भारतीय शिक्षा प्रणाली का विकास

भारत में शिक्षा प्रणाली का विकास एवं इसकी चुनौतियां – इस प्रश्न पत्र में यह जानना होता है कि भारत में शिक्षा प्रणाली का विकास कैसे हुआ और कौन-कौन सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। शिक्षा प्रणाली के विकास में समाजशास्त्रियों के योगदानो के साथ-साथ सरकार के द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किए गए प्रयासों को भी पढ़ना है। सर्वप्रथम हम लोग जानेंगे कि कैसे वैदिक काल और मध्यकालीन भारत में शिक्षा व्यवस्था थी और कैसे अंग्रेज शासन काल में शिक्षा व्यवस्था में सुधार किए गए।

यह भी देखना है कि भारत में आजादी के बाद शिक्षा व्यवस्था के सुधार के लिए कौन-कौन सी नीतियां अपनाई गई और वर्तमान में शिक्षा व्यवस्था कैसी है और इसमें सुधार किस तरीके से किया जा सकता है?

यह प्रश्नपत्र परीक्षा में 80 अंक का आता है। उसमें 8 प्रश्न चार चार अंक (32 अंक) के तथा 4 प्रश्न बारह – बारह अंक (48 अंक) के लिखने होते हैं। यदि आपको अधिक से अधिक अंक लाना है तो इन चार प्रश्नों पर ध्यान दीजिए जो 12-12 अंक के हैं।

वैदिककालीन शिक्षा बौद्धकालीन शिक्षा
मुस्लिमकालीन शिक्षा तक्षशिला विश्वविद्यालय
मैकाले का विवरण पत्र 1835 लॉर्ड विलियम बैंटिक की शिक्षा नीति
एडम रिपोर्ट वुड का घोषणा पत्र
लार्ड कर्जन की शिक्षा नीति हण्टर आयोग
सैडलर आयोग 1917 बुनियादी शिक्षा – वर्धा शिक्षा योजना
वर्धा योजना की असफलता के कारण सार्जेण्ट रिपोर्ट 1944
विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग मुदालियर आयोग 1952
त्रिभाषा सूत्र कोठारी आयोग 1964
शिक्षा का राष्ट्रीयकरण प्रौढ़ शिक्षा अर्थ आवश्यकता उद्देश्य क्षेत्र
राष्ट्रीय साक्षरता मिशन विश्वविद्यालय के कार्य
उच्च शिक्षा के उद्देश्य उच्च शिक्षा समस्याएं
शैक्षिक स्तर गिरने के कारण दूरस्थ शिक्षा अर्थ परिभाषा
मुक्त विश्वविद्यालय संतुलित पाठ्यक्रम आवश्यकता
परीक्षा सुधार आवश्यकता प्राथमिक शिक्षा पाठ्यक्रम

प्रौढ़ शिक्षा की आवश्यकता

प्रौढ़ शिक्षा की आवश्यकता – अशिक्षित मानव पशु के समान ही है, वर्तमान समय के सामाजिक आर्थिक राजनैतिक व्यवसाय तथा तकनीकी वातावरण में अपने को समायोजित करने के लिए तथा प्राकृतिक संपदा व वैज्ञानिक उपलब्धियों का अधिकतम सदुपयोग करने के लिए मानव का शिक्षित होना अत्यंत आवश्यक है। विभिन्न परिस्थितियों के कारण शिक्षा प्राप्त करने से वंचित रह गए अनपढ़ प्राणों के लिए शिक्षा की उचित व्यवस्था करना अत्यंत समसामयिक प्रतीत होता है। प्रौढ़ शिक्षा की आवश्यकता निम्नलिखित दृष्टिकोण से प्रौढ़ शिक्षा की आवश्यकता है- प्रौढ़ शिक्षा एक मानवीय आवश्यकता प्रौढ़ शिक्षा एक पारिवारिक आवश्यकता प्रौढ़ शिक्षा एक राजनीतिक आवश्यकता प्रौढ़ शिक्षा एक सामाजिक आवश्यकता प्रौढ़ शिक्षा एक राष्ट्रीय आवश्यकता प्रौढ़ शिक्षा एक बौद्धिक आवश्यकता प्रौढ़ शिक्षा एक व्यावसायिक आवश्यकता …

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प्रौढ़ शिक्षा अर्थ

प्रौढ़ शिक्षा को भिन्न-भिन्न नामों से संबोधित किया जाता है। साक्षरता, समाज शिक्षा, जीवनपर्यंत शिक्षा, उद्देश्यपूर्ण शिक्षा, आधारभूत शिक्षा, द्वितीय अवसर की शिक्षा जैसे विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। इन सभी नामों से प्रौढ़ शिक्षा नाम सर्वाधिक उपयुक्त प्रतीत होती है। भारत सरकार ने भी प्रौढ़ शिक्षा नाम को ही अपनाया है। अतः आगे इसी नाम का प्रयोग किया जाएगा। फिर भी शेष सभी नामों के अर्थों को संक्षेप में स्पष्ट किया जा रहा है। साक्षरता से अभिप्राय अक्षरों तथा अंकों के ज्ञान से है जिसकी सहायता से व्यक्ति स्वयं अध्ययन करके वांछित ज्ञान प्राप्त कर सके। समाज शिक्षा से तात्पर्य उस ज्ञान से है जो बदलती सामाजिक परिस्थितियों में व्यक्ति को समाज में स्वस्थ जीवन बिताने योग्य बना …

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राष्ट्रीय साक्षरता मिशन

पिछले कुछ वर्षों में प्रौढ़ शिक्षा तथा प्राथमिक शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने पर बल दिए जाने के बावजूद निरीक्षरो की संख्या में निरंतर वृद्धि होती जा रही है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि साक्षरता के प्रसिद्ध में सुधार हुआ है, परंतु निरक्षरो की संख्या विगत 30 वर्षों में डेढ़ गुनी से अधिक हो गई है। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन सन 1951 में भारत देश में 30 करोड़ व्यक्ति निरक्षर थे। जो सन 1981 में बढ़कर 44 करोड हो गए। ऐसी परिस्थिति में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की रचना की गई। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन का शुभारंभ 5 मई 1988 को प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी के द्वारा नई दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर पर किया गया था। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य 15 …

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प्रौढ़ शिक्षा के उद्देश्य

प्रौढ़ शिक्षा की उपयोगिता व्यक्ति व समाज दोनों के लिए है। इसलिए प्रौढ़ शिक्षा के उद्देश्यों को दो भागों व्यक्तिगत उद्देश्य तथा सामाजिक उद्देश्यों में बांटा जा सकता है। प्रौढ़ शिक्षा के उद्देश्य प्रौढ़ शिक्षा के व्यक्तिगत उद्देश्य व्यक्ति की व्यक्तिगत आवश्यकताओं का कर्तव्य पालन की दृष्टि से प्रौढ़ शिक्षा अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है। प्रौढ़ शिक्षा के प्रमुख व्यक्तिगत उद्देश्य निम्नवत लिखे जा सकते है – शिक्षा के द्वारा प्रौढ़ो का बौद्धिक विकास करना कृषि, शिल्प तथा घरेलू उद्योग-धंधों इत्यादि का प्रशिक्षण देकर प्रौढ़ो की व्यवसायिक क्षमता का विकास करना। स्वास्थ्य, शिक्षा, प्रमुख रोगों के उपचार पद्धति तथा संतुलित आहार का ज्ञान देकर प्रौढ़ो के शारीरिक विकास को ठीक रखना। प्रौढ़ो को सामुदायिक जीवन की कला से अवगत करा …

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प्रौढ़ शिक्षा का क्षेत्र

प्रौढ़ शिक्षा केवल साक्षर बनाने तथा साधारण गणित का ज्ञान देने तक सीमित नहीं है, प्रौढ़ शिक्षा का क्षेत्र व्यापक है। प्रौढ़ शिक्षा का क्षेत्र प्रौढ़ शिक्षा के अंतर्गत कम से कम निम्न पांच कार्य सम्मिलित किए जाते हैं प्रौढ़ को आत्म अभिव्यक्ति में निपुण बनाने के लिए साक्षरता प्रसार। व्यक्ति को अपना स्वास्थ्य ठीक रखने की दृष्टि से स्वास्थ्य शिक्षा। प्राणों की आर्थिक उन्नति के लिए व्यवसायिक प्रशिक्षण। प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में अपने कर्तव्य तथा अधिकारियों के प्रति सजग करने के लिए नागरिकता की शिक्षा। खाली समय का सदुपयोग करने के लिए स्वस्थ मनोरंजन। कोठारी आयोग 1964 ने भारतीय संदर्भ में प्रौढ़ शिक्षा के प्रभावशाली कार्यक्रम के नियोजन में निम्न बातों पर विचार करने का सुझाव दिया था। निरक्षरता …

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शिक्षा का राष्ट्रीयकरण

शिक्षा का राष्ट्रीयकरण – शिक्षा के संदर्भ में राष्ट्रीयकरण का अर्थ है ‘शिक्षा पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण’। कुछ लोग शिक्षा के राष्ट्रीयकरण का अर्थ सरकारीकरण से लगाते हैं। दूसरे शब्दों में शिक्षा के राष्ट्रीयकरण का अभिप्राय शिक्षा के विभिन्न पहलुओं, पक्षों जैसे शिक्षा के स्वरूप एवं उद्देश्यों का निर्धारण, पाठ्यक्रम निर्माण, पाठ्य पुस्तकों का प्रकाशन, शिक्षण विधि, शैक्षिक प्रशासन एवं संगठन, शिक्षकों की नियुक्ति, शिक्षा का माध्यम, परीक्षा व्यवस्था, विभिन्न शिक्षा संस्थाओं में शिक्षार्थी प्रवेश प्राविधिक शिक्षा तथा शिक्षा संबंधी अन्य व्यवस्था आदि पर सरकार का पूरा अधिपत्य स्थापित होने से है। संक्षेप में केंद्रीय राज्य सरकार द्वारा शिक्षा का अधिग्रहण ही शिक्षा का राष्ट्रीयकरण है। शिक्षा का राष्ट्रीयकरण शिक्षा पर पूर्ण नियंत्रण का उपयुक्त स्वरूप वर्तमान तानाशाही एवं …

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कोठारी आयोग 1964

कोठारी आयोग – शिक्षा के क्षेत्र में सुधार करने के लिए हमारे देश में जब भी किसी कमेटी अथवा आयोग का गठन किया जाता है तो इसका अभिप्राय यह ही लगाया जाता है कि इस क्षेत्र की लचर व्यवस्था के पुनर्गठन तथा मूल्यांकन के लिए ही इस प्रक्रिया को प्रारंभ किया गया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शिक्षा के क्षेत्र में नए समाज का उदय करने का दायित्व हमारे शिक्षकों व शिक्षा पद्धतियों पर आ गया परंतु शिक्षकों की अपनी समस्याएं बहुत ही तथा शिक्षा पद्धतियों में भी अनेक दोष उत्पन्न होने लगे थे। इसी कारण शिक्षकों, छात्रों, प्रशासन, पाठ्यक्रम व शिक्षा पद्धतियों में यदा-कदा टकराव उत्पन्न हो जाता था। इस परिवर्तन के समय में यह आवश्यकता अनुभव की गई …

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त्रिभाषा सूत्र

त्रिभाषा सूत्र – मुदालियर आयोग ने भाषा के संबंध में जो द्विभाषा सूत्र का सुझाव दिया था। जिसमें अंग्रेजी भाषा की उपेक्षा की गई थीी। जिसका अंग्रेजी समर्थकों ने विरोध किया था और 15 वर्षों तक अंग्रेजी भाषा चलती रहने की बात को लेकर हिंदी समर्थकों ने अंग्रेजी का विरोध किया। इन परिस्थितियों में भाषा संबंधी विवाद को अंतिम रूप से सुलझाने के लिए सन् 1956 में केंद्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद ने त्रिभाषा सूत्र को प्रस्तुत किया। त्रिभाषा सूत्र त्रिभाषा सूत्र की प्रमुख बातें निम्न थीं- प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर शिक्षा का माध्यम मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा हो। अंग्रेजी या अन्य कोई आधुनिक यूरोपीय भाषा। हिंदी तथा अन्य कोई आधुनिक भारतीय भाषा। इस भाषा सूत्र के अनुसार, बालक को …

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मुदालियर आयोग 1952

मुदालियर आयोग 1952 – स्वतंत्रता प्राप्त करने के पश्चात यह आवश्यकता अनुभव की गई कि देश की माध्यमिक शिक्षा का अवश्य ही पुनर्मूल्यांकन होना चाहिए। इसलिए सन 1952 में एक आयोग की नियुक्ति हुई। इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट सन् 1953 में प्रस्तुत की। इस आयोग के चेयरमैन डा• ए लक्ष्मणस्वामी मुदालियर थे। मुदालियर आयोग के कार्य मुदालियर आयोग (माध्यमिक शिक्षा आयोग) के कार्य निम्नलिखित हैं- भारत में माध्यमिक शिक्षा की वर्तमान परिस्थिति की जांच करना। माध्यमिक शिक्षा के पुनर्गठन तथा विकास के लिए कार्य करना। माध्यमिक शिक्षा के उद्देश्य, संगठन तथा पाठ्यक्रम का निर्माण करना। प्राथमिक, बुनियादी तथा उच्च शिक्षा के संदर्भ में माध्यमिक शिक्षा का महत्व। विभिन्न प्रकार के माध्यमिक विद्यालयों के सह-संबंध। अन्य समस्याओं का अध्ययन करना …

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विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग

विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ने भारतीय शिक्षा के गिरते हुए स्तर पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए उनमें प्रत्येक संभव उपाय के द्वारा सुधार करने के संबंध में अपने सुझाव दिए। उच्च शिक्षा के स्तर में वृद्धि करने के उद्देश्य से आयोग ने विश्वविद्यालय शिक्षा के स्तर की ओर ध्यान दिया। उनका मानना था कि हमारे विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त स्नातक देश को विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व प्रदान करें। आयोग चाहता था कि हमारे स्नातक विश्व स्तर के हो। विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग या राधाकृष्ण आयोग भारत सरकार द्वारा नवम्बर 1947 में भारतीय विश्वविद्यालयी शिक्षा की अवस्था पर रिपोर्ट देने के लिये नियुक्त किया गया था। इस आयोग के अध्यक्ष डॉ॰ सर्वपल्ली राधा कृष्णन थे। विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ने उच्च एवं विश्वविद्यालयी …

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सार्जेण्ट रिपोर्ट 1944

सार्जेण्ट रिपोर्ट 1944 भारतीय शिक्षा के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण है। इस रिपोर्ट को अनेक नामों से जाना जाता है। जैसे सार्जेण्ट रिपोर्ट, भारत में युद्धोत्तर शिक्षा विकास योजना एवं केंद्रीय शिक्षा सलाहकार योजना की रिपोर्ट आदि। दूसरे विश्व युद्ध के समाप्त होने के बाद भारत सरकार का ध्यान भारतीयों की दशा सुधारने के लिए और उनके विकास के लिए प्रभावशाली योजना बनाने की ओर गया। इस कार्य के लिए सरकार के शिक्षा सलाहकार ‘जांन सार्जेण्ट’ को वायसराय की प्रबंधकारिणी काउंसिल के पुनर्निर्माण आयोग ने युद्ध उपरांत पुनर्निर्माण काल में भारतीय शिक्षा के विकास के लिए एक विवरण पत्र तैयार करने का कार्यभार सौंपा। इस कार्य के लिए 1944 में एक सर्वेक्षण दल का गठन किया गया जिसके अध्यक्ष सर …

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वर्धा योजना की असफलता के कारण

सैद्धांतिक दृष्टि से वर्धा योजना आदर्श योजना मानी जा सकती है किंतु व्यवहारिक रूप से यह योजना पूर्णतः असफल रही है। इसकी असफलता के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे। 1. योजना की व्यापकता का अभाव वर्धा शिक्षा योजना को राष्ट्रीय योजना कहा जाता है किंतु यह केवल ग्रामीण तथा प्राथमिक स्तर के बालकों के लिए ही थी, शहरी तथा अन्य स्तर के बालकों के लिए नहीं। 2. उच्च शिक्षा के संबंध न होना वर्धा शिक्षा पूर्णतः प्राथमिक स्तर के बालकों के लिए बनाई गई थी। इसके 7-14 वर्ष के ग्रामीण बालकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाई गई थी माध्यमिक शिक्षा तथा उच्च शिक्षा से संबंधित ना होने के कारण इसकी उपयोगिता डांसिंग अप्रासंगिक लगने लगी और इसे लागू न …

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बेसिक शिक्षा

बेसिक शिक्षा मूल रूप से व्यावहारिक होती है तथा बालक एक साथ कई विषयों का ज्ञान प्राप्त कर लेता है। बेसिक शिक्षा क्रियाओं तथा अनुभवों पर आधारित है इसीलिए इसका ज्ञान थोड़े से समय में ही हो जाता है। बालकों की शिक्षण व्यवस्था निम्न प्रकार होती है- सबसे पहले बच्चों को कहानी तथा बातचीत के माध्यम से मातृभाषा का ज्ञान कराया जाता है। मातृ भाषा का ज्ञान होने पर बच्चे पहले उसे पढ़ना तथा फिर लिखना सीखते हैं। पढ़ाई के साथ-साथ बालक किसी आधारभूत शिल्प का ज्ञान भी प्राप्त करते हैं। जैसे-जैसे बच्चा आगे की कक्षाओं में पहुंचता है वैसे ही उसे विभिन्न विषयों का ज्ञान भी प्राप्त होता रहता है। प्राकृतिक वातावरण, सामाजिक वातावरण तथा हस्तकला के माध्यम से …

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सैडलर आयोग 1917

सैडलर आयोग – सन् 1913 के “शिक्षा संबंधी सरकारी प्रस्ताव” में प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा की उन्नति एवं विस्तार के लिए अनेक बहुमूल्य विचार व्यक्त किए गए थे। किंतु इन विचारों को व्यावहारिक रूप प्रदान करने के लिए शिक्षाविदों की सहमति की आवश्यकता थी। अतएव शिक्षा आयोग की नियुक्ति का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। परंतु 1914 के आरंभ में होने वाले विश्व युद्ध ने आयोग की नियुक्ति को असंभव बना दिया और शिक्षा संबंधी सब सुधार कागज पर लिखे रह गए। सैडलर आयोग 1917 विश्वयुद्ध समाप्ति से कुछ दिन पहले भारत सरकार ने कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग की नियुक्ति की। इस आयोग के अध्यक्ष विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ माइकल सैडलर थे आता उनके नाम पर इस आयोग को सैडलर आयोग …

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हण्टर आयोग

हण्टर आयोग – लगभग सन् 1880 में ब्रिटिश प्रशासन को यह आवश्यकता अनुभव हुई की अब तक की शिक्षा की प्रगति का मूल्यांकन किया जाए तथा उत्पन्न हुए दोषों को किस प्रकार दूर किया जाए? इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए 1882 में हण्टर आयोग का गठन किया गया जो भारतीय शिक्षा आयोग के नाम से भी जाना जाता है। इस आयोग को लार्ड रिपन ने जो उस समय वायसराय थे, 3 फरवरी 1882 को नियुक्त किया। इस आयोग में 20 सदस्य थे। इस आयोग में सैयद महमूद, पी संगनन मुदलियार, हाजी गुलाम, के• टी• तंलग, भूदेव मुखर्जी आदि का नाम उल्लेखनीय है। हण्टर आयोग के प्रमुख उद्देश्य इस आयोग नियुक्ति के निम्न उद्देश्य थे- प्राथमिक शिक्षा की वर्तमान स्थिति …

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लार्ड कर्जन की शिक्षा नीति

लार्ड कर्जन की शिक्षा नीति को एक सरकारी प्रस्ताव के रूप में 11 मार्च 1904 को प्रकाशित कराया गया। प्रस्ताव में उस समय के भारतीय शिक्षा के विभिन्न 200 व कमियों का विश्लेषण किया गया उसके बाद सुधार हेतु सुझाव प्रस्तुत किए गए। प्रस्ताव में शिक्षा की नीति निम्न प्रकार से निर्धारित की गई। प्राथमिक शिक्षा पर कम ध्यान दिया गया है। अतः उसके प्रसार पर सरकार को अधिक ध्यान देना चाहिए। प्राथमिक शिक्षा से ही विद्यार्थियों की बौद्धिक नींव मजबूत होती है। प्राथमिक शिक्षा के अंतर्गत अंग्रेजी विषय का अध्ययन नहीं किया जाना चाहिए। प्राथमिक शिक्षा में भारतीय भाषाओं का स्थान प्रमुख होना चाहिए। माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षण को उत्कर्ष करने के लिए मान्यता प्रदान करने तथा सहायता अनुदान …

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लार्ड कर्जन की शिक्षा नीति, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान

वुड का घोषणा पत्र

वुड का घोषणा पत्र – 19 जुलाई 1854 को ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से एक नया शिक्षा संबंधी घोषणा पत्र आया। इस घोषणा पत्र को वुड का घोषणा पत्र कहा गया। इस घोषणा पत्र का मुख्य कारण भारतियों की शिक्षा सम्बंधी मांग थी। 1853 में कंपनी को ब्रिटिश सरकार की ओर से एक आज्ञा पत्र प्राप्त हुआ जिसके कारण कंपनी के प्रशासन व विधान में कुछ महत्वपूर्ण व आवश्यक परिवर्तन किए गए। इस प्रकार कंपनी को कुछ भारतीय मांग के कारण व कुछ ब्रिटिश सरकार के दबाव के कारण शिक्षा संबंधी कुछ सुधार करने के लिए बाध्य होना पड़ा। इस घोषणा पत्र में वुड ने भारतीय जनता की शिक्षा का संपूर्ण बार कंपनी के ऊपर रखा तथा कंपनी को …

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एडम रिपोर्ट

एडम रिपोर्ट – एडम एक शिक्षाविद्, विद्वान एवं कर्तव्यनिष्ठ समाज सेवक थे। एडम का मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही किसी भी समाज का विकास किया जा सकता है। तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने एडम को बिहार तथा बंगाल में शिक्षा की स्थिति का सर्वेक्षण करने का कार्य दिया था। एडम रिपोर्ट एडम ने 1835 से 1838 तक बंगाल में शिक्षा की स्थिति का सूक्ष्म अध्ययन किया। एडम ने तीन प्रतिवेदन इसी अध्ययन के फल स्वरुप दिए। इन तीन रिपोर्टो में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सामग्री होने के साथ-साथ विचारों व सुझावों का समावेश भी है। इन रिपोर्टों में तत्कालीन भारतीय शिक्षा पद्धति, शिक्षा व्यवस्था और भारतीयों के शिक्षा प्रेम का सच्चा वर्णन किया गया है। जिस अपकीर्ति को …

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मैकाले का विवरण पत्र 1835, त्रिभाषा सूत्र, राज्य स्तर पर शैक्षिक प्रशासन

लॉर्ड विलियम बैंटिक की शिक्षा नीति

बैंटिक की शिक्षा नीति – लॉर्ड विलियम बैंटिक ने मैकाले के विवरण पत्र में उल्लेखित किए गए उसके सभी विचारों का अनुमोदन किया। इस अनुमोदन के बाद 7 मार्च 1835 को एक नई विज्ञप्ति जारी की गई जिसमें उसने संस्कार की शिक्षा नीति को निम्न शब्दों में व्यक्त किया। शिक्षा के लिए निर्धारित धन का सर्वोत्कृष्ट प्रयास केवल अंग्रेजी शिक्षा के लिए ही किया जा सकता है। इसके द्वारा कंपनी की शिक्षा संबंधी नीति में अचानक परिवर्तन करके भारतीय शिक्षा को एक नया आकार दिया गया। यह उस दिशा के विषय में, जो सरकार सार्वजनिक शिक्षा की देना चाहती थी, निश्चित नीति की प्रथम सरकारी घोषणा थी। इस प्रकार लगभग 22 वर्षों से प्राच्य एवं पाश्चात्यवादियों का संघर्ष लॉर्ड विलियम …

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वुड का घोषणा पत्र

मैकाले का विवरण पत्र 1835

मैकाले का विवरण पत्र 1835 – 10 जून 1834 को लॉर्ड मैकाले ने गवर्नर जनरल की काउंसिल के कानूनी सदस्य के रूप में भारत में पदार्पण किया। उस समय तक प्राच्य पाश्चात्य विवाद उग्रतम रूप धारण कर चुका था। बैंटिक को विश्वास था कि मैंकॉले जैसा प्रकांड विद्वान ही इस विवाद को समाप्त कर सकता था। इस विचार से उसने मैकाले को बंगाल की लोक शिक्षा समिति का सभापति नियुक्त किया। फिर उसने मैकाले से 1813 के आज्ञा पत्र की 43वीं धारा में अंकित ₹1,00,000 की राशि को व्यय करने की विधि और अन्य विवाद ग्रस्त विषयों के संबंध में कानूनी सलाह देने का अनुरोध किया। मैकाले का विवरण पत्र 1835 मैकाले ने सर्वप्रथम आज्ञापत्र की उक्तधारा और दोनों दलों …

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वुड का घोषणा पत्र

मुस्लिमकालीन शिक्षा

मुस्लिमकालीन शिक्षा, मध्यकालीन युग में अरब की सामाजिक तथा सांस्कृतिक नीतियों का प्रभाव भारत के समाज विशेषकर कला एवं संस्कृति पर पड़ा। इसी प्रभाव का असर हमारी तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था पर भी पड़ा। इसके फलस्वरूप शिक्षा जगत भी प्रभावित हुए बिना न रह सका। 11वीं शताब्दी में मुस्लिम आक्रमणों की जो श्रंखला प्रारंभ हुई वह मोहम्मद गौरी, महमूद गजनबी, चंगेज खान, तैमूर लंग, नादिरशाह, अहमद शाह अब्दाली तथा मुगल वंश के प्रारंभ तक चलती रही। तथा सोने की चिड़िया कहा जाने वाला भारत इन आक्रमणों को जलते हुए सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक रूप से प्रभावित होता रहा। तथा इसी क्रम में भारतीय शिक्षा जगत भी प्रभावित हुए बिना न रह सका। वैदिककालीन शिक्षा ——— बौद्धकालीन शिक्षा मुस्लिमकालीन शिक्षा के …

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धर्म में आधुनिक प्रवृत्तियां, मुस्लिमकालीन शिक्षा

तक्षशिला विश्वविद्यालय

तक्षशिला विश्वविद्यालय वर्तमान पाकिस्तान के रावलपिडी शहर से 35 कि•मी• उत्तर की ओर स्थित था। तक्षशिला नगर तत्कालीन राज्य की राजधानी था। वैदिक काल में यह वैदिककालीन शिक्षा का मुख्य केंद्र था। बाद में यह बौद्धकालीन शिक्षा के मुख्य केंद्र के रूप में विकसित हुआ। तक्षशिला विश्वविद्यालय यह विश्व का प्रथम विश्विद्यालय था जिसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में की गई थी। तक्षशिला विश्वविद्यालय के बड़े-बड़े शिक्षण कक्ष सभा भवन, विशाल पुस्तकालय, शिक्षक निवास भवन, छात्रावास तथा भोजनालय आदि का निर्माण एवं संचालन प्रारंभ हुआ। इस विश्वविद्यालय का प्रमुख शिक्षक कुलपति होता था। जिसकी अध्यक्षता में प्रमुख समितियों का गठन किया जाता था जो विश्वविद्यालय के विभिन्न कार्यों के संपादन एवं देख-रेख के लिए उत्तरदाई होते थे। तक्षशिला विश्वविद्यालय …

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उच्च शिक्षा के उद्देश्य, विश्वविद्यालय शिक्षा प्रशासन, नेता के सामान्य गुण

बौद्धकालीन शिक्षा

बौद्धकालीन शिक्षा के दो प्रमुख स्तर निम्न थे- प्राथमिक स्तर – जातक कथाओं से प्राप्त जानकारी के अनुसार बौद्ध काल की प्राथमिक शिक्षा सांसारिक शिक्षा के रूप में दी जाती थी। इस संबंध में फाह्यान ने भी सामान्य अथवा प्राथमिक शिक्षा की चर्चा अपने ग्रंथों में की है। उच्च स्तर – इस संबंध में प्रो• अल्तेकर के अनुसार “मठों ने अपनी उच्च शिक्षा की योग्यता से, जहां अध्ययन करने के लिए चीन, कोरिया, तिब्बत, जावा जैसे सुदूर देशों के छात्रों को आकर्षित किया है, वहीं भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को भी ऊंचा उठा दिया है। बौद्धकालीन शिक्षा विशेषताएं बौद्धकालीन शिक्षा की विशेषताएं निम्न प्रकार हैं- 1. शिक्षा प्राप्त करने की योग्यता इसी युग में शिक्षा प्राप्त करने के लिए चांद …

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वैदिककालीन शिक्षा

वैदिककालीन शिक्षा – धर्म और धार्मिक मान्यताएं भारतीय शिक्षा के पीछे हजारों वर्षों की शैक्षिक तथा सांस्कृतिक परंपरा का आधार हैं। प्राचीन काल में शिक्षा का आधार क्रियाएं थी। वैदिक क्रिया ही शिक्षा का प्रमुख आधार थी। समस्त जीवन धर्म से चलायमान था। भारतीय शिक्षा का प्रमुख ऐतिहासिक साक्ष्य वेद है। वैदिक युग में शिक्षा व्यक्ति के चहुंमुखी विकास के लिए थी। वैदिककालीन शिक्षा की विशेषताएं वैदिककालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषताओं का संक्षिप्त विवरण निम्न है- ज्ञान शिक्षा मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। शिक्षा के उद्देश्य शिक्षा प्रणाली उपनयन संस्कार ब्रह्मचर्य गुरु सेवा भिक्षावृत्ति व्यवहारिकता व्यक्ति के लिए शिक्षा अवधि पाठ्यक्रम गुरु शिष्य संबंध 1. ज्ञान, शिक्षा मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है शिक्षा ज्ञान है और …

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