शिक्षा के सामाजिक परिप्रेक्ष्य

भारत में स्त्री शिक्षा का विकास

भारत में स्त्री शिक्षा का विकास – प्राचीन काल में नारी समाज की एक शब्द शिक्षित व सम्मानित अंग रही है। ऋग्वेद काल में स्त्रियों को पूर्ण स्वतंत्रता थी। वह पुरुषों के साथ यज्ञ करती थी। यहां तक कि वह यज्ञ पूर्ण नहीं माना जाता था। जो बिना अर्धांगिनी के संपादित किया जाता था। ऋग्वैदिक काल में बहुत सी विदुषी स्त्रियां हैं। उपनिषद काल में भी स्त्रियों को शिक्षा की पूर्ण स्वतंत्रता थी। उपनिषदों में ऐसी स्त्रियों का भी वर्णन है जो शिक्षिका का कार्य करती थी। स्त्रियों को ब्रह्मवादिनी कहा जाता था। इस स्त्री शिक्षिकाएं, उपाध्याय और आचार्य भी कहलाती थी। पिता की अभिलाषा रहती थी कि उसकी पुत्री पंडित और स्त्रियों को सैनिक शिक्षा दिए जाने का उदाहरण …

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भारत में स्त्री शिक्षा का विकास

विकलांग शिक्षा

विकलांग शिक्षा – विकलांग बच्चे विशिष्ट बच्चों की श्रेणी में आते हैं, जिनकी पहचान गुणों, लक्षणों, आदर्शों या किसी कमी के कारण अलग से प्रतीत होती है। विशिष्ट बालक वह है, जो सामान्य बालकों से शारीरिक, मानसिक, सांविधिक और सामाजिक विशेषताओं में इतने अधिक विषमता पूर्ण होते हैं कि अपनी उच्चतम योग्यताओं को विकसित करने के लिए उन्हें शैक्षिक सुविधाओं की आवश्यकता पड़ती है। इस दृष्टि से भी विकलांग बालक सामान्य बच्चों से अलग होते हैं। ऐसे बालकों के शरीर में कोई ना कोई कमी होने के कारण यह विकलांगता की श्रेणी में आते हैं। विकलांगों के प्रकार विकलांग मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं। शारीरिक रूप से विकलांग – इनमें किसी अंग की कमजोरी या कमी रहती …

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विकलांग शिक्षा

स्त्री शिक्षा

स्त्री शिक्षा आज के युग में समाज में सुधार की ओर तीव्र गति से बढ़ रही है। उनकी हर तरह की पारिवारिक, सामाजिक, शैक्षिक एवं आर्थिक स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है। आज की नारी किसी भी क्षेत्र में पुरुष से पीछे नहीं है। स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन का श्रेय स्त्री शिक्षा के प्रसार तथा प्रचार को है। उन्हें समाज में उचित स्थान देना चाहिए। भ्रूण परीक्षण द्वारा कुछ लोग पहले ही बालक होने के प्रति आश्वस्त होना चाहते हैं। भारत में भ्रूण हत्या और उनका परीक्षण स्त्री को जन्म से ही वंचित कर देता है। ग्रामीण क्षेत्रों में अंधविश्वास के कारण इस पाप को करने से लोग हिचकी चाहते नहीं हैं। आज भी कुछ लोग जन्म के बाद …

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स्त्री शिक्षा

जनतंत्र और शिक्षा

जनतंत्र और शिक्षा – शिक्षा में जनतंत्रीय सिद्धांतों के प्रयोग का श्रेय जॉन डीवी को है। डीवी की पुस्तक जनतंत्र और शिक्षा, प्लेटो की रिपब्लिक और रूसो की एमिल की भांति ही एक उच्च श्रेणी की पुस्तक है। डीवी के विचारों का शिक्षा पर बड़ा प्रभाव पड़ा। शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले व्यक्ति धीरे-धीरे शिक्षा को जनतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित करने लगे। जनतंत्र और शिक्षा जनतंत्र की सफलता मुख्य रूप से शिक्षा पर निर्भर करती है। मनुष्य समाज के तुच्छ भेदभाव से ऊपर उठकर समानता और एकता के आधार पर कार्य करता है। क्योंकि अशिक्षित समाज किसी भी तरह जनतंत्र को सफल नहीं बना सकता। जनतंत्र और शिक्षा एक दूसरे से किस प्रकार संबंधित है आइए जानते हैं- …

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जनतंत्र और शिक्षा

जनतंत्र अर्थ परिभाषा जनतंत्र की विशेषताएं सिद्धांत

जनतंत्र को गणतंत्र भी कहा जाता है। गण का अर्थ होता है – झुंड, समूह या जत्था। जनतंत्र को राजतंत्र भी कहा जाता है इसलिए लोकतंत्र के लिए गणराज्य शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। सभी शब्दों से एक ही मत या विचार स्पष्ट होता है कि किसी भी देश या राष्ट्र में राजनैतिक रूप से जब जनता का शासन स्थापित किया जाता है तो वह लोकतंत्र कहलाता है। साधारण तौर पर जनतंत्र से यह धारणा होती है कि राज्य,जनता, चुनाव, संसद आदि का निर्माण करना। जन तंत्र को सफल बनाने के लिए इसके सिद्धांतों तथा मूल्यों का प्रयोग जीवन के आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक तथा शैक्षिक सभी क्षेत्रों में किया जाना चाहिए। भारत में संसदीय, प्रजातांत्रिक प्राणी को मान्यता …

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जनतंत्र

भारतीय समाज अर्थ परिभाषा आधार

भारतीय समाज – समाजशास्त्री समाज को एक अचित्रित या अमूर्त संप्रत्यय कहते हैं। समाज को सामाजिक संबंधों का जाल मानते हैं। साधारण भाषा में सामाजिक संबंधों से बने सामाजिक समूह को समाज कहते हैं। प्रत्येक समाज लगभग इसी प्रकार का ही होता है। भारतीय समाज भी इसी प्रकार का है परंतु भारतीय समाज को अनेक विद्वान भिन्न-भिन्न रूपों में मानते हैं और इसकी विवेचना करते हैं। वर्तमान में भारत देश में लोकतंत्र आत्मक शासन प्रणाली है। लोकतंत्र किसी भी व्यक्ति से जाति, धर्म, वर्ग या संस्कृति के आधार पर भेदभाव नहीं करता है। भारत की संपूर्ण जनसंख्या भारतीय समाज का हिस्सा है। उदीयमान भारतीय समाज का अर्थ समाज गतिशील है। इसका विकास का भी सकारात्मक होता है। कभी इसका विकास …

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भारतीय समाज

भारत में नव सामाजिक व्यवस्था

भारत में नव सामाजिक व्यवस्था – नवीन भारत में देश की सामाजिक व्यवस्था मुख्य रूप से राजतंत्र, अर्थतंत्र और शिक्षा व सामाजिक व्यवस्थाओं पर आधारित है। परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि इसके इस स्वरूप निर्धारण में धर्म तथा अन्य सामाजिक व्यवस्थाओं का योगदान नहीं है। भारत में नव सामाजिक व्यवस्था भारत विभिन्न संस्कृतियों से परिपूर्ण देश है। भारतीय संस्कृति में वसुधैव कुटुंबकम की भावना निहित है। भारतीय संविधान के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है परंतु असामाजिक तत्व एवं कट्टरपंथी धर्म के नाम पर देश में अलगाववादी विचार उत्पन्न कर रहे हैं। राजनीतिक लोग अपने हित के लिए देश को धर्म के नाम पर विभाजित कर रहे हैं। साथ ही साथ जनता भी उनकी इस नीति को स्वीकार …

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भारत में नव सामाजिक व्यवस्था

भारतीय समाज का आधुनिक स्वरूप

भारतीय समाज का आधुनिक स्वरूप – भारतीय समाज दुनिया के सबसे जटिल समाजों में एक है। इसमें कई धर्म, जाति, भाषा, नस्ल के लोग बिलकुल अलग-अलग तरह के भौगोलिक भू-भाग में रहते हैं। उनकी संस्कृतियां अलग हैं, लोक-व्यवहार अलग है। भारतीय समाज का आधुनिक स्वरूप समाज की प्रकृति गतिशील होने के कारण उसमें निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं। ऐसा ही इस भारतीय समाज में हुआ तथा इन परिवर्तनों के कई आधार हैं, भारतीय समाज का आधुनिक स्वरूप निम्नवत रूप से पढ़ा जा सकता है – भारतीय समाज का सामाजिक स्वरूप भारतीय समाज का सांस्कृतिक स्वरूप भारतीय समाज का धार्मिक स्वरूप भारतीय समाज का आर्थिक स्वरूप भारतीय समाज का राजनीतिक स्वरूप भारतीय समाज का वैज्ञानिक स्वरूप भारतीय समाज का सामाजिक स्वरूप …

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शिक्षा के व्यक्तिगत उद्देश्य, भारतीय समाज का आधुनिक स्वरूप

सतत शिक्षा

सतत शिक्षा एक ऐसी व्यापक अवधारणा है जो सभी रूपों में चलने वाले शैक्षिक क्रियाकलापों को अंतर्निहित करती है। इसके अंतर्गत औपचारिक सहज तथा गैर औपचारिक सभी प्रकार की शैक्षिक प्रणालियां आ जाती हैं। सतत शिक्षा मूल्य शिक्षा को जीवन और जीवन को शिक्षा समझने वाली अवधारणा है। व्यापक अर्थ में सतत शिक्षा यह जीवन शिक्षा जन्म से मृत्यु तक अविरल चलने वाली प्रक्रिया है। सतत शिक्षा के अर्थ को और अधिक स्पष्ट करने के लिए नीचे कुछ परिभाषाएं दी जा रही हैं। सतत शिक्षा व्यक्तियों को इस योग्य बनाती है कि वह अपने उपयुक्त कौशलों योग्यताओं एवं व्यक्तियों का विकास कर सकें। सतत शिक्षा एक नवीन क्षेत्र है और यह सामाजिक अणु को विखंडित करने के लिए शक्तिशाली अस्त्र …

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सतत शिक्षा

लोकतंत्र और शिक्षा के उद्देश्य

लोकतंत्र और शिक्षा के उद्देश्य – लोकतंत्र की सफलता उसके नागरिकों पर निर्भर करती है। लोकतंत्र व्यक्ति के व्यक्तित्व एवं सामाजिक दोनों प्रकार के विकास पर समान बल देता है। इस अपेक्षा के साथ ही उसे व्यक्ति समाज और राष्ट्र सभी का हित हो। उसके अनुसार शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य होनी चाहिए – स्वास्थ्य रक्षा एवं स्वास्थ्यवर्धन मानसिक विकास वस्तु के सामाजिक विकास और नेतृत्व की शिक्षा सांस्कृतिक विकास नैतिक एवं चारित्रिक विकास लोकतंत्र और लोकतंत्र की नागरिकता की शिक्षा राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति 1. स्वास्थ्य रक्षा एवं स्वास्थ्यवर्धन लोकतंत्र व्यक्ति के व्यक्तित्व का आदर करता है और व्यक्ति के लिए स्वस्थ्य शरीर पहली आवश्यकता है। अतः लोकतंत्र मनुष्य को अपने स्वास्थ्य की रक्षा एवं पुस्तक संवर्धन करने में प्रशिक्षित …

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लोकतंत्र और शिक्षा के उद्देश्य

प्रजातंत्र के गुण व दोष

प्रजातंत्र के गुण व दोष – प्रजातंत्र की सफलता का मूल आधार शिक्षा होती है, इसलिए लोकतंत्र जन शिक्षा पर सबसे अधिक बल देता है। इसके लिए वह सर्वथा में निश्चित आयु तक के बच्चों के लिए अनिवार्य एवं निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करता है। वह पुरुष और महिलाओं में भेद नहीं करता इसलिए दोनों के समान शिक्षा की व्यवस्था करता है। परंतु दिखाया गया है कि लाख प्रयत्न करने पर भी कुछ बच्चे इस शनिवार एवं निशुल्क शिक्षा को प्राप्त नहीं करते और बड़े होकर वे निरीक्षण प्रौण कहलाते हैं। । प्रजातंत्र के गुण व दोष प्रजातंत्र के गुण व दोष निम्न हैं – प्रजातंत्र के गुण सभी के हितों की रक्षा– प्रजातंत्र सरकार जनता की जनता द्वारा तथा …

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Human Rights in India

प्रजातंत्र परिभाषा व रूप

प्रजातंत्र अंग्रेजी भाषा के Democracy का हिंदी रूपांतरण है। जोकि दो शब्दों के योग से बना है – Demos और Kratia। इसमें Demos का अर्थ है जनता तथा Kratia का अर्थ है शक्ति या शासन। इस प्रकार शाब्दिक दृष्टि से इसका अर्थ है “जनता का शासन”। जिस देश में जनता को शासन के कार्यों में भाग लेने का अधिकार होता है और स्वयं शासन का संचालन करती है उस देश में प्रजातंत्र की व्यवस्था मानी जाती है। प्रजातंत्र परिभाषा प्रजातंत्र को अनेक विद्वानों ने निम्न प्रकार से परिभाषित किया है। प्रजातंत्र वह शासन है जिसमें जनता का अपेक्षाकृत बड़ा भाग शासन में भाग लेता है। डायसी के अनुसार प्रजातंत्र वह व्यवस्था है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति का भाग होता है। सीले …

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Indian Constitution, The Judiciary, प्रजातंत्र

भारतीय संविधान के मौलिक कर्तव्य

भारतीय संविधान के मौलिक कर्तव्य – 26 जनवरी 1950 को स्वतंत्र भारत का नया संविधान लागू किया गया जिसके अंतर्गत भारत को एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित किया गया। स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान के द्वारा लोगों को मौलिक अधिकार जैसे समानता, स्वतंत्रता शोषण के विरुद्ध, धर्म स्वतंत्रता संस्कृति और शिक्षा संबंधी और संविधानिक उपचारों के अधिकार दिए गए हैं। अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। भारतीय संविधान के 44 वे संशोधन द्वारा नागरिकों के कुछ मौलिक कर्तव्य भी निर्धारित किए गए हैं, जो निम्न प्रकार से हैं- भारतीय संविधान के मौलिक कर्तव्य भारत का प्रत्येक नागरिक संविधान का सम्मान करें और उसमें दिए गए नियमों का पालन करें राष्ट्रीय ध्वज द्वारा सिवान का आदर करने …

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भारतीय संविधान के मौलिक कर्तव्य

मौलिक अधिकार

मौलिक अधिकार का सामाजिक जीवन पद्धति में व्यक्ति और राज्य के पारस्परिक संबंधों में महत्वपूर्ण स्थान है। शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति को राज्य के बनाए गए कानूनों और नियमों के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। किंतु साथ ही राज्य की शक्तियों और अधिकारों को सीमित करना भी आवश्यक है। मौलिक अधिकार व्यक्ति के पूर्ण मौलिक और मानसिक विकास के लिए अपरिहार्य हैं। इनके अभाव में व्यक्ति का यथोचित विकास नहीं हो सकता है। यह वह न्यूनतम अधिकार है जो किसी भी लोकतांत्रिक शासन पद्धति में व्यक्ति को प्राप्त होने चाहिए। मौलिक अधिकार भारत के संविधान के तीसरे भाग में वर्णित भारतीय नागरिकों को प्रदान किए गए वे अधिकार हैं जो सामान्य स्थिति में सरकार द्वारा सीमित नहीं …

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मौलिक अधिकार

सांस्कृतिक विरासत

सांस्कृतिक विरासत का तात्पर्य हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति सभ्यता तथा प्राचीन परंपराओं से जो आदर्श हमें प्राप्त हुए हैं। जिनको आज भी हम उन्हीं रूपों में थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ अपनाते चले आ रहे हैं। हमारी भारतीय संस्कृति विश्व की एकमात्र ऐसी संस्कृति रहिए जो कि लोक कल्याण व वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत को आधार मानकर व्यक्ति एवं समाज का कल्याण करती रही है। पुरुषार्थ भारतीय जीवन एवं हिंदी दर्शन का एक अति प्रमुख तत्व सदैव से रहा है। भारतीय दर्शन ने चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष का वर्णन किया है। कर्म का सिद्धांत, धार्मिक तथा आध्यात्मिक आचरण, वर्ण व्यवस्था, संयुक्त परिवार, अतिथि्य संस्कार, त्याग, संयम, पुनर्जन्म, प्राचीन रीति-रिवाजों तथा परंपराएं खान-पान पहनावा बोली भाषा ऐतिहासिक धरोहर …

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सांस्कृतिक विरासत

संस्कृति अर्थ महत्व

संस्कृत शब्द का जन्म संस्कार शब्द से हुआ है जो संस्कार व्यक्ति को संस्कृत बनाते हैं उसे संस्कृति नाम से संबोधित किया जाता है। भारतीय संविधान के अंतर्गत संस्कारों का बहुत महत्व है। गर्भाधान से लेकर मानव के पुनर्जन्म तक विवेक संस्कार किए जाते हैं, जिससे मानव सुसंस्कृत बनता है। जन्म होने पर नामकरण संस्कार, वेदारंभ संस्कार, उपनयन संस्कार, विवाह संस्कार तथा मृत्यु संस्कार इत्यादि विविध संस्कार होते हैं। जो विकासशील बालक को उसके सदाचार पूर्ण कर्तव्यों का स्मरण दिलाते रहते हैं और एक आदर्श मानव बनने के लिए प्रेरित करते हैं। सही अर्थ में संस्कारों द्वारा सुसंस्कृत होकर जीवन के सभी दृश्य कोणों का व्यवहारिक प्रदर्शन ही संस्कृत में इसके आधार व्यवहार की भाषा का उल्लेख जीवन सर्वशक्तिमान सत्ता …

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आर्थिक विकास

आर्थिक विकास का अर्थ शुद्ध राष्ट्रीय आय में दीर्घकालीन वृद्धि को सूचित करने वाली प्रक्रिया से है। दूसरे शब्दों में आर्थिक विकास हुआ प्रक्रिया है जिसके द्वारा अर्थव्यवस्था में राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय मैं दीर्घकालीन और सतत वृद्धि होती है। आर्थिक विकास को न्यू प्रकार परिभाषित किया जाता है। आर्थिक विकास एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा दीर्घकाल में किसी अर्थव्यवस्था की राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है। मायर या वोल्डविन के अनुसार आर्थिक विकास का संबंध इस उद्देश्य से होता है जो एक देश के द्वारा अपनी वास्तविक आय बढ़ाने हेतु समस्त उत्पादन साधनों का प्रयोग करता है। पाल एडवर्ल्ड के अनुसार आर्थिक विकास का अर्थ प्रति व्यक्ति आय उत्पादन से लगाया जाता है वादन की वृद्धि एक …

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आर्थिक विकास, ह्यूरिस्टिक विधि

सामाजिक परिवर्तन परिभाषा प्रक्रिया रूप

सामाजिक परिवर्तन- परिवर्तन प्रकृति का नियम है। परिवर्तन का आशय पूर्व की स्थिति या रहन सहन के ढंग में भिन्नता से है। प्रकृति के समान ही प्रत्येक समाज और सामाजिक व्यवस्था में भी परिवर्तन होता रहता है। सामाजिक व्यवस्था के निर्णायक तत्व मनुष्य है जिसमें आए दिन परिवर्तन होता है। सामाजिक परिवर्तन दो शब्दों से मिलकर बना है समाज और परिवर्तन। समाज का अर्थ केवल व्यक्तियों का समूह नहीं है, समूह में रहने वाले व्यक्तियों के आपस में जो संबंध है उस संबंध के संगठित रूप को समाज कहते हैं। साथ ही साथ परिवर्तन का अर्थ है बदलाव अर्थात पहले की स्थिति में बदलाव। जिस किसी भी समाज के जीवित होने का प्रमाण ही परिवर्तन है। अपरिवर्तित अथवा बगैर परिवर्तन …

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सामाजिक परिवर्तन परिभाषा प्रक्रिया रूप

धर्मनिरपेक्षता अर्थ विशेषताएं

धर्मनिरपेक्षता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग जॉर्ज जैकब हॉलीडेक द्वारा 19वीं शताब्दी में किया गया। उसने लैटिन भाषा के शब्द Seculum शब्द से इस शब्द को ग्रहण किया जिसका अर्थ है यह वर्तमान स्थिति वास्तव में इस शब्द का प्रयोग सामाजिक तथा नैतिक मूल्यों की प्रणाली के संदर्भ में किया था। उसकी इस मूल्य प्रणाली के आधार निम्नलिखित सिद्धांत थे। मनुष्य की भौतिक तथा सांस्कृतिक उन्नति को विशेष महत्त्व उसके द्वारा सत्य की खोज पर बल वर्तमान युग या विश्व की उन्नति से संबंध तार्किक नैतिकता पर बल हम जानते हैं कि भारत एक बहु धर्मावलंबी बहु भाषा एवं संस्कृत वाला देश है। लोकतंत्र यहां की शासन प्रणाली का आधार है। इस आसन में आवश्यक है कि सभी नागरिकों के प्रति …

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लोकतंत्र और शिक्षा के उद्देश्य

आदर्श शैक्षिक पाठ्यक्रम कैसा होना चाहिए

आजकल विद्यालयों में बालक के शारीरिक विकास मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए अनेक प्रयास किए गए। साथ में संवेगात्मक और सौंदर्यात्मक तथा सामाजिक विकास पर भी अनेक प्रयत्न किए गए। सामाजिक बुराइयों के प्रभाव को कम करने तथा दूषित राजनीति के प्रभाव से दूर रखने के लिए भी अनेक प्रयत्न किए गए। आदर्श शैक्षिक पाठ्यक्रम वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में आदर्श शैक्षिक पाठ्यक्रम को निम्न प्रकार का होना चाहिए – शारीरिक श्रम को महत्त्व व्यावसायिक पाठ्यक्रम विज्ञान व तकनीकी को अनिवार्य स्थान कृषि को स्थान शारीरिक शिक्षा तथा स्वास्थ्य विज्ञान भारतीय भाषाओं का ज्ञान प्राचीन संस्कृति एवं इतिहास का अध्ययन धार्मिक व नैतिक शिक्षा राष्ट्रीय व समाज सेवा कार्यक्रमों का आयोजन क्रियात्मक पक्ष पर बल 1. शारीरिक श्रम …

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आदर्श शैक्षिक पाठ्यक्रम,