समाजशास्त्र

मृदा प्रदूषण

मृदा के किसी भी भौतिक रासायनिक और जैविक घटक में आवांछनीय परिवर्तन को मृदा प्रदूषण कहते हैं। मृदा प्रदूषण न केवल विस्तृत वनस्पति को प्रभावित करता है बल्कि यह मिट्टी के सूक्ष्म जीवों की संख्या में परिवर्तन कर देते हैं, जो कि मृदा को उपजाऊ बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। मृदा प्रदूषण के स्रोत मृदा प्रदूषण करने वाले विभिन्न स्रोतों को निम्न दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। पहला प्राकृतिक स्रोत और द्वितीय कृत्रिम स्रोत। प्राकृतिक स्रोत – जंतुओं और वनस्पति स्रोतों से प्राप्त प्रदूषक इस सूची में है- पेड़ पौधों की मृत्यु और उनके अपघटन के फल स्वरुप मृदा में कार्बनिक पदार्थ मिल जाते हैं। जो कि मृदा की उर्वरता शक्ति को बढ़ाते हैं। जंतुओं …

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मृदा प्रदूषण

विस्थापन के कारण

विस्थापन के कारण – विस्थापन शब्द अंग्रेजी भाषा के Displacement शब्द से बना जिसका अर्थ है अपना स्थान बदलना। जब कोई व्यक्ति अथवा समूह किसी कारण से अपने स्थाई स्थान से हटा दिया जाता है तो इस क्रिया को विस्थापन कहते हैं। जबकि हटाए गए व्यक्ति को विस्थापित कहते हैं। उदाहरण के लिए भारत में बड़े-बड़े बांधों के बनाए जाने से उसके समीप आने वाले डूबते क्षेत्र में आने वाले गांवों तथा बस्तियों की सुरक्षा की दृष्टि से किसी अन्य क्षेत्र में बसाया जाता है यह विस्थापन का उदाहरण है। BA Second Sociology I विस्थापन के कारण विस्थापन के कारण अनेक हो सकते है। विस्थापन के प्रमुख कारण निम्न है- 1. प्राकृतिक कारण विस्थापन के इस कारण के अंतर्गत बाढ़ …

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विस्थापन के कारण

वृद्धों की योजनाएं

वृद्धों की योजनाएं वृद्धों की चौमुखी सहायता करने के लिए संस्थाओं द्वारा चलाई जाती हैं। वृद्धजनों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सरकारी और गैर सरकारी संस्थान मिलकर कार्य कर रहे हैं। वृद्धों की योजनाएं वृद्धों के लिए निम्नलिखित कल्याणकारी कार्यक्रम और योजनाएं चलाई गई है- राष्ट्रीय वृद्धजन परिषद राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना केंद्रीय सहायता योजना वृद्ध आश्रम डे केयर सेंटर वृद्धों के लिए चिकित्सा सेवाएं वृद्धों के लिए गैर संस्थागत सेवाएं BA Second Sociology I 1. राष्ट्रीय वृद्धजन परिषद भारत सरकार की राष्ट्रीय नीति को दृष्टिगत रखते हुए वृद्धजनों के संबंध में 1999 में इस परिषद की स्थापना की गई। इस परिषद का प्रमुख कार्य वृद्धों की शिकायतों और कठिनाइयों को ध्यान पूर्वक सुनना और उन पर विचार …

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वृद्धों की योजनाएं

पारिस्थितिकी

पारिस्थितिकी शब्द वर्तमान में प्रचलित Ecology शब्द का हिंदी अनुवाद है। Ecology शब्द का उद्गम ग्रीक भाषा के 2 शब्दों Oikos= House या घर तथा Logus= Study या अध्ययन से हुआ है। इस शब्द के जन्मदाता रिटर्न ए सर्वप्रथम 1807 में इस शब्द का प्रयोग किया लेकिन जर्मन वैज्ञानिक अर्नेस्ट हैकल ने इस शब्द की पूर्ण व्याख्या करके इसे परिभाषित किया। पृथ्वी पर समस्त प्राणी भौतिक वातावरण एवं उद्विकास यह प्रक्रिया पथ तथा आपसी संबंधों द्वारा जुड़े हुए हैं। एक सजीव दूसरे को भोजन व आवास प्रदान कर सकता है या एक दूसरे के लिए उपयोगी तथा हानिकारक पदार्थ पैदा कर सकता है। दोनों भोजन व आवास के लिए संघर्ष कर सकते हैं। अतः सजीव का उसके जैविक व अजैविक …

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जातीय संघर्ष

भारत में जातीय संघर्ष सर्वाधिक मिलता है। स्वतंत्र भारत में जाति संघर्षों में बाढ़ सी आई है। जातीय ऊंच-नीच, भेदभाव व संकीर्णता से अनेक तत्वो, विरोधो व संघर्षों को जन्म दिया है। आज एक जाति दूसरी जाति के विरुद्ध मोर्चाबंदी किए है एक क्षेत्र दूसरे क्षेत्र के विरोध में खड़ा है। पी• एन• हक्सर Today cost is ranged against caste, region against region. आज जातिवाद जातिवाद देश की एकता में सबसे अधिक बाधक है। इससे देश का कोई भाग अछूता हुआ मुक्त नहीं। पूरा देश इनकी चपेट में है। उत्तर प्रदेश में हरिजन व सवर्ण में राजस्थान में जाट और राजपूतों में मध्य प्रदेश में ब्राह्मणों, बनियों वा राजपूतों में, बिहार में राजपूतों का भूमिहारों में, गुजरात में पाटीदार व …

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जातीय संघर्ष निवारण

जातीय संघर्ष निवारण के लिए अनेक समाज शास्त्रियों ने अपने अपने सुझाव दिए हैं। स्वस्थ समाज के विकास के लिए आवश्यक है कि विकास के मार्ग की बाधाओं और समस्याओं को दूर किया जाए तथा अनुकूल परिस्थितियों का सृजन किया जाए। जातीय संघर्ष निवारण जातीय संघर्षों निवारण हेतु सुझाव निम्नलिखित हैं। जातिवाद की समाप्ति आर्थिक समानता उचित शिक्षा स्वस्थ जनमत असामाजिक तत्वों में वृद्धि सांस्कृतिक विघटन स्थिरता में बाधा शांति व व्यवस्था की समस्या लोकतंत्र व सरल अंतर्जातीय विवाह 1. जातिवाद की समाप्ति जातिवाद देश के लिए अभिशाप है। इसके रहते क्षुद्र स्वार्थों, संकीर्णता व विघटन को बढ़ावा मिलता है। जातिवाद की समस्या के समाधान के लिए इरावती कर्वे ने सभी जातियों की आर्थिक व सामाजिक समानता को आवश्यक बताया …

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भारत में वृद्धो की समस्याएं

वृद्धो की समस्याएं – सामान्यत: 65 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों की गणना वृद्ध वर्ग के अंतर्गत की जाती है लेकिन भारत में जहां व्यक्ति की औसत जीवन अवधि अपेक्षाकृत कम है 69 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों को वृद्ध कहा जाता है। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के विकास, आयु संभावित में वृद्धि तथा मृत्यु दर में ह्रास के कारण वृद्धों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है और इसकी अधिकता के कारण इनकी स्थिति दयनीय होती जा रही है। 1969 मैं देश में वृद्धों की संख्या जनसंख्या का 6.21% जो आज बढ़कर 6.57% हो गई है। इस प्रकार देश में वृद्धों की बढ़ती हुई संख्या सामाजिक अर्थव्यवस्था के समक्ष एक गंभीर समस्या है। सन 2000 में …

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संघर्ष अर्थ व विशेषताएं

संघर्ष वह प्रयत्न है जो किसी व्यक्ति या समूह द्वारा शक्ति, हिंसा या प्रतिकार अथवा विरोधपूर्ण किया जाता है। संघर्ष अन्य व्यक्तियों या समूहों के कार्यों में प्रतिरोध उत्पन्न करते हुए बाधक बनता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है ऐसा प्रश्न जो स्वयं के स्वार्थ के लिए व्यक्तियों या सामूहिक कार्य में बाधा डालने के लिए किया जाता है वह संघर्ष कहलाता है। इसके अंतर्गत क्रोध, ग्रहण, आक्रमण, हिंसा एवं क्रूरता आदि की भावनाओं का समावेश होता है। संघर्ष संघर्ष को विभिन्न विद्वानों ने परिभाषित करते हुए लिखा है- संघर्ष वह सामाजिक प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत शक्ति या समूह अपने उद्देश्यों की प्राप्ति विपक्षी हिंसा या हिंसा के भय द्वारा करते हैं। गिलिन संघर्ष पारस्परिक अंतः क्रिया …

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संघर्ष

तलाक

तलाक – भारतीय समाज में अनेकों वैवाहिक समस्याएं विद्यमान है। दिन में एक प्रमुख समस्या तलाक या विवाह-विच्छेद की है, जोकि व्यक्तिक विघटन को प्रोत्साहित करती है। जब किसी व्यक्ति का विवाह किसी लड़की के साथ होता है तो वे दोनों पवित्र अग्नि के समक्ष मेरे लेकर एक दूसरे का सुख दुख में साथ निभाने का वादा करते हैं। किंतु जब इन दोनों के बीच कुछ कारण ऐसे उत्पन्न हो जाते हैं जिनसे दोनों में विवाद होने लगता है तो दोनों ही असंतुष्ट हो जाते हैं। यह विवाद जब अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाते हैं तो ऐसा लगने लगता है कि इनके विवादों का समाधान असंभव है तब एक ही रास्ता बचता है कि इन दोनों को अलग अलग …

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तलाक

मानवाधिकार आयोग

भारत में राष्ट्रीय स्तर व राज्य स्तर दोनों पर मानवाधिकार आयोग की स्थापना की गई है। जिसका मुख्य उद्देश्य मानव के अधिकार का संरक्षण करना, जागरूकता फैलाना व शोध कार्य करना है। राष्ट्रीय तथा राज्य स्तरीय मानवाधिकार आयोगों का अध्ययन हम लोग करने वाले हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा 3 में प्रावधान किया गया है की केंद्रीय सरकार द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के नाम से एक निकाय की स्थापना करेगी। इस आयोग में निम्नलिखित को शामिल किया जाएगा। एक अध्यक्ष जो सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका हो। एक सदस्य जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका हो या वर्तमान में हो। मानवाधिकारों से संबंधित व्यवहारिक ज्ञान व अनुभव रखने वाले दो सदस्य। आयोग का …

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मानवाधिकार

मानवाधिकार

मानवाधिकार का व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास तथा समाजपयोगी कार्यों में महत्वपूर्ण स्थान होता है। अधिकार, सामाजिक जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। अधिकारों के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। राज्य द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व, विकास हेतु अनेक सुविधाएं दी जाती हैं। राज्य के द्वारा व्यक्ति को प्रदान की जाने वाली बाहरी सुविधाएं ही अधिकार कहलाती हैं। मानवाधिकार मानव अधिकार ऐसे अधिकार है जो व्यक्ति से केवल मानव होने के कारण प्राप्त होने चाहिए। मानव अधिकारों का विचार एवं नागरिक अधिकार की अपेक्षा मानव अधिकारों का विचार क्षेत्र नागरिक अधिकारों की तुलना में अधिक व्यापक है। अधिक व्यापक मानव अधिकार वाले समाज की अवधारणा अधिक व्यापक है। सामान्यतया जिन अधिकारों को हम मानव अधिकारों के रूप में …

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मानवाधिकार

दहेज प्रथा

दहेज उस धन या संपत्ति को कहते हैं जो विवाह के समय कन्या पक्ष द्वारा वर पक्ष को दिया जाता है। हिंदू विवाह से संबंधित विभिन्न समस्याओं में से दहेज समस्या एक भीषण समस्या है। दहेज वह संपत्ति है जो विवाह के अवसर पर लड़की के माता-पिता या अन्य निकट संबंधियों द्वारा दी जाती है। फेयर चाइल्ड दहेज प्रथा उत्पत्ति के कारण दहेज प्रथा की उत्पत्ति के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं बाल विवाह – बाल विवाह अत्यंत बुरी प्रथा है जिसके कारण लड़के या लड़कियों को स्वयं अपने जीवनसाथी चुनने का अवसर नहीं मिलता और लड़के के माता-पिता दहेज लेकर उनकी शादी कर देते हैं। जीवनसाथी चुनने का सीमित क्षेत्र – जाति और उप जातियों में विवाह होने से उपयुक्त …

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घरेलू हिंसा

घरेलू हिंसा, भारतीय समाज में अनेक प्रकार की समस्याएं पाई जाती हैं, जिनका समाधान करने के लिए परिवार का प्रत्येक सदस्य प्रयत्नशील रहता है। कभी-कभी पारिवारिक समस्याएं इतना विकराल रूप धारण कर लेती हैं कि परिवार के सदस्यों द्वारा उनका समाधान कर पाना असंभव हो जाता है। इस स्थिति में परिवार के सदस्य हिंसा का सहारा लेते हुए हिंसात्मक रूप धारण कर लेते हैं। घरेलू हिंसा सामान्यता जब-जब परिवार के किसी सदस्य द्वारा हिंसा की जाती है तो उसे पारिवारिक या घरेलू हिंसा कहते हैं, लेकिन आज इसका आशय मुख्य रूप से महिलाओं के प्रति हिंसा से या परिवार की महिला द्वारा की जाने वाली हिंसा को पारिवारिक हिंसा के रूप में माना जाता है। आम समाज में महिला अपराधों …

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दलित समस्या समाधान

दलित समस्या समाधान – जिन वर्गों का प्रयोग हिंदू सामाजिक संरचना सोपान में निरंतर स्थान रखने के लिए समुदायों के लिए किया जाता है वह दलित व अनुसूचित जातियां कहलाती हैं। ‘निम्नतम’ स्थान का आधार इन जातियों के उस व्यवसाय से जुड़ा है, जिसे अपवित्र कहा गया है। यहां पर दलितों की विवेचना अनुसूचित जाति में की गई हैं क्योंकि भारतीय संविधान में अनुसूचित जाति के रूप में इनके कल्याण हेतु अनेकों संवैधानिक प्रावधान किए गए हैं। इन्हें अछूत, हरिजन और बाह्य जातियां भी कहा जाता है। इन्हें संविधान सूची में सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक दृष्टि से सुविधाएं दिलाने के उद्देश्य में शामिल किया गया है। भारतीय समाज मुद्दे एवं समस्याएं दलित समस्या दलितों की समस्याओं का अध्ययन निम्न …

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दलित समस्या समाधान

पिछड़ा वर्ग समस्या समाधान सुझाव

पिछड़ा वर्ग समस्या समाधान सुझाव – पिछड़ा वर्ग शब्द का प्रयोग समाज के कमजोर वर्गों विशेषत: अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़े वर्गों के संदर्भ में किया जाता है। भारतीय संविधान में पिछड़ा वर्ग शब्द का प्रयोग किया गया है। सामान्यत: इन वर्गों में अनुसूचित जातियों, जनजातियों, भूमिहीन श्रमिकों एवं लघु कृषकों आदि को शामिल किया जाता है। समाज में इन लोगों का स्थान अस्पृश्य जातियों से ऊपर किंतु ब्राह्मणों से होता है। भारतीय संविधान में इन वर्गों के लिए अनेकों सामाजिक व शैक्षणिक प्रावधान किए गए हैं। आरक्षण की भी व्यवस्था की गई है। पिछड़ा वर्ग परिभाषा पिछड़ा वर्ग की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है बल्कि उनका आशय ही केवल स्पष्ट किया गया है। पिछड़ा वर्ग की व्याख्या …

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अल्पसंख्यक कल्याण कार्यक्रम

अल्पसंख्यक कल्याण कार्यक्रम – धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यकों की समस्याओं के समाधान हेतु सरकार ने अनेक प्रयास किए हैं। अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए अनेक प्रावधान किए गए हैं। संविधान के अनुच्छेद 14, 15 एवं 16 में कानून के समक्ष समानता एवं विधि के समान संरक्षण का आश्वासन दिया गया है। किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म, जाति, मूल, वंश आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। अनुच्छेद 16 में सार्वजनिक सेवाओं में समान अवसर देने का प्रावधान है। अनुच्छेद 25 में प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी धर्म को स्वीकार करके उसका प्रचार करने की छूट दी गई है। अनुच्छेद 26 में धार्मिक मामलों का प्रबंध करने, अनुच्छेद 27 में धर्म का प्रचार प्रसार हेतु व कर …

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अल्पसंख्यक अर्थ प्रकार समस्याएं

अल्पसंख्यक की समस्याएं – एक समाज या राष्ट्र में विभिन्न दो या अधिक वर्ग के लोग निवास करते हैं जिनमें एक वर्ग या समूह की संख्या आधी से कम होती है वह अल्पसंख्यक वर्ग के नाम से जाना जाता है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि अल्प व्यक्तियों का समूह अल्पसंख्यक कहलाता है। इसे स्पष्ट करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने केरल शिक्षा विधेयक 1957 पर अपने निर्णय में कहा है कि अल्पसंख्यक होने या ना होने का प्रश्न एक राष्ट्र की संपूर्ण जनसंख्या के संदर्भ में निर्धारित किया जाना चाहिए। उपर्युक्त कथन से स्पष्ट होता है अल्पसंख्यक वर्ग में वह समूह आता है जिसकी जनसंख्या 50% से कम हो। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि भारत में …

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धार्मिक असामंजस्यता

धार्मिक असामंजस्यता – धर्म से समाज में नियंत्रण स्थापित होता है। धर्म से समाज में एकता संगठन व सामंजस्य की स्थापना होती है। एक से अधिक धर्म के अनुयाई साथ साथ रहने के कारण सांप्रदायिक विवाद उत्पन्न होते हैं। बहुधर्मी वाले समाज में धार्मिक असामंजस्यता उत्पन्न होता है तथा समाज की एकता भंग होती है। हमारे देश में विभिन्न धर्मों के अनुयाई लोग होने के कारण सांप्रदायिक विवाद उत्पन्न होते रहते हैं। हमारे देश में धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक संघर्ष पैदा होते हैं। धार्मिक असामंजस्यता की विशेषताएं धार्मिक अ सामंजस्यता का वर्णन नीचे किया गया है- धार्मिक समूहों से संबंधित होना – धार्मिक अ सामंजस्यता धार्मिक समूह, संगठन या संप्रदाय से संबंधित होती है। प्रत्येक धर्म के मानने वाले …

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धर्म परिभाषा, धार्मिक असामंजस्यता, बौद्धकालीन शिक्षा

धर्म परिभाषा लक्षण

धर्म परिभाषा – धर्म मानव समाज का एक ऐसा शाश्वत, व्यापक और स्थाई तत्व है, जिसे समझे बिना हम समाज के रूप को समझने में असफल रहेंगे। प्रत्येक समाज में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। मानवीय व्यवहार तथा आचरण इससे प्रभावित रहता है। संपूर्ण विश्व की संचालक शक्ति के अस्तित्व को एक दृढ़ विश्वास ही धर्म को जन्म देता है। वह शक्ति जो संपूर्ण प्रकृति की क्रियाओं को संचालित करती है। मानव जीवन में सुख दुख प्रदान करती है तथा इस शक्ति के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए व्यक्ति पूजा पाठ तथा धार्मिक अनुष्ठान करता है। धर्म का संबंध मानव की श्रद्धा भावनाओं एवं भक्ति के साथ जुड़ा हुआ है। धर्म व्यक्ति के आंतरिक जीवन को ही नहीं …

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धर्म परिभाषा लक्षण

भारतीय समाज में धर्म की भूमिका

धर्म संस्कृति का एक हिस्सा है। धर्म मानवीय जीवन से संबंधित अनेक अनेक कार्यों की पूर्ति करता है, इसी मानवीय लगाव के कारण आदि काल से लेकर वर्तमान काल तक सभी समाजों में धर्म ही दिखाई देता है। धर्म जीवन के मूल्यों का महत्वपूर्ण अर्थ स्पष्ट करता है। सदाचार की भावना से मनुष्य में आत्म नियंत्रण की शक्ति का उदय होता है। अतएव सामाजिक तथा मानवीय दोनों ही दृष्टि से धार्मिक संस्थाओं का बहुत ही महत्व है। भारतीय समाज में धर्म की भूमिका भारतीय समाज में धर्म की सकारात्मक भूमिका आर्थिक विकास में सहायक – धार्मिक प्रभाव के कारण समाज की अर्थव्यवस्था में भी परिवर्तन होता है, मैक्स वेबर ने इस बात को स्पष्ट किया है कि प्रोटेस्टेंट धर्म में …

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लैंगिक असमानता

लैंगिक असमानता का आशय समाज में स्त्रियों एवं पुरुषों में भेदभाव किए जाने से है। लैंगिक असमानता का प्रयोग जैविकीय एवं सामाजिक दोनों भावो में किया जाता है। जीव विज्ञान में लिंग का आशय विशिष्ट जैविककीय संरचना से है। इसमें विशेष शारीरिक व मानसिक दशाओं का समावेश होता है। समाजशास्त्र में स्त्री पुरुषों का अध्ययन सामाजिक संबंध की गहराई तक जानने हेतु किया जाता है। लिंगभेद सामाजिक सांस्कृतिक होता है। लैंगिक असमानता में स्त्री पुरुष का अध्ययन पति-पत्नी, माता पिता, पुत्र पुत्री, भाई बहन के रूप में सामाजिक सांस्कृतिक विचार से होता है। लिंग भेद का आशय स्त्रीत्व अथवा पुरुषत्व के रूप में समांतर व सामाजिक रूप में असमान विभाजन करने से हैं। समाजशास्त्र के विचार से लैंगिक असमानता हुआ …

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लैंगिक असमानता

धर्म में आधुनिक प्रवृत्तियां

धर्म में आधुनिक प्रवृत्तियां – यदि धर्म रूढ़िवादी पर्वती का तथा वस्तु- स्थित बनाए रखने का समर्थक है, परंतु आधुनिक समाज में तेजी से बदलती परिस्थितियों के प्रवेश के प्रवेश में यह स्वयं को बचाने में असमर्थ हो गया, जिसके परिणाम स्वरूप धर्म में नई प्रवृतियां दिखाई दी। धर्म में आधुनिक प्रवृत्तियां धार्मिक संकीर्णता में कमी धार्मिक कट्टरता का कम होना मानवतावादी धर्म का विकास धर्म का व्यवसायीकरण धार्मिक कर्मकांडो का सरलीकरण धर्म मनोरंजन के साधन के रूप में 1. धार्मिक संकीर्णता में कमी पुराने समय में धर्म की प्रकृति बहुत स संकीर्ण थी । सभी अपने धर्मों को अन्य धर्मों की अपेक्षा श्रेष्ठ समझते थे तथा दूसरे धर्मों को ग्रह की दृष्टि से देखते थे। इसी दृष्टिकोण के कारण …

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जाति अर्थ परिभाषा लक्षण

भारतीय सामाजिक संस्थाओं में जाति एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्था है। डॉक्टर सक्सेना का मत है कि जाति हिंदू सामाजिक संरचना का एक मुख्य आधार रही है, जिससे हिंदुओं का सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन प्रभावित होता रहा है। श्रीमती कर्वे का मत है कि यदि हम भारतीय संस्कृति के तत्वों को समझना चाहते हैं तो जाति प्रथा का अध्ययन नितांत आवश्यक है। जाति अर्थ जाति शब्द अंग्रेजी भाषा के कास्ट का हिंदी अनुवाद है। अंग्रेजी के Caste शब्द की व्युत्पत्ति पुर्तगाली भाषा के Casta शब्द से हुई है, जिसका अर्थ मत, विभेद तथा जाति से लगाया जाता है। जाति शब्द की उत्पत्ति का पता सन् 1665 में ग्रेसिया-डी ओरेटा नामक विद्वान ने लगाया। उसके बाद फ्रांस के अब्बे डुबाय …

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जाति अर्थ परिभाषा लक्षण

निर्धनता का सामाजिक प्रभाव

निर्धनता का सामाजिक प्रभाव क्या है? निर्धनता अनेक सामाजिक बुराइयों को जन्म देती है। निर्धनता के समाज पर अनेक प्रभाव पड़ते हैं। जिन्हें निम्न प्रकार स्पष्ट किया गया है- निर्धनता का सामाजिक प्रभाव निर्धनता समाज को और अधिक निर्धन करती है। निर्धनता का सामाजिक प्रभाव निम्न है- अपराधों में वृद्धि भिक्षावृत्ति चरित्र का पतन शारीरिक प्रभाव मानसिक प्रभाव गरीबी, गरीबी को उत्पन्न करती है 1. अपराधों में वृद्धि निर्धनता एक अभिशाप है जो कि अपराधों में वृद्धि करती है। सामान्यतया जब कोई व्यक्ति ईमानदारी से धन नहीं कमा पाता है, तो वह अपराध करने लगता है। क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने परिवार को कष्ट में नहीं रख सकता है। अतः इसका निवारण करने के लिए उसकी प्रवृत्ति अपराधिक हो जाती …

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निर्धनता का सामाजिक प्रभाव, जातीय संघर्ष

भारत में निर्धनता के कारण

भारत में निर्धनता के कारण निम्न है- अशिक्षा – भारत में सन 2001 की जनगणना के अनुसार अब तक जनसंख्या का केवल 65.38% भाग ही साक्षर है, इस प्रतिशत में व्यक्ति भी सम्मिलित है जो मामूली रूप से लिख पढ़ सकते हैं। उद्योगों की कमी – भारत में आदमी प्रमुख उद्योग शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित है। ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योगों का उचित विकास नहीं हुआ है, जिस कारणवश वहां पर बेरोजगारी में वृद्धि होती है। जो निर्धनता का प्रधान कारण है। सामाजिक कारण – देश में गरीबी के लिए जाति प्रथा, संयुक्त परिवार प्रथा, उत्तराधिकार के नियम, शिक्षा व मानव कल्याण के प्रति उदासीनता आज के अनेक कारण हैं, जो गरीबों को और गरीब बना रहे हैं। आप निर्धनता …

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भारत में निर्धनता के कारण

निर्धनता का अर्थ एवं परिभाषा

भारत में निर्धनता की परिभाषा पौष्टिक आहार के आधार पर दी गई है। योजना आयोग के अनुसार किसी व्यक्ति को गांव में यदि 2400 कैलोरी और शहरों में 2100 कैलोरी प्रतिदिन की ऊर्जा का भोजन उपलब्ध नहीं होता है तो यह माना जाएगा कि वह व्यक्ति गरीबी की रेखा के नीचे अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। निर्धनता कुछ प्रमुख विद्वानों ने गरीबी को निम्न प्रकार परिभाषित किया है- गरीबी वह दशा है जिसमें एक व्यक्ति अपर्याप्त आए या विचार हीन वह के कारण अपने जीवन स्तर को इतना ऊंचा नहीं रख पाता है जिससे उसकी शारीरिक व मानसिक कुशलता बनी रह सके वह तथा उसके आश्रित समाज के स्तर के अनुसार जिसका कि वह सदस्य है जीवन व्यतीत कर …

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निर्धनता का अर्थ एवं परिभाषा