पष्ट होता है कि बाल विकास बाल मनोविज्ञान …

बाल विकास Read More »

बाल विकास

बाल मनोविज्ञान क्या है?

बाल मनोविज्ञान का जन्मदाता दर्शनशास्त्र philosophy ही है। आज से कुछ वर्ष पूर्व मनोविज्ञान अलग विषय के रूप में विकसित नहीं था बल्कि यह दर्शनशास्त्र की ही एक शाखा के रूप में था। मनोविज्ञान अंग्रेजी भाषा के शब्द साइकोलॉजि psychology का हिंदी रूपांतरण है। साइकोलॉजी शब्द दो शब्दों के जोड़ से बना है अर्थात साइक + लोगोस। साइक का अर्थ है आत्मा तथा लोगों का अर्थ है विज्ञान अर्थात इसका अर्थ यह हुआ कि आत्मा का विज्ञान। अतः आत्मा के विज्ञान को ही साइकोलॉजि कहा जाता है। मनोविज्ञान मनोविज्ञान के जनक अरस्तु को माना जाता है। मनोविज्ञान को निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है – मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान माना है। गैरिट मनोविज्ञान व्यवहार का निश्चित विज्ञान है। वाटसन …

बाल मनोविज्ञान क्या है? Read More »

बाल मनोविज्ञान क्या है?