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कक्षा 10 लेखकों का जीवन परिचय

UP Board के कक्षा 10 के पाठ्यक्रम में गद्य तथा पद्य में कुल 20 लेखको की जीवनी दी गयी है। जिनमे से गद्य से तथा पद्य से अलग अलग 1-1 जीवनी परीक्षा में पूछी जाती है। कक्षा 10 लेखकों का जीवन परिचय कुल 6 अंक का पूछा जाता है। लेखकों तथा कवियों के जीवन परिचय से क्रमशाः 3 और 3 अंक के प्रश्न पूछे जाते है। यहाँ सभी रचनाकारों की रचनाएँ सहित उनका जीवन परिचय सरल भाषा में दिया जा रहा है।

कक्षा 10 लेखकों का जीवन परिचय

कक्षा 10 लेखकों का जीवन परिचय
गद्य के लेखक
आचार्य रामचंद्र शुक्ल

जन्म
4 अक्टूबर 1884
जन्म स्थान
अगोना जिला बस्ती उत्तर प्रदेश
पिता
चंद्रबली शुक्ल
मृत्यू
2 फ़रवरी 1941

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
आचार्य रामचंद्र शुक्ल
आलोचक, निबन्धकार, साहित्येतिहासकार, कोशकार, अनुवादक, कथाकार और कवि

हिन्दी साहित्य का इतिहास उनके द्वारा लिखी गई सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है, जिसके द्वारा आज भी काल निर्धारण एवं पाठ्यक्रम निर्माण में सहायता ली जाती है।

श्यामसुन्दर दास के शब्दों में 'शब्दसागर की उपयोगिता और सर्वांगपूर्णता का अधिकांश श्रेय पं.रामचंद्र शुक्ल को प्राप्त है।

 


शिक्षा

अध्ययन के प्रति लग्नशीलता शुक्ल जी में बाल्यकाल से ही थी। किंतु इसके लिए उन्हें अनुकूल वातावरण न मिल सका। मिर्जापुर के लंदन मिशन स्कूल से स्कूल शिक्षा पूर्ण की। उनके पिता की इच्छा थी कि शुक्ल जी कचहरी में जाकर दफ्तर का काम सीखें, किंतु शुक्ल जी उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे। पिता जी ने उन्हें वकालत पढ़ने के लिए इलाहाबाद भेजा पर उनकी रुचि वकालत में न होकर साहित्य में थी। अतः परिणाम यह हुआ कि वे उसमें अनुत्तीर्ण रहे। शुक्ल जी के पिताजी ने उन्हें नायब तहसीलदारी की जगह दिलाने का प्रयास किया, किंतु उनकी स्वाभिमानी प्रकृति के कारण यह संभव न हो सका।

रचनाएँ
निबंध
  • चिंतामणि
  • मित्रता
उपन्यास
  • शशांक
सम्पादन
  • हिंदी शब्दसागर
  • नागरी प्रचारिणी पत्रिका
  • भ्रमरगीत सार
अंग्रेज़ी से अनुवाद किया
  • विश्वप्रपंच,
  • आदर्श जीवन,
  • मेगस्थनीज का भारतवर्षीय वर्णन,
  • कल्पना का आनन्द

जयशंकर प्रसाद

जन्म
30 जनवरी 1889
जन्म स्थान
वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत
मृत्यू
15 नवंबर 1937
पिता
बाबू देवीप्रसाद
सम्मान
जयशंकर प्रसाद को 'कामायनी' पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ था।

जयशंकर प्रसाद
कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार

आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में इनके कृतित्व का गौरव अक्षुण्ण है। वे एक युगप्रवर्तक लेखक थे जिन्होंने एक ही साथ कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिंदी को गौरवान्वित होने योग्य कृतियाँ दीं। कवि के रूप में वे निराला, पन्त, महादेवी के साथ छायावाद के प्रमुख स्तम्भ के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं; नाटक लेखन में भारतेन्दु के बाद वे एक अलग धारा बहाने वाले युगप्रवर्तक नाटककार रहे जिनके नाटक आज भी पाठक न केवल चाव से पढ़ते हैं, बल्कि उनकी अर्थगर्भिता तथा रंगमंचीय प्रासंगिकता भी दिनानुदिन बढ़ती ही गयी है। इस दृष्टि से उनकी महत्ता पहचानने एवं स्थापित करने में वीरेन्द्र नारायण, शांता गाँधी, सत्येन्द्र तनेजा एवं अब कई दृष्टियों से सबसे बढ़कर महेश आनन्द का प्रशंसनीय ऐतिहासिक योगदान रहा है। इसके अलावा कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में भी उन्होंने कई यादगार कृतियाँ दीं। विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करुणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन। 48 वर्षो के छोटे से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएँ की।


शिक्षा - दीक्षा

प्रसाद जी की प्रारंभिक शिक्षा काशी में क्वींस कालेज में हुई, किंतु बाद में घर पर इनकी शिक्षा का व्यापक प्रबंध किया गया, जहाँ संस्कृत, हिंदी, उर्दू, तथा फारसी का अध्ययन इन्होंने किया। दीनबंधु ब्रह्मचारी जैसे विद्वान्‌ इनके संस्कृत के अध्यापक थे। इनके गुरुओं में 'रसमय सिद्ध' की भी चर्चा की जाती है।

घर के वातावरण के कारण साहित्य और कला के प्रति उनमें प्रारंभ से ही रुचि थी और कहा जाता है कि नौ वर्ष की उम्र में ही उन्होंने 'कलाधर' के नाम से व्रजभाषा में एक सवैया लिखकर 'रसमय सिद्ध' को दिखाया था। उन्होंने वेद, इतिहास, पुराण तथा साहित्य शास्त्र का अत्यंत गंभीर अध्ययन किया था। वे बाग-बगीचे तथा भोजन बनाने के शौकीन थे और शतरंज के खिलाड़ी भी थे। वे नियमित व्यायाम करनेवाले, सात्विक खान पान एवं गंभीर प्रकृति के व्यक्ति थे। वे नागरीप्रचारिणी सभा के उपाध्यक्ष भी थे। क्षय रोग से नवम्बर 14, 1937 (दिन-सोमवार) को प्रातःकाल (उम्र 47) उनका देहान्त काशी में हुआ।

रचनाएँ
काव्य
  1. कानन कुसुम
  2. झरना
  3. आंसू
  4. लहर
  5. कामायनी
  6. प्रेम पथिक
कहानी

कथा के क्षेत्र में प्रसाद जी आधुनिक ढंग की कहानियों के आरंभयिता माने जाते हैं। सन्‌ 1912 ई. में 'इंदु' में उनकी पहली कहानी 'ग्राम' प्रकाशित हुई। उन्होंने कुल 72 कहानियाँ लिखी हैं।

  1. छाया
  2. प्रतिध्वनि
  3. आकाशदीप
  4. आंधी
  5. इन्द्रजाल
उपन्यास

प्रसाद ने तीन उपन्यास लिखे हैं।

  1. 'कंकाल', में नागरिक सभ्यता का अंतर यथार्थ उद्घाटित किया गया है।
  2. 'तितली' में ग्रामीण जीवन के सुधार के संकेत हैं।
  3. 'इरावती' ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखा गया इनका अधूरा उपन्यास है जो रोमांस के कारण ऐतिहासिक रोमांस के उपन्यासों में विशेष आदर का पात्र है।

इन्होंने अपने उपन्यासों में ग्राम, नगर, प्रकृति और जीवन का मार्मिक चित्रण किया है जो भावुकता और कवित्व से पूर्ण होते हुए भी प्रौढ़ लोगों की शैल्पिक जिज्ञासा का समाधान करता है।

नाटक
  1. स्कंदगुप्त
  2. चंद्रगुप्त
  3. ध्रुवस्वामिनी
  4. जन्मेजय का नाग यज्ञ
  5. राज्यश्री
  6. कामना
  7. एक घूंट

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

जन्म
27 May 1894
जन्म स्थान
राजनांदगांव, छत्तीसगढ़, भारत
मृत्यू
28 दिसंबर, 1971
पिता
पुन्नालाल बख्शी
सम्मान
हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा सन् 1949 में साहित्य वाचस्पति की उपाधि से अलंकृत किया गया। इसके ठीक एक साल बाद वे मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति निर्वाचित हुए।

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
मास्टरजी, निबंधकार

पदुमलाल पन्नालाल बख्शी ने अध्यापन, संपादन लेखन के क्षेत्र में कार्य किए। उन्होंने कविताएँ, कहानियाँ और निबंध सभी कुछ लिखा हैं पर उनकी ख्याति विशेष रूप से निबंधों के लिए ही है। उन्होंने 1929 से 1934 तक अनेक पाठ्यपुस्तकों यथा- पंचपात्र, विश्वसाहित्य, प्रदीप की रचना की और वे प्रकाशित हुईं।


शिक्षा

उनकी प्राथमिक शिक्षा म.प्र. के प्रथम मुख्‍यमंत्री पं॰ रविशंकर शुक्‍ल जैसे मनीषी गुरूओं के सानिध्‍य में विक्‍टोरिया हाई स्‍कूल, खैरागढ में हुई थी। प्रारंभ से ही इनकी प्रतिभा को खैरागढ के ही इतिहासकार लाल प्रद्युम्‍न सिंह जी ने समझा एवं बख्‍शी जी को साहित्‍य सृजन के लिए प्रोत्‍साहित किया और यहीं से साहित्‍य की अविरल धारा बह निकली। बख्‍शी जी ने बनारस हिन्‍दू कॉलेज से बी.ए. किया और एल.एल.बी. करने लगे, किन्‍तु वे साहित्‍य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता एवं समयाभाव के कारण एल.एल.बी. पूरा नहीं कर पाए।

रचनाएँ
कविताएँ
  1. अश्रुदल
  2. शतदल
  3. पंच-पात्र
नाटक
  1. अन्नपूर्णा का मंदिर
  2. उन्मुक्ति का बंधन
उपन्यास
  1. कथा-चक्र
  2. भोला (बाल उपन्यास)
  3. वे दिन (बाल उपन्यास)
समालोचना-निबन्ध
  1. हिन्दी साहित्य विमर्श
  2. विश्व-साहित्य
  3. हिन्दी कहानी साहित्य
  4. हिन्दी उपन्यास साहित्य
  5. प्रदीप
  6.  
  7.  
  8.  
आत्मकथा-संस्मरण
  1. मेरी अपनी कथा
  2. जिन्हें नहीं भूलूंगा
साहित्य-समग्र

बख्शी ग्रन्थावली

डॉ राजेंद्र प्रसाद

जन्म
3 दिसम्बर 1884
जन्म स्थान
बिहार के तत्कालीन सारण जिले के जीरादेई नामक गाँव
मृत्यू
28 फ़रवरी 1963
पिता
महादेव सहाय
माता
कमलेश्वरी देवी
सम्मान
भारत रत्न, भारत के प्रथम राष्ट्रपति

डॉ राजेंद्र प्रसाद
राष्ट्रपति, भारतीय स्वतंत्रता सेनानी

डॉ राजेन्द्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति एवं महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे। वे भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से थे और उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में प्रमुख भूमिका निभाई। उन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया था। राष्ट्रपति होने के अतिरिक्त उन्होंने भारत के पहले मंत्रिमंडल में 1946 एवं 1947 मेें कृषि और खाद्यमंत्री का दायित्व भी निभाया था। सम्मान से उन्हें प्रायः 'राजेन्द्र बाबू' कहकर पुकारा जाता है।


शिक्षा

बचपन में राजेन्द्र बाबू जल्दी सो जाते थे और सुबह जल्दी उठ जाते थे। उठते ही माँ को भी जगा दिया करते और फिर उन्हें सोने ही नहीं देते थे। अतएव माँ भी उन्हें प्रभाती के साथ-साथ रामायण महाभारत की कहानियाँ और भजन कीर्तन आदि रोजाना सुनाती थीं।

पाँच वर्ष की उम्र में ही राजेन्द्र बाबू ने एक मौलवी साहब से फारसी में शिक्षा शुरू किया। उसके बाद वे अपनी प्रारंभिक शिक्षा के लिए छपरा के जिला स्कूल गए।राजेन्द्र बाबू का विवाह उस समय की परिपाटी के अनुसार बाल्यकाल में ही, लगभग 13 वर्ष की उम्र में, राजवंशी देवी से हो गया। विवाह के बाद भी उन्होंने पटना की टी० के० घोष अकादमी से अपनी पढाई जारी रखी। उनका वैवाहिक जीवन बहुत सुखी रहा और उससे उनके अध्ययन अथवा अन्य कार्यों में कोई रुकावट नहीं पड़ी।

लेकिन वे जल्द ही जिला स्कूल छपरा चले गये और वहीं से 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा दी। उस प्रवेश परीक्षा में उन्हें प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था।सन् 1902 में उन्होंने कोलकाता के प्रसिद्ध प्रेसिडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया। उनकी प्रतिभा ने गोपाल कृष्ण गोखले तथा बिहार-विभूति अनुग्रह नारायण सिन्हा जैसे विद्वानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। 1915 में उन्होंने स्वर्ण पद के साथ विधि परास्नातक (एलएलएम) की परीक्षा पास की और बाद में लॉ के क्षेत्र में ही उन्होंने डॉक्ट्रेट की उपाधि भी हासिल की। राजेन्द्र बाबू कानून की अपनी पढाई का अभ्यास भागलपुर, बिहार में किया करते थे।

हिंदी भाषा से प्रेम

यद्यपि राजेन्द्र बाबू की पढ़ाई फारसी और उर्दू से शुरू हुई थी तथापि बी० ए० में उन्होंने हिंदी ही ली। वे अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी व बंगाली भाषा और साहित्य से पूरी तरह परिचित थे तथा इन भाषाओं में सरलता से प्रभावकारी व्याख्यान भी दे सकते थे। गुजराती का व्यावहारिक ज्ञान भी उन्हें था। एम० एल० परीक्षा के लिए हिन्दू कानून का उन्होंने संस्कृत ग्रंथों से ही अध्ययन किया था। हिन्दी के प्रति उनका अगाध प्रेम था। हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं जैसे भारत मित्र, भारतोदय, कमला आदि में उनके लेख छपते थे। उनके निबन्ध सुरुचिपूर्ण तथा प्रभावकारी होते थे। 1912 ई. में जब अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन कलकत्ते में हुआ तब स्वागतकारिणी समिति के वे प्रधान मन्त्री थे। 1920 ई. में जब अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का 10वाँ अधिवेशन पटना में हुआ तब भी वे प्रधान मन्त्री थे। 1923 ई. में जब सम्मेलन का अधिवेशन काकीनाडा में होने वाला था तब वे उसके अध्यक्ष मनोनीत हुए थे परन्तु रुग्णता के कारण वे उसमें उपस्थित न हो सके अतः उनका भाषण जमनालाल बजाज ने पढ़ा था। 1926 ई० में वे बिहार प्रदेशीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के और 1927 ई० में उत्तर प्रदेशीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति थे। हिन्दी में उनकी आत्मकथा बड़ी प्रसिद्ध पुस्तक है। अंग्रेजी में भी उन्होंने कुछ पुस्तकें लिखीं। उन्होंने हिन्दी के 'देश' और अंग्रेजी के 'पटना लॉ वीकली' समाचार पत्र का सम्पादन भी किया था।

रचनाएँ

राजेन्द्र बाबू ने अपनी आत्मकथा (१९४६) के अतिरिक्त कई पुस्तकें भी लिखी। जिनमे 

  1. बापू के कदमों में बाबू (१९५४),
  2. इण्डिया डिवाइडेड (१९४६),
  3. सत्याग्रह ऐट चम्पारण (१९२२),
  4. गान्धीजी की देन,
  5. भारतीय संस्कृति व खादी का अर्थशास्त्र

रामधारी सिंह दिनकर

जन्म
23 सितम्बर 1908
जन्म स्थान
मद्रास, तमिलनाडु, भारत
मृत्यू
24 अप्रैल 1974

रामधारी सिंह दिनकर
कवि, लेखक

रामधारी सिंह दिनकर हिन्दी के एक प्रमुख लेखक, कवि व निबन्धकार थे। वे आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं।

'दिनकर' स्वतन्त्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतन्त्रता के बाद 'राष्ट्रकवि' के नाम से जाने गये। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इन्हीं दो प्रवृत्तियों का चरम उत्कर्ष हमें उनकी कुरुक्षेत्र और उर्वशी नामक कृतियों में मिलता है।


शिक्षा - दीक्षा

उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास राजनीति विज्ञान में बीए किया। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था। बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक विद्यालय में अध्यापक हो गये। 1934 से 1947 तक बिहार सरकार की सेवा में सब-रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपनिदेशक पदों पर कार्य किया। 1950 से 1952 तक मुजफ्फरपुर कालेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे, भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद पर कार्य किया और उसके बाद भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार बने।

प्रमुख रचनाएँ
काव्य
  1. बारदोली-विजय संदेश

  2. प्रणभंग

  3. रेणुका

  4. हुंकार

  5. रसवन्ती

  6. द्वंद्वगीत

  7. कुरूक्षेत्र

  8. धूप-छाँह

  9. सामधेनी

  10. बापू

  11. इतिहास के आँसू

  12. धूप और धुआँ

  13. मिर्च का मज़ा

  14. रश्मिरथी

  15. दिल्ली

  16. नीम के पत्ते

  17. नील कुसुम

  18. सूरज का ब्याह

  19. चक्रवाल

  20. कवि-श्री

भगवतशरण उपाध्याय

जन्म
1910
जन्म स्थान
उजियारपुर, जिला- बलिया (उ0प्र0)
मृत्यू
12 अगस्त 1982
सम्मान
इन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की शोध पत्रिका का संपादन भी किया। ये हिन्दी विश्वकोश संपादक-मंडल के सदस्य भी रहे। इन्होंने मारीशस में भारत के राजदूत तथा विक्रम विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर पद को भी सुशोभित किया है।

भगवतशरण उपाध्याय
पुरातत्वज्ञ, इतिहासवेत्ता, संस्कृति मर्मज्ञ, विचारक, निबंधकार, आलोचक और कथाकार

उनके व्यक्तित्व का मुख्य क्षेत्र इतिहास है, उनके लेखन का मुख्य विषय इतिहास है। उनके सोचने का मुख्य नजरिया ऐतिहासिक है। फिर भी संस्कृति के बारे में उनके दृष्टिकोण और चिन्तन को देखा जाए, वैसे ही साहित्य के बारे में उनके दृष्टिकोण और चिन्तन को देखना भी कम रोचक नहीं है। हिन्दी आलोचना के विकास में अथवा आलोचना-कर्म में उपाध्याय जी की चर्चा आमतौर से नहीं सुनी जाती। हिन्दी-आलोचना पर लिखी पुस्तकों में उनका उल्लेख नहीं मिलता और हिन्दी के आलोचकों की चर्चा के प्रसंग में लेखकगण उनका ज़िक्र नहीं करते। लेकिन डॉ. भगवतशरण उपाध्याय ने साहित्य के प्रश्नों पर, ख़ासकर अपने समय के ख़ास प्रश्नों पर तो विचार किया ही है, उन्होंने बाजाब्ता साहित्य की कृतियों की व्यावहारिक समीक्षा भी की है। यह तो अलग से ध्यान देने योग्य और उल्लेखनीय है कि उन्होंने कालिदास पर जितने विस्तार से लिखा है, उतने विस्तार से और किसी ने नहीं लिखा। कालिदास उनके अत्यंत प्रिय रचनाकार हैं। उन पर डॉ. उपाध्याय ने कई तरह से विचार किया है।


शिक्षा

उपाध्याय जी ने संस्कृत, हिन्दी साहित्य, इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व का गहन अध्ययन किया।

रचनाएँ
  1. विश्व साहित्य की रूपरेखा
  2. कालिदास का भारत
  3. कादम्बरी
  4. ठूँठा आम
  5. लाल चीन
  6. गंगा-गोदावरी
  7. बुद्ध वैभव
  8. साहित्य और कला
  9. सागर की लहरों पर
  10. भारतीय इतिहास के आलोक स्तंभ
अंग्रेज़ी रचनाएँ
    • इंडिया इन कालिदास
    • विमेन इन ऋग्वेद
    • द एंशेण्ट वर्ल्ड
    • फ़ीडर्स ऑफ़ इंडियन कल्चर
 

 

जयप्रकाश भारती

जन्म
2 जनवरी, 1936
जन्म स्थान
मेरठ (उत्तर प्रदेश)
मृत्यू
5 फरवरी, 2005
सम्मान
श्रेष्ट बाल साहित्य के लेखन के लिये इन्हें उपराष्ट्रपति द्वारा रजत पदक प्रदान करके अभिनन्दित किया गया।

जयप्रकाश भारती
लेखक, सम्पादक

भारती जी ने हिन्दी बालसाहित्य पर महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उन्हें हिन्दी बाल-साहित्य का युगनिर्माता कहा जाता है। 'नंदन' को उन्होंने सर्वश्रेष्ठ बाल पत्रिका का दर्जा दिलाया।


शिक्षा

एम॰ए॰, बी॰एस-सी॰, साहित्यरत्न की परीक्षाएँ उतीर्ण कर इन्होंने पत्रकारिता तथा अन्य विषयों में डिप्लोमा किया। इनकी एक हजार से अधिक कविताएँ, कहानियाँ तथा लेख प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होने सौ से अधिक पुस्तकों का सम्पादन किया।

रचनाएँ
  • अनन्त आकाश,
  • हिमालय की पुकार,
  • अथाह सागर,
  • विज्ञान की विभूतियाँ,
  • देश हमारा,
  • चलो चाँद पर चलें,
  • सरदार भगतसिंह,
  • हमारे गौरव के प्रतीक,
  • ऐसे थे हमारे बापू,
  • बर्फ की गुड़िया,
  • दुनिया रंग बिरंगी
  • भारत की प्रतिनिधि लोक-कथाएँ
  • हिन्दी की सौ श्रेष्ठ पुस्तकें
  • हिन्दी पत्रकारिता : दशा और दिशा
  • बाल पत्रकारिता, स्वर्ण युग की ओर
  • हिन्दी के श्रेष्ठ बालगीत
  • एक थाल मोतियों भरा : जीवन निर्माण की प्रेरक कथाएँ
  • भारतीय बाल साहित्य का इतिहास

पद्य के लेखक
सूरदास

गोस्वामी तुलसीदास

रसखान

बिहारीलाल

सुमित्रानंदन पंत

महादेवी वर्मा

पंडित राम नरेश त्रिपाठी

माखनलाल चतुर्वेदी

सुभद्रा कुमारी चौहान

मैथिलीशरण गुप्त

केदारनाथ सिंह

अशोक बाजपेई

श्याम नारायण पांडे

कक्षा 9 लेखकों का जीवन परिचय

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