भारतीय शिक्षा प्रणाली का विकास

भारत में शिक्षा प्रणाली का विकास एवं इसकी चुनौतियां – इस प्रश्न पत्र में यह जानना होता है कि भारत में शिक्षा प्रणाली का विकास कैसे हुआ और कौन-कौन सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। शिक्षा प्रणाली के विकास में समाजशास्त्रियों के योगदानो के साथ-साथ सरकार के द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किए गए प्रयासों को भी पढ़ना है। सर्वप्रथम हम लोग जानेंगे कि कैसे वैदिक काल और मध्यकालीन भारत में शिक्षा व्यवस्था थी और कैसे अंग्रेज शासन काल में शिक्षा व्यवस्था में सुधार किए गए।

यह भी देखना है कि भारत में आजादी के बाद शिक्षा व्यवस्था के सुधार के लिए कौन-कौन सी नीतियां अपनाई गई और वर्तमान में शिक्षा व्यवस्था कैसी है और इसमें सुधार किस तरीके से किया जा सकता है?

यह प्रश्नपत्र परीक्षा में 80 अंक का आता है। उसमें 8 प्रश्न चार चार अंक (32 अंक) के तथा 4 प्रश्न बारह – बारह अंक (48 अंक) के लिखने होते हैं। यदि आपको अधिक से अधिक अंक लाना है तो इन चार प्रश्नों पर ध्यान दीजिए जो 12-12 अंक के हैं।

वैदिककालीन शिक्षा बौद्धकालीन शिक्षा
मुस्लिमकालीन शिक्षा तक्षशिला विश्वविद्यालय
मैकाले का विवरण पत्र 1835 लॉर्ड विलियम बैंटिक की शिक्षा नीति
एडम रिपोर्ट वुड का घोषणा पत्र
लार्ड कर्जन की शिक्षा नीति हण्टर आयोग
सैडलर आयोग 1917 बुनियादी शिक्षा – वर्धा शिक्षा योजना
वर्धा योजना की असफलता के कारण सार्जेण्ट रिपोर्ट 1944
विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग मुदालियर आयोग 1952
त्रिभाषा सूत्र कोठारी आयोग 1964
शिक्षा का राष्ट्रीयकरण प्रौढ़ शिक्षा अर्थ आवश्यकता उद्देश्य क्षेत्र
राष्ट्रीय साक्षरता मिशन विश्वविद्यालय के कार्य
उच्च शिक्षा के उद्देश्य उच्च शिक्षा समस्याएं
शैक्षिक स्तर गिरने के कारण दूरस्थ शिक्षा अर्थ परिभाषा
मुक्त विश्वविद्यालय संतुलित पाठ्यक्रम आवश्यकता
परीक्षा सुधार आवश्यकता प्राथमिक शिक्षा पाठ्यक्रम

शिक्षा का व्यवसायीकरण

माध्यमिक शिक्षा का व्यवसायीकरण को लेकर भारत सरकार ने कई आयोगों का गठन ही नहीं किया अपितु उनकी सलाह पर कार्य किया। परंतु फिर भी स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं हुआ। इसके संबंध में कोठारी आयोग 1964 ने कहा है बार-बार सलाह देने के पश्चात भी दुर्भाग्य की बात यह है कि विद्यालय स्तर पर व्यवसायिक शिक्षा को एक घटिया किस्म की शिक्षा समझा जाता है और अभिभावक तथा विद्यार्थियों का सबसे आखरी चुनाव होता है। शिक्षा का व्यवसायीकरण का सामान्य शब्दों में अर्थ होता है किसी व्यवसायिक में प्रशिक्षण अर्थात विद्यार्थी को एक व्यवसाय सिखाना ताकि वह अपना जीवन यापन सुगमता से कर सके। शिक्षा के साथ-साथ उन कोर्सों की भी व्यवस्था की जाए जो छात्रों को शिक्षा के …

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शिक्षा का व्यवसायीकरण

भारत में शिक्षा के निजीकरण के कारण

भारत में शिक्षा के निजीकरण के कारण – भारत में स्वतंत्रता से पूर्व निजी क्षेत्र की प्रधानता की, परंतु योजना काल में सार्वजनिक क्षेत्र का महत्व बढ़ा है तथा निजी क्षेत्र के महत्त्व में सापेक्षिक रूप से कमी आई है। सन 1991 में नई आर्थिक नीति की घोषणा की गई। इस नीति के अंतर्गत निजी क्षेत्र को अधिक महत्व दिया गया। भारत में शिक्षा के निजीकरण के कारण भारत में शिक्षा के निजीकरण की बढ़ती हुई प्रवृत्ति का एक प्रमुख कारण सार्वजनिक क्षेत्रों की अकुशलता है। इसके मुख्य कारण निम्न है- समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं का विघटन अकुशल सार्वजनिक क्षेत्र अनार्थिक कीमत नीति सरकार पर भार एशिया के नए औद्योगिक राष्ट्रों का अनुभव पूंजीवाद के लाभ उठाने के लिए सरकार के वित्तीय …

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शिक्षा का व्यवसायीकरण

राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान

राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान – सर्व शिक्षा अभियान से माध्यमिक विद्यालयों में प्रवेश संख्या बढ़ी है और विद्यालय में ठहराव में सफलता मिली है। इसी प्रगति क्रम को आगे बढ़ाने के लिए NUEPA ने 2006 में योजना पर विचार किया गया। योजना को कार्यान्वित करने के लिए समय-समय पर रूपरेखा तैयार की गई। वर्ष 2009 को प्रोजेक्ट बोर्ड ने सर्व शिक्षा अभियान को स्वीकृति प्रदान कर दी। जिसमें सर्व शिक्षा अभियान में उच्चतर माध्यमिक शिक्षा को सम्मिलित किया गया जैसे राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के नाम से भी जाना जाता है। इसमें 14 से 18 आयु वर्ग तक के बालकों की शिक्षा को सम्मिलित किया गया है। राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान की आवश्यकता सर्व शिक्षा अभियान के दूसरे चरण को …

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राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान

सर्व शिक्षा अभियान

सर्व शिक्षा अभियान केंद्र सरकार द्वारा चलाई जाने वाली एक महत्वपूर्ण योजना है। इस योजना का उद्देश्य भारत भर में सभी को जहां तक संभव हो शिक्षित करना है। अक्टूबर 1998 में राज्य सरकारों को शिक्षा मंत्रियों की एक कॉन्फ्रेंस यह तय करने के लिए केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री ने दिल्ली में बुलाई थी कि यूनिवर्सल एलिमेंट्री एजुकेशन को एक मिशन के रूप में कैसे चलाया जाए। इस कांफ्रेंस की सिफारिशों के आधार पर सर्व शिक्षा अभियान की योजना बनाई थी। इसको नवंबर 2000 में भारत सरकार द्वारा स्वीकृत किया गया। राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान सर्व शिक्षा अभियान के लक्ष्य सर्व शिक्षा अभियान के निम्न लक्ष्य थे 6 से 14 आयु वर्ग के जो बालक 2003 तक पाठशाला में एजुकेशन …

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सर्व शिक्षा अभियान

ब्रिटिश काल में प्राथमिक शिक्षा

ब्रिटिश काल में प्राथमिक शिक्षा – ब्रिटिश काल में ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर ब्रिटिश शासन तक सभी के काल में भारत में शिक्षा पद्धति ने नवीन दिशा ग्रहण की। इसाई धर्म के प्रचार के लिए आई हुई मिशनरियों के द्वारा ईसाई धर्म के प्रचारक भारत में शिक्षा का प्रसार करना चाहते थे। 1813 में आज्ञा पत्र के अनुसार भारत वासियों को शिक्षा का प्रावधान किया गया। 1835 में लॉर्ड मैकाले ने नई शिक्षा नीति की घोषणा की तथा शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा को रखा तथा उसका यह मानना था कि अंग्रेजी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने से भारत में जो पीढ़ी पैदा होगी वह कुछ समय बाद रंग, नस्ल, खून व राष्ट्रीयता से तो भारतीय होगी परंतु …

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प्राथमिक शिक्षा पाठ्यक्रम

प्राथमिक शिक्षा पाठ्यक्रम को समझने से पहले यह आवश्यक है कि हम इस पाठ्यक्रम की कमियों को देखें। विदेशी शिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रम से इसकी तुलना करने पर हम पाते हैं कि हमारा प्राथमिक शिक्षा का पाठ्यक्रम अत्यधिक संकुचित व पुराना है। इसका प्रमुख कारण यह है कि यह पाठ्यक्रम लाभदायक कुशलताओं का विकास तथा उचित प्रकार की रूचियों, अभिव्रतियों तथा मान्यताओं पर पर्याप्त बल नहीं देता है। इस कारण से यह आधुनिक ज्ञान तथा वर्तमान जीवन से अलग अलग है। प्राथमिक शिक्षा पाठ्यक्रम के दोष प्राथमिक शिक्षा पाठ्यक्रम के दोषों को हम निम्न रूप में समझ सकते हैं- पाठ्यक्रम अत्यधिक संकुचित है। पुस्तक की ज्ञानवर्धक तंत्र विद्या पर बल देता है। उच्च शिक्षा के प्रतिकूल है। इसका आधार व्यवहारिक …

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परीक्षा सुधार आवश्यकता

परीक्षा सुधार आवश्यकता – जैसे-जैसे समाज की विचारधाराओं में परिवर्तन होता चला गया। शिक्षा व्यवस्था व उसका स्वरूप भी परिवर्तित होता चला गया। जैसे ही शिक्षा के उद्देश्य परिवर्तित हुए तो उसी के आधार पर पाठ्यक्रम शिक्षाविद विधियां अनुशासन शिक्षा बालक परीक्षा का मूल्यांकन आदि सभी परिवर्तित हो जाते हैं जैसे कि शिक्षा की इतिहास से स्पष्ट होता है। परीक्षा सुधार आवश्यकता शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बालक का सर्वागीण विकास करना होता है और या सर्वागीण विकास बालक के व्यवहार में प्रदर्शित होता है। इस विकास का मूल्यांकन करना आसान कार्य नहीं होता है। केवल अंक प्राप्त करने तथा ग्रेड कुछ गिने-चुने प्रश्नों के उत्तर देने से भी शिक्षा के वास्तविक उद्देश्यों नहीं किया जा सकता हैचूंकि मूल्यांकन सतत व …

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राष्ट्रीय पाठ्यक्रम 2005

राष्ट्रीय पाठ्यक्रम 2005 – वर्तमान में कोई भी घटना, समस्या, प्रदूषण, प्राकृतिक आपदा, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय ना रहकर अंतरराष्ट्रीय रूप धारण कर लेती है। जैसे आतंकवाद आणविक शक्ति का दुरुपयोग प्राकृतिक संसाधनों का अधिक दोहन, भूकंप इत्यादि। इसलिए पाठ्यक्रम ने भी विश्व स्तरीय रूप ले लिया है। विश्व के विद्वानों अर्थशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों, वैज्ञानिकों, राजनीतिज्ञों और महापुरुषों, शिक्षा शास्त्रियों द्वारा विश्व की सुख शांति समृद्धि और विकास विश्व शांति के लिए पाठ्यक्रम को विश्व स्तरीय रूप देने का प्रयास किया जा रहा है। Jacques Delor की अध्यक्षता में जो शिक्षा नीति बनाई गई उसे भारतीय शिक्षा नीति नहीं कह सकते, क्योंकि इस शिक्षा आयोग में डॉक्टर कर्ण सिंह शिक्षाविद भारतीय थे। शेष अध्यक्ष डेलर सहित 14 सदस्य विदेशी विश्व स्तर के प्रतिनिधि …

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राष्ट्रीय पाठ्यक्रम निर्माण 2005

राष्ट्रीय पाठ्यक्रम निर्माण 2005 – मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा बुलाई गई राष्ट्रीय अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की कार्यकारिणी सभा में चिंतन किया गया कि राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम 2000 में क्या सुधार किया जाए? 14 जुलाई से 19 जुलाई 2004 में बुलाई गई सभा में निर्णय लिया गया कि 21 वी शताब्दी के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम प्रोफेसर यशपाल की अध्यक्षता में तैयार करने के लिए मैसूर, भोपाल, भुवनेश्वर, अजमेर और शिलांग में पांच सभाओं का आयोजन करके नया पाठ्यक्रम 2005 तैयार किया गया। राष्ट्रीय पाठ्यक्रम निर्माण 2005 उद्देश्य पाठ्यक्रम में सभी एस सी ई आर टी के सचिव देश के सभी परीक्षा बोर्डों का सहयोग लिया गया। गहन अध्ययन के उपरांत विस्तार से तर्क वितर्क करके नए पाठ्यक्रम में …

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संतुलित पाठ्यक्रम आवश्यकता

संतुलित पाठ्यक्रम आवश्यकता – पाठ शालाओं की आत्मा होने के कारण पाठ्यक्रम में एकात्मक संतुलन और संजीवता होनी चाहिए। शिक्षा ऐसे जीवन के लिए होती है जो स्थिर न रहकर परिवर्तनशील होता है। शिक्षण एक निरंतर चलते रहने वाला कार्य है। इसीलिए यह थोड़े वर्षों में ही नहीं हो सकता। शैशव से मृत्यु तक का प्रत्येक कार्य शिक्षाप्रद होता है। इसीलिए इसे ज्ञान पूर्ण तथाकथित विषयों में विभाजित करना हास्यप्रद है। पाठ्यक्रम में होने वाले प्रत्येक कार्य तथा प्रत्येक संबंध पाठ्यक्रम है। पाठ्यक्रम निरंतर प्रगतिशील तथा परिवर्तनशील संसार में प्रगतिशील बच्चे के लिए एक प्रगतिशील व परिवर्तनशील क्रम है। संतुलित पाठ्यक्रम आवश्यकता नई शिक्षा नीति 1986 तथा राष्ट्रीय पाठ्यक्रम नई शिक्षा नीति में पाठ्यक्रम संबंधी निम्नलिखित दिशानिर्देशों अथवा सिद्धांतों को …

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केंद्र सरकार के शैक्षिक उत्तरदायित्व

केंद्र सरकार के शैक्षिक उत्तरदायित्व

केंद्र सरकार के शैक्षिक उत्तरदायित्व – 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता पूर्व 1945 ईस्वी में शिक्षा विभाग का स्वतंत्र अस्तित्व प्रकाश में आ चुका था। स्वाधीन भारत की सरकार ने सन 1947 में ही शिक्षा मंत्रालय का गठन कर दिया और भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद को बनाया गया। विज्ञान संबंधी खोजों को प्रोत्साहन प्रदान करने की दृष्टि से सन 1953 ईस्वी में वैज्ञानिक अनुसंधान का भी कार्य इन्हें सौंपा गया और शिक्षा मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान मंत्रालय कर दिया गया। सन 1957 में इस मंत्रालय के अंतर्गत तीन विभाग थे। शिक्षा विभाग शारीरिक शिक्षा तथा सांस्कृतिक विभाग औद्योगिक शिक्षा वैज्ञानिक शोध विभाग केंद्र सरकार के शैक्षिक उत्तरदायित्व केंद्र …

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केंद्र सरकार के शैक्षिक उत्तरदायित्व

शिक्षा निदेशक के कार्य

शिक्षा निदेशक के कार्य शिक्षा निदेशक के कुछ मुख्य कार्य निम्न है – शिक्षा निदेशक संपूर्ण राज्य में शिक्षा प्रशासन के प्रति उत्तरदाई होता है। वाह शिक्षामंत्री को शैक्षिक एवं प्रशासनिक विषयों में सलाह देता है। राज्य के समस्त विश्वविद्यालयों की कार्यकारिणी परिषद का वह पदेन सदस्य होता है। इस प्रकार वह विश्वविद्यालयों पर नियंत्रण भी रखता है। राज्य में शिक्षा विस्तार संबंधी योजनाओं का वह निर्माण करता है। शासकीय विद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्ति और स्थानांतरण का कार्य शिक्षा निदेशक ही संयुक्त शिक्षा निदेशकों की सहायता से करता है। राज्य के समस्त शिक्षा कार्यक्रमों में समन्वय की स्थापना वह करता है। वह विद्यालयों को मान्यता प्रदान करता है तथा उसके लिए सहायता अनुदान की व्यवस्था करता है। वह सहायता …

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केंद्र सरकार की शैक्षिक सलाहकार समितियां

केंद्र सरकार की शैक्षिक सलाहकार समितियां – केंद्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत शिक्षा विभाग है जो केंद्रीय सरकार के शिक्षा विषयक कार्यों और उत्तर दायित्वों का निर्वहन करता है। शिक्षा विभाग के कार्य काफी विस्तृत है। इस दृष्टि से केंद्रीय सरकार ने शिक्षा विभाग के विभिन्न क्षेत्रों को समुन्नत बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के परामर्शदाता मंडलों, परिषदों और समितियों की स्थापना की है जो केंद्र सरकार को संबंधित क्षेत्र में परामर्श देते रहते हैं। जैसे – विश्वविद्यालय अनुदान आयोग उच्च शिक्षा के क्षेत्र में केंद्र सरकार को परामर्श देने का कार्य करता है। परामर्शदाता मंडल परिषदों और समितियों के कारण केंद्र सरकार को अपने शैक्षणिक दायित्व और कार्यों को पूर्ण करने में काफी सहयोग प्राप्त …

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दूरस्थ शिक्षा लक्षण

दूरस्थ शिक्षा लक्षण – प्राचीन काल से ही हमारे देश में दूरस्थ शिक्षा की व्यवस्था रही है। समय के साथ-साथ इसका भी स्वरूप बदलता रहा है। वर्तमान में यह पद्धति अत्यधिक विकसित हो चुकी है। काल में जहां ऋषि मुनि ज्ञान देने के लिए गांव गांव जाते थे या अपनी कुटिया में रहकर ज्ञान देते थे वही आधुनिक समय में विद्यार्थी पत्राचार के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करते हैं। दूरस्थ शिक्षा लक्षण दूरस्थ शिक्षा का प्रसार निम्नलिखित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक है। दूरस्थ शिक्षा लक्षण निम्न हैं – विद्यार्थियों के घरों तक ज्ञान पहुंचाना – हमारे देश में दूरस्थ शिक्षा केंद्रों की स्थापना उन प्रतिभाशाली विद्वानों की इच्छा का प्रतीक है कि उनका ज्ञान, प्रकाश विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों …

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मुक्त विश्वविद्यालय,

मुक्त विश्वविद्यालय के उद्देश्य

मुक्त विश्वविद्यालय के उद्देश्य – मुक्त विश्वविद्यालय शिक्षा की एक ऐसी प्रणाली है जिसके द्वार सबके लिए खुले हैं। इसमें प्रवेश पाने के लिए आयु व आधारभूत शैक्षिक योग्यता आदि का कोई बंधन नहीं होता। इसमें सब युवक अथवा वृद्ध अपना पंजीकरण करा सकते हैं। जो किसी कारण उच्च शिक्षा प्राप्त करने से वंचित रह गए हैं। इसके माध्यम से राष्ट्र के दूरदराज इलाकों में रहने वाले लोग भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। मुक्त विश्वविद्यालय परंपरागत विश्वविद्यालयों में प्रवेश के बढ़ते हुए दबाव को कम करने में सहायक है तथा इसमें प्रति व्यक्ति वह भी बहुत कम आता है। भारत जैसे देश के लिए यह विश्वविद्यालय वरदान साबित हो रहे हैं। दूरस्थ शिक्षा मुक्त विश्वविद्यालय के उद्देश्य मुक्त …

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मुक्त विश्वविद्यालय

मुक्त विश्वविद्यालय

शिक्षा के क्षेत्र में मुक्त विश्वविद्यालय एक नवीन अवधारणा है। मुक्त विश्वविद्यालय का अर्थ उस विश्वविद्यालय से है जो विश्वविद्यालय परिसर से दूर रहने वाले छात्रों को शिक्षा प्रदान करता है। मुक्त विश्वविद्यालय के द्वार छात्रों के लिए सदैव खुले रहते हैं। इससे यह अभिप्राय है कि मुक्त विश्वविद्यालय के अंतर्गत शिक्षा प्राप्त करने के लिए न तो किसी प्रकार का आयोजन है और न ही औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता होती है। मुक्त विश्वविद्यालय के अंतर्गत मुख्यत: अध्ययन के दो क्षेत्र हैं- स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम उत्तरोत्तर अनुभव प्रशिक्षण और शिक्षा भारत में मुक्त विश्वविद्यालय भारत में मुक्त विश्वविद्यालय का विचार डॉक्टर वी के आर वी राव ने दिया। जनसंख्या विस्फोट और शिक्षा के अधिकार के संविधानिक प्रावधान के कारण …

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दूरस्थ शिक्षा की आवश्यकता

दूरस्थ शिक्षा नि:संदेह बीसवीं सदी की देन है, परंतु इसकी आवश्यकता 21वीं सदी में ज्यादा महसूस की जा रही है। आधुनिक युग में दूरस्थ शिक्षा की आवश्यकता बढ़ने के महत्वपूर्ण कारण निम्न है- 1. जनसंख्या विस्फोट 1947 में जब भारत आजाद हुआ उस समय भारत की जनसंख्या लगभग 42 करोड़ थी। परंतु वर्तमान में यह लगभग 110 करोड़ पार कर चुकी है। यह कहा जा सकता है कि भारत में जनसंख्या विस्फोट हो चुका है। इस जनसंख्या विस्फोट की यह स्थिति है कि सन 2050 तक हम जनसंख्या की दृष्टि से चीन से आगे निकल चुके होंगे। जिस तेजी से जनसंख्या बढ़ रही है उसी अनुपात में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या में भी निरंतर बढ़ोतरी हो रही है। यही …

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दूरस्थ शिक्षा,

दूरस्थ शिक्षा अर्थ परिभाषा

दूरस्थ शिक्षा से तात्पर्य ऐसी शिक्षा से है जिनके माध्यम से उन दूरदराज के लोगों को शिक्षित किया जाना है। जो किन्ही कारणों से औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने से वंचित रह गए थे। ऐसे शिक्षा के अंतर्गत शिक्षार्थी को किसी विद्यालय, महाविद्यालय विश्वविद्यालय में दाखिला लेना नहीं पड़ता, अपितु वे अपने निवास स्थान पर रहते हुए ही पत्राचार, टेप रिकॉर्डर, आकाशवाणी, दूरदर्शन और वीडियो कैसेट की सहायता से शिक्षा प्राप्त करते हैं। इस शिक्षण विधि में अध्यापक तथा विद्यार्थियों को आमने सामने आने की जरूरत नहीं पड़ती है। विद्यार्थी अपनी सभी समस्याओं का हल ऊपर विवेक चित स्थानों से स्वत: ही कर लेता है। दूरस्थ शिक्षा प्राचीन काल से ही हमारे देश में दूरस्थ शिक्षा की व्यवस्था रही है। समय …

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दूरस्थ शिक्षा, नेतृत्व

शैक्षिक स्तर गिरने के कारण

शैक्षिक स्तर गिरने के कारण – स्वतंत्रता के बाद से यही कहा जा रहा है कि देश में शिक्षा का स्तर गिर रहा है। इस बीच देश में शिक्षा के संबंध में जितने भी आयोग का गठन (विश्वविद्यालय आयोग, माध्यमिक शिक्षा आयोग, राष्ट्रीय शिक्षा आयोग) किया गया। सभी ने शिक्षा के स्तर गिरने की बात कही, सभी ने इसके कारण खोजने का प्रयास किया और इसे ऊंचा उठाने के उपाय बताएं। शिक्षा के स्तर में गिरावट के वर्तमान समय में निम्नलिखित कारण है- शिक्षा के लिए बजट में कम धनराशि का प्रावधान पाठ्यक्रमों का निम्न स्तर शिक्षकों में उचित गुणों का अभाव शिक्षक संघों का निर्माण दोषारोपण की प्रवृत्ति उच्च शिक्षा स्तर पर सामान्य छात्रों का प्रवेश शिक्षा संस्थाओं में …

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उच्च शिक्षा के उद्देश्य, विश्वविद्यालय शिक्षा प्रशासन, नेता के सामान्य गुण

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड से तात्पर्य प्राथमिक स्कूलों को न्यूनतम आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाए। स्कूल सुधार योजना के एक आंशिक हिस्से के रूप में यह कार्यक्रम संपूर्ण देश में लागू किया गया है। ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड स्कूलों में आवश्यक न्यूनतम शिक्षण सहायक सामग्री को उपलब्ध कराना मात्र नहीं है अपितु यह एक मानसिकता और आचरण का परिचायक है। यह उचित लोगों के द्वारा उचित समय पर उचित भावना तथा उचित ढंग से काम करने की प्रेरणा है। ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड योजना का लक्ष्य स्थानीय निकायों पंचायती राज तथा मान्यता प्राप्त एवं सहायता प्राप्त संस्थाओं द्वारा संचालित प्राथमिक स्कूलों में उपलब्ध सुविधाओं में पर्याप्त सुधार लाना है। ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड योजना के परस्पर आधारित तीन घटक है- एक …

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ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड

उच्च शिक्षा समस्याएं

उच्च शिक्षा समस्याएं – भारत में विभिन्न स्तरों की शिक्षा के उद्देश्य निश्चित करने का कार्य सर्वप्रथम वुड के घोषणा पत्र में किया गया। इसके बाद भारत में जो भी शिक्षा आयोग गठित किए गए सभी ने विभिन्न स्तरों की शिक्षा के उद्देश्य स्पष्ट करने का कार्य जारी रखा। 15 अगस्त 1947 को देश की स्वतंत्रता के उपरांत 1948 में भारत सरकार ने राधाकृष्णन आयोग का गठन किया। उच्च शिक्षा समस्याएं उच्च शिक्षा का प्रसार हमारे देश में इसी एक तथ्य से प्रमाणित हो जाता है कि आज हमारे देश में 160 विश्वविद्यालय हैं। इन विश्वविद्यालयों द्वारा शिक्षा का प्रसार करने में निम्न कठिनाइयां आती हैं- 1. नए विश्वविद्यालय आज हमारे देश में 160 विश्वविद्यालय हैं परंतु आज भी कभी-कभी …

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विश्वविद्यालय संप्रभुता

विश्वविद्यालय संप्रभुता से अभिप्राय विश्वविद्यालयों को कार्य प्रवेश अनुसंधान तथा प्रशासन संबंधी स्वाधीनता से है। वर्तमान समय में विश्वविद्यालयों की प्रभुसत्ता पर अनेक राजनीतिक नियंत्रण है। आयोग ने विश्वविद्यालय की प्रभुसत्ता के तीन क्षेत्र बताए हैं- विद्यार्थियों का चयन अध्यापकों की नियुक्ति और पदोन्नति पाठ्यक्रमों तथा शिक्षण विधियों का निर्धारण और अनुसंधान के क्षेत्र तथा समस्याओं का चयन। विश्वविद्यालय संप्रभुता वर्तमान समय में भारत में विश्वविद्यालयों की प्रभुसत्ता पर राजनीति छा गई है। इसके परिणाम स्वरूप विद्यालय अखाड़े बन गए हैं। जातिवाद तथा क्षेत्रवाद आज विद्यालयों की पहचान बन गया है और अध्यापक तथा छात्र दोनों ही आतंकित हो गए। यह प्रभुसत्ता तीन स्तरों पर है- विश्वविद्यालय की आंतरिक स्वायत्तता अर्थात समग्र रूप से विश्वविद्यालय के संदर्भ में विभागों कालेजों …

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विश्वविद्यालय के कार्य

विश्वविद्यालय के कार्य – विश्वविद्यालय (युनिवर्सिटी) वह संस्था है जिसमें सभी प्रकार की विद्याओं की उच्च कोटि की शिक्षा दी जाती हो, परीक्षा ली जाती हो तथा लोगों को विद्या संबंधी उपाधियाँ आदि प्रदान की जाती हों। इसके अंतर्गत विश्वविद्यालय के मैदान, भवन, प्रभाग, तथा विद्यार्थियों का संगठन आदि भी सम्मिलित हैं। विश्वविद्यालय के कार्य विश्वविद्यालय के चार प्रमुख कार्य होते हैं – शिक्षा अनुदान सम्बद्धता प्रसार 1. शिक्षा विश्वविद्यालय का प्रमुख कार्य शिक्षा प्रदान करना है। विश्वविद्यालय, संस्थान कालेजों के माध्यम से शिक्षा को प्रदान करते हैं। बेरोजगारी की समस्या के कारण आज छात्रों की भीड़ विश्वविद्यालय की तरफ इस उम्मीद से उम्र नहीं है कि शायद कोई अच्छा पाठ्यक्रम उन्हें किसी रोजगार को दिलाने में सहायक हो। इसी …

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Indira Awas Yojana, विश्वविद्यालय के कार्य

शिक्षक शिक्षा की समस्याएं

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से ही भारतीय अध्यापक शिक्षा में बहुत अधिक सुधार हुए हैं, परंतु फिर भी सभी समस्याओं का हल खोजना संभव नहीं हो सका है। शिक्षक शिक्षा की समस्याएं शिक्षक शिक्षा की समस्याएं अति विचारणीय है जो कि इस प्रकार हैं – विविध स्तरीय प्रशिक्षण में संपर्क ना होना। बुनियादी एवं गैर बुनियादी पाठ्यक्रमों में असमानता। अध्यापक प्रशिक्षण का जीवन से सहसंबंधित ना होना। प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में संकीर्णता एवं अवधि की अनुपयुक्तता। कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों के अध्यापकों का प्रशिक्षित ना होना। प्रशिक्षण संस्थाओं में एकरूपता का अभाव। शोध कार्य। 1. विविधस्तरीय प्रशिक्षणों में संपर्क न होना प्रायः पूर्व प्राथमिक विद्यालयों के अध्यापकों के प्रशिक्षण से लेकर स्नातक अध्यापकों के प्रशिक्षण तक प्रशिक्षण व्यवस्था में कोई संपर्क नहीं …

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उच्च शिक्षा के उद्देश्य

उच्च शिक्षा के उद्देश्य – भारत में विभिन्न स्तरों की शिक्षा के उद्देश्य निश्चित करने का कार्य सर्वप्रथम वुड के घोषणा पत्र में किया गया।इसके बाद भारत में जो भी शिक्षा आयोग गठित किए गए सभी ने विभिन्न स्तरों की शिक्षा के उद्देश्य स्पष्ट करने का कार्य जारी रखा। 15 अगस्त 1947 को देश की स्वतंत्रता के उपरांत 1948 में भारत सरकार ने राधाकृष्णन आयोग का गठन किया। उच्च शिक्षा के उद्देश्य आयोग ने उच्च शिक्षा के कुछ निम्नलिखित महत्वपूर्ण उद्देश्य निर्धारित किए- ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करना जो शारीरिक दृष्टि से स्वास्थ्य तथा मानसिक दृष्टि से प्रबुद्ध हो। व्यक्तियों के आनुवंशिक गुणों को पहचान कर उनका विकास करना। ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करना जो राजनीति प्रशासन व्यवसाय उद्योग और …

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वैदिककालीन शिक्षा गुण व दोष

वैदिककालीन शिक्षा – धर्म और धार्मिक मान्यताएं भारतीय शिक्षा के पीछे हजारों वर्षों की शैक्षिक तथा सांस्कृतिक परंपरा का आधार हैं। प्राचीन काल में शिक्षा का आधार क्रियाएं थी। वैदिक क्रिया ही शिक्षा का प्रमुख आधार थी।समस्त जीवन धर्म से चलायमान था। भारतीय शिक्षा का प्रमुख ऐतिहासिक साक्ष्य वेद है। वैदिक युग में शिक्षा व्यक्ति के चहुंमुखी विकास के लिए थी। वैदिककालीन शिक्षा गुण वैदिक शिक्षा प्रणाली के प्रमुख गुण निम्नलिखित थे। वैदिककालीन शिक्षा निशुल्क थी, गुरुकुल में शिष्यों से किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता था। उनके आवास, वस्त्र तथा भोजन की व्यवस्था भी निशुल्क होती थी। वैदिक काल की शिक्षा पर होने वाले व्यय की पूर्ति राज, धनाढ्य लोगों तथा भिक्षाटन एवं गुरु दक्षिणा से की …

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वैदिककालीन शिक्षा में गुरु शिष्य सम्बंध

वैदिककालीन शिक्षा में गुरु शिष्य सम्बंध विशेष प्रकार के थे, जोकि अत्यंत मधुर, आत्मीय एवं अनुकरणीय थे। वैदिक काल में गुरु और शिष्य के मध्य भरोसे और जिम्मेदारी के संबंध हुआ करते थे। गुरु शिष्यों के साथ पुत्रवतभावना से व्यवहार करते थे। और शिष्य भी गुरु को पिता तुल्य मानकर उनकी सभी आज्ञाओ का पालन करते थे। वैदिककालीन शिक्षा में गुरु शिष्य सम्बंध प्रेम, स्नेह, आत्मीयता, त्याग, समर्पण तथा श्रद्धा का यह वातावरण उस समय की शिक्षा के महत्व को और अधिक बढ़ा रहा था। वैदिक काल में गुरु के प्रति शिष्यों के कर्तव्य वैदिक काल में जिस प्रकार गुरुओं के शिष्यों के प्रति दायित्व होते थे, उसी प्रकार शिष्यों के भी गुरुओं के प्रति कर्तव्य होते थे। शिष्य निम्नलिखित …

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वैदिककालीन शिक्षा के उद्देश्य

वैदिककालीन शिक्षा के उद्देश्य शिक्षा स्वरूप तथा उसकी गंभीरता से यह स्पष्ट होता है कि तत्कालीन शिक्षा के उक्त उद्देश्यों के साथ-साथ एक अति महत्वपूर्ण उद्देश्य तथा आदर्श ज्ञान का विकास था। ईश्वर भक्ति तथा धार्मिकता की भावना चरित्र निर्माण व्यक्तित्व का विकास नागरिक तथा सामाजिक कर्तव्यों का पालन सामाजिक कुशलता की उन्नति और राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण एवं प्रसार प्राचीन भारत में शिक्षा के मुख्य उद्देश्य एवं आदर्श थे। डा. अल्तेकर वैदिककालीन शिक्षा के उद्देश्यों को हम निम्न शीर्षक के माध्यम से व्यक्त कर सकते हैं- 1. स्वास्थ्य का संरक्षण एवं संवर्धन वैदिककालीन शिक्षा का एक अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति है और मोक्ष की प्राप्ति के लिए सबसे पहली आवश्यकता है स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन। यही कारण है …

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प्रशिक्षित अप्रशिक्षित शिक्षक में अंतर

शिक्षक ही विद्यालय तथा शिक्षा पद्धति की प्रमुख गत्यात्मक सकती है परंतु यह भी सत्य है कि विद्यालय भवन, पाठ्यक्रम, पाठ्य सहगामी क्रियाएं, निर्देशन आदि सभी वस्तुएं शैक्षिक कार्यक्रम में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इन सबसे भी अधिक महत्वपूर्ण एक विषय है, शिक्षक का प्रशिक्षित होना क्योंकि शिक्षक ही आने वाली समितियों पर प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालता है। अप्रशिक्षित शिक्षक अधिक प्रभावी ढंग से शिक्षण कार्य निष्पादन नहीं कर सकता। प्रशिक्षित अप्रशिक्षित शिक्षक में अंतर प्रशिक्षित एवं अप्रशिक्षित शिक्षकों में अंतर को निम्नवत् समझा जा सकता है- प्रशिक्षित शिक्षक अप्रशिक्षित शिक्षक 1. प्रशिक्षित शिक्षक को शिक्षण कला का ज्ञान होता है। अप्रशिक्षित शिक्षक को अनिवार्य नहीं है कि उसे शिक्षण कला का ज्ञान हो। 2. प्रशिक्षित शिक्षक कक्षा …

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प्रौढ़ शिक्षा की समस्याएं

प्रौढ़ शिक्षा की समस्याएं – प्रौढ़ शिक्षा निर्विवाद रूप से एक राष्ट्रीय आवश्यकता है। विकास का संबंध केवल कल कारखानों, बांधों और सड़कों से नहीं, इसका संबंध बुनियादी तौर पर लोगों के जीवन से है। इसका लक्ष्य है कि लोगों की भौतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उन्नति। मानवीय पक्ष तथा उससे जुड़ी हुई बातें सबसे महत्वपूर्ण है। भविष्य में हमें इन बातों पर अधिक ध्यान देना होगा। करोड़ों लोगों का निरीक्षण होना भारत के लिए अभिशाप है इससे मुक्ति पानी ही होगी। महात्मा गांधी प्रौढ़ शिक्षा की समस्याएं वास्तव में साक्षरता मानव के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अपनी बातों को दूसरे तक पहुंचाने नवीन बातों को सीखने तथा ज्ञान व विज्ञान के आदान-प्रदान के लिए साक्षरता एक जरूरी साधन …

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