शिक्षा शास्त्र

सूचना एवं संप्रेषण तकनीकी के लाभ

सूचना एवं संप्रेषण तकनीकी के लाभ – आधुनिक सूचना एवं संप्रेषण तकनीकी ने हमारे दैनिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों जैसे शिक्षा व्यापार बैंकिंग चिकित्सा को प्रभावित किया है। इसने हमारे सोचने के ढंग, संप्रेषण करने के तरीके एवं अधिकांश चीजो को प्रभावित किया है। सूचना एवं संप्रेषण तकनीकी के लाभ सूचना एवं संप्रेषण तकनीकी के शिक्षा में लाभ निम्न है – ज्ञान आधारित समाज के निर्माण में सहायक छात्रों का व्यक्तिगत विकास शिक्षण में सहायक शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के स्वरूप में परिवर्तन शिक्षक प्रशिक्षण में सहायक छात्र केंद्रित शिक्षण में सहायक परामर्श देने में सहायक शैक्षिक प्रशासन में सहायक शैक्षिक शोध कार्यों में सहायक ज्ञान आधारित समाज के निर्माण में सहायक नवीनतम यंत्रों एवं विधियों के द्वारा सूचना एवं संप्रेषण …

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सूचना एवं संप्रेषण तकनीकी के लाभ

सतत शिक्षा

सतत शिक्षा एक ऐसी व्यापक अवधारणा है जो सभी रूपों में चलने वाले शैक्षिक क्रियाकलापों को अंतर्निहित करती है। इसके अंतर्गत औपचारिक सहज तथा गैर औपचारिक सभी प्रकार की शैक्षिक प्रणालियां आ जाती हैं। सतत शिक्षा मूल्य शिक्षा को जीवन और जीवन को शिक्षा समझने वाली अवधारणा है। व्यापक अर्थ में सतत शिक्षा यह जीवन शिक्षा जन्म से मृत्यु तक अविरल चलने वाली प्रक्रिया है। सतत शिक्षा के अर्थ को और अधिक स्पष्ट करने के लिए नीचे कुछ परिभाषाएं दी जा रही हैं। सतत शिक्षा व्यक्तियों को इस योग्य बनाती है कि वह अपने उपयुक्त कौशलों योग्यताओं एवं व्यक्तियों का विकास कर सकें। सतत शिक्षा एक नवीन क्षेत्र है और यह सामाजिक अणु को विखंडित करने के लिए शक्तिशाली अस्त्र …

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सतत शिक्षा

लोकतंत्र और शिक्षा के उद्देश्य

लोकतंत्र और शिक्षा के उद्देश्य – लोकतंत्र की सफलता उसके नागरिकों पर निर्भर करती है। लोकतंत्र व्यक्ति के व्यक्तित्व एवं सामाजिक दोनों प्रकार के विकास पर समान बल देता है। इस अपेक्षा के साथ ही उसे व्यक्ति समाज और राष्ट्र सभी का हित हो। उसके अनुसार शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य होनी चाहिए – स्वास्थ्य रक्षा एवं स्वास्थ्यवर्धन मानसिक विकास वस्तु के सामाजिक विकास और नेतृत्व की शिक्षा सांस्कृतिक विकास नैतिक एवं चारित्रिक विकास लोकतंत्र और लोकतंत्र की नागरिकता की शिक्षा राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति 1. स्वास्थ्य रक्षा एवं स्वास्थ्यवर्धन लोकतंत्र व्यक्ति के व्यक्तित्व का आदर करता है और व्यक्ति के लिए स्वस्थ्य शरीर पहली आवश्यकता है। अतः लोकतंत्र मनुष्य को अपने स्वास्थ्य की रक्षा एवं पुस्तक संवर्धन करने में प्रशिक्षित …

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लोकतंत्र और शिक्षा के उद्देश्य

प्रजातंत्र के गुण व दोष

प्रजातंत्र के गुण व दोष – प्रजातंत्र की सफलता का मूल आधार शिक्षा होती है, इसलिए लोकतंत्र जन शिक्षा पर सबसे अधिक बल देता है। इसके लिए वह सर्वथा में निश्चित आयु तक के बच्चों के लिए अनिवार्य एवं निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करता है। वह पुरुष और महिलाओं में भेद नहीं करता इसलिए दोनों के समान शिक्षा की व्यवस्था करता है। परंतु दिखाया गया है कि लाख प्रयत्न करने पर भी कुछ बच्चे इस शनिवार एवं निशुल्क शिक्षा को प्राप्त नहीं करते और बड़े होकर वे निरीक्षण प्रौण कहलाते हैं। । प्रजातंत्र के गुण व दोष प्रजातंत्र के गुण व दोष निम्न हैं – प्रजातंत्र के गुण सभी के हितों की रक्षा– प्रजातंत्र सरकार जनता की जनता द्वारा तथा …

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Human Rights in India

प्रजातंत्र परिभाषा व रूप

प्रजातंत्र अंग्रेजी भाषा के Democracy का हिंदी रूपांतरण है। जोकि दो शब्दों के योग से बना है – Demos और Kratia। इसमें Demos का अर्थ है जनता तथा Kratia का अर्थ है शक्ति या शासन। इस प्रकार शाब्दिक दृष्टि से इसका अर्थ है “जनता का शासन”। जिस देश में जनता को शासन के कार्यों में भाग लेने का अधिकार होता है और स्वयं शासन का संचालन करती है उस देश में प्रजातंत्र की व्यवस्था मानी जाती है। प्रजातंत्र परिभाषा प्रजातंत्र को अनेक विद्वानों ने निम्न प्रकार से परिभाषित किया है। प्रजातंत्र वह शासन है जिसमें जनता का अपेक्षाकृत बड़ा भाग शासन में भाग लेता है। डायसी के अनुसार प्रजातंत्र वह व्यवस्था है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति का भाग होता है। सीले …

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Indian Constitution, The Judiciary, प्रजातंत्र

भारतीय संविधान के मौलिक कर्तव्य

भारतीय संविधान के मौलिक कर्तव्य – 26 जनवरी 1950 को स्वतंत्र भारत का नया संविधान लागू किया गया जिसके अंतर्गत भारत को एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित किया गया। स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान के द्वारा लोगों को मौलिक अधिकार जैसे समानता, स्वतंत्रता शोषण के विरुद्ध, धर्म स्वतंत्रता संस्कृति और शिक्षा संबंधी और संविधानिक उपचारों के अधिकार दिए गए हैं। अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। भारतीय संविधान के 44 वे संशोधन द्वारा नागरिकों के कुछ मौलिक कर्तव्य भी निर्धारित किए गए हैं, जो निम्न प्रकार से हैं- भारतीय संविधान के मौलिक कर्तव्य भारत का प्रत्येक नागरिक संविधान का सम्मान करें और उसमें दिए गए नियमों का पालन करें राष्ट्रीय ध्वज द्वारा सिवान का आदर करने …

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भारतीय संविधान के मौलिक कर्तव्य

भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार

सामाजिक जीवन पद्धति में व्यक्ति और राज्य के पारस्परिक संबंधों में अधिकारों का एवं कर्तव्यों का महत्वपूर्ण स्थान है। शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति को राज्य के बनाए गए कानूनों और नियमों के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। किंतु साथ ही राज्य की शक्तियों और अधिकारों को सीमित करना भी आवश्यक है। मौलिक अधिकार व्यक्ति के पूर्ण मौलिक और मानसिक विकास के लिए अपरिहार्य हैं। इनके अभाव में व्यक्ति का यथोचित विकास नहीं हो सकता है। यह वह न्यूनतम अधिकार है जो किसी भी लोकतांत्रिक शासन पद्धति में व्यक्ति को प्राप्त होने चाहिए। भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार भारत देश प्रभुसत्ता संपन्न लोकतांत्रिक राज्य हैं। जिसमें चतुर्मुखी विकास के लिए भारतीय नागरिकों को 6 मूल …

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विधि निर्माण शासन

भारतीय संविधान ने विधि निर्माण का कार्य विधायिका को सौंपा है जो संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप व्यवस्था को सुचारू रूप से बनाए रखने के लिए यथा समय यथा आवश्यक विधि का निर्माण करती है जिसे लागू करने का कार्य कार्यपालिका को सौंपा गया है। न्यायपालिका को संविधान का संरक्षण दिया गया है अतः न्यायपालिका विधायिका द्वारा बनाए गए किसी भी विधि का पुनरावलोकन कर सकती है कि निर्मित विधि संविधान के अनुरूप है या नहीं। यदि विधि संविधान का उल्लंघन करती है तो न्यायपालिका उसे आविधिमान्य घोषित कर सकती है। भारत में विधि के शासन का इतिहास भारत में विधि का इतिहास अति प्राचीन है जिसका उल्लेख विविध प्राचीन ग्रंथों में विस्तृत मिलता है। डॉ पी• के• सेन प्रख्यात दंड …

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Human Rights in India

भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएं

भारत में संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना के तहत किया गया था। संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई थी। 26 November 1949 को भारतीय संविधान सभा ने अपना कार्य समाप्त किया था। या संविधान भारत में 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। भारत के संविधान की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित है- सर्वाधिक विशाल एवं लिखित संविधान संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न राज्य लोकतंत्रात्मक राज्य पंथ निरपेक्ष राज्य समाजवादी राज्य गणराज्य संसदीय शासन प्रणाली संघात्मक शासन व्यवस्था मौलिक अधिकारों का समावेश राज्य के नीति निदेशक तत्व स्वतंत्र न्यायपालिका 1. सर्वाधिक विशाल एवं लिखित संविधान आईवर जेनिंग्स का यह कहना बिल्कुल सही है कि भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा एवं विस्तृत संविधान है मूल भारतीय संविधान …

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संविधान

किसी भी सभ्य समाज वाले राज्य में संविधान का विशेष महत्व होता है। प्रत्येक प्रकार के राज्य अपनी अपनी परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुसार संविधान का निर्माण करते हैं। यही कारण है कि प्रत्येक राज्य का संविधान उस राज्य की जीवन पद्धति का लिखित प्रारूप होता है। चाहे वह राज्य लोकतंत्रात्मक हो या फिर राजतंत्रात्मक। संविधान उस जीवन पद्धति का प्रतीक है जो किसी राज्य द्वारा अपने लिए अपनाई जाती है अरस्तु के अनुसार संविधानहीन राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती संविधान के अभाव में राज्य, राज्य ना होकर एक प्रकार की अराजकता होगी। जैलीनेक के अनुसार संविधान ऐसे निश्चित नियमों का एक संग्रह होता है जिसमें सरकार की कार्यविधि प्रतिपादित होती है और जिसके द्वारा संचालन होता है। …

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सांस्कृतिक विरासत

सांस्कृतिक विरासत का तात्पर्य हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति सभ्यता तथा प्राचीन परंपराओं से जो आदर्श हमें प्राप्त हुए हैं जिनको आज भी हम उन्हीं रूपों में थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ अपनाते चले आ रहे हैं। हमारी भारतीय संस्कृति विश्व की एकमात्र ऐसी संस्कृति रहिए जो कि लोक कल्याण व वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत को आधार मानकर व्यक्ति एवं समाज का कल्याण करती रही है। पुरुषार्थ भारतीय जीवन एवं हिंदी दर्शन का एक अति प्रमुख तत्व सदैव से रहा है। भारतीय दर्शन ने चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष का वर्णन किया है। कर्म का सिद्धांत, धार्मिक तथा आध्यात्मिक आचरण, वर्ण व्यवस्था, संयुक्त परिवार, अतिथि्य संस्कार, त्याग संयम पुनर्जन्म प्राचीन रीति-रिवाजों तथा परंपराएं खान-पान पहनावा बोली भाषा ऐतिहासिक धरोहर …

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संस्कृति अर्थ महत्व

संस्कृत शब्द का जन्म संस्कार शब्द से हुआ है जो संस्कार व्यक्ति को संस्कृत बनाते हैं उसे संस्कृति नाम से संबोधित किया जाता है। भारतीय संविधान के अंतर्गत संस्कारों का बहुत महत्व है। गर्भाधान से लेकर मानव के पुनर्जन्म तक विवेक संस्कार किए जाते हैं, जिससे मानव सुसंस्कृत बनता है। जन्म होने पर नामकरण संस्कार, वेदारंभ संस्कार, उपनयन संस्कार, विवाह संस्कार तथा मृत्यु संस्कार इत्यादि विविध संस्कार होते हैं। जो विकासशील बालक को उसके सदाचार पूर्ण कर्तव्यों का स्मरण दिलाते रहते हैं और एक आदर्श मानव बनने के लिए प्रेरित करते हैं। सही अर्थ में संस्कारों द्वारा सुसंस्कृत होकर जीवन के सभी दृश्य कोणों का व्यवहारिक प्रदर्शन ही संस्कृत में इसके आधार व्यवहार की भाषा का उल्लेख जीवन सर्वशक्तिमान सत्ता …

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आर्थिक विकास

आर्थिक विकास का अर्थ शुद्ध राष्ट्रीय आय में दीर्घकालीन वृद्धि को सूचित करने वाली प्रक्रिया से है। दूसरे शब्दों में आर्थिक विकास हुआ प्रक्रिया है जिसके द्वारा अर्थव्यवस्था में राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय मैं दीर्घकालीन और सतत वृद्धि होती है। आर्थिक विकास को न्यू प्रकार परिभाषित किया जाता है। आर्थिक विकास एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा दीर्घकाल में किसी अर्थव्यवस्था की राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है। मायर या वोल्डविन के अनुसार आर्थिक विकास का संबंध इस उद्देश्य से होता है जो एक देश के द्वारा अपनी वास्तविक आय बढ़ाने हेतु समस्त उत्पादन साधनों का प्रयोग करता है। पाल एडवर्ल्ड के अनुसार आर्थिक विकास का अर्थ प्रति व्यक्ति आय उत्पादन से लगाया जाता है वादन की वृद्धि एक …

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धर्मनिरपेक्ष शिक्षा की विशेषताएं

धर्मनिरपेक्ष वादी शिक्षा की विशेषताएं निम्न है- नैतिकता का विकास-धर्मनिरपेक्षता वादी शिक्षा से बालकों में नैतिक दृष्टिकोण का विकास होता है। नैतिक शिक्षा सभी अर्थों में उनके चारित्रिक और नैतिक विकास की आधारशिला होती है। इस शिक्षा के माध्यम से उनमें सत्य साईं सरिता इमानदारी नम्रता सहानुभूति मानवता सेवा व त्याग आदि गुणों का विकास होता है और इन गुणों के परिणाम स्वरूप उनके चरित्र एवं व्यक्तित्व में निखार आता है। विशाल दृष्टिकोण का विकास- धर्मनिरपेक्षता वादी व्यक्ति को गतिशील एवं समस्या उन्मुक्त बनाती हैं यह शिक्षा उनमें जीवन के प्रति ऐसे दृष्टिकोण का विकास करती हैं जिसमें वह अपने स्वार्थों को त्याग कर समाज सेवा में रुचि लेने लगता है यह शिक्षा उसे जीवन की समस्याओं का दृढ़ता पूर्वक …

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सामाजिक परिवर्तन परिभाषा प्रक्रिया कारक

सामाजिक परिवर्तन- परिवर्तन प्रकृति का नियम है। परिवर्तन का आशय पूर्व की स्थिति या रहन सहन के ढंग में भिन्नता से है। प्रकृति के समान ही प्रत्येक समाज और सामाजिक व्यवस्था में भी परिवर्तन होता रहता है, सामाजिक व्यवस्था के निर्णायक तत्व मनुष्य है, फोन में आए दिन परिवर्तन होता है समाज एक अच्छी संस्था है। समाज में परिवर्तन होना स्वाभाविक ही है संस्थाओं सामाजिक राजनीतिक एवं आर्थिक व्यवस्था शिक्षा आदर्शों तथा विचारधाराओं गीत रिवाजों तौर-तरीकों व्यक्तियों के पारस्परिक संबंधों में परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। भारत के प्राचीन एवं अर्वाचीन समाज से आधुनिक औद्योगिक क्रांति नगरीकरण नवीन मशीनों का आविष्कार तथा संदेश वाहन की सुविधाओं के कारण जीवन के प्रत्येक पहलू में परिवर्तन दिखाई पड़ता है। सार रूप समाज में …

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धर्मनिरपेक्षता को प्रभावित करने वाले कारक

धर्मनिरपेक्षता की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करने वाले महत्वपूर्ण कारक निम्न है। 1. पश्चिमीकरण भारत में धर्मनिरपेक्षता के विचारों को प्रोत्साहित करने में पश्चिमीकरण का महत्वपूर्ण योगदान है। अंग्रेजों के भारत में लंबे शासनकाल में भारत में नवीन प्रौद्योगिकी संचार, यातायात, डाक, तार, रेल, शिक्षा, व्यवस्था नवीन ज्ञान व मूल्यों का सूत्रपात हुआ है जिसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति भादवा भौतिकवाद को बढ़ावा मिला तथा धर्म का भाव धीरे-धीरे कम होता गया। 2. नगरीकरण एवं औद्योगीकरण धर्मनिरपेक्षता की सोच विशेष रूप से नागरिकों में अधिक प्रभावी रही है क्योंकि शिक्षा संचार यातायात आदि की सुविधा नगरों में ही अधिक पाई जाती है विभिन्न प्रकार के उद्योग धंधे एवं व्यवसाय भी नगरों में पाए जाते हैं इन मैचों की विभिन्न जातियों धर्मों संप्रदायों …

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धर्मनिरपेक्षता अर्थ विशेषताएं

धर्मनिरपेक्षता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग जॉर्ज जैकब हॉलीडेक द्वारा 19वीं शताब्दी में किया गया। उसने लैटिन भाषा के शब्द Seculum शब्द से इस शब्द को ग्रहण किया जिसका अर्थ है यह वर्तमान स्थिति वास्तव में हॉलीडेके मैं इस शब्द का प्रयोग सामाजिक तथा नैतिक मूल्यों की प्रणाली के संदर्भ में किया था। उसकी इस मूल्य प्रणाली के आधार निम्नलिखित सिद्धांत थे। धर्मनिरपेक्षता एवं सामाजिक लक्ष्य मनुष्य की भौतिक तथा सांस्कृतिक उन्नति को विशेष महत्त्व उसके द्वारा सत्य की खोज पर बल वर्तमान युग या विश्व की उन्नति से संबंध तार्किक नैतिकता पर बल हम जानते हैं कि भारत एक बहु धर्मावलंबी बहु भाषा एवं संस्कृत वाला देश है। लोकतंत्र यहां की शासन प्रणाली का आधार है। इस आसन में आवश्यक …

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लोकतंत्र और शिक्षा के उद्देश्य

अनेकता में एकता के उपाय

शांतिपूर्ण एवं सामूहिक रहने के लिए जातीय, प्रांतीय, धार्मिक एवं सामाजिक, सांस्कृतिक विभिन्नता में एकता स्थापित करने के लिए शैक्षिक संस्थाओं द्वारा निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं – लोगों को भारत के प्रत्येक दृष्टिकोण से भारत की परिस्थितियों का ज्ञान कराया जाए और उन जानकारियों में स्वतंत्रता संघर्ष का समन्वय किया जाए सभी जातियों तथा राज्यों के बीच संपर्क और सहयोग उत्पन्न करने के लिए शिक्षा व्यवस्था और कार्यों को इस प्रकार प्रोत्साहित किया जाए जिससे लोगों में अपने राष्ट्र के प्रति एकता का भाव विकसित हो सके। विभिन्न उद्देश्यों के लोकप्रिय नेताओं के जीवन से संबंधित साहित्य ने तैयार कराया जाए जिसके ज्ञान से प्रदेशिक एकता को स्थापित किया जा सकता है। राज्यों की संस्कृत अकादमी ओं राष्ट्रीय …

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व्यक्ति और समाज में संबंध

जन्म से मानव पशु की भांति होता है जब कोई प्राणी जन्म लेता है तो उसके द्वारा कुछ समय को व प्रवृत्तियां भी होती हैं। समाज के द्वारा ही उन मूल संवेग ओवर प्रवृत्तियों को शोधन व मार्गी करण होता है। मानव मनुष्य तब तक नहीं बन सकता जब तक समाज उसको सहारा ना दे। हम सभी जानते हैं कि जैसी संगत होती है वैसा ही आचरण होता है। यदि मनुष्य जाति में जन्म लेकर ही भेड़ियों के साथ रहेगा तो वह भी भेड़िया ही बन जाएगा। इससे यह सिद्ध होता है कि व्यक्ति जन्म से पशु होता है और फिर उसको मानव समाज ही बनाता है समाज की गति को बोलना लिखना पढ़ना आचार व्यवहार सिखाता है समाज के …

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आदर्श शैक्षिक पाठ्यक्रम

आजकल विद्यालयों में बालक के शारीरिक विकास मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए अनेक प्रयास किए गए। साथ में संवेगात्मक और सौंदर्यात्मक तथा सामाजिक विकास पर भी अनेक प्रयत्न किए गए। सामाजिक बुराइयों के प्रभाव को कम करने तथा दूषित राजनीति के प्रभाव से दूर रखने के लिए भी अनेक प्रयत्न किए गए। आदर्श शैक्षिक पाठ्यक्रम वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में शैक्षिक पाठ्यक्रम को निम्न प्रकार का होना चाहिए – शारीरिक श्रम को महत्त्व व्यावसायिक पाठ्यक्रम विज्ञान व तकनीकी को अनिवार्य स्थान कृषि को स्थान शारीरिक शिक्षा तथा स्वास्थ्य विज्ञान भारतीय भाषाओं का ज्ञान प्राचीन संस्कृति एवं इतिहास का अध्ययन धार्मिक व नैतिक शिक्षा राष्ट्रीय व समाज सेवा कार्यक्रमों का आयोजन क्रियात्मक पक्ष पर बल 1. शारीरिक श्रम को …

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भारतीय समाज का बालक पर प्रभाव

बालक के व्यक्तित्व के विभिन्न अंगों पर भारतीय समाज का प्रभाव निम्न प्रकार दृष्टिगोचर होता है। बालक के शारीरिक विकास पर प्रभाव बालक के मानसिक विकास पर प्रभाव बालक के आध्यात्मिक विकास का प्रभाव बालक के संवेगात्मक और सौंदर्यात्मक विकास पर प्रभाव बालक के सामाजिक विकास पर प्रभाव पारिवारिक विघटन का प्रभाव अपराधों का प्रभाव गरीबी और बेरोजगारी का प्रभाव सामाजिक बुराइयों का प्रभाव दूषित राजनीति का प्रभाव 1. बालक के शारीरिक विकास पर प्रभाव आजकल विद्यालयों में बालक के शारीरिक विकास के लिए अनेक प्रयत्न किए जाते हैं; जैसे खेलकूद, व्यायाम, स्काउटिंग एंड गर्ल गाइडिंग, एनसीसी एनएसएस आदि के माध्यम से बालकों को अपना शारीरिक विकास करने के अवसर प्रदान किए जाते हैं। समय-समय पर युवक महोत्सव और युवक …

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आधुनिक भारतीय समाज

आधुनिक युग में भारतीय समाज में अनेक परिवर्तन हुए हैं और निरंतर हो रहे हैं। आज यहां भारतीय समाज विकास की सीढ़ियां चढ़ता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर अनेकानेक दोषों और समस्याओं से भी ग्रस्त हो रहा है। भारतीय समाज के आधुनिक स्वरूप को निम्न प्रकार समझा जा सकता है – आधुनिक भारतीय समाज भारतीय समाज के आधुनिक स्वरूप को निम्न प्रकार समझा जा सकता है – जनतांत्रिक समाजवादी व्यवस्था सामाजिक न्याय धर्म निरपेक्षता आर्थिक असमानता बेरोजगारी संतुलित परिवारों का विघटन दहेज प्रथा और बाल विवाह निम्न जीवन स्तर जनसंख्या की वृद्धि स्त्रियों की दशा में परिवर्तन विघटनकारी शक्तियों को प्रोत्साहन सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन नैतिक व धार्मिक मूल्यों में परिवर्तन उच्च आकांक्षाएं 1. जनतांत्रिक समाजवादी व्यवस्था भारत में …

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आधुनिक भारतीय समाज,

मानवतावाद

मानवतावाद को अंग्रेजी में Humanism शब्द से संबोधित किया जाता है जिसका अर्थ है मानव। मानवतावाद के चिंतन का केंद्र बिंदु मानव है। यह दर्शन मानव के सम्मान मानव की गरिमा और मानव की मात्रा में आस्था रखता है। मानव कल्याण मैं इसका विश्वास है। मानव कल्याण के लिए जो भी तत्व उपयोगी हैं उन सब का संबंध मानवतावाद से है। मानवतावाद के अनुसार मानव से परे कुछ भी नहीं है। इसीलिए परलोक या स्वर्ग जैसी बातों में इसका कोई विश्वास नहीं है। यदि कोई पढ़ लो क्या फर्क है तो उसे बस इसी पृथ्वी पर स्थापित करना चाहता है। मानवतावाद के अनुसार मानव कल्याण का अर्थ मानव कल्याण से है। इसीलिए परलोक या स्वर्ग जैसी बातों में इसका कोई …

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विद्यार्थी, विद्यार्थी जीवन

प्रयोजनवाद

प्रयोजनवाद शब्द का अंग्रेजी रूपांतरण Pragmatism है। कुछ विद्वान Pragmatism शब्द की उत्पत्ति यूनानी शब्द Pragma से मानते हैं, जिसका अर्थ है-‘A thing done, Business, Effective action’ किया गया कार्य, व्यवसाय, प्रभावपूर्ण कार्य। लेकिन अन्य कुछ विद्वान इस शब्द की उत्पत्ति एक-दूसरे यूनानी शब्द Promitikos से मानते हैं जिसका अर्थ है Practicable अर्थात व्यावहारिक। इस प्रकार विशाल रूप में प्रयोजनवाद से आया है कि सभी विचारों मूल्य एवं निर्णय ओका सत्य उसके व्यवहारिक परिणामों में पाया जाता है यदि उनके परिणाम संतोषजनक हैं तो वह सत्य हैं अन्यथा नहीं। प्रयोजनवाद ई वस्तुतः वास्तव में मानव जीवन के वास्तविक पक्ष पर अपना ध्यान केंद्रित रखते हैं। ब्रह्मांड को बेबस अनेक वस्तुओं और अनेक क्रियाओं का परिणाम मानते हैं, लेकिन यह वस्तुओं …

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प्रयोजनवाद

प्रकृतिवाद

प्रकृतिवाद के दर्शन के अनुसार प्रकृति अपने आपमें पूर्ण तत्व है। इस दर्शन के अनुसार, प्रत्येक वस्तु प्रकृति से उत्पन्न होती है और फिर उसी में विलीन हो जाती है। प्रकृतिवादी इंद्रियों के अनुभव से प्राप्त ज्ञान को ही सच्चा ज्ञान मानते हैं तथा उसके अनुसार सच्चे ज्ञान की प्राप्ति के लिए मनुष्य को स्वयं निरीक्षण परीक्षण करना चाहिए। प्राकृतिकवादियों के मतानुसार, मनुष्य की अपनी एक प्रकृति होती है जो पूर्ण रूप से निर्मल है, उसके अनुकूल आचरण करने में उसे सुख और संतोष होता है तथा प्रतिकूल आचरण करने पर उसे दुख और असंतोष का अनुभव होता है। इसलिए प्राकृतिक वादियों के अनुसार मनुष्य को अपनी प्रकृति के अनुकूल ही आचरण करना चाहिए। दूसरे शब्दों में प्रकृति वादी मनुष्य …

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प्रकृतिवाद

यथार्थवाद अर्थ परिभाषा सिद्धांत

यथार्थवाद का अंग्रेजी रूपांतरण Realism है। Real शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के realis से हुई है। जिसका अर्थ है वस्तु। इस प्रकार Realism का शाब्दिक अर्थ हुआ वस्तु वाद या वस्तु संबंधी विचारधारा। वस्तुतः यथार्थवाद वस्तु संबंधी विचारों के प्रति एक दृष्टिकोण है जिसके अनुसार संसार की वस्तुएं यथार्थ है। इस वाद के अनुसार केवल इंद्रीयज ज्ञान ही सत्य है। Realism का मानना है कि ब्रह्म जगत मिथ्या नहीं वरन सत्य है। आदर्शवाद इस सृष्टि का अस्तित्व विचारों के आधार पर मानता है किंतु इसके अनुसार जगत विचारों पर आश्रित नहीं है। इसके अनुसार हमारा अनुभव स्वतंत्र इतना होकर बाय पदार्थों के प्रति प्रतिक्रिया का निर्धारण करता है। अनुभव बाहय जगत से प्रभावित हैं और बाहय जगत की वास्तविक …

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यथार्थवाद अर्थ परिभाषा सिद्धांत

आदर्शवाद अर्थ परिभाषा सिद्धांत

आदर्शवाद का आधार आध्यात्म है। आदर्शवाद मूलभूत रूप से शाश्वत मूल्यों एवं आदर्शों को स्वीकार करता है। इस विचारधारा के अनुसार भौतिक जगत की कोई भी वस्तु शाश्वत नहीं है अतः इनका विशेष महत्व नहीं है। इस विचारधारा के अनुसार आत्मा परमात्मा और विचार ही शाश्वत है। आदर्शवाद के आदि प्रवर्तक प्लेटो के अनुसार यह प्रत्यक्ष या विचारों का एक वास्तविक विचारों के प्रकृति से ही यह भौतिक जगत बना है। इसी मत को प्रत्ययवाद या विचारवाद कहा जाता है। परंतु बाद में विभिन्न अध्यात्मवादी सिद्धांतों के आधार पर विभिन्न रूपों में आदर्शवाद को प्रस्तुत किया गया। आदर्शवाद आदर्शवादी एक जटिल विचारधारा है। अतः इसे विभिन्न रूपों में परिभाषित किया गया है। प्रकृति को वास्तव में स्वीकार करता है वही …

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आदर्शवाद अर्थ परिभाषा सिद्धांत

इस्लाम दर्शन

इस्लाम दर्शन – इस्लाम शब्द का शाब्दिक अर्थ है शांति, शांति प्राप्त का मार्ग व विनम्रता। धार्मिक अर्थ में इस्लाम शब्द का अर्थ ईश्वर की इच्छा को पूर्णता मानना होता है। इस्लाम धर्म एवं दर्शन कुरान पुस्तक में वर्णित है। कुछ अन्य ग्रंथ भी इस्लाम धर्म बौद्ध दर्शन के सिद्धांतों को स्पष्ट करते हैं जैसे तौरत, इंजील, जिब्रील, सहीफे जिनकी चर्चा कुरान में ही हुई। इस्लाम दर्शन का अर्थ भारत के मध्य युग में इस्लाम का आगमन हुआ जिसने भारतीय समाज संस्कृत एवं विचारधारा के चिंतन के नए तत्व देकर शिक्षा दर्शन का सूत्रपात किया। यह पहला विदेशी धर्म था जिसने भारतीय समाज एवं जीवन के प्रत्येक पक्ष के सिद्धांतों के अनुकूल शिक्षा का संगठन किया गया और इसके अर्थ …

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मुस्लिमकालीन शिक्षा

बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत

बौद्ध दर्शन की शिक्षाओं के अनुसार, बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत निम्न है- चार आर्य सत्य अस्टांग मार्ग प्रतीत्य समुत्पाद यह तीन विचार ही बौद्ध दर्शन का आधार है और इन्हें ही बौद्ध दर्शन के सिद्धांत के रूप में स्वीकार किया जाता है। बौद्ध दर्शन के चार आर्य सत्य महात्मा बुद्ध के अनुसार चार आर्य सत्य इस प्रकार हैं दुख– जीवन दुखों से भरा है जिसे हम सुख समझते हैं उनका अंत भी दुख ही है। सुखों की प्राप्ति की इच्छा भी दुख लिए हुए है और सुखों को भोगने का परिणाम भी दुख रूप में प्रकट होता है क्योंकि सुख स्थाई नहीं है। दुख समुदाय– प्रत्येक दुख का कारण होता है। संसार में प्रत्येक घटना का कोई ना कोई …

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बौद्ध दर्शन

बौद्ध दर्शन

बौद्ध दर्शन में शिक्षा को एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया माना गया है। शिक्षा ही मनुष्य को अलौकिक रूप एवं परमार्थिक जीवन के योग्य बनाती है। बौद्ध मत के अनुसार वास्तविक शिक्षा वह है जो मनुष्य के दुखों से मुक्ति दिलाकर निर्वाण की प्राप्ति कराए। व्यक्ति के समस्त दुखों का कारण अज्ञान है और इस अज्ञान को शिक्षा द्वारा ही दूर किया जा सकता है। बिना शिक्षा के निर्वाण की प्राप्ति संभव नहीं है। बौद्ध कालीन शिक्षा के उद्देश्य महात्मा बुद्ध द्वारा सद्जीवन के लिए प्रतिपादित अष्टांग मार्ग ही शिक्षा के उद्देश्यों का प्रमुख आधार है। इनके अतिरिक्त कालांतर में कुछ शैक्षिक उद्देश्यों को इसमें सम्मिलित किया गया जिनका विवरण निम्नलिखित है- संस्कृति का संरक्षण – बौद्ध दर्शन में धर्म को संस्कृति …

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बौद्ध दर्शन